
उनतालीस लंकाएँ · खंड 3
दो हज़ार अट्ठाईस लकीरें
Do Hazar Atthais Lakeeren · Two Thousand Twenty Eight Lines
प्रकाशन की तैयारी में
जगह छीनी नहीं जाती। दी जाती है।
कहानी
1987 के उस रविवार से अम्मा हर रविवार दीवार पर एक लाल लकीर खींचती आई हैं। अब तक दो हज़ार अट्ठाईस लकीरें हो चुकी हैं। हर दिवाली पूरा घर पुतता है, बस वह दीवार नहीं।
तीसरी रात पाँचवीं अम्मा होंगी। उम्र चौहत्तर, हाथ में छड़ी, और ऐसे घुटने कि सब मना करते हैं। अम्मा बस इतना कहती हैं, “उनतालीस साल हमने हर रविवार एक लकीर खींचकर इंतज़ार किया है, और तुम हमें घुटने गिनाओगे?”
फ़ोन में बस इक्कीस प्रतिशत बैटरी है, और गिनती के पल धनुषकोडि की हवा अम्मा का पल्लू उनके चेहरे पर डाल देती है। दरवाज़ा फिर भी 1987 वाली लंका में खुलता है, उसी रविवार की लंका में। पर उस लंका की छतें जलती हैं, और बचने का दूसरा रास्ता बस ढलते सूरज तक खुला है।
पचानवे बरस से एक राजा लंकाओं में किसी की जगह माँग रहा है। गाथा के इस आख़िरी खंड में सवाल बदल जाता है: कौन अपनी जगह ख़ुद देगा?
कौन कौन
इस खंड के लोग
बालकअदासोलह साल की, देहरादून की
कथा प्रेमीअन्नूअदा की मम्मा, बनारस की
योद्धाकुंदनअदा के पापा, गढ़वाल के
जिज्ञासुतेनज़िनअदा का दोस्त, देहरादून का
राजा भानुप्रतापसन इकतीस से लंका में
और अम्मा, अन्नू की माँ: तीसरे खंड में साथ आती हैं, छड़ी लिए। उन्होंने कभी समुद्र नहीं देखा।
इस खंड की लंकाएँ
किन कथाओं की लंका में
हर कथा का अपना पन्ना है, लंका की खोज खेल के हिस्से में: वह किसकी है, कहाँ की है, और सुंदरकांड के पल उसमें कैसे कहे गए।
पूरी गाथा: उनतालीस लंकाएँ · खेल: लंका की खोज

