अशोक वाटिका कैसी थी, और वहाँ सीता जी से पहली भेंट
अशोक वाटिका रावण का बाग़ है, जहाँ सीता जी को राक्षसियों के पहरे में रखा गया है। वाल्मीकि के अनुसार वहाँ सोने और चाँदी जैसे पेड़ हैं, एक सुनहरा शिंशपा का पेड़ है जिस पर सैकड़ों घंटियाँ बजती हैं, और हज़ार खंभों वाला एक सफ़ेद चैत्य। हनुमान जी इसी शिंशपा में छिपकर सीता जी को पहली बार देखते हैं।

एक नज़र में
| कथा | सीता जी तक क्या पहुँचा | कैसे | कहाँ लिखा है |
|---|---|---|---|
| वाल्मीकि रामायण | राम की अँगूठी | हनुमान जी पहले राम की कथा सुनाते हैं, फिर अँगूठी देते हैं | सुंदरकांड, सर्ग 36 |
| रामचरितमानस | राम की अँगूठी | पेड़ पर से नीचे डाली | सुंदरकांड, दोहा 12 |
| रामकियेन | अँगूठी और कपड़ा | फाँसी से बचाने के बाद | भाग 14 |
| जैन रामकथा | अँगूठी | अदृश्य होकर गोद में डाली | त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6 |
| ककविन रामायण | लौटते समय चूड़ामणि और चिट्ठी | सीता जी ने हनुमान जी को दी | सर्ग 11 |
| तिब्बती रामकथा | चिट्ठियाँ, दोनों ओर से | हनुमान जी ले गए और लाए | दुनहुआंग की पोथियाँ |
वाल्मीकि रामायण में: बाग़ जो चमकता है
वाटिका में ऐसे पेड़ हैं जो चाँदी और सोने के बने लगते हैं, और कुछ उगते सूरज जैसे (सर्ग 14, श्लोक 5 से 8)। हज़ारों अशोक के पेड़ हैं: कुछ सोने जैसे, कुछ आग जैसे, कुछ नीलम और काजल जैसे गहरे (सर्ग 15, श्लोक 10)।
पंछियों के पंखों की हवा से पेड़ों से रंग बिरंगे फूल झड़ते हैं, और फूलों से ढके हनुमान जी फूलों के पहाड़ जैसे दिखते हैं (सर्ग 14, श्लोक 10 और 11)। वहाँ कोयल, मोर, हंस, सारस और चकवे हैं।
बीच में शिंशपा का एक सुनहरा पेड़ है, जिसके चारों ओर सोने के चबूतरे हैं, और हवा चलने पर उस पर सैकड़ों छोटी घंटियाँ बजती हैं (सर्ग 14, श्लोक 36 से 40)। हनुमान जी इसी के पत्तों में छिप जाते हैं (श्लोक 52)।
पास ही एक चैत्य है, हज़ार खंभों पर खड़ा, कैलाश जैसा सफ़ेद, मूँगे की सीढ़ियों और सोने के चबूतरों वाला (सर्ग 15, श्लोक 16 और 17)। वहाँ सीता जी पीले, मैले कपड़े में, उपवास से दुबली, राक्षसियों से घिरी हुई हैं, शुक्ल पक्ष के पहले दिन के पतले चाँद जैसी (सर्ग 15, श्लोक 18 से 21)।
हर कथा में सीता जी तक पहुँची निशानी
रामचरितमानस में हनुमान जी पेड़ पर से अँगूठी नीचे डालते हैं, और सीता जी को वह ऐसी लगती है जैसे अशोक ने अंगारा दे दिया हो (सुंदरकांड, दोहा 12)।
रामकियेन में सीता जी पेड़ की डाल से अपना कपड़ा बाँधकर फाँसी लगाने कूद पड़ती हैं, और हनुमान जी गाँठ खोलकर उन्हें नीचे उतारते हैं। उसके बाद ही वे राम की अँगूठी और कपड़ा दिखाते हैं (राजा राम प्रथम का पाठ, भाग 14)।
हेमचंद्र की जैन रामकथा में हनुमान जी अदृश्य होकर अँगूठी सीता जी की गोद में डालते हैं। राम की ख़बर की ख़ुशी में, और हनुमान जी के कहने पर, सीता जी इक्कीसवें दिन और रात के बाद पहली बार खाना खाती हैं (त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6)।
जावा की ककविन रामायण में सीता जी लौटते हनुमान जी को चूड़ामणि के साथ राम के नाम एक लिखी हुई चिट्ठी भी देती हैं, और राम उसे पढ़ते हैं (सर्ग 11)। तिब्बती रामकथा में तो राम और सीता हनुमान जी के हाथों एक दूसरे को चिट्ठियाँ भेजते हैं, और राम उन्हें इस बात पर टोकते भी हैं कि वे ख़ुद चिट्ठी लिखकर हाल क्यों नहीं पूछते रहे।
इस पर और
हर कथा का अपना पन्ना है, और हर पात्र का भी।










