पंचांग 2027

सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में

हनुमान जी की छलाँग

सीधा जवाब

हनुमान जी लंका के लिए महेंद्र पर्वत से छलाँग लगाते हैं। वाल्मीकि रामायण के सुंदरकांड का पहला सर्ग इसी छलाँग का है, और वह इसे इतना बड़ा दिखाता है कि पहाड़ दब जाता है, पेड़ जड़ से उखड़कर उनके पीछे उड़ते हैं, और समुद्र पर उनकी परछाईं दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी पड़ती है।

उनतालीस लंकाएँ: समुद्र के बीच से खुलता सुनहरा रास्ता
उनतालीस लंकाएँ: समुद्र के बीच से खुलता सुनहरा रास्ता

एक नज़र में

एक नज़र में: हनुमान जी की छलाँग
कथाछलाँग कहाँ सेक्या दिखता हैकहाँ लिखा है
वाल्मीकि रामायणमहेंद्र पर्वतपहाड़ दबता है, पेड़ पीछे उड़ते हैं, समुद्र पर 10 × 30 योजन की परछाईंसुंदरकांड, सर्ग 1
रामचरितमानससमुद्र किनारे का पहाड़पहाड़ पाताल में चला जाता है, छलाँग राम के बाण जैसीसुंदरकांड, पहले दोहे से पहले
जैन रामकथाछलाँग नहीं, तेज़ विमान सेरास्ते में नाना महेंद्र से लड़ाई और मेलत्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6

वाल्मीकि रामायण में: पहाड़ दब जाता है

छलाँग से पहले हनुमान जी पहाड़ को हाथों और पैरों से दबाते हैं। दबाव से पहाड़ में सोने, चाँदी और काजल के रंग की धारियाँ उभर आती हैं, और उसमें से पानी ऐसे फूटता है जैसे मद में डूबे हाथी के माथे से (सर्ग 1, श्लोक 14 और 15)।

पहाड़ की गुफ़ाओं में रहने वाले जीव चीख़ उठते हैं। बड़े बड़े साँप, जिनके फनों पर स्वस्तिक के निशान हैं, आग उगलने लगते हैं (श्लोक 19)। वहाँ तप करने वाले ऋषि और विद्याधर पहाड़ छोड़कर आकाश में उड़ जाते हैं।

वे अपनी पूँछ ऊपर उठाते हैं, और वह इंद्र के सम्मान में गाड़े गए खंभे जैसी दिखती है (श्लोक 61)। उनकी भुजाएँ ऐसी लगती हैं जैसे पहाड़ की चोटी से पाँच फन वाले साँप निकल रहे हों (श्लोक 56)।

पेड़ पीछे उड़ते हैं, बादल साथ खिंचते हैं

छलाँग इतनी तेज़ है कि शाल के पेड़ जड़ से उखड़कर उनके पीछे ऐसे उड़ते हैं जैसे राजा के पीछे सैनिक चलते हैं (श्लोक 48)। कुछ दूर जाकर वे फूल बरसाते हुए समुद्र में गिर जाते हैं (श्लोक 52)।

समुद्र पर उनकी परछाईं दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी पड़ती है, और पानी पर ऐसे चमकती है जैसे घने सफ़ेद बादलों की कतार (श्लोक 76 और 77)। सफ़ेद, लाल, नीले और मजीठ रंग के बड़े बादल उनके साथ खिंचते चले आते हैं (श्लोक 80 और 81)।

रास्ते में मैनाक पर्वत समुद्र से ऊपर उठकर उन्हें आराम करने को कहता है, सुरसा उनकी परीक्षा लेती है, और सिंहिका उनकी परछाईं पकड़ लेती है। तीनों की कथा उनके अपने पन्नों पर है: मैनाक, सुरसा और सिंहिका। समुद्र के सारे जीव, हर कथा में, इस पन्ने पर हैं।

रामचरितमानस में: राम का बाण

तुलसीदास इस छलाँग को राम के उस बाण से मिलाते हैं जो कभी ख़ाली नहीं जाता: "जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥" और जिस पहाड़ पर वे पैर रखते हैं, वह तुरंत पाताल में चला जाता है: "जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥" दोनों चौपाइयाँ रामचरितमानस के सुंदरकांड की शुरुआत में, पहले दोहे से पहले हैं।

जैन रामकथा में: महेंद्र, पहाड़ नहीं, नाना

वाल्मीकि में महेंद्र वह पहाड़ है जहाँ से छलाँग लगती है। हेमचंद्र की जैन रामकथा में महेंद्र एक राजा हैं, और हनुमान जी के नाना। लंका जाते हुए हनुमान जी उनका नगर देखते हैं, और अपनी माँ अंजना को घर से निकाले जाने की बात याद करके उनसे लड़ पड़ते हैं। वे पहले मामा प्रसन्नकीर्ति को पकड़ते हैं, फिर नाना को, और तब बताते हैं कि वे अंजना के बेटे हैं। दोनों में मेल हो जाता है, और महेंद्र राम का साथ देने चल पड़ते हैं (त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित, पर्व 7, सर्ग 6)। जैन कथा में हनुमान जी समुद्र कूदते नहीं, एक बहुत तेज़ विमान में लंका जाते हैं। और कथा जैन रामकथा के पन्ने पर है।

इस पर और

हर कथा का अपना पन्ना है, और हर पात्र का भी।

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

हनुमान जी ने लंका के लिए छलाँग कहाँ से लगाई?

वाल्मीकि रामायण के अनुसार महेंद्र पर्वत से। सुंदरकांड का पहला सर्ग इसी छलाँग का है।

समुद्र पर हनुमान जी की परछाईं कितनी बड़ी थी?

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1, श्लोक 76 और 77 के अनुसार दस योजन चौड़ी और तीस योजन लंबी, जो समुद्र पर सफ़ेद बादलों की कतार जैसी चमकती थी।

छलाँग के समय पेड़ों का क्या हुआ?

शाल के पेड़ जड़ से उखड़कर उनके पीछे ऐसे उड़े जैसे राजा के पीछे सैनिक, और फिर फूल बरसाते हुए समुद्र में गिर गए (सर्ग 1, श्लोक 48 और 52)।

रामचरितमानस में छलाँग को किससे मिलाया गया है?

राम के अमोघ बाण से, जो कभी ख़ाली नहीं जाता: "जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना॥"

जैन रामकथा में महेंद्र कौन हैं?

हेमचंद्र की जैन रामकथा में महेंद्र हनुमान जी के नाना हैं, जिनसे वे लंका जाते हुए लड़ते हैं और फिर मेल कर लेते हैं।

In English

Hanuman leaps for Lanka from Mount Mahendra. In Valmiki's Sundara Kanda (sarga 1) the mountain streams gold, silver and dark minerals under his feet, snakes spit fire, uprooted sal trees fly after him "like soldiers following their king" and fall into the sea, and his shadow on the water is ten yojanas wide and thirty long. Tulsidas compares the leap to Rama's unfailing arrow. In Hemachandra's Jain telling, Mahendra is not a mountain but Hanuman's grandfather, whom he fights and then embraces on the way.

स्रोत

  1. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, संस्कृत पाठ और अंग्रेज़ी अर्थ (valmikiramayan.net)
  2. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग दर सर्ग (sanskritdocuments.org)
  3. रामचरितमानस, सुंदरकांड, आईआईटी कानपुर का पाठ
  4. हेमचंद्र, त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित, पर्व 7, सर्ग 6, सीता की खोज (wisdomlib)

वाल्मीकि रामायण के श्लोकों की संख्या दक्षिण की परंपरा के पाठ से है, जैसा valmikiramayan.net और sanskritdocuments.org छापते हैं। दूसरे संस्करणों में संख्या एक दो श्लोक आगे पीछे हो सकती है।

सुंदरकांड के और पन्ने