उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · फाल्गुन कृष्ण सप्तमी
शबरी जयंती 2027
Shabari Jayanti 2027
जिसने बरसों एक ही रास्ता देखा, और जिस दिन वह रास्ता चलकर आया।
शबरी जयंती 2027 में 27 फ़रवरी, शनिवार को है। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी तिथि 26 फ़रवरी, रात 8:44 से 27 फ़रवरी, रात 9:55 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
खट्टा। फिर ज़रा रुककर, मीठा।
पहाड़ी पर बेर के पेड़ हैं, और नीचे गिरे बेरों पर धूप।
एक बच्चा एक बेर चखता है और बाक़ी अपनी झोली में रख लेता है।
दादी हँसती हैं: पहले ख़ुद चखा? शबरी की तरह?
पुजारी जी धीरे से कहते हैं, वाल्मीकि में तो चखने की बात ही नहीं है।
दादी कंधे उचकाती हैं। हमारे यहाँ तो है।
एक ही बुढ़िया, एक ही दोना। और हर कहने वाले के हाथ में बेर का स्वाद थोड़ा अलग।
2027 में कब
शबरी जयंती 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़27 फ़रवरी, शनिवार
तिथिफाल्गुन कृष्ण सप्तमी26 फ़रवरी, रात 8:44 से 27 फ़रवरी, रात 9:55 तक
नक्षत्रविशाखासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:49
सूर्यास्तशाम 6:19
चंद्रोदयरात 12:01
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शुभकामना
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पहचान
शबरी जयंती क्या है
शबरी जयंती उस तपस्विनी की याद का दिन है जिसने पंपा सरोवर के पास अपने गुरुओं के कहने पर बरसों राम की राह देखी। उत्तर भारत के पंचांग में यह फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को आती है। गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण के अमांत पंचांग में इसी दिन को माघ कृष्ण सप्तमी कहा जाता है, यानी महीने का नाम बदलता है, दिन वही रहता है। वाल्मीकि रामायण शबरी को श्रमणी कहती है, यानी तपस्या करने वाली स्त्री। गुजरात के डांग ज़िले का शबरी धाम वह जगह मानी जाती है जहाँ राम शबरी से मिले थे।
कथा
शबरी जयंती की कथा
वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड का चौहत्तरवाँ सर्ग यह कथा कहता है। सीता को खोजते राम और लक्ष्मण कबंध के बताए रास्ते पर पश्चिम की ओर चलते हैं और पंपा सरोवर के पश्चिमी किनारे शबरी के आश्रम पहुँचते हैं। शबरी उन्हें देखते ही उठ खड़ी होती हैं, हाथ जोड़ती हैं और दोनों भाइयों के पाँव पकड़ लेती हैं। पाँव धोने और आचमन के लिए जल देती हैं। फिर कहती हैं: मेरे गुरु, मतंग मुनि के शिष्य, जाते समय कह गए थे कि राम आएँगे, उनकी राह देखना। आज आपको देखकर मेरी तपस्या पूरी हुई।
वे बताती हैं कि उन्होंने राम के लिए पंपा के किनारे उगने वाले तरह तरह के जंगली फल और कंद जमा करके रखे हैं (सर्ग चौहत्तर, श्लोक सत्रह)। फिर वे राम को मतंग वन दिखाती हैं: वहाँ की वेदियाँ, मुनियों के गीले वल्कल जो अब तक सूखे नहीं, उनकी मालाएँ जो अब तक मुरझाई नहीं, और यह बात कि नहाने के लिए समुद्र तक न जा सकने वाले मुनियों ने सातों समुद्रों को अपने पास बुला लिया था। आख़िर में राम की आज्ञा लेकर शबरी अपना शरीर आग को सौंप देती हैं और उस लोक को चली जाती हैं जहाँ उनके गुरु गए थे।
तुलसीदास के रामचरितमानस में, अरण्यकांड में, शबरी राम को घर आया देखती हैं तो उन्हें मुनि की बात याद आती है: “सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥” वे फल लाती हैं, और तुलसी कहते हैं: “कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥” (दोहा 34) यानी बहुत रसीले कंद, मूल और फल लाकर दिए, और प्रभु ने बार बार तारीफ़ करते हुए प्रेम से खाए। फिर राम कहते हैं: “कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥” मैं बस एक ही रिश्ता मानता हूँ, भक्ति का। और वहीं वे नौ तरह की भक्ति गिनाते हैं, जिसे नवधा भक्ति कहते हैं: पहली संतों का संग, दूसरी मेरी कथा से प्रेम, तीसरी गुरु के चरणों की सेवा, चौथी कपट छोड़कर मेरे गुण गाना, पाँचवीं मंत्र का जाप और पक्का भरोसा, छठी संयम और सज्जनों वाला आचरण, सातवीं सारे जग को मुझमें देखना और संतों को मुझसे बड़ा मानना, आठवीं जो मिले उसमें संतोष और सपने में भी दूसरों का दोष न देखना, और नौवीं सबसे सीधा, छल रहित बरताव और मन में मेरा भरोसा। कथा के अंत में शबरी “तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे”, यानी योग की आग में देह छोड़कर हरि के चरणों में ऐसी लीन हुईं कि फिर लौटना नहीं हुआ।
और जूठे बेर? वाल्मीकि रामायण में शबरी फल जमा करती हैं, चखने की बात नहीं है। मानस में भी फल लाए जाते हैं और राम उन्हें प्रेम से खाते हैं, पर चखकर देने की कोई पंक्ति नहीं। वाल्मीकि रामायण के एक अंग्रेज़ी अनुवाद की टिप्पणी कहती है कि चखकर देने की कथा वाल्मीकि की नहीं, पद्म पुराण से आई है, और वहाँ से ये पंक्तियाँ देती है: “स्वयमासाद्य माधुर्यं परीक्ष्य परिभक्ष्य च। पश्चान्निवेदयामास राघवाभ्यां दृढव्रता॥” यानी पक्के व्रत वाली शबरी ने ख़ुद मिठास परखी, चखकर देखा, और फिर दोनों रघुवंशियों को दिया। डांग के शबरी धाम की मान्यता भी यही है कि शबरी ने यहाँ बेर पहले चखकर राम को दिए।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में शबरी जयंती
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
वाल्मीकि रामायण
संस्कृत · Valmiki Ramayana
वाल्मीकि रामायण में शबरी का प्रसंग अरण्यकांड के चौहत्तरवें सर्ग में है। यहाँ वह श्रमणी हैं, मतंग मुनि के शिष्यों की सेविका, जो गुरुओं के कहने पर राम की राह देखती रहीं। वे पंपा के किनारे के जंगली फल राम के लिए जमा करती हैं, मतंग वन की वेदियाँ और कभी न मुरझाने वाली मालाएँ दिखाती हैं, और फिर राम की आज्ञा से आग में प्रवेश करके गुरुओं के लोक जाती हैं। इस सबसे पुरानी कथा में बेर चखने की बात नहीं है।
रामचरितमानस
अवधी · Ramcharitmanas
रामचरितमानस के अरण्यकांड में शबरी के घर ही राम नवधा भक्ति कहते हैं, दोहा पैंतीस और छत्तीस के आसपास: “नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥ प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥” इससे ठीक पहले राम कहते हैं, “मानउँ एक भगति कर नाता”, यानी मैं बस भक्ति का नाता मानता हूँ। शबरी के लाए फल राम बार बार सराहकर खाते हैं, पर यहाँ भी चखकर देने की पंक्ति नहीं है।
कहाँ कैसे
शबरी जयंती कहाँ कैसे मनाया जाता है
शबरी धाम, डांग (गुजरात)
सुबीर गाँव के पास, आहवा से लगभग तैंतीस किलोमीटर और सापुतारा से लगभग साठ किलोमीटर दूर, एक पहाड़ी पर छोटा मंदिर है, जिसके चारों ओर बेर के पेड़ हैं। मान्यता है कि यहीं शबरी राम से मिलीं, और मंदिर में राम के आने के चित्र बने हैं।
उत्तर भारत
यहाँ के पूर्णिमांत पंचांग में यह दिन फाल्गुन कृष्ण सप्तमी है।
गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत
यहाँ के अमांत पंचांग में यही दिन माघ कृष्ण सप्तमी कहलाता है। महीने का नाम अलग है, पर शबरी जयंती दोनों पंचांगों में एक ही दिन पड़ती है।
रीत
शबरी जयंती के दिन क्या करते हैं
- इस दिन शबरी की कथा पढ़ी और सुनी जाती है। उसका सबसे पुराना रूप वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के चौहत्तरवें सर्ग में है।
- मानस पढ़ने वाले घरों के लिए यह प्रसंग अरण्यकांड के दोहा चौंतीस से छत्तीस तक है, जिसमें नवधा भक्ति आती है।
- नवधा भक्ति की नौ पंक्तियाँ छोटी हैं, और इन्हें एक एक करके याद करना इस दिन की सबसे सीधी पूजा है।
- गुजरात के डांग ज़िले में सुबीर के पास शबरी धाम की पहाड़ी पर लोग दर्शन को जाते हैं, जहाँ मान्यता है कि राम शबरी से मिले थे।
रसोई
शबरी जयंती का खाना
- बेर शबरी धाम की पहाड़ी बेर के पेड़ों से घिरी है, और वहाँ की मान्यता बेरों से ही जुड़ी है।
- कंद, मूल और फल मानस में शबरी राम को यही देती हैं, बहुत रसीले, और राम उन्हें बार बार सराहकर खाते हैं।
सवाल जवाब
शबरी जयंती 2027: पूछे जाने वाले सवाल
शबरी जयंती 2027 कब है?
शबरी जयंती 2027 में 27 फ़रवरी, शनिवार को है। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी तिथि 26 फ़रवरी, रात 8:44 से 27 फ़रवरी, रात 9:55 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
शबरी जयंती किस तिथि को होती है?
उत्तर भारत के पंचांग में फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को। अमांत पंचांग में इसी दिन को माघ कृष्ण सप्तमी कहते हैं, इसलिए दिन दोनों में एक ही रहता है।
क्या वाल्मीकि रामायण में शबरी के जूठे बेर हैं?
नहीं। अरण्यकांड के चौहत्तरवें सर्ग में शबरी पंपा के किनारे के फल जमा करती हैं, पर चखकर देने की बात नहीं है। एक अनुवाद की टिप्पणी इस कथा को पद्म पुराण से आया बताती है।
क्या रामचरितमानस में शबरी बेर चखकर देती हैं?
मानस में शबरी कंद, मूल और रसीले फल लाकर देती हैं और राम उन्हें प्रेम से सराहकर खाते हैं। चखकर देने की पंक्ति वहाँ नहीं है।
नवधा भक्ति क्या है?
रामचरितमानस के अरण्यकांड में राम शबरी को नौ तरह की भक्ति बताते हैं: संतों का संग, कथा से प्रेम, गुरु की सेवा, गुण गाना, मंत्र जाप, संयम, सबमें प्रभु को देखना, संतोष, और सीधा छल रहित मन।
शबरी धाम कहाँ है?
गुजरात के डांग ज़िले में, सुबीर गाँव के पास। मान्यता है कि यहीं राम शबरी से मिले थे।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Shabari Jayanti, Drik Panchangफाल्गुन कृष्ण सप्तमी, अमांत में माघ, दोनों में एक दिन
- Valmiki Ramayana, Aranya Kanda 74 (prose)शबरी का आश्रम, गुरु, फल, मतंग वन, अग्नि प्रवेश
- Valmiki Ramayana, Aranya Kanda 74 (verse and notes)श्लोक सत्रह, श्रमणी, चखने की कथा पद्म पुराण की होने की टिप्पणी
- Shri Ramcharitmanas, Aranyakanda, sanskritdocumentsशबरी प्रसंग, नवधा भक्ति, शबरी का अंत
- कंद मूल फल सुरस अति, भारतकोशदोहा चौंतीस और उसका अर्थ
- Devotional trip to Shabari Dham, ISKCON Newsडांग का शबरी धाम, सुबीर, बेर के पेड़, स्थानीय मान्यता
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।