रावण और शिव, हनुमान जी और रुद्र
रामकथा में शिव कई जगह हैं, पर हर बात एक ग्रंथ से नहीं आती। रावण के शिव का पर्वत हिलाने (जिसे परंपरा कैलाश मानती है) और उसका नाम पड़ने की कथा वाल्मीकि के उत्तर कांड में है। हनुमान जी को रुद्र का अवतार शिव पुराण कहता है, वाल्मीकि नहीं। शिव तांडव स्तोत्र परंपरा से रावण का माना जाता है, पर वह वाल्मीकि रामायण में नहीं है। और रामेश्वरम के दो लिंगों की कथा बाद के पुराणों और मंदिर की अपनी परंपरा से आती है।

एक नज़र में
| बात | कौन सा ग्रंथ कहता है | कहाँ |
|---|---|---|
| रावण का शिव का पर्वत हिलाना, नाम रावण पड़ना | वाल्मीकि रामायण (पर्वत का नाम परंपरा से कैलाश) | उत्तर कांड, सर्ग 16 |
| शिव तांडव स्तोत्र रावण का | परंपरा; स्तोत्र का अपना आख़िरी श्लोक | वाल्मीकि रामायण में नहीं |
| हनुमान जी रुद्र के अवतार | शिव पुराण | शतरुद्र संहिता, अध्याय 20 |
| शिव का हनुमान जी को वरदान | वाल्मीकि रामायण | उत्तर कांड, सर्ग 36, श्लोक 18 |
| रामेश्वरम में शिव की कृपा | वाल्मीकि रामायण | युद्ध कांड, सर्ग 123 |
| रामलिंगम और विश्वलिंगम | बाद के पुराण और मंदिर की परंपरा | रामनाथस्वामी मंदिर |
रावण ने कैलाश उठाया, और नाम पाया
वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड, सर्ग 16 में रावण शिव के पर्वत को हिलाता है (श्लोक 20)। वाल्मीकि पहाड़ का नाम नहीं लेते, परंपरा उसे कैलाश मानती है। शिव खेल खेल में अपने पैर के अँगूठे से पहाड़ को दबा देते हैं (श्लोक 21)। रावण की भुजाएँ दब जाती हैं, और उसकी चीख़ तीनों लोकों में भर जाती है (श्लोक 22 और 23)।
तब शिव कहते हैं कि तूने तीनों लोकों को रुलाया, इसलिए तेरा नाम रावण होगा (श्लोक 26 और 27), यानी जो दूसरों को रुलाए (श्लोक 28)। यह कथा सुंदरकांड से बहुत पहले की है, पर रावण की शिव भक्ति यहीं से शुरू होती है।
शिव तांडव स्तोत्र
परंपरा कहती है कि शिव तांडव स्तोत्र रावण ने रचा। स्तोत्र ख़ुद अपने सत्रहवें श्लोक में ख़ुद को "दशवक्त्रगीतं", यानी दस मुँह वाले का गाया हुआ, कहता है, और इसके अंत में "श्रीरावणकृतं" लिखा मिलता है। पर यह स्तोत्र वाल्मीकि रामायण में नहीं है, और यह कब लिखा गया, यह पक्का नहीं पता।
हनुमान जी और रुद्र
शिव पुराण की शतरुद्र संहिता (अध्याय 20) में हनुमान जी को शिव का, रुद्र का अवतार कहा गया है, जो राम के काम के लिए अंजना के गर्भ से जन्मे। स्कंद पुराण के एक पाठ में उन्हें ग्यारहवाँ रुद्र कहा गया है। वाल्मीकि रामायण यह बात नहीं कहती; वहाँ वे वायु के पुत्र हैं।
वाल्मीकि में शिव का हनुमान जी से रिश्ता एक वरदान का है: बचपन में शंकर उन्हें वर देते हैं कि वे न शिव से मरेंगे, न शिव के हथियारों से (उत्तर कांड, सर्ग 36, श्लोक 18)। बाकी वरदान वरदानों वाले पन्ने पर हैं।
रामेश्वरम के दो लिंग
वाल्मीकि रामायण में रामेश्वरम में लिंग स्थापित करने की कथा नहीं है। युद्ध के बाद पुष्पक विमान से लौटते हुए राम बस इतना कहते हैं कि यहाँ शिव ने उन पर कृपा की थी, और सेतुबंध एक पवित्र तीर्थ है (युद्ध कांड, सर्ग 123, श्लोक 19 से 21)।
दो लिंगों की कथा बाद के पुराणों और रामनाथस्वामी मंदिर की अपनी परंपरा की है। तमिलनाडु पर्यटन विभाग के अनुसार राम शिव की पूजा करना चाहते थे। हनुमान जी लिंग लाने गए और देर हो गई, तो सीता जी ने रेत से एक लिंग बना दिया, जो रामलिंगम कहलाता है। हनुमान जी का लाया लिंग विश्वलिंगम है। मंदिर में माना जाता है कि पहले विश्वलिंगम की पूजा हो।
यह पूजा युद्ध से पहले हुई या बाद में, इस पर भी कथाएँ अलग हैं: कुछ पुराण इसे जीत के लिए, युद्ध से पहले रखते हैं, और मंदिर की कथा कहती है युद्ध के बाद, प्रायश्चित के लिए। रामेश्वरम के पास का समुद्र तट, धनुषकोडी, उनतालीस लंकाएँ की कथा में भी आता है।










