पंचांग 2027

सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत में

रामचरितमानस

Ramcharitmanas

  • भाषा अवधी
  • किसकी तुलसीदास
  • कब सोलहवीं सदी
  • कहाँ काशी और अयोध्या

यह कथा

अवधी में तुलसीदास की रचना, जो उत्तर भारत में सबसे ज़्यादा पढ़ी और गाई जाती है। यहाँ कथा भक्ति की तरफ़ झुकती है: हनुमान मच्छर जितने छोटे होते हैं, विभीषण का घर तुलसी से पहचाना जाता है, और लौटने से पहले विदा लेना उतना ही ज़रूरी है जितना लंका जलाना।

एक नज़र में

रामचरितमानस, अपनी लिपि में

रामचरितमानस

लिपि
देवनागरी, अवधी
रूप
सात कांड, चौपाई और दोहे; सुंदरकांड 60 दोहों का
समय
सन 1574 में अयोध्या में शुरू, रामनवमी के दिन

इस कथा की लंका

  • हनुमान जी मच्छर जितना रूप लेकर लंका में जाते हैं, और लंकिनी को एक मुक्का पड़ते ही समझ आ जाता है कि रावण का अंत शुरू हो गया।
  • विभीषण का घर तुलसी के पौधों और राम के आयुधों के निशान से पहचाना जाता है; वाल्मीकि के सुंदरकांड में यह मुलाक़ात नहीं।
  • लंका जलाकर हनुमान जी फिर सीता जी के सामने हाथ जोड़कर खड़े होते हैं, और तभी चूड़ामणि मिलती है।

आज: उत्तर भारत की रामलीला इसी से खेली जाती है (यूनेस्को सूची, 2008), और सुंदरकांड का पाठ घर घर होता है।

स्रोत:

  1. en.wikipedia.org
  2. britannica.com
  3. ich.unesco.org

इस कथा की एक खुली प्रति

सुंदरकांड के पल, इस कथा में

खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।

खुला हुआ मुँह

पहली रात: खोज

मानस में भी यह पड़ाव आता है, और वहाँ भी वे नागों की माता हैं।

तुलसीदास इसे परीक्षा कहकर ही लिखते हैं, इसलिए वहाँ कोई कड़वाहट नहीं बचती।

वे कहती हैं कि देवताओं ने उन्हें भेजा है, और रास्ता तभी मिलेगा जब मुँह में से निकलकर दिखाओ।

मुँह बड़ा होता जाता है, और सामने वाला अचानक अंगूठे जितना छोटा होकर भीतर से निकल जाता है।

निकलते ही वे आशीर्वाद देती हैं और रास्ता खुल जाता है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, सुरसा वाला प्रसंग · सुरसा

अपने ऊपर की पहरेदारी

पहली रात: खोज

मानस इस सवाल पर ठहरता नहीं।

वहाँ यह बात पहले से तय है कि भीतर जाने वाला किस भाव से जा रहा है।

वहाँ वे उन कमरों से यूँ गुज़रते हैं जैसे कोई बच्चा माँ के घर में गुज़रता हो।

देखने और ताकने का फ़र्क़ मानस में पहले ही तय हो चुका है।

इसलिए तुलसीदास को यह सवाल उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

रामचरितमानस, सुंदरकांड

नाम लेकर चलना

पहली रात: खोज

वे नाम लेते हैं, और उसी के सहारे भीतर घुस जाते हैं।

छोटा रूप लेकर वे राम को याद करते हुए लंका की तरफ़ चले, और उसी याद के सहारे भीतर घुसे।

जैसे ही वे नाम लेते हैं, चाल हल्की हो जाती है और पैर अपने आप आगे पड़ने लगते हैं।

भीतर का डर बाहर के पहरे से बड़ा था, और वही पहले उतरता है।

यही वह पंक्ति है जो सबसे ज़्यादा दोहराई जाती है, क्योंकि उसमें डर और सहारा दोनों एक साथ हैं।

रामचरितमानस, सुंदरकांड

मंदोदरी का कक्ष

पहली रात: खोज

वहाँ यह ग़लतफ़हमी होती ही नहीं।

वे कमरों से ऐसे गुज़रते हैं जैसे कोई बच्चा माँ के घर में गुज़रता हो।

वे कमरे देखते हैं, सोए हुए लोग देखते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं।

किसी को ग़लती से पहचान लेने वाला पल यहाँ आता ही नहीं।

कौन सी कथा कहाँ रुकती है, इसी से उसका मिज़ाज पता चलता है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड · मंदोदरी

बिल्ली जितना

पहली रात: खोज

मानस में यह रूप और भी छोटा है, मच्छर जितना।

बिल्ली फिर भी दिख सकती है, मच्छर नहीं।

इसी छोटे से फ़र्क़ से तुलसीदास अपनी बात कह देते हैं।

और उसी चौपाई में वे यह भी जोड़ते हैं कि भीतर जाते हुए उन्होंने राम को याद किया।

रामचरितमानस, सुंदरकांड

पाँच सेनापतियों की क़तार

दूसरा दिन: आग

एक के बाद एक सेनापति भेजे जाते हैं, और दरबार में हर बार वही ख़बर लौटती है।

नाम कोई नहीं गिनाता, सिर्फ़ यह गिना जाता है कि कितने नहीं लौटे।

जो भेजे गए, वे लौटे नहीं, और उनका सामान ही वापस आता है।

हर बार दरबार में ख़बर पहुँचती है, और हर बार सन्नाटा थोड़ा और गहरा होता है।

मानस यहाँ गिनती नहीं रखता, सिर्फ़ नतीजा रखता है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड

निकुंभिला का मैदान

दूसरा दिन: आग

मानस में यह नाम इस रात नहीं, आगे की लड़ाई में आता है।

वहाँ रावण का बेटा इसी मैदान पर यज्ञ करता है, और वही यज्ञ तोड़ा जाता है।

वहाँ वह छिपकर यज्ञ करता है, ताकि कोई रोक न सके।

यज्ञ पूरा हो जाता तो उसे हराना मुश्किल था, इसलिए उसे बीच में ही तोड़ा जाता है।

यानी जो नाम आज सिर्फ़ धमकी में आया, वह आगे सबसे बड़ा मोड़ बन जाता है।

रामचरितमानस, लंकाकांड, निकुंभिला वाला प्रसंग

वाटिका का तोरण

दूसरा दिन: आग

मानस में यह पूरी कड़ी तेज़ी से बीतती है। रखवाले आते हैं, फिर सेना, फिर अक्षय।

तुलसीदास नाम गिनाने पर नहीं रुकते, वे उस एक बात पर रुकते हैं कि जो भी आया, लौटा नहीं।

तोरण पर चढ़कर वे नीचे देखते हैं, और नीचे से पत्थर आने लगते हैं।

हर बार जो लौटकर ख़बर देता है, वह यही कहता है कि यह कोई आम वानर नहीं।

इसीलिए वहाँ यह हिस्सा लड़ाई कम और चेतावनी ज़्यादा लगता है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, अक्षय वध वाला हिस्सा · अक्षय कुमार

जो दृश्य यहाँ नहीं है

छठी रात: विद्याधरों की लंका

वे उन्हें अँगूठी देते हैं, और हाथ काँपते हुए वह ली जाती है।

बदले में चूड़ामणि मिलती है, और वही निशानी बनकर लौटती है।

पास खड़ी राक्षसी दूर देखने लगती है, जैसे उसने कुछ देखा ही न हो।

दोनों के हाथ एक पल को रुकते हैं, और फिर वे मुड़ जाते हैं।

जैन परंपरा में यह पूरा लेन देन आता ही नहीं।

रामचरितमानस, सुंदरकांड; तुलना में

लंका का द्वार

पहली रात: खोज

रात है। वे मच्छर जितने छोटे होकर नगर में घुसना चाहते हैं, पर द्वार पर एक राक्षसी उन्हें रोक लेती है।

वह पूछती है कि तू कौन है और चोरों की तरह क्यों घुस रहा है। वे कुछ कहते नहीं, बस एक घूँसा मारते हैं।

वह गिर पड़ती है, मुँह से खून आता है। गिरी हुई हालत में ही उसे वह पुरानी बात याद आती है जो उससे कही गई थी, कि जिस दिन कोई वानर उसे मारेगा, उसी दिन से राक्षसों के दिन पूरे समझना।

अब वह डरती नहीं। वह हाथ जोड़कर कहती है कि जिसके मन में राम का नाम बस गया, उसके लिए यह नगर कुछ भी नहीं। फिर वह ख़ुद उसे भीतर जाने देती है।

· लंकिनी

नगर की गलियाँ

पहली रात: खोज

यही नगर, दूसरी कथा में।

यहाँ वे मच्छर जितने छोटे होकर भीतर घुसते हैं, इतने छोटे कि किसी की नज़र में आने का सवाल ही नहीं।

इतने छोटे रूप में हवा भी तेज़ लगती है, और हर आवाज़ पास से गुज़रती हुई।

वे दीवार के साथ साथ चलते हैं, और जहाँ रोशनी पड़ती है वहाँ रुक जाते हैं।

सोने के महल, पहरे, और बीच में एक अदृश्य सी हलचल।

रावण का महल

पहली रात: खोज

मानस में महल की खोज तेज़ी से बीतती है। वे एक कमरे से दूसरे कमरे में जाते हैं और सोते हुए रावण को भी देख लेते हैं।

तुलसीदास ठहरते वहीं हैं जहाँ मन ठहरता है: सोने के महलों के बीच भी वह नहीं मिलती जिसे ढूँढा जा रहा है।

सोते हुए रावण के चारों ओर रानियाँ पड़ी हैं, और दीये मद्धम पड़ चुके हैं।

वे एक पल रुककर उसे देखते हैं, फिर बिना आवाज़ किए आगे बढ़ जाते हैं।

इसी के तुरंत बाद वह घर आता है जहाँ तुलसी है और राम का नाम लिया जा रहा है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, महल की खोज

एक अलग सा घर

पहली रात: खोज

मानस में यह घर इसलिए दिखता है कि वहाँ तुलसी लगी है और राम का नाम लिया जा रहा है।

हनुमान ठिठक जाते हैं, क्योंकि राक्षसों के नगर में यह आवाज़ कहीं और नहीं सुनाई दी।

घर छोटा है, और उसके आँगन में एक पौधा लगा है, जिसके चारों ओर मिट्टी का घेरा बना है।

भीतर कोई धीमे स्वर में नाम ले रहा है, और वह आवाज़ रुकती नहीं।

विभीषण से भेंट यहीं होती है, और वही आगे का रास्ता बताते हैं।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, विभीषण से भेंट · विभीषण

अशोक वाटिका

पहली रात: खोज

मानस में यही पल थोड़ा और खुलकर आता है। रावण पूरे ठाठ के साथ आता है, साथ में उसकी रानियाँ और दीये।

वह मनाता है, फिर डराता है। सीता रावण से सीधे बात नहीं करतीं, बीच में एक तिनका रख लेती हैं, और उसी की ओट से जवाब देती हैं।

साथ आई रानियाँ दीये लिए खड़ी रहती हैं, और कोई कुछ नहीं बोलती।

उसके जाते ही राक्षसियाँ पास आकर घेरा छोटा कर लेती हैं।

तुलसीदास यहाँ ठहरकर यह भी कहते हैं कि डर उनके मन में नहीं, उसके मन में है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, रावण का वाटिका आना

अशोक वाटिका

दूसरा दिन: आग

मानस में बाग़ उजाड़ना भूख से शुरू होता है। वे पहले फल खाते हैं, फिर पेड़ तोड़ने लगते हैं।

रखवाले दौड़ते हैं और रावण तक ख़बर पहुँचती है। तुलसीदास इसे लड़ाई की तरह नहीं, ललकार की तरह लिखते हैं।

फल खाते हुए वे डालों पर झूलते हैं, और नीचे गुठलियाँ गिरती जाती हैं।

रखवाले पहले दूर से चिल्लाते हैं, फिर पास आने की हिम्मत करते हैं।

यहीं से वह कड़ी शुरू होती है जो दरबार तक जाती है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, बाग़ उजाड़ना

रावण का दरबार

दूसरा दिन: आग

बँधे हुए वे दरबार में लाए जाते हैं। रावण हँसकर पूछता है कि तू कौन है और मेरा बाग़ किसके बल पर उजाड़ा।

वे सीधा जवाब देते हैं। वे कहते हैं कि जिसने पहाड़ जैसे बलवानों को तिनके की तरह उठा दिया, वही मेरे स्वामी हैं, और तू उनकी पत्नी को उठा लाया है।

वह सलाह भी देता है कि अब भी लौटा दे तो जान बच जाएगी। पूरी सभा सुनती है, और रावण का गुस्सा बढ़ता जाता है।

मारने का हुक्म होता है, तभी उसका अपना भाई कहता है कि दूत को मारा नहीं जाता। तब तय होता है कि पूँछ जलाकर उसे नगर में घुमाया जाए।

नगर का चौक

दूसरा दिन: आग

मानस में यह दृश्य हँसी और डर, दोनों का है। कपड़े लपेटे जाते हैं, तेल डाला जाता है, और पूरा नगर देखने जमा होता है।

पूँछ बढ़ती जाती है, कपड़े कम पड़ते जाते हैं, और नगर का तेल और घी ख़त्म होने लगता है।

भीड़ में बच्चे आगे आकर देखते हैं, और बड़े उन्हें पीछे खींचते हैं।

आग लगते ही वे एक छलाँग में छत पर पहुँच जाते हैं, और भीड़ पीछे हट जाती है।

तुलसीदास कहते हैं कि जिसे खिलौना समझकर आग लगाई गई, वही आग पूरे नगर की हो गई।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, पूँछ में आग

जलती छतें

दूसरा दिन: आग

राक्षस पूँछ पर कपड़े लपेटते हैं, तेल डालते हैं, और नगर में घुमाते हुए आग लगा देते हैं।

वे छोटे होकर बंधन से निकल जाते हैं, फिर बड़े होकर छत दर छत कूदते हैं। जलती पूँछ जहाँ छूती है, वहीं आग लग जाती है।

देखते देखते सोने की लंका धुएँ में डूब जाती है। लोग भागते हैं, और वे ऊपर से सब देखते हैं।

आख़िर में वे समुद्र में जाकर पूँछ बुझाते हैं, फिर बग़ीचे में लौटकर विदा लेते हैं, और तब उड़ते हैं।

अशोक वाटिका

दूसरा दिन: आग

मानस में विदाई का यह पल अलग से आता है, और लंका जलाने के बाद आता है।

वे दोबारा सीता के पास जाते हैं, विदा माँगते हैं, और चूड़ामणि लेकर चलते हैं।

जाते हुए वे यह भी कहते हैं कि थोड़ा ही समय बचा है, राम जल्दी आएँगे।

वे झुककर प्रणाम करते हैं, और उठते हुए एक पल को रुक जाते हैं।

तुलसीदास के लिए विदा लेना उतना ही ज़रूरी है जितना लंका जलाना।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, विदाई और चूड़ामणि

लौटती उड़ान

तीसरा हिस्सा: ख़बर

मानस में लौटती छलाँग से पहले वे राम का नाम लेते हैं, और तभी कूदते हैं।

उस धक्के से पहाड़ काँपता है और पेड़ हिल जाते हैं।

पैरों के नीचे की चट्टान दबकर धँस जाती है, और नीचे मिट्टी झर जाती है।

एक ही उछाल में वे बादलों के ऊपर पहुँच जाते हैं।

जाते वक़्त की छलाँग में सवाल था, लौटती छलाँग में जवाब है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, लौटती छलाँग

मधुवन

तीसरा हिस्सा: ख़बर

मानस में भी लौटती टोली मधुबन में घुसती है और फल तथा शहद पर टूट पड़ती है।

रखवाले रोकते हैं, धक्का मुक्की होती है, और शिकायत सुग्रीव तक पहुँचती है।

शहद हाथों से टपकता है और बालों तक पहुँच जाता है।

कोई पेड़ पर चढ़कर नीचे फल फेंकता है, और नीचे वाले उन्हें लपकते हैं।

सुग्रीव ग़ुस्सा नहीं करते, उलटा ख़ुश होते हैं, क्योंकि ऐसा ऊधम हारकर लौटने वाले नहीं करते।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, मधुबन

सुग्रीव का महल

तीसरा हिस्सा: ख़बर

मानस में किष्किंधा वाला यह हिस्सा छोटा है। ख़बर पहुँचती है और सब तुरंत राम की तरफ़ चल पड़ते हैं।

तुलसीदास सुग्रीव के फ़ैसले पर नहीं रुकते, वे उस उतावली पर रुकते हैं जो ख़बर सुनते ही सब में आ जाती है।

कोई हथियार उठाता है, कोई बिना कुछ लिए ही चल पड़ता है।

रास्ते में वे एक दूसरे से वही बात बार बार पूछते हैं।

यही उतावली आगे पूरी सेना को समुद्र तक ले जाती है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, ख़बर पहुँचने वाला हिस्सा

राम का शिबिर

तीसरा हिस्सा: ख़बर

वानरों का शोर सुनकर राम समझ जाते हैं कि काम हो गया, क्योंकि हारकर लौटने वाले ऐसे नहीं आते।

हनुमान सामने आकर पहले सिर झुकाते हैं, फिर कहते हैं कि सीता देखी गईं। वे निशानी सौंपते हैं और उनका संदेश कहते हैं।

राम निशानी को छाती से लगा लेते हैं और पूछते हैं कि वे किस हाल में थीं, क्या कहा उन्होंने।

यहाँ यह भी है कि हनुमान उन्हें अपनी शक्ति का भरोसा देकर आए थे, कि चाहें तो वे उन्हें अभी ले आते।

इस कथा के 4 और पल खेल के भीतर पढ़े जा सकते हैं: उस पार का किनारा, पेड़ की ऊँची डाल, वाटिका का कोना।

इस कथा से खेल के पत्ते

खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।

  • वही नाम, आगे की लड़ाई में
  • सोलह से बत्तीस
  • मानस में गिनती नहीं, नतीजा
  • तुलसी से हुई पहचान
  • मानस वाली विदाई
  • मानस वाली रक्षिका
  • मच्छर जितना
  • बड़ा रूप दिखाना
  • भरे दरबार में जवाब
  • जाने से पहले विदा

खेल में ढूँढो

उपन्यास

इस कथा की लंका, उपन्यास में

मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा उनतालीस लंकाएँ इस कथा की लंका में उतरती है। तीनों खंड लिखे जा चुके हैं, और प्रकाशन की तैयारी में हैं।

रामचरितमानस इन त्योहारों के पन्नों पर भी आती है, उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 में: मौनी अमावस्या, शबरी जयंती, महाशिवरात्रि, राम नवमी, परशुराम जयंती, जया पार्वती व्रत, तुलसीदास जयंती, शारदीय नवरात्रि, दशहरा, भरत मिलाप, करवा चौथ, तुलसी विवाह, वैकुंठ चतुर्दशी, विवाह पंचमी। ये दिन, और साल का हर त्योहार और व्रत, एक बार दबाकर अपने फ़ोन के कैलेंडर में: Manu Vishranti Calendar जोड़ें।

गाथा देखो

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

रामचरितमानस किस भाषा में है?

अवधी।

रामचरितमानस किसकी रचना है?

तुलसीदास।

रामचरितमानस कहाँ की है?

काशी और अयोध्या।

रामचरितमानस कब की है?

सोलहवीं सदी।