उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · हर महीने
संक्रांति 2027
Sankranti 2027
सूरज हर महीने घर बदलता है। और हर बार कहीं न कहीं नया महीना जागता है।
साल 2027 में बारह संक्रांतियाँ हैं: हर महीने सूर्य एक नई राशि में जाता है। पहली, मकर संक्रांति, 15 जनवरी, शुक्रवार को है, और आख़िरी, धनु संक्रांति, 16 दिसंबर, गुरुवार को। हर संक्रांति पर सूर्य किस घड़ी राशि बदलता है और उस दिन कहाँ क्या होता है, नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।
दीवार के पंचांग पर हर महीने के बीच में एक छोटा सा सूरज छपा है।
बच्चा उँगली रखकर पूछता है: यह हर महीने क्यों आता है?
दादी जवाब नहीं देतीं। लोटा भरती हैं और आँगन में चली जाती हैं।
धूप अभी पतली है। लोटे से गिरती धार में वह टूट टूटकर चमकती है।
कहीं इसी सुबह किसी का नया साल शुरू हुआ है। कहीं बस नया महीना।
कहीं शादी के ढोल अब पूरे एक महीने चुप रहेंगे।
सूरज आज एक नई राशि में गया है, दादी कहती हैं। एक घर छोड़ा, दूसरे में आया।
बारह घर, बारह दरवाज़े। और हर दरवाज़े पर किसी इलाक़े की अपनी कथा।
2027 में कब
संक्रांति 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं
आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।
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सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।
पहचान
संक्रांति क्या है
संक्रांति वह घड़ी है जब सूरज एक राशि से निकलकर अगली राशि में जाता है। राशियाँ बारह हैं, इसलिए साल में बारह संक्रांतियाँ होती हैं, लगभग हर महीने एक। यह दिन चाँद की तिथि से नहीं, सूरज से तय होता है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में हर संक्रांति बरस दर बरस लगभग एक सी तारीख़ पर आती है। पंचांग इन बारह को चार टोलियों में बाँटता है: मकर और कर्क अयन संक्रांतियाँ हैं, जहाँ से सूरज की उत्तर और दक्षिण की चाल गिनी जाती है; मेष और तुला विषुव संक्रांतियाँ हैं; वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ विष्णुपदी कहलाती हैं; और मिथुन, कन्या, धनु और मीन षडशीतिमुखी। हर संक्रांति के आसपास कुछ घड़ियाँ पुण्य काल मानी जाती हैं, जिनमें स्नान, दान और तर्पण होता है। नियम सीधा है: संक्रांति दिन में हो तो पुण्य उसी दिन का, और रात में हो तो धर्मसिंधु अगले दिन को पुण्य का दिन मानता है। हर संक्रांति के लिए यह पन्ना ऊपर अपने आप दिन निकालता है। ओड़िशा, बंगाल, असम, पंजाब, तमिलनाडु और केरल के अपने सौर महीने संक्रांति से ही बदलते हैं, इसलिए इनमें से कई संक्रांतियाँ वहाँ किसी त्योहार या नए साल का दिन भी हैं। सबसे बड़ी मकर संक्रांति है, जिसका अपना पन्ना है।
पूरी सूची
संक्रांति 2027: हर तारीख़
हर तारीख़, उस दिन की तिथि कब से कब तक, सूर्य किस घड़ी नई राशि में जाता है, और उस दिन की अपनी बात।
15जनवरी
मकर संक्रांति
पौष शुक्ल सप्तमी (सूर्योदय के समय)
साल की सबसे बड़ी संक्रांति, जहाँ से उत्तरायण यानी सूरज की उत्तर की चाल गिनी जाती है और खरमास ख़त्म होता है। इसी दिन असम का माघ बिहू, तमिलनाडु का पोंगल और सबरीमला का मकरविलक्कु है, और इस बार गुरु गोबिंद सिंह जी का प्रकाश पर्व भी। विष्णु पुराण में पौष के महीने सूरज के रथ पर भग आदित्य रहते हैं।
सूर्य मकर राशि में: 14 जनवरी, रात 9:10
13फ़रवरी
कुंभ संक्रांति
माघ शुक्ल सप्तमी (सूर्योदय के समय)
इस बार यह रथ सप्तमी के दिन ही है, यानी माघ शुक्ल सप्तमी को, जिसे सूरज का जन्मदिन माना जाता है। पंचांग इसे विष्णुपदी संक्रांतियों में गिनता है, जिनका पुण्य काल संक्रांति से पहले की सोलह घड़ियाँ हैं। विष्णु पुराण में माघ के रथ पर त्वष्टा आदित्य हैं।
सूर्य कुंभ राशि में: सुबह 10:09
15मार्च
मीन संक्रांति
फाल्गुन शुक्ल सप्तमी (सूर्योदय के समय)
उत्तराखंड में इस दिन फूलदेई है, जब बच्चे सुबह सुबह घर घर जाकर देहरी पर फूल और चावल रखते हैं। इसी संक्रांति से साल का दूसरा खरमास शुरू होता है, जो मेष संक्रांति तक चलता है। विष्णु पुराण में फाल्गुन के रथ पर ख़ुद विष्णु आदित्य बनकर रहते हैं।
सूर्य मीन राशि में: सुबह 7:00
14अप्रैल
मेष संक्रांति
चैत्र शुक्ल अष्टमी (सूर्योदय के समय)
विषुव संक्रांति, जब विष्णु पुराण के हिसाब से दिन और रात बराबर होते हैं और दान का फल बड़ा होता है; यहीं खरमास भी ख़त्म होता है। इसी दिन पंजाब की बैसाखी, तमिल पुथांडु और ओड़िया पणा संक्रांति है। केरल का विषु, असम का बोहाग बिहू और बंगाल का पोइला बोइशाख भी इसी संक्रांति से जुड़े हैं, पर अपने अपने नियम से कई बार अगले दिन पड़ते हैं। विष्णु पुराण में चैत्र के रथ पर धाता आदित्य हैं।
सूर्य मेष राशि में: दोपहर 3:28
15मई
वृषभ संक्रांति
वैशाख शुक्ल दशमी (सूर्योदय के समय)
यह विष्णुपदी संक्रांति है, जिसका पुण्य काल संक्रांति से पहले की सोलह घड़ियों में माना जाता है, इसलिए इसका स्नान दान संक्रांति की घड़ी से पहले होता है। इसके साथ कोई बड़ा त्योहार नहीं जुड़ा, तो यह घर के सीधे स्नान, अर्घ्य और दान वाली संक्रांति है। विष्णु पुराण में वैशाख के रथ पर अर्यमा आदित्य हैं।
सूर्य वृषभ राशि में: दोपहर 12:20
15जून
मिथुन संक्रांति
ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी (सूर्योदय के समय)
ओड़िशा में यह राजा संक्रांति है, तीन दिन के राजा पर्व का बीच वाला दिन और आषाढ़ का पहला दिन। मान्यता है कि इन दिनों धरती माँ रजस्वला होती हैं, यानी उनके मासिक धर्म के दिन होते हैं, इसलिए खेत का सारा काम रुकता है और लड़कियाँ झूले झूलती हैं। विष्णु पुराण में ज्येष्ठ के रथ पर मित्र आदित्य हैं।
सूर्य मिथुन राशि में: शाम 6:56
17जुलाई
कर्क संक्रांति
आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी (सूर्योदय के समय)
यहाँ से दक्षिणायन शुरू होता है, सूरज की दक्षिण की चाल, और केरल में कर्किडकम यानी रामायण मास, जिसमें हर शाम अध्यात्म रामायणम् किलिप्पाट्टु पढ़ी जाती है। उत्तराखंड का हरेला भी इसी संक्रांति से जुड़ा त्योहार है। विष्णु पुराण में आषाढ़ के रथ पर वरुण आदित्य हैं।
सूर्य कर्क राशि में: सुबह 5:49
17अगस्त
सिंह संक्रांति
श्रावण पूर्णिमा (सूर्योदय के समय)
उत्तराखंड में यह भादों का पहला दिन है, घी संक्रांति या घी त्यार, जब हर घर में घी खाया और सिर पर लगाया जाता है। इस बार इसी दिन रक्षा बंधन भी है। विष्णु पुराण में श्रावण के रथ पर इंद्र आदित्य हैं।
सूर्य सिंह राशि में: दोपहर 2:14
17सितंबर
कन्या संक्रांति
आश्विन कृष्ण द्वितीया (सूर्योदय के समय)
बांग्ला पंचांग में यह भाद्र महीने का आख़िरी दिन है, भाद्र संक्रांति, और इसी दिन विश्वकर्मा पूजा होती है: कारीगर, मिस्त्री और कारख़ाने वाले अपने औज़ार और मशीनें पूजते हैं। विष्णु पुराण में भाद्रपद के रथ पर विवस्वान आदित्य हैं।
सूर्य कन्या राशि में: दोपहर 2:11
18अक्टूबर
तुला संक्रांति
कार्तिक कृष्ण तृतीया (सूर्योदय के समय)
साल की दूसरी विषुव संक्रांति, जब फिर दिन और रात बराबर माने गए, और जिसका पुण्य काल संक्रांति के पहले और बाद की पंद्रह पंद्रह घड़ियाँ हैं। इसी दिन असम का काति बिहू है, जब तुलसी के पौधे के पास और खेतों में दीये जलते हैं, और इस बार करवा चौथ भी। विष्णु पुराण में आश्विन के रथ पर पूषा आदित्य हैं।
सूर्य तुला राशि में: रात 2:09
17नवंबर
वृश्चिक संक्रांति
मार्गशीर्ष कृष्ण चतुर्थी (सूर्योदय के समय)
केरल में यह वृश्चिकम महीने का पहला दिन है, जिससे सबरीमला का इकतालीस दिन का मंडल काल शुरू होता है; भक्त माला पहनकर इकतालीस दिन ब्रह्मचर्य और व्रत रखते हैं। विष्णु पुराण में कार्तिक के रथ पर पर्जन्य आदित्य हैं, यानी मेघ बरसाने वाले।
सूर्य वृश्चिक राशि में: रात 1:59
16दिसंबर
धनु संक्रांति
पौष कृष्ण तृतीया (सूर्योदय के समय)
इसी दिन से खरमास शुरू होता है, जो मकर संक्रांति तक चलता है: इस महीने शादी, मुंडन, जनेऊ और गृह प्रवेश नहीं होते, पर पूजा पाठ चलता रहता है। विष्णु पुराण में मार्गशीर्ष के रथ पर अंशु आदित्य हैं।
सूर्य धनु राशि में: शाम 4:39
कथा
संक्रांति की कथा
विष्णु पुराण के दूसरे अंश के आठवें अध्याय में पराशर मुनि सूरज के रथ की कथा सुनाते हैं। रथ का एक ही पहिया है, जिसमें तीन नाभियाँ, पाँच अरे और छह घेरे हैं, और इसी पहिये को काल का चक्र कहा गया है, यानी समय का पहिया। रथ को सात घोड़े खींचते हैं, और इन घोड़ों के नाम वेद के सात छंद हैं: गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति। यही रथ राशि राशि आगे बढ़ता है। जब सूरज मकर में जाता है, उसकी उत्तर की चाल शुरू होती है, और कुंभ, मीन, मेष, वृषभ, मिथुन से होता हुआ वह कर्क तक पहुँचता है, जहाँ से वह दक्षिण की ओर मुड़ जाता है।
पर हर सुबह यह रथ आसानी से नहीं निकलता। इसी अध्याय में कथा है कि रात और दिन के मिलने की घड़ी, यानी संध्या में, मंदेह नाम के भयानक राक्षस सूरज को निगलने दौड़ते हैं। ब्रह्मा ने उन्हें शाप दिया था कि वे हर दिन मरेंगे और हर रात फिर जी उठेंगे, इसलिए यह लड़ाई रोज़ होती है। तब ब्राह्मण ॐ और गायत्री से पवित्र किया हुआ पानी उछालते हैं, और वह पानी वज्र की तरह उन राक्षसों को जला देता है। पुराण यह भी कहता है कि सुबह की संध्या छोड़ना सूरज को मारने जैसा है।
दसवें अध्याय में आगे की बात है। सूरज के रथ पर हर महीने सात का एक दल रहता है: एक आदित्य, एक ऋषि, एक गंधर्व, एक अप्सरा, एक यक्ष, एक नाग और एक राक्षस। ऋषि सूरज की स्तुति करता है, गंधर्व गाता है, अप्सरा आगे आगे नाचती है, नाग घोड़ों को जोतता है, यक्ष लगाम सँभालता है और राक्षस पीछे पीछे चलता है। छोटे छोटे बालखिल्य ऋषि रथ को चारों ओर से घेरे रहते हैं। चैत्र में यह दल धाता आदित्य का है, वैशाख में अर्यमा का, और इसी तरह फाल्गुन तक, जहाँ ख़ुद विष्णु आदित्य बनकर रथ पर रहते हैं। पुराण कहता है कि ये दल अपनी अपनी ऋतु में सर्दी, गर्मी और बारिश बाँटते हैं। महीना बदलता है तो रथ का दल भी बदल जाता है।
बीच में दो दिन ऐसे आते हैं जब सूरज मेष और तुला में जाता है। विष्णु पुराण कहता है कि उन दिनों दिन और रात बराबर होते हैं, पंद्रह पंद्रह मुहूर्त के, और ये दिन पवित्र हैं: इन दिनों दिया गया दान बहुत फल देता है।
और एक कथा लोक की है, जो पुराण की नहीं, घर घर की है। कहते हैं, साल भर दौड़ते दौड़ते सूरज के सातों घोड़े थक जाते हैं। उन्हें आराम देने के लिए एक महीने रथ की रास खर, यानी गधे, को दे दी जाती है। गधा धीरे चलता है, और इसीलिए उस महीने धरती पर सूरज का तेज कम माना जाता है। इसी महीने को खरमास कहते हैं: खर यानी गधा, और मास यानी महीना। मकर संक्रांति आते ही घोड़े फिर जुत जाते हैं और सूरज अपनी पूरी चाल पकड़ लेता है।
व्रत
संक्रांति का व्रत कैसे रखें
- संक्रांति की सुबह, या उसके पुण्य काल में, नदी, तीर्थ या घर पर ही नहाया जाता है; धर्मसिंधु इस दिन के स्नान को ज़रूरी मानता है।
- नहाकर लोटे से सूरज को जल का अर्घ्य दिया जाता है, यानी हाथ ऊँचे करके धार गिराते हुए जल चढ़ाया जाता है।
- जो व्रत रखते हैं वे इसी समय संकल्प लेते हैं; पंचांग संक्रांति के दिनों को दान और उपवास, दोनों के लिए शुभ मानते हैं।
- पितरों का तर्पण और श्राद्ध होता है, पर धर्मसिंधु के हिसाब से इसमें पिंडदान नहीं होता।
- अपनी हैसियत से तिल, अनाज, कपड़े या कंबल का दान किया जाता है।
- संक्रांति रात में हो तो स्नान, दान और तर्पण अगले दिन के पुण्य काल में होते हैं, क्योंकि संक्रांति की रात में श्राद्ध का काम नहीं होता।
पारण: व्रत कैसे खोलें
संक्रांति कोई एक बँधे नियम वाला व्रत नहीं है, जैसे एकादशी या प्रदोष, इसलिए इसका कोई तय पारण भी नहीं। इस दिन का असली काम पुण्य काल के भीतर स्नान, सूरज को अर्घ्य, दान और पितरों का तर्पण है। जो उपवास रखते हैं, वे यह सब पूरा करके अपने घर की रीत से व्रत खोलते हैं। एक बात का ध्यान रहे: धर्मसिंधु कहता है कि संक्रांति की रात में श्राद्ध का काम नहीं होता, इसलिए रात की संक्रांति का दान पुण्य अगले दिन होता है। हर संक्रांति का पुण्य काल यह पन्ना ऊपर अपने आप दिखाता है।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में संक्रांति
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
अध्यात्म रामायण किलिप्पाट्टु
मलयालम · Adhyatma Ramayanam Kilippattu
कर्क संक्रांति के साथ केरल में कर्किडकम महीना शुरू होता है, मलयालम पंचांग का आख़िरी महीना, जो बरसात के बीच पड़ता है। इसी महीने केरल के घरों में हर शाम पीतल का दीया, निलविलक्कु, जलाकर तुंचत्तु एषुत्तच्छन की अध्यात्म रामायणम् किलिप्पाट्टु का एक हिस्सा पढ़ा जाता है, इस हिसाब से कि महीने के पहले दिन से आख़िरी दिन तक पूरी कथा हो जाए। इसीलिए इस महीने को रामायण मास कहते हैं। इस कथा को सुनाने वाला कोई आदमी नहीं, एक तोता है, तो सूरज के कर्क में जाने के साथ केरल में एक तोता महीने भर की कथा शुरू करता है।
कहाँ कैसे
संक्रांति कहाँ कैसे मनाया जाता है
केरल
मेष संक्रांति के बाद विषु आता है, मलयालम महीने मेडम का पहला दिन। कर्क संक्रांति से कर्किडकम यानी रामायण मास शुरू होता है, और वृश्चिक संक्रांति से सबरीमला की यात्रा का मौसम, जिसमें इकतालीस दिन का मंडल काल आता है; यह मौसम मकर संक्रांति के मकरविलक्कु तक चलता है।
उत्तराखंड
पहाड़ में कई संक्रांतियाँ अपने आप में त्योहार हैं: मीन संक्रांति पर बच्चों की फूलदेई, कर्क संक्रांति पर हरेला, सिंह संक्रांति पर घी संक्रांति, और मकर संक्रांति पर उत्तरैणी और घुघुतिया।
ओड़िशा
मेष संक्रांति ओड़िया नया साल है, पणा संक्रांति, और ओड़िया नियम में संक्रांति हिंदू आधी रात से पहले हो जाए तो नया साल उसी दिन। मिथुन संक्रांति पर राजा पर्व का बीच वाला दिन, राजा संक्रांति, होता है।
बंगाल
बांग्ला महीने भी संक्रांति से बदलते हैं। मेष संक्रांति के बाद पोइला बोइशाख, बांग्ला नया साल, आता है, और कन्या संक्रांति, जो भाद्र महीने का आख़िरी दिन है, विश्वकर्मा पूजा का दिन है।
तमिलनाडु
मेष संक्रांति के दिन पुथांडु, यानी तमिल नया साल, होता है। तमिल नियम में संक्रांति सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच हो तो नया साल उसी दिन, और सूर्यास्त के बाद हो तो अगले दिन।
उत्तर भारत के घर
हर संक्रांति पर सुबह नहाकर सूरज को जल चढ़ाया जाता है और कुछ न कुछ दान होता है। धनु संक्रांति से मकर तक, और मीन से मेष तक, खरमास माना जाता है, जिसमें शादी ब्याह रुक जाते हैं।
रीत
संक्रांति के दिन क्या करते हैं
- पूजा सूर्य नारायण की होती है; धर्मसिंधु कहता है कि संक्रांति के दिन सूरज को दूध से नहलाने वाला सूर्य लोक की राह पाता है।
- शिव की पूजा भी होती है: धर्मसिंधु के शिव व्रत में तिल का स्नान, तिल का दीया, तिल का हवन और तिल मिला सोना दान करना गिना गया है।
- पुण्य काल हर संक्रांति का अलग है: मकर में संक्रांति के बाद की चालीस घड़ियाँ, कर्क में पहले की तीस, मेष और तुला में पहले और बाद की पंद्रह पंद्रह, विष्णुपदी में पहले की सोलह, और षडशीतिमुखी में बाद की सोलह।
- मेष और तुला की विषुव संक्रांतियों पर दान का फल सबसे बड़ा माना गया है, क्योंकि विष्णु पुराण इन दिनों को पवित्र कहता है।
- धनु संक्रांति और मीन संक्रांति से एक एक महीने का खरमास लगता है: शादी, सगाई, मुंडन, जनेऊ और गृह प्रवेश नहीं होते, पर पूजा और हवन चलते रहते हैं।
सवाल जवाब
संक्रांति 2027: पूछे जाने वाले सवाल
संक्रांति 2027 में कब कब है?
साल 2027 में बारह संक्रांतियाँ हैं: हर महीने सूर्य एक नई राशि में जाता है। पहली, मकर संक्रांति, 15 जनवरी, शुक्रवार को है, और आख़िरी, धनु संक्रांति, 16 दिसंबर, गुरुवार को। हर संक्रांति पर सूर्य किस घड़ी राशि बदलता है और उस दिन कहाँ क्या होता है, नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।
साल में कितनी संक्रांति होती हैं?
बारह, हर राशि की एक। सूरज लगभग एक महीने में एक राशि पार करता है, इसलिए हर महीने एक संक्रांति आती है। इनमें मकर और कर्क अयन, मेष और तुला विषुव, और बाक़ी आठ विष्णुपदी और षडशीतिमुखी कहलाती हैं।
संक्रांति रात में हो तो स्नान दान कब करें?
धर्मसिंधु कहता है कि रात की संक्रांति में पुण्य अगले दिन का होता है, और अगली सुबह, सूर्योदय से कुछ पहले का समय सबसे पुण्य वाला है। कुछ पंचांग आधी रात से पहले की संक्रांति के लिए उसी दिन का आख़िरी हिस्सा भी पुण्य का मानते हैं। यह पन्ना हर संक्रांति का पुण्य काल ऊपर दिखाता है।
संक्रांति पर क्या दान करें?
तिल, अनाज, कपड़े और कंबल का दान सबसे चलन में है। धर्मसिंधु में तिल का दान, तिल का दीया और कपड़ों का दान ख़ास तौर पर गिना गया है।
क्या संक्रांति पर व्रत रखना ज़रूरी है?
नहीं। धर्मसिंधु संक्रांति के स्नान पर सबसे ज़्यादा ज़ोर देता है, और उसके बाद तर्पण और दान पर। उपवास अपनी इच्छा और घर की रीत से रखा जाता है।
खरमास कब से कब तक रहता है?
साल में दो बार: एक धनु संक्रांति से मकर संक्रांति तक, और दूसरा मीन संक्रांति से मेष संक्रांति तक। ये दोनों राशियाँ बृहस्पति की हैं, और इन दिनों शादी, मुंडन और गृह प्रवेश नहीं होते।
संक्रांति और अमावस्या या पूर्णिमा में क्या फ़र्क़ है?
अमावस्या और पूर्णिमा चाँद की तिथियाँ हैं, जो हर बरस अंग्रेज़ी तारीख़ में आगे पीछे होती हैं। संक्रांति सूरज की चाल से आती है, इसलिए इसकी तारीख़ हर बरस लगभग एक सी रहती है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Sankranti, information page, Drik Panchangबारह संक्रांति, चार टोलियाँ, हर टोली का पुण्य काल
- Dharmasindhu, chapter on Sankranti, Kamakotiरात की संक्रांति में अगला दिन, स्नान, बिना पिंड का श्राद्ध, तिल दान, शिव व्रत, सूरज को दूध
- Vishnu Purana, Book II, Chapter 8, sacred-texts.comसूरज का रथ, काल चक्र, सात छंद वाले घोड़े, उत्तर और दक्षिण की चाल, विषुव के दिन, मंदेह राक्षस
- Vishnu Purana, Book II, Chapter 10, sacred-texts.comहर महीने रथ पर सात का दल, बारह महीनों के आदित्य
- Kharmas, Bhakti Bharatसाल में दो खरमास, क्या नहीं होता, घोड़ों और गधे की लोक कथा
- Mesha Sankranti, Drik Panchangमेष संक्रांति के नए साल, तमिल, केरल, ओड़िया और बंगाल के नियम, रात की संक्रांति का पंचांग वाला नियम
- Why Kerala observes the Karkidakam tradition of reading the Ramayanam, Deccan Chronicleकर्किडकम, निलविलक्कु, एषुत्तच्छन की किलिप्पाट्टु का महीने भर पाठ
- Sabarimala pilgrimage season, Kerala Tourismवृश्चिकम से मंडल काल, इकतालीस दिन, माला और ब्रह्मचर्य, मकरविलक्कु
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।