लंका दहन
रावण के कहने पर राक्षस हनुमान जी की पूँछ में कपड़ा लपेटकर आग लगाते हैं, और हनुमान जी उसी जलती पूँछ से छत से छत कूदते हुए पूरी लंका जला देते हैं। वाल्मीकि इस आग को करोड़ों सूरजों जैसी कहते हैं। पर हर रामकथा में यह पल एक सा नहीं है, और एक जैन कथा में लंका जलती ही नहीं।

एक नज़र में
| कथा | पूँछ में आग कैसे | क्या जला | कहाँ लिखा है |
|---|---|---|---|
| वाल्मीकि रामायण | कपड़ा और तेल | पूरी लंका; बाद में सीता जी के लिए डर | सुंदरकांड, सर्ग 53 से 55 |
| रामचरितमानस | नगर का सारा कपड़ा, घी और तेल | पूरा नगर, बस विभीषण का घर बचा | सुंदरकांड, दोहा 25 और 26 से पहले |
| रामकियेन | पूँछ में आग | लंका; पूँछ मुँह में डालकर आग बुझती है, मुनि नारत के कहने पर | रामकियेन, लंका दहन |
| जैन रामकथा | नागपाश, आग नहीं | मुकुट और नगर पैरों से तोड़े; जलाना नहीं | त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6 |
वाल्मीकि रामायण में: करोड़ों सूरजों जैसी आग
जलती पूँछ लेकर हनुमान जी लंका की छतों पर बादल की तरह घूमते हैं, एक घर से दूसरे घर (सर्ग 54, श्लोक 6 और 7)। आग की लपटें पलाश, सेमल और केसर के फूलों जैसे रंग की हैं (श्लोक 29), और घी पड़ी आग की तरह आकाश छूती हैं (श्लोक 32)।
वाल्मीकि कहते हैं कि उस आग में करोड़ों सूरजों जैसी चमक है, वह दुनिया के टूटे हुए आधे गोले जैसी धधकती है, और उसमें बिजली की कड़क जैसी आवाज़ है (श्लोक 33)। नीले कमल जैसे बादल धुएँ से ढक जाते हैं (श्लोक 34)। बार बार वह आग प्रलय की आग जैसी कही गई है (श्लोक 21, 32 और 49)।
मोतियों और रत्नों से जड़े, सोने की खिड़कियों वाले घर टुकड़े टुकड़े होकर गिरते हैं (श्लोक 23)। हनुमान जी हीरे, मूँगे, वैदूर्य और मोतियों के साथ पिघली धातुएँ बहती देखते हैं (श्लोक 27)। जलते घरों से बच्चों को गोद में लिए, बिखरे बालों वाली स्त्रियाँ नीचे गिरती हैं (श्लोक 25 और 26)।
आग के बाद का डर: कहीं सीता जी भी तो नहीं जलीं?
लंका जलाकर हनुमान जी अचानक डर जाते हैं कि कहीं इस आग में सीता जी भी न जल गई हों (सर्ग 55, श्लोक 8 और 11)। फिर वे अच्छे शकुन देखते हैं (श्लोक 21), और सोचते हैं कि आग, आग को नहीं जलाती (श्लोक 22 और 23)। तभी आकाश में चारणों की बातें सुनाई देती हैं कि पूरी लंका जल गई, बस सीता जी नहीं जलीं (श्लोक 29 से 32)। यह पल वाल्मीकि का अपना है, और बहुत कम कहा जाता है।
रामचरितमानस में: बस एक घर बचा
तुलसीदास बताते हैं कि पूँछ लपेटने में नगर का सारा कपड़ा, घी और तेल ख़त्म हो गया, और पूँछ बढ़ती गई, जैसे हनुमान जी खेल रहे हों: "रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥" पल भर में पूरा नगर जल गया, बस विभीषण का घर नहीं जला: "जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं॥" (रामचरितमानस, सुंदरकांड: पहली चौपाई दोहा 25 से पहले, दूसरी दोहा 26 से पहले)।
दूसरी रामकथाओं में
रामकियेन में जलती पूँछ बुझती ही नहीं। तब एक मुनि, नारत, बताते हैं कि पूँछ को मुँह में डाल लो, और आग बुझ जाती है।
हेमचंद्र की जैन रामकथा में कहानी दूसरी है। इंद्रजीत के नागपाश में हनुमान जी सिर से पैर तक बँध जाते हैं, पर वे पाश तोड़ देते हैं, रावण का मुकुट लात मारकर टुकड़े टुकड़े कर देते हैं, और पैरों की चोट से नगर तोड़ देते हैं। इस हिस्से में लंका जलती नहीं (त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6)। कथाकार यहाँ पूछते हैं: कमल की डंडियों से हाथी कब तक बँधा रहेगा?
जावा के प्रंबनन मंदिर की नवीं सदी की पत्थर की पट्टियों में हनुमान जी की पूँछ में आग लगी है, और वे एक भवन की छत पर कूदते दिखते हैं (शिव मंदिर, पट्टी 21)। आज यह पल कहाँ कहाँ खेला जाता है, वह इस पन्ने पर है।
इस पर और
हर कथा का अपना पन्ना है, और हर पात्र का भी।










