एक ध्यान डायरी · चार भाग

नेति नेति

एक ध्यान यात्रा

अथात आदेशो नेति नेतिबृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६

मनु विश्रांतिध्यान साधक, लेखक और शोधकर्ताA meditation diary in four parts. In Hindi.

पहले पन्ने से

यह डायरी कैसे बनी

जो पंक्ति ध्यान में उतरी उसे उसी दिन उतार लेता रहा।

धीरे धीरे उन्हीं पन्नों से एक पूरा हिसाब बन गया। काल क्या है, देह किस नियम से चलती है, प्रकृति क्या देती है और क्या वापस लेती है। मैंने उसी हिसाब से जन्म, कर्म, मृत्यु और मोक्ष, सब बाँध रखा था।

दिक़्क़त यह थी कि मैं उसे सच मान चुका था। जो अपने आप उतर आए, उस पर शक करना कठिन होता है, और मेरे पास यह जानने का कोई तरीक़ा नहीं था कि यह सचमुच कुछ है या सिर्फ़ मेरा अपना बनाया हुआ ढाँचा है जिसे मैं बरसों से दोहरा रहा हूँ।

फिर हर पंक्ति किसी ग्रंथ के एक श्लोक के सामने रखी गई।

कभी वह मेरी बात के साथ खड़ा हुआ, कभी उसने उसे काट दिया, और कई बार उसने वही बात इतनी साफ़ कह दी कि मेरा पूरा पन्ना बेकार हो गया।

मैंने अपनी किसी पंक्ति को बचाया नहीं। जो गिरी उसे गिरा हुआ लिखा, जो अधूरी रह गई उसे खुला छोड़ा, और जो सही निकली उसके आगे भी यह लिखा कि वह किस हद तक सही है।

पढ़ने का तरीक़ा

हर दिन, तीन चीज़ें

हर दिन तीन चीज़ें हैं। ऊपर वह पंक्ति जो मेरे पन्ने पर पहले से पड़ी थी। बीच में वह श्लोक जो उस दिन सामने आया, अपनी संख्या और अपने अर्थ के साथ। नीचे मेरा हिसाब, कि उस भिड़ंत में से क्या बचा।

संस्कृत जानना ज़रूरी नहीं। हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ है। हर पाठ और संख्या छपी हुई प्रति से मिलाई गई है, और जो न मिला वह छपा नहीं।

अपनी डायरी इसी तरह कैसे लिखें →

आज का दिन

दूसरा दिन

पहला भाग, मृत्यु और काल · अध्याय एक, सहायक

रात को बिना किसी वजह के एक पर्व उठा लिया था। यह डायरी शायद इसी लापरवाही से चल पड़ी।

मेरे पन्नों से

मृत्यु ने उसे मारने के लिए दूसरों की मदद ली।

को न्वर्जुनक दोषोऽत्र विद्यते मम बालिश।
अस्वतन्त्रं हि मां मृत्युर्विवशं यदचूचुदत्॥

महाभारत, अनुशासन पर्व १.३६

पूरा दिन पढ़ो →

हर दिन यहाँ डायरी का एक नया दिन खुलता है, चारों भागों से। किताब अभी छपी नहीं है।

दो सौ सैंतालीस दिन

चार भाग

चारों भाग एक सीढ़ी की तरह उतरते हैं। पहले में बात बाहर है, काल में। दूसरे में वह पास आ जाती है, छाया और प्राण में। तीसरे में भीतर, आत्मा और ध्वनि में। और चौथे में सवाल गिनने वाले पर आ जाता है।

मृत्यु और काल

कौन मारता है, कौन सिर्फ़ ज़रिया है, और इस सबका कोई नाप है या नहीं।

सर्वे कालात्मकाः सर्प कालात्मकमिदं जगत्॥

महाभारत, अनुशासन पर्व १.५४

सब कालात्मक हैं। यह सारा जगत् कालात्मक है।

६५ दिन, सात अध्याय। हर अध्याय एक दरवाज़ा है, कोई भी खोलिए।

अध्याय एकसहायकदिन १ से ५

किसी के मरने पर कारण ढूँढ़ लिया जाता है, बीमारी, हादसा, कोई आदमी, और कारण मिलते ही बात बंद कर दी जाती है।

जो कभी नहीं गिना जाता वह यह है कि उस एक मौत के पीछे कितने हाथ थे और उनमें से कोई अपनी मर्ज़ी से नहीं चला था।

किसके सामने रखा गयामहाभारत, अनुशासन पर्व

खुला रहा, ये सहायक कौन हैं।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, दूसरा दिन →

अध्याय दोमृत्यु का नामदिन ६ से १३

जिसने कुछ ग़लत नहीं किया वह तीस में चला जाता है…

मेरे पन्नों पर देह के लिए एक और शब्द लिखा है, यंत्र, और उस शब्द से मुझे बरसों झेंप होती रही, क्योंकि उसमें उम्र किसी काम की नहीं रह जाती।

किसके सामने रखा गयामहाभारत, शांति पर्वगीता

खुला रहा, समय की इकाई घटती क्यों जा रही है।

अध्याय तीनप्रकृति का लेनदेनदिन १४ से २१

हवा, पानी, अन्न और दवा, हम रोज़ लेते हैं और मान चुके हैं कि यह मुफ़्त है, क्योंकि इसका बिल कभी हाथ में नहीं आता।

मेरे पन्नों पर इसका पूरा लेनदेन तीन पंक्तियों में लिखा है और उन तीनों पर मुझे कभी शक नहीं हुआ, इसीलिए वे सबसे ख़तरनाक थीं।

किसके सामने रखा गयागीता, तीसरा अध्यायईशोपनिषद्

खुला रहा, प्रकृति अपने इलाज में कहाँ तक जा सकती है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, उन्नीसवाँ दिन →

अध्याय चारजो काल के बाहर खड़े हैंदिन २२ से ३३

एक गुरु जो कहता है, दूसरा उसी को काट देता है, और दोनों अपने रास्ते को इकलौता बताते हैं, इसलिए सीखने वाला कहीं का नहीं रहता।

मेरे पन्नों पर तीन नाम सवाल की तरह पड़े थे, अष्टावक्र, हनुमान और नर नारायण, और मैंने उन्हें बरसों नहीं खोला क्योंकि डर था कि खुलने पर वे कुछ और निकलेंगे।

किसके सामने रखा गयामाण्डूक्य उपनिषद्कठोपनिषद्

खुला रहा, ठहराव, जिसका नाम किसी ग्रंथ में नहीं मिला।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, इकतीसवाँ दिन →

अध्याय पाँचहिसाबदिन ३४ से ४५

जो बुरा समय चल रहा है वह किए का फल है या सिर्फ़ इत्तेफ़ाक़, इसका जवाब हर जगह टाल दिया जाता है, और आदमी दोनों के बीच लटका रहता है।

नाप के नाम भी हम नरम चुनते हैं, संतुलन, निःस्वार्थ, दक्षता, और भला लगना किसी बात का सबूत नहीं है।

किसके सामने रखा गयागीता, चौथा, छठा और अठारहवाँ अध्याय

खुला रहा, वह सूचकांक, जो मेरे पन्ने पर सिर्फ़ एक योजना की तरह पड़ा है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, चौवालीसवाँ दिन →

अध्याय छहबचे हुए पन्नेदिन ४६ से ५९

बड़ी मान्यताओं पर हम बहस करते हैं और छोटी को जाँचने लायक़ ही नहीं समझते, जबकि रोज़ के फ़ैसले वही चलाती हैं।

इस डायरी का नियम था कि कोई पंक्ति छूटे नहीं, इसलिए सबसे साधारण वाली अंत तक बचती चली गईं, और उनमें से एक तो मेरे पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य की थी।

किसके सामने रखा गयागीता, नवाँ, दसवाँ और सत्रहवाँ अध्याय

खुला रहा, किसी जगह के असर की सीमा कहाँ ख़त्म होती है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, अट्ठावनवाँ दिन →

अध्याय सातआख़िरी नियमदिन ६० से ६५

…आदमी यह नहीं जान पाता कि कुछ हुआ भी या वह अपने को बहला रहा है, क्योंकि इस काम का कोई नाप किसी ने नहीं दिया।

मेरे पन्ने पर वह नाप लिखा हुआ है, और मैं उसे अंत तक टालता रहा, क्योंकि नाप लिख देने के बाद अपने को उस पर रखना पड़ता है।

किसके सामने रखा गयागीता, चौदहवाँ अध्याय

खुला रहा, उस नाप तक पहुँचने का तरीक़ा।

छाया और प्राण

कौन उजाला करता है, कौन लेता है, और बीच में क्या आ जाता है।

छायामयः पुरुषः।

बृहदारण्यक उपनिषद् ३.९.१४

छाया से बना हुआ आदमी। पूछा गया कि इसकी देवता कौन है। उत्तर आया, मृत्यु।

मेरे पन्नों के सिरे पर यही दो शब्द लिखे हैं, और मैंने उन्हें बिना जाने जोड़ा था।

६२ दिन, पाँच अध्याय। हर अध्याय एक दरवाज़ा है, कोई भी खोलिए।

अध्याय एकछायादिन १ से १३

छाया को हमने हमेशा धूप वाली चीज़ समझा, जबकि किसी भी कंपन का रुक जाना छाया है, और वह सीधे प्राणों पर पड़ती है।

किसके सामने रखा गयामार्कण्डेय पुराणप्रश्नोपनिषद्

खुला रहा, यह छाया ग्रहों तक जाती है या नहीं।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, पाँचवाँ दिन →

अध्याय दोमालिकानादिन १४ से २६

दो लोगों के साथ रहने की तकलीफ़ को हम स्वभाव का फ़र्क़ कह देते हैं, और जो असल में बँट रहा होता है उस पर बात ही नहीं होती।

मेरे पन्नों पर लिखा है कि बँटता स्थान और समय का मालिकाना है, और उसके लिए दो में से किसी एक की दुनिया को बिगड़ना पड़ता है।

किसके सामने रखा गयाबृहदारण्यक उपनिषद्

खुला रहा, दोनों से बनी तीसरी दुनिया किसकी होती है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, बीसवाँ दिन →

अध्याय तीनयह मैं नहीं हूँदिन २७ से ३९

मेरा घर, मेरी देह, मेरा नाम, यह कहते हुए कभी किसी को रुकना नहीं पड़ता, और यही सबसे कम जाँचा हुआ वाक्य है।

मेरे चौथे पन्नों का पहला वाक्य ही इनकार का है, कि मैं मालिक नहीं हूँ, देखभाल करने वाला हूँ, और यह लिखना आसान था, इस पर टिकना नहीं।

किसके सामने रखा गयागीता, सातवाँ और पंद्रहवाँ अध्यायतैत्तिरीय उपनिषद्

खुला रहा, तो देखभाल करने वाला कौन है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, छत्तीसवाँ दिन →

अध्याय चारधक्कादिन ४० से ५०

…उठने का बल कहाँ से आता है यह कोई नहीं बताता।

बीच में एक दिन ऐसा है जिसका जवाब मेरे पास नहीं था और वह जवाब के बिना ही छपा है।

किसके सामने रखा गयागीता, दूसरे से अठारहवें अध्याय तक

खुला रहा, उस पल पास कोई विचार न हो तो क्या होता है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, पैंतालीसवाँ दिन →

अध्याय पाँचनेतिदिन ५१ से ६२

शनि, साढ़ेसाती और कालसर्प का डर बिकता है, महँगे उपाय बताए जाते हैं, और डर वहीं का वहीं रहता है।

मेरे पन्नों पर शनि छाया का पुत्र है, यानी किसी के काल पर पड़ी एक नपी हुई अवधि का नाम, और यह मैंने बिना जाने लिखा था।

किसके सामने रखा गयापुराण

खुला रहा, कणों वाली बात, जो मुझे कहीं नहीं मिली।

प्रकाश, आत्मा और ध्वनि

जो उधार लिया गया है उसे वापस कैसे माँगा जाता है।

अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति।

बृहदारण्यक उपनिषद् ४.३.९

यहाँ यह पुरुष स्वयं ज्योति हो जाता है।

८० दिन, सात अध्याय। हर अध्याय एक दरवाज़ा है, कोई भी खोलिए।

अध्याय एकलौटावदिन १ से १४

दिखने की चाह को अहंकार कहकर शर्मिंदा कर दिया जाता है, और उसका कोई हिसाब कहीं नहीं मिलता।

मेरे पन्नों पर यह चाह एक लेनदेन है, कि दिखने के लिए प्रकाश उधार लिया जाता है और वह उधार वापस माँगा जाता है, और इसी एक बात से मैंने अस्तित्व, कर्म और मोक्ष, सब बाँध रखा था।

किसके सामने रखा गयाबृहदारण्यक उपनिषद्, चौथा अध्यायईशोपनिषद्, सत्रहवाँ मंत्र

खुला रहा, जलाने वाली आग एक ही तरफ़ क्यों माँगी गई है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, तेरहवाँ दिन →

अध्याय दोमाँगदिन १५ से २९

जिसके पीछे भीड़ हो जाती है उसका अपना बढ़ना रुक जाता है, यह देखा हुआ है और इसका कारण कहीं लिखा नहीं मिलता।

मेरे पन्ने पर कारण साफ़ लिखा है, कि माँग एक बोझ है और जितनी बढ़े उतनी क़ीमत, और यह मेरे लिखे का सबसे साफ़ हिस्सा था, शायद इसीलिए सबसे कमज़ोर।

किसके सामने रखा गयाश्वेताश्वतर उपनिषद्

खुला रहा, ऊपर की जगह ख़ाली रह जाने वाला डर, जो पन्ने पर तीन बार लौटता है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, सत्ताईसवाँ दिन →

अध्याय तीनआत्मादिन ३० से ४४

आत्मा अजर है, अमर है, और कर्म उसे छूता नहीं, यह सब सुना हुआ है, और इसके आगे पूछो तो बात टाल दी जाती है।

सूची देखिए तो शरीर देखता है, सीखता है, कमाता है, जन्मता है, मरता है, और आत्मा के खाने में कुछ लिखा ही नहीं जाता।

किसके सामने रखा गयागीता, दूसरा अध्यायकठोपनिषद्माण्डूक्य उपनिषद्

खुला रहा, आत्माएँ एक हैं या अनेक। यह तीन बार पूछा गया और तीनों बार खुला रहा।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, इकतीसवाँ दिन →

अध्याय चारतीन माँएँदिन ४५ से ५४

जिसका कोई गया है वह सबसे पहले यही जानना चाहता है कि वह अब है कहाँ, और उसे जो तसल्ली दी जाती है वह अक्सर उलटा काम करती है।

मेरे पन्नों पर जन्म की पूरी प्रक्रिया में तीन माँएँ हैं, ऊपर एक चाहने वाली, बीच में एक काम करने वाली, नीचे एक गोद, और इस ढाँचे का नाम किसी ग्रंथ में नहीं है।

किसके सामने रखा गयाऐतरेय उपनिषद्माण्डूक्य उपनिषद्महाभारत, शांति पर्व

खुला रहा, बीच वाली का ब्योरा।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, अड़तालीसवाँ दिन →

अध्याय पाँचतरंगदिन ५५ से ६६

कुंडली पर या तो अंधा भरोसा है या पूरा मज़ाक़, और बीच में खड़े आदमी के लिए कोई भाषा नहीं है।

मेरे पन्नों पर ख़ाना सिर्फ़ मोटा अंदाज़ा देता है और असल बात हर देह की अपनी बनावट में है, यानी वही तरंग दो लोगों पर एक जैसी नहीं पड़ती।

किसके सामने रखा गयागीताकठोपनिषद्

खुला रहा, हम ख़ुद जलने वाले पिंड हैं या नहीं।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, छप्पनवाँ दिन →

अध्याय छहध्वनिदिन ६७ से ७१

जप, मंत्र और आरती घर घर में चलते हैं, और कोई यह नहीं बताता कि ये काम कैसे करते हैं, सिर्फ़ यह बताया जाता है कि करो।

मेरे पन्नों पर ध्वनि वह नहीं है जो हम निकालते हैं, वह है जो हम हैं, और चक्र उसी की गाँठें हैं।

किसके सामने रखा गयामुण्डक उपनिषद्छान्दोग्य उपनिषद्

खुला रहा, बीज मंत्र और छंद का फ़र्क़, जो पहले भाग से लटका हुआ है।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, अड़सठवाँ दिन →

अध्याय सातमंडलदिन ७२ से ८०

आदमी कमाता है, जमा करता है, थकता जाता है, और इस थकान को ज़िम्मेदारी का नाम दे देता है।

मेरे पन्नों पर यह पूरा जीवन आमदनी और ख़र्च की तरह लिखा है, और उसमें से एक बात निकली जो मेरे ही पुराने लिखे से टकराती है, कि जमा करना अपने आप में घिसाव है।

किसके सामने रखा गयामहाभारत, शांति पर्वमुण्डक उपनिषद्

खुला रहा, इसी पन्ने की तीसरी पंक्ति, जिसका जवाब मैंने नहीं दिया।

आयाम

वे जगहें जो पहले तीनों में खुली छोड़ दी गई थीं।

न त्वं श्रेष्ठोऽसि नो व्यान

महाभारत, अश्वमेधिक पर्व २३.१५

तू हममें श्रेष्ठ नहीं है, व्यान।

हर एक अपने को सबसे बड़ा कहता है, और हर एक को यही सुनना पड़ता है।

४० दिन, पाँच अध्याय। हर अध्याय एक दरवाज़ा है, कोई भी खोलिए।

अध्याय एकआयामदिन १ से १०

इतने बड़े ब्रह्मांड के सामने अपने एक छोटे से काम का कोई अर्थ नहीं दिखता…

…मैं पहली बार अपने को एक बहुत बड़ी देह के भीतर एक कोशिका की तरह रख देता हूँ।

किसके सामने रखा गयाऋग्वेद, पुरुष सूक्तछान्दोग्य उपनिषद्

खुला रहा, पाँचवाँ आयाम, जो तीसरे दिन उठा और चौबीसवें तक खुला ही रहा।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, तीसरा दिन →

अध्याय दोधुरीदिन ११ से २२

ये कथाएँ हमें बचपन से सुनाई गईं और इनसे सवाल पूछना लगभग अपराध बना दिया गया, इसलिए ये कभी खुलीं नहीं।

पूछने लायक़ सवाल छोटे ही हैं, कि रावण राम से क्या ले सकता था, और सोने का हिरन असल में किसकी चाह थी।

किसके सामने रखा गयारामायण, युद्धकांडगीता

खुला रहा, दूसरी तरफ़ का अनुभव कैसे हो।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, अठारहवाँ दिन →

अध्याय तीनखुले वादेदिन २३ से २९

किताबें अपने ही छोड़े हुए सवाल भूल जाती हैं और पाठक को कभी यह नहीं बताया जाता कि यहाँ बात अधूरी रह गई थी।

तीन भागों में मैंने कई बार लिखा कि इसका जवाब कहीं और है और वह जगह अभी खोली नहीं है, और वे वादे निभे नहीं थे।

खुला रहा, छान्दोग्य का पाँचवाँ अध्याय, आज भी।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, छब्बीसवाँ दिन →

अध्याय चारकोषदिन ३० से ३३

जो आदमी संवेदनशील है वह बाहर का अन्याय देखकर टूटता है, और उसे सलाह दो ही मिलती हैं, सब छोड़ दो या सब सह लो।

मेरे बाक़ी पन्ने अपने लिए लिखे गए हैं, यह अकेला पन्ना किसी और से बात कर रहा है, और इसमें एक घेरा है जिसे साथ लेकर चला जा सकता है।

किसके सामने रखा गयागीता, छठा और अठारहवाँ अध्यायकठोपनिषद्

खुला रहा, चक्रों के देवताओं की सूची, जो इन ग्रंथों में है ही नहीं।

इस अध्याय का एक पूरा दिन पढ़ो, बत्तीसवाँ दिन →

अध्याय पाँचभीतर के चारदिन ३४ से ४०

जिस बुद्धि से आदमी ने सब हल किया है, किसी बड़े संकट में वही बेकार हो जाती है, और उसके आगे का नक़्शा किसी के पास नहीं।

यहाँ पहली बार आयाम बाहर नहीं, भीतर गिने गए हैं, बुद्धि, पहचान, स्मृति और शुद्ध प्रज्ञा, और हमने इन्हें कभी अलग नहीं किया था।

किसके सामने रखा गयागीता, पंद्रहवाँ और अठारहवाँ अध्यायश्वेताश्वतर उपनिषद्

खुला रहा, प्रज्ञा में टिके रहने का तरीक़ा।

जिसे काल और मृत्यु ने पकड़ा है वह पहले भाग से शुरू करे, जिसे रिश्तों ने दूसरे से, जिसे अपनी ही बनाई व्यवस्था ने तीसरे से, और जिसे यह सवाल है कि मैं इस सब में हूँ कहाँ, चौथे से।

जिनके सामने रखा गया

ग्रंथ

डायरी की हर पंक्ति किसी ग्रंथ के श्लोक के सामने रखी गई। ये वे ग्रंथ हैं, जिनके श्लोक चारों भागों में आए। किसी भी पोथी पर दबाइए, उसका पत्ता खुल जाएगा।

  • वेद

  • उपनिषद्

  • दो गीताएँ

  • महाभारत

  • वाल्मीकि रामायण

  • पुराण

हर पत्ते पर यह भी लिखा है कि उस ग्रंथ का पाठ किससे मिलाया गया।

यह नाम कहाँ से आया

नाम

अथात आदेशो नेति नेति

बृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६

यह नहीं, यह नहीं।

इसी काम का नाम नेति नेति है। जो हाथ आए उसके आगे यह कहना कि यह भी नहीं, और फिर आगे चलना।

उपनिषद् में यह पाँच जगह आता है: पूरा अर्थ, मंत्रों के साथ →

पढ़ने से पहले

यह किताब किसके लिए है

यह उसके लिए है जिसके पास अपनी कोई बात है। जिसने कभी कुछ ऐसा सोचा या महसूस किया हो जो उसे सच लगा, पर जिसे वह आज तक किसी के सामने रख नहीं सका।

यह उसके लिए भी है जो ग्रंथ पढ़ना चाहता है और श्रद्धा से शुरू नहीं कर पाता। यहाँ श्लोक पूजा के लिए नहीं, जाँच के लिए खोले गए हैं, और वे उसी में खरे उतरे हैं।

और जो इसे अकेले नहीं, साथ मिलकर करना चाहें, किसी कॉलेज में, किसी कंपनी में या किसी समूह में, उनके लिए नेति नेति कार्यशालाएँ हैं।

यह उसके लिए नहीं है जो उत्तर लेने आया है। यहाँ किसी बात का अंत नहीं है, कई सवाल खुले छोड़े गए हैं, और गिरी हुई पंक्तियाँ भी छपी हुई हैं।

पूरी डायरी

गिनती में

  • ४भाग
  • २४७दिन
  • ३६४श्लोक
  • २३०अपनी पंक्तियाँ

यहाँ कोई दावा बिना संख्या के नहीं छपा। हर पाठ छपी हुई प्रति से मिलाया गया है, और जो नहीं मिला वह छपा ही नहीं।

और जो पंक्तियाँ ग्रंथ के सामने गिर गईं, वे भी इसी किताब में हैं, गिरी हुई।

अध्ययन संस्करण

पाँच खंड

इन्हीं किताबों से बना पाँच खंडों का अध्ययन संस्करण, हर खंड अपने आप में पूरा।

  1. मृत्यु और काल
  2. छाया, प्राण और डर
  3. प्रकाश, आत्मा और ध्वनि
  4. आयाम और शब्द
  5. काम, घर और चोट

आख़िर में, एक सुबह

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्ययादुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥

कठोपनिषद् १.३.१४

उठो, जागो, और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर समझो। ज्ञानी कहते हैं, यह रास्ता छुरे की तेज़ धार जैसा है, जिस पर चलना कठिन है।

ट्रेलर

46 सेकंड, 4K में, आवाज़ के साथ।

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

नेति नेति क्या है?

नेति नेति मनु विश्रांति की ध्यान डायरी है, चार भागों में। हर दिन उनकी अपनी एक पंक्ति होती है, उसके सामने किसी ग्रंथ का एक श्लोक, और नीचे उनका हिसाब, कि उस भिड़ंत में से क्या बचा।

नेति नेति का मतलब क्या है?

यह नहीं, यह नहीं (अंग्रेज़ी में, not this, not this)। यह शब्द बृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६ से आया है: अथात आदेशो नेति नेति।

इस डायरी में कौन कौन से ग्रंथ हैं?

वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता, अष्टावक्र गीता, महाभारत, वाल्मीकि रामायण और पुराण। पूरी सूची इसी पन्ने पर, ग्रंथ वाले हिस्से में है, और हर ग्रंथ के आगे यह भी लिखा है कि उसका पाठ किससे मिलाया गया।

इसके चार भाग कौन से हैं?

पहला भाग मृत्यु और काल, दूसरा छाया और प्राण, तीसरा प्रकाश, आत्मा और ध्वनि, और चौथा आयाम। चारों में मिलाकर दो सौ सैंतालीस दिन हैं।

क्या इसे पढ़ने के लिए संस्कृत आनी चाहिए?

संस्कृत जानना ज़रूरी नहीं। हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ है। हर पाठ और संख्या छपी हुई प्रति से मिलाई गई है, और जो न मिला वह छपा नहीं।

यह किताब किसके लिए है?

यह उसके लिए है जिसके पास अपनी कोई बात है। जिसने कभी कुछ ऐसा सोचा या महसूस किया हो जो उसे सच लगा, पर जिसे वह आज तक किसी के सामने रख नहीं सका।

अध्ययन संस्करण क्या है?

इन्हीं किताबों से बना पाँच खंडों का अध्ययन संस्करण भी है: मृत्यु और काल, छाया प्राण और डर, प्रकाश आत्मा और ध्वनि, आयाम और शब्द, काम घर और चोट।

क्या पाँचों खंड ऑनलाइन पढ़ सकते हैं?

हाँ, इसी साइट पर, हिंदी में। हर खंड के पहले दो अध्याय मुफ़्त हैं। उसके बाद एक अध्याय 39 रुपये का (पाँचवें खंड के बारह छोटे अध्यायों में 19 का), पूरा खंड 149 रुपये में (लॉन्च ऑफ़र, असली दाम 249), और पाँचों खंड एक साथ 599 रुपये में, UPI से। कोई मेंबरशिप नहीं, जो पढ़ना चाहें बस उसी के पैसे।