जो पंक्ति ध्यान में उतरीउसे उसी दिन उतार लेता रहा।
यह भी नहीं।
यह भी नहीं।
एक ध्यान डायरी · चार भाग
नेति नेति
एक ध्यान यात्रा
अथात आदेशो नेति नेतिबृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६
मनु विश्रांतिध्यान साधक, लेखक और शोधकर्ताA meditation diary in four parts. In Hindi.
पहले पन्ने से
यह डायरी कैसे बनी
जो पंक्ति ध्यान में उतरी उसे उसी दिन उतार लेता रहा।
धीरे धीरे उन्हीं पन्नों से एक पूरा हिसाब बन गया। काल क्या है, देह किस नियम से चलती है, प्रकृति क्या देती है और क्या वापस लेती है। मैंने उसी हिसाब से जन्म, कर्म, मृत्यु और मोक्ष, सब बाँध रखा था।
दिक़्क़त यह थी कि मैं उसे सच मान चुका था। जो अपने आप उतर आए, उस पर शक करना कठिन होता है, और मेरे पास यह जानने का कोई तरीक़ा नहीं था कि यह सचमुच कुछ है या सिर्फ़ मेरा अपना बनाया हुआ ढाँचा है जिसे मैं बरसों से दोहरा रहा हूँ।
फिर हर पंक्ति किसी ग्रंथ के एक श्लोक के सामने रखी गई।
कभी वह मेरी बात के साथ खड़ा हुआ, कभी उसने उसे काट दिया, और कई बार उसने वही बात इतनी साफ़ कह दी कि मेरा पूरा पन्ना बेकार हो गया।
मैंने अपनी किसी पंक्ति को बचाया नहीं। जो गिरी उसे गिरा हुआ लिखा, जो अधूरी रह गई उसे खुला छोड़ा, और जो सही निकली उसके आगे भी यह लिखा कि वह किस हद तक सही है।
पढ़ने का तरीक़ा
हर दिन, तीन चीज़ें
मेरी पंक्ति
उस दिन का श्लोक॥ संख्या ॥
हिसाब
गिरीखुली छोड़ीकिस हद तक सही
हर दिन तीन चीज़ें हैं। ऊपर वह पंक्ति जो मेरे पन्ने पर पहले से पड़ी थी। बीच में वह श्लोक जो उस दिन सामने आया, अपनी संख्या और अपने अर्थ के साथ। नीचे मेरा हिसाब, कि उस भिड़ंत में से क्या बचा।
संस्कृत जानना ज़रूरी नहीं। हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ है। हर पाठ और संख्या छपी हुई प्रति से मिलाई गई है, और जो न मिला वह छपा नहीं।
हर दिन यहाँ डायरी का एक नया दिन खुलता है, चारों भागों से। किताब अभी छपी नहीं है।
दो सौ सैंतालीस दिन
चार भाग
चारों भाग एक सीढ़ी की तरह उतरते हैं। पहले में बात बाहर है, काल में। दूसरे में वह पास आ जाती है, छाया और प्राण में। तीसरे में भीतर, आत्मा और ध्वनि में। और चौथे में सवाल गिनने वाले पर आ जाता है।
एक गुरु जो कहता है, दूसरा उसी को काट देता है, और दोनों अपने रास्ते को इकलौता बताते हैं, इसलिए सीखने वाला कहीं का नहीं रहता।
मेरे पन्नों पर तीन नाम सवाल की तरह पड़े थे, अष्टावक्र, हनुमान और नर नारायण, और मैंने उन्हें बरसों नहीं खोला क्योंकि डर था कि खुलने पर वे कुछ और निकलेंगे।
किसके सामने रखा गयामाण्डूक्य उपनिषद्कठोपनिषद्
खुला रहा, ठहराव, जिसका नाम किसी ग्रंथ में नहीं मिला।
८० दिन, सात अध्याय। हर अध्याय एक दरवाज़ा है, कोई भी खोलिए।
अध्याय एकलौटावदिन १ से १४
दिखने की चाह को अहंकार कहकर शर्मिंदा कर दिया जाता है, और उसका कोई हिसाब कहीं नहीं मिलता।
मेरे पन्नों पर यह चाह एक लेनदेन है, कि दिखने के लिए प्रकाश उधार लिया जाता है और वह उधार वापस माँगा जाता है, और इसी एक बात से मैंने अस्तित्व, कर्म और मोक्ष, सब बाँध रखा था।
किसके सामने रखा गयाबृहदारण्यक उपनिषद्, चौथा अध्यायईशोपनिषद्, सत्रहवाँ मंत्र
खुला रहा, जलाने वाली आग एक ही तरफ़ क्यों माँगी गई है।
जिसका कोई गया है वह सबसे पहले यही जानना चाहता है कि वह अब है कहाँ, और उसे जो तसल्ली दी जाती है वह अक्सर उलटा काम करती है।
मेरे पन्नों पर जन्म की पूरी प्रक्रिया में तीन माँएँ हैं, ऊपर एक चाहने वाली, बीच में एक काम करने वाली, नीचे एक गोद, और इस ढाँचे का नाम किसी ग्रंथ में नहीं है।
किसके सामने रखा गयाऐतरेय उपनिषद्माण्डूक्य उपनिषद्महाभारत, शांति पर्व
आदमी कमाता है, जमा करता है, थकता जाता है, और इस थकान को ज़िम्मेदारी का नाम दे देता है।
मेरे पन्नों पर यह पूरा जीवन आमदनी और ख़र्च की तरह लिखा है, और उसमें से एक बात निकली जो मेरे ही पुराने लिखे से टकराती है, कि जमा करना अपने आप में घिसाव है।
किसके सामने रखा गयामहाभारत, शांति पर्वमुण्डक उपनिषद्
खुला रहा, इसी पन्ने की तीसरी पंक्ति, जिसका जवाब मैंने नहीं दिया।
जिस बुद्धि से आदमी ने सब हल किया है, किसी बड़े संकट में वही बेकार हो जाती है, और उसके आगे का नक़्शा किसी के पास नहीं।
यहाँ पहली बार आयाम बाहर नहीं, भीतर गिने गए हैं, बुद्धि, पहचान, स्मृति और शुद्ध प्रज्ञा, और हमने इन्हें कभी अलग नहीं किया था।
किसके सामने रखा गयागीता, पंद्रहवाँ और अठारहवाँ अध्यायश्वेताश्वतर उपनिषद्
खुला रहा, प्रज्ञा में टिके रहने का तरीक़ा।
जिसे काल और मृत्यु ने पकड़ा है वह पहले भाग से शुरू करे, जिसे रिश्तों ने दूसरे से, जिसे अपनी ही बनाई व्यवस्था ने तीसरे से, और जिसे यह सवाल है कि मैं इस सब में हूँ कहाँ, चौथे से।
जिनके सामने रखा गया
ग्रंथ
डायरी की हर पंक्ति किसी ग्रंथ के श्लोक के सामने रखी गई। ये वे ग्रंथ हैं, जिनके श्लोक चारों भागों में आए। किसी भी पोथी पर दबाइए, उसका पत्ता खुल जाएगा।
वेद
उपनिषद्
दो गीताएँ
महाभारत
वाल्मीकि रामायण
पुराण
हर पत्ते पर यह भी लिखा है कि उस ग्रंथ का पाठ किससे मिलाया गया।
वेद
ऋग्वेद
चारों वेदों में सबसे पुराना। पुरुष सूक्त इसी के दसवें मंडल में है।
किन अध्यायों में इसके सामने रखा गया
पाठ किससे मिलाया गया
ऋग्वेद संहिता का प्रचलित पाठ
वेद
अथर्ववेद
चार वेदों में चौथा।
पाठ किससे मिलाया गया
संस्कृत विकिस्रोत, शौनक शाखा
उपनिषद्
ईशोपनिषद्
अठारह मंत्रों का छोटा सा उपनिषद्, जो शुक्ल यजुर्वेद का आख़िरी अध्याय है।
यह उसके लिए है जिसके पास अपनी कोई बात है। जिसने कभी कुछ ऐसा सोचा या महसूस किया हो जो उसे सच लगा, पर जिसे वह आज तक किसी के सामने रख नहीं सका।
यह उसके लिए भी है जो ग्रंथ पढ़ना चाहता है और श्रद्धा से शुरू नहीं कर पाता। यहाँ श्लोक पूजा के लिए नहीं, जाँच के लिए खोले गए हैं, और वे उसी में खरे उतरे हैं।
और जो इसे अकेले नहीं, साथ मिलकर करना चाहें, किसी कॉलेज में, किसी कंपनी में या किसी समूह में, उनके लिए नेति नेति कार्यशालाएँ हैं।
यह उसके लिए नहीं है जो उत्तर लेने आया है। यहाँ किसी बात का अंत नहीं है, कई सवाल खुले छोड़े गए हैं, और गिरी हुई पंक्तियाँ भी छपी हुई हैं।
पूरी डायरी
गिनती में
४भाग
२४७दिन
३६४श्लोक
२३०अपनी पंक्तियाँ
यहाँ कोई दावा बिना संख्या के नहीं छपा। हर पाठ छपी हुई प्रति से मिलाया गया है, और जो नहीं मिला वह छपा ही नहीं।
और जो पंक्तियाँ ग्रंथ के सामने गिर गईं, वे भी इसी किताब में हैं, गिरी हुई।
उठो, जागो, और श्रेष्ठ जनों के पास जाकर समझो। ज्ञानी कहते हैं, यह रास्ता छुरे की तेज़ धार जैसा है, जिस पर चलना कठिन है।
ट्रेलर
46 सेकंड, 4K में, आवाज़ के साथ।
सवाल जवाब
पूछे जाने वाले सवाल
नेति नेति क्या है?
नेति नेति मनु विश्रांति की ध्यान डायरी है, चार भागों में। हर दिन उनकी अपनी एक पंक्ति होती है, उसके सामने किसी ग्रंथ का एक श्लोक, और नीचे उनका हिसाब, कि उस भिड़ंत में से क्या बचा।
नेति नेति का मतलब क्या है?
यह नहीं, यह नहीं (अंग्रेज़ी में, not this, not this)। यह शब्द बृहदारण्यक उपनिषद् २.३.६ से आया है: अथात आदेशो नेति नेति।
इस डायरी में कौन कौन से ग्रंथ हैं?
वेद, उपनिषद्, भगवद्गीता, अष्टावक्र गीता, महाभारत, वाल्मीकि रामायण और पुराण। पूरी सूची इसी पन्ने पर, ग्रंथ वाले हिस्से में है, और हर ग्रंथ के आगे यह भी लिखा है कि उसका पाठ किससे मिलाया गया।
इसके चार भाग कौन से हैं?
पहला भाग मृत्यु और काल, दूसरा छाया और प्राण, तीसरा प्रकाश, आत्मा और ध्वनि, और चौथा आयाम। चारों में मिलाकर दो सौ सैंतालीस दिन हैं।
क्या इसे पढ़ने के लिए संस्कृत आनी चाहिए?
संस्कृत जानना ज़रूरी नहीं। हर श्लोक के नीचे उसका अर्थ है। हर पाठ और संख्या छपी हुई प्रति से मिलाई गई है, और जो न मिला वह छपा नहीं।
यह किताब किसके लिए है?
यह उसके लिए है जिसके पास अपनी कोई बात है। जिसने कभी कुछ ऐसा सोचा या महसूस किया हो जो उसे सच लगा, पर जिसे वह आज तक किसी के सामने रख नहीं सका।
अध्ययन संस्करण क्या है?
इन्हीं किताबों से बना पाँच खंडों का अध्ययन संस्करण भी है: मृत्यु और काल, छाया प्राण और डर, प्रकाश आत्मा और ध्वनि, आयाम और शब्द, काम घर और चोट।
क्या पाँचों खंड ऑनलाइन पढ़ सकते हैं?
हाँ, इसी साइट पर, हिंदी में। हर खंड के पहले दो अध्याय मुफ़्त हैं। उसके बाद एक अध्याय 39 रुपये का (पाँचवें खंड के बारह छोटे अध्यायों में 19 का), पूरा खंड 149 रुपये में (लॉन्च ऑफ़र, असली दाम 249), और पाँचों खंड एक साथ 599 रुपये में, UPI से। कोई मेंबरशिप नहीं, जो पढ़ना चाहें बस उसी के पैसे।