उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · वैशाख शुक्ल तृतीया
परशुराम जयंती 2027
Parashurama Jayanti 2027
शाम का दीया। और एक ऋषि, जिनके हाथ में फरसा है।
परशुराम जयंती 2027 में 8 मई, शनिवार को है। वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि 8 मई, सुबह 11:43 से 9 मई, सुबह 9:04 तक है। प्रदोष काल शाम 7:00 से रात 9:24 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
आँगन के कोने में कोई लकड़ी चीर रहा है। कुल्हाड़ी उठती है, गिरती है, फिर रुक जाती है।
सूरज अभी अभी डूबा है। पूजा की जगह धुल चुकी है।
वहाँ एक तस्वीर है: जटा, काँधे पर धनुष, हाथ में फरसा।
एक बच्चा पूछता है: ऋषि के हाथ में कुल्हाड़ी क्यों?
दादी दीया जलाती हैं और कहती हैं: थे ऋषि के बेटे, पर लड़े राजा की तरह।
फिर वे वह कथा सुनाती हैं जिसमें यही फरसे वाले ऋषि एक लड़के के आगे अपना धनुष रख देते हैं।
दोनों का नाम राम। रास्ता एक। और कथा वहीं से मुड़ती है।
2027 में कब
परशुराम जयंती 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़8 मई, शनिवार
तिथिवैशाख शुक्ल तृतीया8 मई, सुबह 11:43 से 9 मई, सुबह 9:04 तक
नक्षत्ररोहिणीसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 5:35
सूर्यास्तशाम 7:00
चंद्रोदयसुबह 6:40
- प्रदोष काल
- शाम 7:00 से रात 9:24 तकसूर्यास्त के बाद के दो घंटे चौबीस मिनट।
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शुभकामना
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पहचान
परशुराम जयंती क्या है
परशुराम जयंती विष्णु के छठे अवतार परशुराम के जन्म का दिन मानी जाती है। यह वैशाख के शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है, पर दिन शाम देखकर तय होता है। मान्यता है कि परशुराम प्रदोष काल में जन्मे, यानी सूरज डूबने के ठीक बाद वाली घड़ी में। इसलिए जयंती उस दिन मानते हैं जिस दिन प्रदोष काल में तृतीया हो। इसी कारण यह कभी अक्षय तृतीया के दिन ही पड़ती है, और कभी उससे एक दिन पहले। परशुराम ऋषि जमदग्नि और रेणुका के सबसे छोटे बेटे थे, भृगु के वंश के, इसलिए उन्हें भार्गव और जामदग्न्य भी कहते हैं। हिंदू मान्यता है कि वे चिरंजीवी हैं, यानी आज भी धरती पर हैं, और इसी कारण राम और कृष्ण की तरह घर घर उनकी पूजा नहीं होती। फिर भी इस शाम बहुत से घरों में, और देश के पश्चिमी तट पर उनके मंदिरों में, उन्हें याद करते हैं।
कथा
परशुराम जयंती की कथा
भागवत पुराण के नौवें स्कंध में कथा है। राजा गाधि की बेटी थीं सत्यवती, और ऋषि ऋचीक ने उनसे ब्याह करना चाहा। गाधि को ऋषि अपनी बेटी के लायक़ नहीं लगे, तो उन्होंने दहेज में हज़ार घोड़े माँगे, चाँदनी जैसे उजले, और हर घोड़े का एक कान काला। ऋचीक समझ गए कि राजा क्या चाहते हैं। वे वरुण से वैसे ही घोड़े ले आए, और ब्याह हो गया। फिर सत्यवती को और उनकी माँ को, दोनों को बेटे की चाह हुई। ऋचीक ने मंत्र पढ़कर दो चरु पकाए, यानी हवन वाला अन्न: पत्नी के लिए ब्राह्मण के मंत्रों से, सास के लिए क्षत्रिय के मंत्रों से। फिर वे नहाने चले गए। माँ ने सोचा, बेटी वाला चरु ज़रूर अच्छा होगा, और वही माँग लिया। सत्यवती ने अपना चरु माँ को दे दिया और माँ वाला ख़ुद खा लिया।
ऋचीक लौटे तो बोले: यह तुमने बड़ी भूल की। अब तुम्हारा बेटा भयंकर योद्धा होगा, और तुम्हारा भाई वेद जानने वाला। सत्यवती ने हाथ जोड़े कि बेटा ऐसा न हो। ऋचीक ने कहा: तो यह तेज तुम्हारे पोते में आएगा। सत्यवती के बेटे हुए जमदग्नि। जमदग्नि का ब्याह रेणु की बेटी रेणुका से हुआ, और उनके कई बेटे हुए। सबसे छोटे का नाम था राम, जिन्हें दुनिया परशुराम के नाम से जानती है। यानी ऋषि के घर का बेटा, जिसके भीतर योद्धा का तेज था, और वह तेज उसकी दादी की एक अदला बदली से आया था।
उन दिनों हैहय वंश का राजा था कार्तवीर्य अर्जुन। दत्तात्रेय की पूजा से उसे हज़ार भुजाएँ मिली थीं। एक बार नर्मदा में खेलते हुए उसने अपनी भुजाओं से नदी रोक दी, पानी उलटा बहा और रावण का डेरा डूब गया। रावण ने उसे बुरा भला कहा, तो उसने रावण को पकड़कर माहिष्मती में ऐसे बंद रखा जैसे कोई बंदर को रखता है, और फिर यूँ ही छोड़ दिया। एक दिन शिकार खेलते खेलते वह जमदग्नि के आश्रम पहुँचा। ऋषि ने अपनी कामधेनु गाय की मदद से राजा और उसके सारे साथियों की ख़ूब आवभगत की। पर राजा के मन में लालच आ गया। उसके आदमी रोती हुई गाय और उसके बछड़े को खींचकर माहिष्मती ले गए। परशुराम ने सुना तो वे ऐसे भड़के जैसे किसी ने साँप को कुचल दिया हो। फरसा, ढाल, धनुष और तरकश लेकर वे अकेले राजा के पीछे दौड़े, जैसे शेर हाथी के पीछे। राजा ने सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी, और परशुराम ने अकेले सबको गिरा दिया। राजा ने हज़ार हाथों से पाँच सौ धनुष चलाए, तो परशुराम ने एक ही धनुष से सब काट दिए। आख़िर में उन्होंने फरसे से उसकी भुजाएँ ऐसे काटीं जैसे कोई साँप के फन काटे, फिर सिर। गाय और बछड़ा वे पिता के पास लौटा लाए।
पर जमदग्नि ख़ुश नहीं हुए। बोले: बेटा, ब्राह्मण की शोभा क्षमा में है। तुमने एक राजा को मारकर पाप किया है। जाओ, तीर्थों में घूमकर इसे धो आओ। परशुराम ने बात मानी और एक बरस तीर्थों में रहे। इसी बीच कार्तवीर्य के बेटे पुराना बदला लेने आए, और ध्यान में डूबे जमदग्नि को मार डाला। रेणुका अपने बेटे को पुकारती रहीं: राम, राम। परशुराम लौटे, पिता को देखा, और प्रण लिया। भागवत कहता है कि उन्होंने इक्कीस बार धरती को क्षत्रियों से ख़ाली किया, और समंतपंचक में ख़ून की नौ झीलें भर दीं। फिर पिता का सिर जोड़कर उन्हें जिलाया, दिशाएँ और ज़मीनें यज्ञ कराने वाले ब्राह्मणों को दान कर दीं, और हथियार रख दिए। भागवत के हिसाब से वे आज भी महेंद्र पर्वत पर तप करते हैं।
व्रत
परशुराम जयंती का व्रत कैसे रखें
- सुबह जल्दी नहाते हैं, हो सके तो किसी नदी में, और तन मन साफ़ करके व्रत शुरू करते हैं।
- फिर परशुराम को याद करके संकल्प लेते हैं, यानी मन में ठानते हैं कि आज का दिन बल, धर्म और रुकावटें दूर होने की प्रार्थना में बीतेगा।
- यह व्रत ज़रूरी नहीं माना जाता; जो रखते हैं, वे अपनी सेहत देखकर पूरा या थोड़ा रखते हैं।
- कुछ लोग निर्जल रहते हैं, यानी पानी भी नहीं पीते, और कुछ फलाहार करते हैं, यानी बस फल और दूध।
- दिन भर अनाज, नमक और भारी खाना नहीं खाते।
- दिन मंत्र जाप और ध्यान में बीतता है, और शाम को प्रदोष काल की पूजा के साथ परशुराम के जन्म की कथा सुनते हैं।
- पूजा के बाद ज़रूरतमंदों या ब्राह्मणों को खाना खिलाते हैं; मान्यता है कि इससे व्रत का पुण्य बढ़ता है।
पारण: व्रत कैसे खोलें
परशुराम जयंती का व्रत शाम की पूजा के बाद खोलते हैं। प्रदोष काल की पूजा और आरती पूरी हो जाए, तब फल, नारियल या मिठाई के सादे प्रसाद से व्रत तोड़ते हैं, और उसके बाद हल्का खाना खाते हैं। सूरज हर शहर में अलग समय पर डूबता है, इसलिए पारण की घड़ी अपने शहर के हिसाब से देखें।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में परशुराम जयंती
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
वाल्मीकि रामायण
संस्कृत · Valmiki Ramayana
वाल्मीकि रामायण के बालकांड में शिव का धनुष टूटने की ख़बर सुनकर परशुराम राम के रास्ते में आ खड़े होते हैं। सर्ग पचहत्तर के पहले श्लोक में वे कहते हैं: “राम दाशरथे वीर वीर्यम् ते श्रूयते अद्भुतम्। धनुषो भेदनम् चैव निखिलेन मया श्रुतम्॥” (बालकांड 75.1) यानी दशरथ के बेटे राम, तुम्हारे बल की बात सुनी है, और धनुष तोड़ने की पूरी कथा भी। फिर वे बताते हैं कि विश्वकर्मा ने दो धनुष बनाए थे: एक शिव को मिला, जिसे राम ने तोड़ा, और दूसरा विष्णु को, जो विष्णु ने भृगु वंश के ऋचीक को दिया और ऋचीक ने जमदग्नि को। यानी परशुराम के हाथ का धनुष उसी घर का है जिसकी कथा उनकी जयंती पर सुनते हैं। सर्ग छिहत्तर में राम वह विष्णु वाला धनुष ले लेते हैं और उस पर डोरी चढ़ा देते हैं। परशुराम तप से कमाए अपने लोक छोड़ देते हैं, पर अपनी चलने की शक्ति बचा लेते हैं, ताकि महेंद्र पर्वत लौट सकें। वही महेंद्र पर्वत, जहाँ भागवत उन्हें आज तक बताता है।
रामचरितमानस
अवधी · Ramcharitmanas
रामचरितमानस के बालकांड में यही भेंट एक लंबी बहस बन जाती है, जिसे राम लक्ष्मण परशुराम संवाद कहते हैं। धनुष टूटा देखकर परशुराम गरजते हैं: “सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥” यानी सुनो राम, जिसने शिव का धनुष तोड़ा है, वह मेरा वैसा ही दुश्मन है जैसा सहसबाहु था। यह सहसबाहु वही हज़ार भुजाओं वाला कार्तवीर्य है, जिसकी कथा ऊपर भागवत से कही गई। और फिर: “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥” मुनि की बात सुनकर लक्ष्मण मुस्कुराते हैं और फरसे वाले को चिढ़ाने लगते हैं। तुलसी की कथा में परशुराम का ग़ुस्सा और लक्ष्मण की हँसी आमने सामने खड़े हैं।
कहाँ कैसे
परशुराम जयंती कहाँ कैसे मनाया जाता है
तिरुवल्लम, तिरुवनंतपुरम (केरल)
करमना और किल्लियार नदियों के संगम के पास का यह पुराना मंदिर केरल में परशुराम का अकेला मंदिर कहा जाता है। यहाँ परशुराम जयंती बड़ा दिन है, और बाक़ी दिनों में लोग यहाँ पितरों के लिए बलि तर्पण भी करते हैं।
केरल की धरती
केरल में कथा है कि परशुराम ने गोकर्ण से अपना फरसा समुद्र में फेंका, वह कन्याकुमारी जाकर गिरा, और समुद्र पीछे हटकर जो ज़मीन छोड़ गया, वही केरल बनी। इसलिए वहाँ उनका नाम उस ज़मीन के जन्म से जुड़ा है।
पाजक, उडुपी के पास (कर्नाटक)
यहाँ परशुराम का एक बड़ा मंदिर है। भारत के पश्चिमी तट पर उनके और भी कई मंदिर हैं, जहाँ यह दिन उनके नाम से माना जाता है।
रीत
परशुराम जयंती के दिन क्या करते हैं
- पूजा की सबसे ख़ास घड़ी प्रदोष काल है, सूरज डूबने के बाद का समय, क्योंकि मान्यता है कि जन्म उसी घड़ी हुआ था; ठीक घड़ी पंचांग में देखते हैं।
- पूजा की जगह साफ़ करके परशुराम की मूर्ति या तस्वीर रखते हैं, और उसके आगे फूल, धूप और फल सजाते हैं।
- पहले दीया या धूप जलाते हैं, फिर ताज़े फूल चढ़ाते हैं।
- “ॐ परशुरामाय नमः” जैसे मंत्र का जाप होता है, और कुछ लोग पूरब या उत्तर पूरब की ओर मुँह करके गायत्री मंत्र एक सौ आठ बार पढ़ते हैं।
- फल और मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद घर वालों और आए हुए लोगों में बाँटते हैं।
- जो चाहें, वे हवन भी करते हैं, जिसमें घी, लकड़ी और अनाज आग में डालते हैं।
- आख़िर में आरती होती है, और सच, न्याय और रक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं।
सवाल जवाब
परशुराम जयंती 2027: पूछे जाने वाले सवाल
परशुराम जयंती 2027 कब है?
परशुराम जयंती 2027 में 8 मई, शनिवार को है। वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि 8 मई, सुबह 11:43 से 9 मई, सुबह 9:04 तक है। प्रदोष काल शाम 7:00 से रात 9:24 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया हमेशा एक ही दिन क्यों नहीं होतीं?
दोनों वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन हैं, पर परशुराम जयंती उस दिन मानते हैं जिस दिन प्रदोष काल में, यानी सूरज डूबने के बाद, तृतीया हो। इसलिए यह कभी अक्षय तृतीया के दिन ही होती है और कभी उससे एक दिन पहले।
परशुराम जयंती के व्रत में क्या खा सकते हैं?
जो पूरा व्रत न रख सकें, वे फलाहार करते हैं: फल और दूध। अनाज, नमक और भारी खाना दिन भर नहीं खाते। कुछ लोग निर्जल व्रत भी रखते हैं।
परशुराम जयंती का व्रत कब खोलें?
शाम को प्रदोष काल की पूजा और आरती के बाद, फल, नारियल या मिठाई के प्रसाद से व्रत खोलते हैं, फिर हल्का खाना।
परशुराम की पूजा राम और कृष्ण की तरह क्यों नहीं होती?
हिंदू मान्यता है कि परशुराम चिरंजीवी हैं, यानी आज भी धरती पर हैं, इसलिए उनकी पूजा उस तरह नहीं होती। भागवत भी कहता है कि वे आज भी महेंद्र पर्वत पर तप करते हैं।
परशुराम ने इक्कीस बार क्षत्रियों का नाश क्यों किया?
भागवत पुराण की कथा है कि राजा कार्तवीर्य अर्जुन के बेटों ने उनके पिता जमदग्नि को ध्यान में डूबे हुए मार डाला था। उसी के बाद परशुराम ने प्रण लिया और इक्कीस बार धरती को क्षत्रियों से ख़ाली किया।
परशुराम और कल्कि का क्या रिश्ता है?
कल्कि पुराण कहता है कि विष्णु के दसवें और आख़िरी अवतार कल्कि को युद्ध की विद्या परशुराम ही सिखाएँगे।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Parashurama Jayanti, Drik Panchangवैशाख शुक्ल तृतीया, प्रदोष काल का नियम, चिरंजीवी, पाजक, पश्चिमी तट के मंदिर, कल्कि के गुरु
- Srimad Bhagavatam 9.15, Parasurama, the Lord's Warrior Incarnation, VedaBaseऋचीक, हज़ार घोड़े, दो चरु, जमदग्नि और रेणुका, कार्तवीर्य, कामधेनु, युद्ध, पिता की सीख
- Srimad Bhagavatam 9.16, Lord Parasurama Destroys the World's Ruling Class, VedaBaseएक बरस तीर्थ, जमदग्नि की हत्या, इक्कीस बार, समंतपंचक, महेंद्र पर्वत
- Valmiki Ramayana, Bala Kanda 75, sanskritdocumentsश्लोक 75.1, विश्वकर्मा के दो धनुष, ऋचीक और जमदग्नि
- Valmiki Ramayana, Bala Kanda 76, valmikiramayan.netराम का धनुष चढ़ाना, तप के लोक, महेंद्र पर्वत लौटना
- Ram Lakshman Parshuram Samvad, NCERT Hindi, StudiesTodayमानस बालकांड की पंक्तियाँ: सहसबाहु सम सो रिपु मोरा, लखन मुसुकाने
- The Thiruvallam Parashurama Temple, LiveHistoryIndiaतिरुवल्लम का मंदिर, गोकर्ण से कन्याकुमारी तक फरसा, बलि तर्पण, जयंती
- Parashurama Jayanti, Rudraksha Ratnaव्रत के नियम, निर्जल और फलाहार, अनाज नमक से परहेज़, पूजा के चरण, शाम की पूजा के बाद पारण, दान
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।