सुंदरकांड के पात्र
अक्षय कुमार
रावण का बेटा, जो सोने के रथ पर हनुमान से लड़ने आया
अक्षय कुमार, जिन्हें वाल्मीकि रामायण में अक्ष कहा गया है, रावण के बेटे हैं। अशोक वाटिका उजड़ने के बाद जब रावण के सेनापति हार जाते हैं, तब रावण उन्हें भेजता है। वे बहादुरी से लड़ते हैं, पर हनुमान उन्हें मार देते हैं, और इससे रावण डर जाता है।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 47
वाल्मीकि रामायण में
पाँच सेनापतियों के मारे जाने के बाद रावण अपने बेटे अक्ष को भेजता है। वे आठ घोड़ों वाले सोने के रथ पर आते हैं और तीन बाणों से हनुमान के माथे पर चोट करते हैं।
हनुमान उनकी कुशलता देखकर उनकी बड़ाई करते हैं और पहले उन्हें मारना नहीं चाहते। फिर सोचते हैं कि बढ़ती आग को अनदेखा नहीं किया जा सकता।
वे हथेली से आठों घोड़ों को मार देते हैं, रथ तोड़ देते हैं, आसमान में उनके पैर पकड़कर घुमाते हैं और ज़मीन पर पटक देते हैं। अक्ष मारे जाते हैं, और रावण डर से भर जाता है।
अबालवद्बालदिवाकरप्रभः करोत्ययं कर्म महन्महाबलः। न चास्य सर्वाहवकर्मशोभिनः प्रमापणे मे मतिरत्र जायते॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 47, श्लोक 26
यह बालक होकर भी बालकों जैसा नहीं, उगते सूरज जैसा चमकता, बहुत बलवान है और बड़े काम कर रहा है। युद्ध के हर काम में चमकते इस वीर को मारने का मेरा मन नहीं करता। (हनुमान, मन में)
न खल्वयं नाभिभवेदुपेक्षितः पराक्रमो ह्यस्य रणे विवर्धते। प्रमापणं त्वेव ममाद्य रोचते न वर्धमानोऽग्निरुपेक्षितुं क्षमः॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 47, श्लोक 29
अगर इसे छोड़ दिया तो यह मुझे हरा देगा, क्योंकि लड़ाई में इसका बल बढ़ता जा रहा है। अब इसे मारना ही ठीक लगता है। बढ़ती आग को अनदेखा नहीं किया जा सकता। (हनुमान, मन में)
तुलसीदास, रामचरितमानस, सुंदरकांड
रामचरितमानस में
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 18 से पहले की चौपाई
फिर रावण ने अक्षयकुमार को भेजा, जो बहुत से योद्धा साथ लेकर चले।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 18 से पहले की चौपाई
उन्हें आते देखकर हनुमान ने एक पेड़ उठाकर ललकारा, उन्हें मार गिराया और ज़ोर से गरजे।
मानस में अक्षय की कथा दो पंक्तियों की है। हनुमान एक पेड़ से उन्हें तुरंत मार देते हैं। रथ वाली लड़ाई और हनुमान का उनकी बड़ाई करना वहाँ नहीं है।
दूसरी रामकथाओं में
खेल में यह पल वाटिका का तोरण पर आता है, और वहाँ इसे दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है।
रामचरितमानस
मानस में यह पूरी कड़ी तेज़ी से बीतती है। रखवाले आते हैं, फिर सेना, फिर अक्षय।
तुलसीदास नाम गिनाने पर नहीं रुकते, वे उस एक बात पर रुकते हैं कि जो भी आया, लौटा नहीं।
तोरण पर चढ़कर वे नीचे देखते हैं, और नीचे से पत्थर आने लगते हैं।
हर बार जो लौटकर ख़बर देता है, वह यही कहता है कि यह कोई आम वानर नहीं।
इसीलिए वहाँ यह हिस्सा लड़ाई कम और चेतावनी ज़्यादा लगता है।
रामचरितमानस, सुंदरकांड, अक्षय वध वाला हिस्सा · रामचरितमानसरामावतार
रामावतार में यह पूरी कड़ी उसी एक छंद की एक पंक्ति है।
वे नगर जलाते हैं, अक्षय कुमार को मारते हैं, और अशोक वाटिका उजाड़ देते हैं।
न डर की बात आती है, न विनती की, सिर्फ़ काम होता है।
लड़ाई का पूरा ब्योरा कवि आगे युद्ध के छंदों के लिए बचाकर रखते हैं।
छंद तेज़ हैं और शब्द ऐसे चुने गए हैं जो सुनते ही खड़ा कर दें।
दसम ग्रंथ, रामावतार, छंद 366 · रामावतारश्लोक और उनकी संख्या आईआईटी कानपुर के पाठ से हैं। वाल्मीकि रामायण का यह पाठ दक्षिण की परंपरा का है, जिसमें सुंदरकांड 68 सर्गों का है; बड़ौदा के समीक्षित संस्करण में सर्ग संख्या कुछ अलग है। श्लोकों का अर्थ सीधी हिंदी में दिया गया है।
सुंदरकांड के और पात्र
- मैनाकसमुद्र से उठा सोने का पहाड़, जिसने हनुमान को रुकने को कहा
- सुरसानागों की माता, जिसने देवताओं के कहने पर हनुमान को परखा
- सिंहिकापरछाईं पकड़ने वाली राक्षसी
- लंकिनीलंका नगर की रखवाली, जिसे हनुमान ने एक मुक्का मारा
- मंदोदरीरावण की रानी, जिसे हनुमान ने पल भर के लिए सीता समझ लिया
- त्रिजटाबूढ़ी राक्षसी, जिसने राक्षसों के अंत का सपना देखा
- विभीषणरावण का छोटा भाई, जिसने भरे दरबार में कहा कि दूत को मारा नहीं जाता