पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी

वैकुंठ चतुर्दशी 2027

Vaikuntha Chaturdashi 2027

एक रात, दो पूजाएँ। आधी रात विष्णु, भोर में शिव।

इस बरस (2026) वैकुंठ चतुर्दशी 23 नवंबर, सोमवार को है। वैकुंठ चतुर्दशी 2026: तारीख़, मुहूर्त और शुभकामना कार्ड · यह पन्ना 2027 का है।

वैकुंठ चतुर्दशी 2027 में 12 नवंबर, शुक्रवार को है। कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तिथि 12 नवंबर, सुबह 10:22 से 13 नवंबर, सुबह 9:56 तक है। निशीथ काल की पूजा 12 नवंबर, रात 11:39 से 13 नवंबर, रात 12:32 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

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उस शाम का चाँद, 97 प्रतिशत रोशन

ढोल की आवाज़ तंग गली में पास आ रही है। आगे आगे पालकी, पीछे भीड़।

महाकाल अपने मंदिर से निकलकर गोपाल से मिलने जा रहे हैं।

गोपाल के मंदिर में दो मालाएँ रखी हैं। एक बेल के पत्तों की, एक तुलसी की।

आज ये हाथ बदलेंगी। तुलसी शिव के गले जाएगी, बेल विष्णु के।

छतों पर लोग खड़े हैं। एक बच्चा पूछता है: भगवान भगवान से मिलने क्यों जाते हैं?

दादी कहती हैं: चार महीने विष्णु सोए रहे, तो दुनिया शिव ने सँभाली। आज वे उसे लौटाने जा रहे हैं।

दो देवता, एक रात। और दोनों एक दूसरे के आगे सिर झुकाते हैं।

2027 में कब

वैकुंठ चतुर्दशी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़12 नवंबर, शुक्रवार

तिथिकार्तिक शुक्ल चतुर्दशी12 नवंबर, सुबह 10:22 से 13 नवंबर, सुबह 9:56 तक

नक्षत्ररेवतीसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 6:41

सूर्यास्तशाम 5:29

चंद्रोदयशाम 4:00

निशीथ काल
12 नवंबर, रात 11:39 से 13 नवंबर, रात 12:32 तकआधी रात के आसपास का मुहूर्त, रात के पंद्रह हिस्सों में आठवाँ।

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शुभकामना

वैकुंठ चतुर्दशी का शुभकामना कार्ड

वैकुंठ चतुर्दशी का शुभकामना कार्ड: वैकुंठ चतुर्दशी की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

वैकुंठ चतुर्दशी क्या है

वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है, कार्तिक पूर्णिमा से ठीक एक दिन पहले। यह साल का वह दिन है जब विष्णु और शिव, हरि और हर, दोनों की पूजा साथ होती है, इसलिए इसे हरि हर मिलन भी कहते हैं, और बैकुंठ चौदस भी। विष्णु की पूजा आधी रात के पास होती है, निशीथ काल में, और शिव की पूजा भोर से पहले, अरुणोदय में। इस दिन पूजा उल्टी भी चढ़ती है: विष्णु शिव को तुलसी चढ़ाते हैं और शिव विष्णु को बेल पत्र, जबकि बाक़ी साल तुलसी विष्णु की है और बेल शिव का। मान्यता है कि इस दिन जो व्रत रखकर पहले विष्णु की पूजा करे, उसके लिए वैकुंठ के दरवाज़े खुले रहते हैं। अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा है, और काशी में देव दीपावली। निशीथ काल और अरुणोदय, दोनों का समय इसी पन्ने पर ऊपर दिया है।

कथा

वैकुंठ चतुर्दशी की कथा

शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के छत्तीसवें अध्याय में यह कथा है। दैत्य बहुत ताक़तवर हो गए थे और देवताओं को सता रहे थे। देवता विष्णु के पास गए, और विष्णु दैत्यों पर जीत के लिए कैलास गए। वहाँ उन्होंने आग जलाई, आसन जमाया और शिव की पूजा और तप शुरू किया। उन्होंने मानसरोवर के हज़ार कमल लिए, और शिव के हज़ार नाम जपते हुए हर नाम पर एक कमल चढ़ाने लगे। शिव ने परखने के लिए उनमें से एक कमल चुपचाप छिपा दिया। आख़िरी नाम पर विष्णु का हाथ ख़ाली लौटा।

विष्णु रुके नहीं। उन्होंने सोचा: 'मन्नेत्रं कमलं न किम्', यानी क्या मेरी आँख भी कमल नहीं है? और वे अपनी कमल जैसी आँख निकालकर चढ़ाने को तैयार हो गए। उसी पल लिंग से शिव प्रकट हुए और बोले, 'मा मा', यानी नहीं, ऐसा मत करो। शिव ने कहा कि मैं तुम्हारा मन और देवताओं का काम, दोनों जानता हूँ, और फिर वर दिया: 'सुदर्शनाख्यं चक्रं च ददामि तव शोभनम्', यानी मैं तुम्हें सुदर्शन नाम का सुंदर चक्र देता हूँ। वह चक्र दस हज़ार सूरजों जैसा चमकता था, और उसी से विष्णु ने दैत्यों को हराया।

घरों में यही कथा काशी की कथा बनकर सुनाते हैं। विष्णु वैकुंठ छोड़कर काशी आए, मणिकर्णिका घाट पर नहाए, और विश्वनाथ पर सोने के हज़ार कमल चढ़ाने का प्रण लिया। एक कमल कम पड़ा, तो उन्हें याद आया कि लोग उन्हें कमल नयन और पुंडरीकाक्ष कहते हैं, यानी कमल जैसी आँखों वाले, और वे आँख चढ़ाने लगे। शिव ने रोका, सुदर्शन चक्र दिया, और कहा कि आज से कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी वैकुंठ चतुर्दशी कहलाएगी; जो इस दिन व्रत रखकर पहले विष्णु को पूजेगा, वह वैकुंठ पाएगा। शिव पुराण में यह सब कैलास पर होता है, काशी की बात लोक की है।

लोक में एक और कथा नारद की है। नारद ने विष्णु से पूछा कि आम लोग, जिनके पास न लंबा तप है न बड़ा ज्ञान, मुक्ति कैसे पाएँ? विष्णु बोले, जो कार्तिक की इस चतुर्दशी को व्रत रखकर मेरी पूजा करेगा, उसके लिए स्वर्ग के दरवाज़े खुले मिलेंगे, और उन्होंने अपने द्वारपालों, जय और विजय, से कहा कि उस रात वैकुंठ के दरवाज़े खुले रखना। कहते हैं, इसी दिन की एक कथा धनेश्वर नाम के एक पापी ब्राह्मण की भी है, जो इस चतुर्दशी को तीर्थयात्रियों की भीड़ के बीच गोदावरी में नहाया, और उन भक्तों के पुण्य से उसके पाप धुल गए और उसे वैकुंठ मिला।

उज्जैन में इस रात के साथ एक और मान्यता जुड़ी है। कहते हैं, देवउठनी एकादशी तक, चार महीने, यानी चातुर्मास में, विष्णु सोते हैं और दुनिया की देखभाल शिव करते हैं। विष्णु के जागने के बाद, इसी चतुर्दशी की रात, महाकाल ख़ुद गोपाल मंदिर जाकर दुनिया की देखभाल फिर से श्री हरि को सौंप देते हैं, और फिर तप के लिए कैलास पर्वत चले जाते हैं।

व्रत

वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह जल्दी नहाकर दिन भर के व्रत का संकल्प लेते हैं; कई लोग उसी समय शिवलिंग या शिव की तस्वीर पर जल, बेल पत्र और फूल चढ़ाते हैं।
  2. दिन भर व्रत रखते हैं, हर कोई अपनी ताक़त के हिसाब से।
  3. दिन में विष्णु सहस्रनाम या शिव का कोई स्तोत्र पढ़ते या सुनते हैं।
  4. वैकुंठ चतुर्दशी की कथा पढ़ते या सुनते हैं; कहते हैं, इसे पढ़ने या सुनने से विष्णु का लोक मिलता है।
  5. व्रत रात तक चलता है, क्योंकि इस दिन की दोनों पूजाएँ रात की हैं, और उनका क्रम नहीं बदलता: पहले हरि, फिर हर।

पारण: व्रत कैसे खोलें

वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत कब खोलें, इसका कोई एक तय नियम नहीं मिलता, जैसा एकादशी के लिए मिलता है। पूजा का क्रम साफ़ है: रात को पहले विष्णु, फिर भोर में शिव। इसलिए भोर की शिव पूजा के बाद, अपने घर की रीत से, व्रत खोलना ठीक रहता है। अगला दिन कार्तिक पूर्णिमा का है, उसके स्नान और दान की बात उसके अपने पन्ने पर है। बूढ़े, गर्भ से औरतें, शुगर के मरीज़ या दवा लेने वाले, व्रत से पहले डॉक्टर से पूछ लें।

उनतालीस लंकाएँ

रामकथाओं में वैकुंठ चतुर्दशी

उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।

रामचरितमानस

अवधी · Ramcharitmanas

रामचरितमानस के लंकाकांड की शुरुआत में राम, जो विष्णु के अवतार हैं, समुद्र पर पुल बनने के बाद किनारे पर शिव को थापते हैं: 'लिंग थापि बिधिवत करि पूजा। सिव समान प्रिय मोहि न दूजा॥' और फिर उसी जगह हरि और हर की बात एक दोहे में बाँध देते हैं: 'संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास। ते नर करहि कलप भरि घोर नरक महुँ बास॥' मतलब, जिसे शंकर प्यारे हों पर जो मुझसे बैर रखे, और जो शिव से बैर रखे पर ख़ुद को मेरा दास कहे, ऐसे लोग कल्प भर घोर नरक में रहते हैं। वैकुंठ चतुर्दशी की हज़ार कमल वाली कथा और उज्जैन का मालाओं का लेन देन यही बात दिखाते हैं जो तुलसी के राम यहाँ कहते हैं: विष्णु शिव को पूजते हैं, और शिव विष्णु को।

कहाँ कैसे

वैकुंठ चतुर्दशी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • उज्जैन, मध्य प्रदेश

    रात को महाकालेश्वर मंदिर से महाकाल की सवारी निकलती है, गुदरी चौराहा और पटनी बाज़ार से होकर गोपाल मंदिर पहुँचती है, और उसी रास्ते लौटती है। गोपाल मंदिर में महाकाल बेल पत्र की माला गोपाल को पहनाते हैं और गोपाल तुलसी की माला महाकाल को; माना जाता है कि यह दोनों के काम की अदला बदली है।

  • वाराणसी, उत्तर प्रदेश

    साल में बस यही दिन है जब काशी विश्वनाथ मंदिर के गर्भगृह में विष्णु को ख़ास जगह मिलती है, और कहते हैं, उस दिन विश्वनाथ का मंदिर वैकुंठ जैसा पवित्र हो जाता है। शिव के भक्त भोर में मणिकर्णिका घाट पर नहाते हैं, जिसे मणिकर्णिका स्नान कहते हैं।

  • गंगा और दूसरी नदियों के घाट

    लोग नदी में नहाते हैं और दीये पानी में बहाते हैं, जिसे दीपदान कहते हैं; कार्तिक दीयों का महीना है, और अगली रात काशी के घाट देव दीपावली के दीयों से भरते हैं।

  • घर का पूजा घर

    घर के ईशान कोने में, यानी उत्तर और पूरब के बीच, हरा कपड़ा बिछाकर हरिहर कलश रखते हैं, और उसके पास शिव और विष्णु की तस्वीरें, ताकि दोनों की पूजा एक ही जगह हो।

रीत

वैकुंठ चतुर्दशी के दिन क्या करते हैं

  1. हरिहर कलश काँसे का होता है: उसमें पानी, दूध, सिक्के, दूब, सुपारी और पीपल के पत्ते डालकर ऊपर नारियल रखते हैं।
  2. आधी रात के पास, निशीथ काल में, विष्णु की पूजा होती है: विष्णु सहस्रनाम पढ़ते हुए हज़ार कमल चढ़ाते हैं, और जिसके पास इतने न हों, वह जितने हों उतने।
  3. विष्णु की तस्वीर पर गोरोचन लगाते हैं, और शिव को चंदन लगाकर कमल चढ़ाते हैं।
  4. आज की उल्टी पूजा: शिव को तुलसी चढ़ती है और विष्णु को बेल पत्र।
  5. भोर से पहले, अरुणोदय में, शिव की पूजा होती है, और उसी से रात की पूजा पूरी होती है।
  6. काँसे के दीये में गाय के घी का दीया जलता है, और भोग में मखाने की खीर बनती है, जिसे पूजा के बाद गाय को खिलाते हैं।
  7. कहते हैं कि पुराणों के अनुसार इस दिन का दान और जप दस यज्ञों जितना फल देता है।

सवाल जवाब

वैकुंठ चतुर्दशी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

वैकुंठ चतुर्दशी 2026 में कब है?

वैकुंठ चतुर्दशी 2026 में 23 नवंबर, सोमवार को है। इस बरस की तिथि, मुहूर्त और शुभकामना कार्ड वैकुंठ चतुर्दशी 2026 के पन्ने पर हैं। यह पन्ना 2027 का है।

वैकुंठ चतुर्दशी 2027 कब है?

वैकुंठ चतुर्दशी 2027 में 12 नवंबर, शुक्रवार को है। कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी तिथि 12 नवंबर, सुबह 10:22 से 13 नवंबर, सुबह 9:56 तक है। निशीथ काल की पूजा 12 नवंबर, रात 11:39 से 13 नवंबर, रात 12:32 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

वैकुंठ चतुर्दशी पर शिव को तुलसी क्यों चढ़ाते हैं?

क्योंकि इस दिन हरि और हर एक दूसरे को पूजते हैं: विष्णु शिव को तुलसी चढ़ाते हैं और शिव विष्णु को बेल पत्र। बाक़ी साल तुलसी विष्णु की है और बेल शिव का, आज दोनों बदल जाते हैं।

वैकुंठ चतुर्दशी पर विष्णु और शिव की पूजा किस समय करें?

विष्णु की पूजा आधी रात के पास, निशीथ काल में, और शिव की पूजा भोर से पहले, अरुणोदय में। दोनों का समय इस पन्ने पर ऊपर दिया है।

उज्जैन का हरि हर मिलन क्या है?

इस रात महाकाल की सवारी गोपाल मंदिर जाती है, और दोनों देवता मालाएँ बदलते हैं: बेल की माला गोपाल को, तुलसी की महाकाल को। मान्यता है कि चार महीने दुनिया सँभालकर शिव आज उसका भार विष्णु को लौटाते हैं।

विष्णु को सुदर्शन चक्र कैसे मिला?

शिव पुराण के अनुसार, विष्णु ने शिव के हज़ार नामों के साथ हज़ार कमल चढ़ाए; शिव ने एक छिपा लिया, तो विष्णु अपनी कमल जैसी आँख चढ़ाने लगे। शिव ने रोककर उन्हें सुदर्शन चक्र दिया।

वैकुंठ चतुर्दशी और कार्तिक पूर्णिमा में क्या रिश्ता है?

वैकुंठ चतुर्दशी कार्तिक पूर्णिमा से ठीक पहले की तिथि है। अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा का स्नान है, और काशी में देव दीपावली।

वैकुंठ चतुर्दशी का व्रत कब खोलें?

इसका कोई एक तय नियम नहीं मिलता। पूजा रात को विष्णु और भोर में शिव की है, इसलिए व्रत भोर की शिव पूजा के बाद, घर की रीत से, खोलना ठीक रहता है।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Vaikuntha Chaturdashi (Drik Panchang)कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी, निशीथ में विष्णु और अरुणोदय में शिव, हज़ार कमल और सहस्रनाम, तुलसी और बेल का लेन देन, विश्वनाथ के गर्भगृह में विष्णु, मणिकर्णिका स्नान, देव दीपावली
  2. Shiva Purana, Kotirudra Samhita, Adhyaya 36 (VedaPath)हज़ार कमल, छिपाया हुआ कमल, 'मन्नेत्रं कमलं न किम्', 'मा मा', सुदर्शन वाला श्लोक, दस हज़ार सूरजों जैसी चमक
  3. Stories from the Shiva Purana: Acquisition of Sudarshana Chakra by Vishnu (Advaita-L)दैत्यों का सताना, कैलास, मानसरोवर के कमल, हज़ार नाम
  4. Vaikuntha Chaturdashi: Hari Hara Milan (Hindu Tone)हरि और हर की साथ पूजा, घर की विधि, सहस्रनाम और स्तोत्र, चातुर्मास के बाद सृष्टि लौटाना, मणिकर्णिका, व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह
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तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।