हनुमान जी की छलाँग
हनुमान जी लंका के लिए महेंद्र पर्वत से छलाँग लगाते हैं। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड का पहला सर्ग इसी छलाँग का है, और वह इसे इतना बड़ा दिखाता है कि पहाड़ दब जाता है, पेड़ जड़ से उखड़कर उनके पीछे उड़ते हैं, और समुद्र पर उनकी परछाईं दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी पड़ती है।

एक नज़र में
| कथा | छलाँग कहाँ से | क्या दिखता है | कहाँ लिखा है |
|---|---|---|---|
| वाल्मीकि रामायण | महेंद्र पर्वत | पहाड़ दबता है, पेड़ पीछे उड़ते हैं, समुद्र पर 10 × 30 योजन की परछाईं | सुंदरकांड, सर्ग 1 |
| रामचरितमानस | समुद्र किनारे का पहाड़ | पहाड़ पाताल में चला जाता है, छलाँग राम के बाण जैसी | सुंदरकांड, पहले दोहे से पहले |
| जैन रामकथा | छलाँग नहीं, तेज़ विमान से | रास्ते में नाना महेंद्र से लड़ाई और मेल | त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6 |
वाल्मीकि रामायण में: पहाड़ दब जाता है
छलाँग से पहले हनुमान जी पहाड़ को हाथों और पैरों से दबाते हैं। दबाव से पहाड़ में सोने, चाँदी और काजल के रंग की धारियाँ उभर आती हैं, और उसमें से पानी ऐसे फूटता है जैसे मद में डूबे हाथी के माथे से (सर्ग 1, श्लोक 14 और 15)।
पहाड़ की गुफ़ाओं में रहने वाले जीव चीख़ उठते हैं। बड़े बड़े साँप, जिनके फनों पर स्वस्तिक के निशान हैं, आग उगलने लगते हैं (श्लोक 19)। वहाँ तप करने वाले ऋषि और विद्याधर पहाड़ छोड़कर आकाश में उड़ जाते हैं।
वे अपनी पूँछ ऊपर उठाते हैं, और वह इंद्र के सम्मान में गाड़े गए खंभे जैसी दिखती है (श्लोक 61)। उनकी भुजाएँ ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ की चोटी से पाँच फन वाले साँप निकल रहे हों (श्लोक 56)।
पेड़ पीछे उड़ते हैं, बादल साथ खिंचते हैं
छलाँग इतनी तेज़ है कि शाल के पेड़ जड़ से उखड़कर उनके पीछे ऐसे उड़ते हैं जैसे राजा के पीछे सैनिक चलते हैं (श्लोक 48)। कुछ दूर जाकर वे फूल बरसाते हुए समुद्र में गिर जाते हैं (श्लोक 52)।
समुद्र पर उनकी परछाईं दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी पड़ती है, और पानी पर ऐसे चमकती है जैसे घने सफ़ेद बादलों की कतार (श्लोक 76 और 77)। सफ़ेद, लाल, नीले और मजीठ रंग के बड़े बादल उनके साथ खिंचते चले आते हैं (श्लोक 80 और 81)।
रास्ते में मैनाक पर्वत समुद्र से ऊपर उठकर उन्हें आराम करने को कहता है, सुरसा उनकी परीक्षा लेती है, और सिंहिका उनकी परछाईं पकड़ लेती है। तीनों की कथा उनके अपने पन्नों पर है: मैनाक, सुरसा और सिंहिका। समुद्र के सारे जीव, हर कथा में, इस पन्ने पर हैं।
रामचरितमानस में: राम का बाण
तुलसीदास इस छलाँग को राम के उस बाण से मिलाते हैं जो कभी ख़ाली नहीं जाता: "जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥" और जिस पहाड़ पर वे पैर रखते हैं, वह तुरंत पाताल में चला जाता है: "जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥" दोनों चौपाइयाँ रामचरितमानस के सुंदरकांड की शुरुआत में, पहले दोहे से पहले हैं।
जैन रामकथा में: महेंद्र, पहाड़ नहीं, नाना
वाल्मीकि में महेंद्र वह पहाड़ है जहाँ से छलाँग लगती है। हेमचंद्र की जैन रामकथा में महेंद्र एक राजा हैं, और हनुमान जी के नाना। लंका जाते हुए हनुमान जी उनका नगर देखते हैं, और अपनी माँ अंजना को घर से निकाले जाने की बात याद करके उनसे लड़ पड़ते हैं। वे पहले मामा प्रसन्नकीर्ति को पकड़ते हैं, फिर नाना को, और तब बताते हैं कि वे अंजना के बेटे हैं। दोनों में मेल हो जाता है, और महेंद्र राम का साथ देने चल पड़ते हैं (त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित, पर्व 7, सर्ग 6)। जैन कथा में हनुमान जी समुद्र कूदते नहीं, एक बहुत तेज़ विमान में लंका जाते हैं। और कथा जैन रामकथा के पन्ने पर है।
इस पर और
हर कथा का अपना पन्ना है, और हर पात्र का भी।










