सुंदरकांड के पात्र
विभीषण
रावण का छोटा भाई, जिसने भरे दरबार में कहा कि दूत को मारा नहीं जाता
विभीषण रावण के छोटे भाई हैं। सुंदरकांड में जब रावण हनुमान को मार डालने का आदेश देता है, तब विभीषण कहते हैं कि दूत को मारना धर्म के ख़िलाफ़ है। रावण मान जाता है, और मौत की जगह हनुमान की पूँछ में आग लगाने का आदेश देता है।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 52
वाल्मीकि रामायण में
रावण हनुमान को मारने का आदेश देता है, तो विभीषण कहते हैं कि जो राजा सही और ग़लत जानते हैं, वे दूत को नहीं मारते। दूत को सज़ा दी जा सकती है, अंग बिगाड़ना, कोड़े मारना, सिर मुँडवाना या निशान दाग़ना, पर दूत को मारने की बात कभी नहीं सुनी गई।
वे यह भी कहते हैं कि इसे मार दिया तो राम तक ललकार ले जाने वाला कोई नहीं बचेगा, इसलिए सज़ा उन्हें मिलनी चाहिए जिन्होंने इसे भेजा।
रावण बात मान लेता है और अगले सर्ग में हनुमान की पूँछ में आग लगाने का आदेश देता है। वाल्मीकि में विभीषण का लंका छोड़कर राम के पास जाना इसके बाद, युद्धकांड में आता है।
क्षमस्व रोषं त्यज राक्षसेन्द्र प्रसीद मद्वाक्यमिदं शृणुष्व। वधं न कुर्वन्ति परावरज्ञा दूतस्य सन्तो वसुधाधिपेन्द्राः॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 52, श्लोक 5
राक्षसराज, क्षमा करो, ग़ुस्सा छोड़ो, शांत होकर मेरी यह बात सुनो। जो भले राजा ऊँच नीच जानते हैं, वे दूत का वध नहीं करते।
वैरूप्यमङ्गेषु कशाभिघातो मौण्ड्यं तथा लक्षणसन्निपातः। एतान् हि दूते प्रवदन्ति दण्डान् वधस्तु दूतस्य न नः श्रुतोऽस्ति॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 52, श्लोक 15
अंग बिगाड़ना, कोड़े मारना, सिर मुँडवाना, निशान दाग़ना, दूत के लिए यही सज़ाएँ बताई गई हैं। दूत को मारने की बात हमने कभी नहीं सुनी।
तुलसीदास, रामचरितमानस, सुंदरकांड
रामचरितमानस में
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 24 से पहले की चौपाई
सिर झुकाकर और बहुत विनती करके (विभीषण ने कहा), दूत को मारना नीति के ख़िलाफ़ है।
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि। मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि॥41॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 41
राम सच्चे संकल्प वाले प्रभु हैं, और तुम्हारी सभा काल के वश में है। अब मैं रघुवीर की शरण में जाता हूँ, मुझे दोष मत देना।
दूत वाली बात दोनों में एक जैसी है। पर मानस में विभीषण का रावण से टूटना, राम की शरण में जाना और लंका के राजा का तिलक, तीनों सुंदरकांड के भीतर ही आ जाते हैं, जबकि वाल्मीकि में ये युद्धकांड में हैं। मानस यह भी कहता है कि रावण ने विभीषण को लात मारी, जो वाल्मीकि में नहीं है।
दूसरी रामकथाओं में
खेल में यह पल एक अलग सा घर, विभीषण की नीति पर आता है, और वहाँ इसे दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है।
रामचरितमानस
मानस में यह घर इसलिए दिखता है कि वहाँ तुलसी लगी है और राम का नाम लिया जा रहा है।
हनुमान ठिठक जाते हैं, क्योंकि राक्षसों के नगर में यह आवाज़ कहीं और नहीं सुनाई दी।
घर छोटा है, और उसके आँगन में एक पौधा लगा है, जिसके चारों ओर मिट्टी का घेरा बना है।
भीतर कोई धीमे स्वर में नाम ले रहा है, और वह आवाज़ रुकती नहीं।
विभीषण से भेंट यहीं होती है, और वही आगे का रास्ता बताते हैं।
रामचरितमानस, सुंदरकांड, विभीषण से भेंट · रामचरितमानससुंदरकांड पर और
यही पल, सारी रामकथाओं में एक साथ:
श्लोक और उनकी संख्या आईआईटी कानपुर के पाठ से हैं। वाल्मीकि रामायण का यह पाठ दक्षिण की परंपरा का है, जिसमें सुंदरकांड 68 सर्गों का है; बड़ौदा के समीक्षित संस्करण में सर्ग संख्या कुछ अलग है। श्लोकों का अर्थ सीधी हिंदी में दिया गया है।
सुंदरकांड के और पात्र
- मैनाकसमुद्र से उठा सोने का पहाड़, जिसने हनुमान को रुकने को कहा
- सुरसानागों की माता, जिसने देवताओं के कहने पर हनुमान को परखा
- सिंहिकापरछाईं पकड़ने वाली राक्षसी
- लंकिनीलंका नगर की रखवाली, जिसे हनुमान ने एक मुक्का मारा
- मंदोदरीरावण की रानी, जिसे हनुमान ने पल भर के लिए सीता समझ लिया
- त्रिजटाबूढ़ी राक्षसी, जिसने राक्षसों के अंत का सपना देखा
- अक्षय कुमाररावण का बेटा, जो सोने के रथ पर हनुमान से लड़ने आया