सुंदरकांड के पात्र
लंकिनी
लंका नगर की रखवाली, जिसे हनुमान ने एक मुक्का मारा
लंकिनी लंका नगर की रखवाली करने वाली है। जब हनुमान रात में नगर में जाने लगते हैं, तो वह उन्हें रोकती है। हनुमान के एक मुक्के से वह गिर पड़ती है, और तब बताती है कि ब्रह्मा ने उससे कहा था, जिस दिन कोई वानर उसे हरा देगा, उस दिन से राक्षसों पर संकट आ जाएगा।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 3
वाल्मीकि रामायण में
वाल्मीकि रामायण में उसका नाम लंकिनी नहीं है। वहाँ वह ख़ुद लंका नगरी है, जो एक डरावनी स्त्री के रूप में सामने आती है और कहती है कि वह रावण के कहने पर नगर की रखवाली करती है।
हनुमान कहते हैं कि वे बस नगर देखना चाहते हैं। वह उन्हें थप्पड़ मारती है। हनुमान उसे बाएँ हाथ के मुक्के से मारते हैं, पूरा ग़ुस्सा रोककर, क्योंकि वह स्त्री है, और वह गिर पड़ती है।
तब वह बताती है कि ब्रह्मा ने उससे कहा था, जब कोई वानर तुम्हें अपने बल से हरा दे, तब जानना कि राक्षसों पर संकट आ गया है। फिर वह हनुमान को सीता को ढूँढने के लिए नगर में जाने देती है।
अहं हि नगरी लङ्का स्वयमेव प्लवङ्गम। सर्वतः परिरक्षामि ह्येतत्ते कथितं मया॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 3, श्लोक 30
हे वानर, मैं ख़ुद लंका नगरी हूँ, और चारों तरफ़ से इसकी रखवाली करती हूँ। यह मैंने तुम्हें बता दिया।
यदा त्वां वानरः कश्चिद्विक्रमाद्वशमानयेत्॥ तदा त्वया हि विज्ञेयं रक्षसां भयमागतम्।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 3, श्लोक 47
(ब्रह्मा ने कहा था) जब कोई वानर अपने बल से तुम्हें वश में कर ले, तब समझ लेना कि राक्षसों पर भय आ गया है।
तुलसीदास, रामचरितमानस, सुंदरकांड
रामचरितमानस में
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 4 से पहले की चौपाई
लंकिनी नाम की एक राक्षसी ने (रोककर) कहा, मेरा अनादर करके कहाँ चले?
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥4॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 4
हे तात, स्वर्ग और मोक्ष के सारे सुख तराज़ू के एक पलड़े पर रख दो, तब भी वे सब मिलकर उस सुख के बराबर नहीं, जो पल भर के सत्संग से मिलता है।
मानस में वह लंकिनी नाम की एक रखवाली राक्षसी है, नगर ख़ुद नहीं। ब्रह्मा की बात वहाँ उस समय से जुड़ती है जब ब्रह्मा ने रावण को वर दिया था, और आख़िर में वह राम के दूत के दर्शन को सत्संग कहकर सराहती है, जो वाल्मीकि में नहीं है।
दूसरी रामकथाओं में
खेल में यह पल लंका का द्वार पर आता है, और वहाँ इसे दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है।
रामचरितमानस
रात है। वे मच्छर जितने छोटे होकर नगर में घुसना चाहते हैं, पर द्वार पर एक राक्षसी उन्हें रोक लेती है।
वह पूछती है कि तू कौन है और चोरों की तरह क्यों घुस रहा है। वे कुछ कहते नहीं, बस एक घूँसा मारते हैं।
वह गिर पड़ती है, मुँह से खून आता है। गिरी हुई हालत में ही उसे वह पुरानी बात याद आती है जो उससे कही गई थी, कि जिस दिन कोई वानर उसे मारेगा, उसी दिन से राक्षसों के दिन पूरे समझना।
अब वह डरती नहीं। वह हाथ जोड़कर कहती है कि जिसके मन में राम का नाम बस गया, उसके लिए यह नगर कुछ भी नहीं। फिर वह ख़ुद उसे भीतर जाने देती है।
· रामचरितमानसश्लोक और उनकी संख्या आईआईटी कानपुर के पाठ से हैं। वाल्मीकि रामायण का यह पाठ दक्षिण की परंपरा का है, जिसमें सुंदरकांड 68 सर्गों का है; बड़ौदा के समीक्षित संस्करण में सर्ग संख्या कुछ अलग है। श्लोकों का अर्थ सीधी हिंदी में दिया गया है।
सुंदरकांड के और पात्र
- मैनाकसमुद्र से उठा सोने का पहाड़, जिसने हनुमान को रुकने को कहा
- सुरसानागों की माता, जिसने देवताओं के कहने पर हनुमान को परखा
- सिंहिकापरछाईं पकड़ने वाली राक्षसी
- मंदोदरीरावण की रानी, जिसे हनुमान ने पल भर के लिए सीता समझ लिया
- त्रिजटाबूढ़ी राक्षसी, जिसने राक्षसों के अंत का सपना देखा
- विभीषणरावण का छोटा भाई, जिसने भरे दरबार में कहा कि दूत को मारा नहीं जाता
- अक्षय कुमाररावण का बेटा, जो सोने के रथ पर हनुमान से लड़ने आया