पंचांग 2027

सुंदरकांड के पात्र

सुरसा

नागों की माता, जिसने देवताओं के कहने पर हनुमान को परखा

सुरसा नागों की माता हैं। सुंदरकांड में देवता उनसे कहते हैं कि वे हनुमान का रास्ता रोककर उनकी ताक़त और समझ को परखें। सुरसा अपना मुँह बढ़ाती जाती हैं और हनुमान अपना शरीर, फिर हनुमान अचानक अंगूठे जितने छोटे होकर उनके मुँह में जाते हैं और बाहर निकल आते हैं। सुरसा ख़ुश होकर आशीर्वाद देती हैं।

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1

वाल्मीकि रामायण में

देवता, गंधर्व, सिद्ध और महर्षि सुरसा से कहते हैं कि वे पल भर के लिए भयानक रूप लेकर हनुमान को रोकें, ताकि उनकी ताक़त और बुद्धि की परख हो। सुरसा हनुमान से कहती हैं कि देवताओं ने तुम्हें मेरा भोजन बनाया है, मेरे मुँह में आओ।

हनुमान उन्हें राम का काम बताते हैं और वचन देते हैं कि सीता को देखकर वे ख़ुद लौटकर उनके मुँह में आ जाएँगे। सुरसा कहती हैं कि उन्हें ब्रह्मा का वरदान है, कोई उन्हें लाँघकर नहीं जा सकता।

हनुमान दस योजन बढ़ते हैं तो सुरसा का मुँह बीस योजन का हो जाता है, और यह होड़ चलती रहती है, जब तक हनुमान नब्बे योजन के नहीं हो जाते। तब हनुमान अचानक अंगूठे जितने छोटे होकर उनके मुँह में जाते हैं और बाहर निकल आते हैं। इस तरह सुरसा का वरदान भी सच रहता है और रास्ता भी खुल जाता है। सुरसा अपने रूप में लौटकर उन्हें आशीर्वाद देती हैं।

ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः। अब्रुवन् सूर्यसङ्काशां सुरसां नागमातरम्॥

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1, श्लोक 145

तब देवताओं, गंधर्वों, सिद्धों और महर्षियों ने सूरज जैसी चमकती नागों की माता सुरसा से कहा।

प्रविष्टोऽस्मि हि ते वक्त्रं दाक्षायणि नमोऽस्तु ते। गमिष्ये यत्र वैदेही सत्यं चासीद्वरस्तव॥

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1, श्लोक 169

हे दाक्षायणी, मैं तुम्हारे मुँह में जा चुका हूँ, तुम्हें प्रणाम। अब मैं वहाँ जाऊँगा जहाँ वैदेही हैं। तुम्हारा वरदान भी सच हो गया। (हनुमान, सुरसा से)

तुलसीदास, रामचरितमानस, सुंदरकांड

रामचरितमानस में

सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥

रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 2 से पहले की चौपाई

देवताओं ने नागों की माता सुरसा को भेजा, और उसने आकर यह बात कही।

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥2॥

रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 2

(सुरसा बोलीं) तुम बल और बुद्धि के भंडार हो, राम का सारा काम करोगे। यह आशीर्वाद देकर वे चली गईं, और हनुमान ख़ुश होकर आगे चले।

मानस में परीक्षा और आशीर्वाद वैसे ही हैं, पर गिनती बदल जाती है: सुरसा का मुँह एक योजन से शुरू होकर सोलह, फिर बत्तीस, और आख़िर में सौ योजन तक जाता है, और हनुमान हर बार उसके दुगने हो जाते हैं।

दूसरी रामकथाओं में

खेल में यह पल खुला हुआ मुँह पर आता है, और वहाँ इसे दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है।

रामचरितमानस

मानस में भी यह पड़ाव आता है, और वहाँ भी वे नागों की माता हैं।

तुलसीदास इसे परीक्षा कहकर ही लिखते हैं, इसलिए वहाँ कोई कड़वाहट नहीं बचती।

वे कहती हैं कि देवताओं ने उन्हें भेजा है, और रास्ता तभी मिलेगा जब मुँह में से निकलकर दिखाओ।

मुँह बड़ा होता जाता है, और सामने वाला अचानक अंगूठे जितना छोटा होकर भीतर से निकल जाता है।

निकलते ही वे आशीर्वाद देती हैं और रास्ता खुल जाता है।

रामचरितमानस, सुंदरकांड, सुरसा वाला प्रसंग · रामचरितमानस

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सुंदरकांड पर और

यही पल, सारी रामकथाओं में एक साथ:

श्लोक और उनकी संख्या आईआईटी कानपुर के पाठ से हैं। वाल्मीकि रामायण का यह पाठ दक्षिण की परंपरा का है, जिसमें सुंदरकांड 68 सर्गों का है; बड़ौदा के समीक्षित संस्करण में सर्ग संख्या कुछ अलग है। श्लोकों का अर्थ सीधी हिंदी में दिया गया है।

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

सुरसा कौन थी?

नागों की माता। सुंदरकांड में देवता उन्हें हनुमान की ताक़त और बुद्धि परखने भेजते हैं।

सुरसा ने हनुमान को क्यों रोका?

परखने के लिए। वाल्मीकि रामायण में देवता, गंधर्व, सिद्ध और महर्षि उनसे कहते हैं कि पल भर के लिए हनुमान का रास्ता रोको, ताकि उनकी ताक़त और बुद्धि की परख हो।

हनुमान सुरसा के मुँह से कैसे निकले?

सुरसा का मुँह और हनुमान का शरीर बढ़ते गए, फिर हनुमान अचानक अंगूठे जितने छोटे होकर उनके मुँह में गए और बाहर निकल आए। इससे सुरसा का वरदान भी सच रहा और रास्ता भी खुल गया।