पंचांग 2027

सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में

लंका दहन

सीधा जवाब

रावण के कहने पर राक्षस हनुमान जी की पूँछ में कपड़ा लपेटकर आग लगाते हैं, और हनुमान जी उसी जलती पूँछ से छत से छत कूदते हुए पूरी लंका जला देते हैं। वाल्मीकि इस आग को करोड़ों सूरजों जैसी कहते हैं। पर हर रामकथा में यह पल एक सा नहीं है, और एक जैन कथा में लंका जलती ही नहीं।

उनतालीस लंकाएँ: जलती छतें, धुएँ से भरा आकाश
उनतालीस लंकाएँ: जलती छतें, धुएँ से भरा आकाश

एक नज़र में

एक नज़र में: लंका दहन
कथापूँछ में आग कैसेक्या जलाकहाँ लिखा है
वाल्मीकि रामायणकपड़ा और तेलपूरी लंका; बाद में सीता जी के लिए डरसुंदरकांड, सर्ग 53 से 55
रामचरितमानसनगर का सारा कपड़ा, घी और तेलपूरा नगर, बस विभीषण का घर बचासुंदरकांड, दोहा 25 और 26 से पहले
रामकियेनपूँछ में आगलंका; पूँछ मुँह में डालकर आग बुझती है, मुनि नारत के कहने पररामकियेन, लंका दहन
जैन रामकथानागपाश, आग नहींमुकुट और नगर पैरों से तोड़े; जलाना नहींत्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6

वाल्मीकि रामायण में: करोड़ों सूरजों जैसी आग

जलती पूँछ लेकर हनुमान जी लंका की छतों पर बादल की तरह घूमते हैं, एक घर से दूसरे घर (सर्ग 54, श्लोक 6 और 7)। आग की लपटें पलाश, सेमल और केसर के फूलों जैसे रंग की हैं (श्लोक 29), और घी पड़ी आग की तरह आकाश छूती हैं (श्लोक 32)।

वाल्मीकि कहते हैं कि उस आग में करोड़ों सूरजों जैसी चमक है, वह दुनिया के टूटे हुए आधे गोले जैसी धधकती है, और उसमें बिजली की कड़क जैसी आवाज़ है (श्लोक 33)। नीले कमल जैसे बादल धुएँ से ढक जाते हैं (श्लोक 34)। बार बार वह आग प्रलय की आग जैसी कही गई है (श्लोक 21, 32 और 49)।

मोतियों और रत्नों से जड़े, सोने की खिड़कियों वाले घर टुकड़े टुकड़े होकर गिरते हैं (श्लोक 23)। हनुमान जी हीरे, मूँगे, वैदूर्य और मोतियों के साथ पिघली धातुएँ बहती देखते हैं (श्लोक 27)। जलते घरों से बच्चों को गोद में लिए, बिखरे बालों वाली स्त्रियाँ नीचे गिरती हैं (श्लोक 25 और 26)।

आग के बाद का डर: कहीं सीता जी भी तो नहीं जलीं?

लंका जलाकर हनुमान जी अचानक डर जाते हैं कि कहीं इस आग में सीता जी भी न जल गई हों (सर्ग 55, श्लोक 8 और 11)। फिर वे अच्छे शकुन देखते हैं (श्लोक 21), और सोचते हैं कि आग, आग को नहीं जलाती (श्लोक 22 और 23)। तभी आकाश में चारणों की बातें सुनाई देती हैं कि पूरी लंका जल गई, बस सीता जी नहीं जलीं (श्लोक 29 से 32)। यह पल वाल्मीकि का अपना है, और बहुत कम कहा जाता है।

रामचरितमानस में: बस एक घर बचा

तुलसीदास बताते हैं कि पूँछ लपेटने में नगर का सारा कपड़ा, घी और तेल ख़त्म हो गया, और पूँछ बढ़ती गई, जैसे हनुमान जी खेल रहे हों: "रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥" पल भर में पूरा नगर जल गया, बस विभीषण का घर नहीं जला: "जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥" (रामचरितमानस, सुंदरकांड: पहली चौपाई दोहा 25 से पहले, दूसरी दोहा 26 से पहले)।

दूसरी रामकथाओं में

रामकियेन में जलती पूँछ बुझती ही नहीं। तब एक मुनि, नारत, बताते हैं कि पूँछ को मुँह में डाल लो, और आग बुझ जाती है।

हेमचंद्र की जैन रामकथा में कहानी दूसरी है। इंद्रजीत के नागपाश में हनुमान जी सिर से पैर तक बँध जाते हैं, पर वे पाश तोड़ देते हैं, रावण का मुकुट लात मारकर टुकड़े टुकड़े कर देते हैं, और पैरों की चोट से नगर तोड़ देते हैं। इस हिस्से में लंका जलती नहीं (त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6)। कथाकार यहाँ पूछते हैं: कमल की डंडियों से हाथी कब तक बँधा रहेगा?

जावा के प्रंबनन मंदिर की नवीं सदी की पत्थर की पट्टियों में हनुमान जी की पूँछ में आग लगी है, और वे एक भवन की छत पर कूदते दिखते हैं (शिव मंदिर, पट्टी 21)। आज यह पल कहाँ कहाँ खेला जाता है, वह इस पन्ने पर है।

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

हनुमान जी ने लंका क्यों जलाई?

रावण ने दूत को मारने के बजाय उसकी पूँछ जलाने का दंड दिया, और हनुमान जी ने उसी जलती पूँछ से नगर जला दिया (वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 53 और 54)।

लंका दहन में किसका घर नहीं जला?

रामचरितमानस के अनुसार विभीषण का: "जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥"

लंका जलाने के बाद हनुमान जी को क्या डर हुआ?

कि कहीं सीता जी भी न जल गई हों। अच्छे शकुन और चारणों की बात सुनकर उन्हें भरोसा हुआ कि वे सुरक्षित हैं (वाल्मीकि, सर्ग 55)।

क्या हर रामायण में लंका जलती है?

नहीं। हेमचंद्र की जैन रामकथा में हनुमान जी नागपाश तोड़कर रावण का मुकुट तोड़ते हैं और नगर पैरों से तोड़ते हैं, पर लंका जलाने की बात नहीं आती।

लंका दहन और रावण दहन में क्या फ़र्क़ है?

लंका दहन सुंदरकांड का पल है, जब हनुमान जी लंका जलाते हैं। रावण दहन दशहरे पर रावण के पुतले को जलाना है, जो युद्ध में रावण के अंत की याद है। रामनगर की रामलीला में ये दोनों अलग अलग दिन होते हैं।

In English

In Valmiki (Sundara Kanda, sargas 53 to 55) Hanuman strolls over Lanka's rooftops "like a cloud" with his burning tail; the fire has "a splendour equal to millions of suns", gem-set houses shatter and molten metals run with diamonds and pearls. Afterwards he panics that Sita may have burned, until omens and the voices of celestial singers reassure him. Tulsidas says the whole city burned in a moment except Vibhishana's house. In the Thai Ramakien the tail will not stop burning until the hermit Narot tells him to put it in his mouth; and in Hemachandra's Jain telling Hanuman breaks the snake noose, kicks Ravana's crown to pieces and smashes the city with his feet, with no burning of Lanka.

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