पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · माघ शुक्ल सप्तमी

रथ सप्तमी 2027

Ratha Saptami 2027

सिर पर आक का पत्ता, पाँव ठंडे पानी में। और पूरब में सूरज का जन्मदिन।

रथ सप्तमी 2027 में 13 फ़रवरी, शनिवार को है। माघ शुक्ल सप्तमी तिथि 13 फ़रवरी, रात 3:00 से 14 फ़रवरी, रात 2:07 तक है। सुबह की पूजा का समय (प्रातः काल) सुबह 7:02 से सुबह 9:15 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

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उस शाम का चाँद, 41 प्रतिशत रोशन

आक का पत्ता मोटा है। डंठल से तोड़ो तो सफ़ेद दूध की एक बूँद निकलती है।

घाट पर अभी अँधेरा है। पानी काला दिखता है, और ठंडा।

एक आदमी सात पत्ते गिनता है। एक सिर पर, दो कंधों पर, दो घुटनों पर, दो पाँवों पर।

हर पत्ते पर थोड़े से चावल और एक बेर।

वह होंठों में कुछ बुदबुदाता है और पानी में उतर जाता है।

पूरब में पहली लाली उठती है। घाट भर के लोटे एक साथ ऊपर उठते हैं।

कहते हैं, आज सूरज का जन्मदिन है। कोई कहता है, आज उसका रथ उत्तर की ओर मुड़ता है।

एक ही सुबह की दो कथाएँ। और दोनों में वही सात घोड़े।

2027 में कब

रथ सप्तमी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़13 फ़रवरी, शनिवार

तिथिमाघ शुक्ल सप्तमी13 फ़रवरी, रात 3:00 से 14 फ़रवरी, रात 2:07 तक

नक्षत्रभरणीसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 7:02

सूर्यास्तशाम 6:10

चंद्रोदयसुबह 10:28

प्रातः काल
सुबह 7:02 से सुबह 9:15 तकसूर्योदय के बाद दिन का पहला पाँचवाँ हिस्सा।

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शुभकामना

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पहचान

रथ सप्तमी क्या है

रथ सप्तमी माघ महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी है। इसे माघ सप्तमी, अचला सप्तमी, आरोग्य सप्तमी और सूर्य जयंती भी कहते हैं, क्योंकि यह सूरज का जन्मदिन माना जाता है: भविष्य पुराण कहता है कि सूरज सप्तमी को प्रकट हुए, और एक परंपरा में यह दिन कश्यप ऋषि और अदिति के घर सूरज के जन्म का है। दूसरी मान्यता यह है कि इसी दिन सात घोड़ों वाला सूरज का रथ उत्तर की ओर मुड़ता है, और भविष्य पुराण भी इस दिन को उत्तरायण की शुरुआत और वसंत की आहट कहता है। व्रत उस दिन होता है जिस दिन सूर्योदय के समय सप्तमी हो, और इसका सबसे बड़ा काम अरुणोदय का स्नान है, यानी सूरज निकलने से पहले की लाली वाले समय का। पंचांगों में लिखा है कि दान पुण्य के लिए यह दिन सूर्य ग्रहण जितना शुभ है। दक्षिण भारत में, ख़ास तौर पर तिरुमला और आंध्र प्रदेश में, यह बहुत बड़ा दिन है।

कथा

रथ सप्तमी की कथा

भविष्य पुराण में श्रीकृष्ण अपने बेटे सांब को सूरज की पूजा सिखाते हैं, और बात यहीं से शुरू करते हैं: 'प्रत्यक्षं देवता सूर्यो जगच्चक्षुर्दिवाकरः।' मतलब: सूरज वह देवता है जो सबको आँखों से दिखता है; वह जगत की आँख है और दिन बनाने वाला। फिर कृष्ण सूरज के जन्म की कथा सुनाते हैं। सूरज सप्तमी के दिन प्रकट हुए, पर पहले एक अंडे के भीतर रहे और वहीं बढ़ते रहे। इसीलिए उन्हें मार्तंड कहते हैं।

इस पुराण की कथा में सूरज का ब्याह दक्ष प्रजापति की बेटी संज्ञा से हुआ। उनके यम, वैवस्वत और यमुना हुए। पर संज्ञा से सूरज का तेज सहा नहीं जाता था। तब उन्होंने अपनी ही जैसी एक छाया बनाई, उसे घर में छोड़ा, और ख़ुद घोड़ी का रूप लेकर उत्तरकुरु में तप करने चली गईं। छाया से शनि और तपती हुए। छाया अपने बच्चों को ज़्यादा प्यार करती थी। यम ने यह सहा नहीं और विरोध किया, तो छाया ने उनके पाँवों को शाप दे दिया।

अब सूरज समझ गए कि कुछ ठीक नहीं है। उन्होंने यम को शांत किया, और सारा सच सामने आ गया। सूरज संज्ञा को ढूँढ़ते हुए उत्तरकुरु पहुँचे, जहाँ वे घोड़ी बनकर तप कर रही थीं। विश्वकर्मा ने सूरज का तेज थोड़ा घटाया, ताकि संज्ञा उसे सह सकें। तब दोनों फिर मिले, और उनसे अश्विनी कुमार और रैवत हुए। भविष्य पुराण कहता है कि यह मिलन माघ के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को हुआ था।

इसी पुराण में आगे कहा गया है कि राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र में कई बरस माघ की सप्तमी का व्रत रखा, और उनकी सारी इच्छाएँ पूरी हुईं। रथ सप्तमी को सूरज का जन्मदिन भी कहा गया है और उत्तरायण की शुरुआत भी। सूरज के रथ में सात घोड़े हैं, जिनमें जय और विजय के नाम आते हैं, और रथ चलाने वाले हैं अरुण। पुराण यह भी कहता है कि इस दिन सूरज, संज्ञा और छाया की मूर्तियाँ सात घोड़ों वाले रथ पर रखकर मंदिर या नगर की परिक्रमा कराई जाए। जो इसमें साथ चलते हैं, उन्हें सेहत और धन मिलता है, और आख़िर में सूर्य लोक।

ओड़िशा में एक और कथा कही जाती है। मान्यता है कि कृष्ण के बेटे सांब को कोढ़ हो गया था, और वे चंद्रभागा नदी में नहाकर ठीक हुए, फिर बारह बरस उसी जगह सूरज की पूजा करते रहे। वह नदी अब सूख चुकी है और बस एक ताल बचा है, पर कोणार्क के पास, जहाँ चंद्रभागा समुद्र से मिलती थी, माघ सप्तमी पर लाखों लोग इसी आस में नहाने आते हैं।

व्रत

रथ सप्तमी का व्रत कैसे रखें

  1. भविष्य पुराण की सप्तमी व्रत विधि में उपवास एक दिन पहले, षष्ठी से ही शुरू हो जाता है, और सप्तमी को पूजा होती है।
  2. सप्तमी की भोर, अरुणोदय में, यानी सूरज निकलने से लगभग चार घड़ी पहले, नदी या नहर में नहाया जाता है; पंचांगों में घर से अच्छा नदी का स्नान बताया गया है।
  3. नहाते समय आक के सात पत्ते, बेर और अक्षत के साथ, सिर, कंधों, घुटनों और पाँवों पर रखे जाते हैं, और यह श्लोक पढ़ा जाता है: 'यद्यज्जन्मकृतं पापं मया सप्तसु जन्मसु। तन्मे रोगं च शोकं च माकरी हन्तु सप्तमी॥' मतलब: सात जन्मों में मुझसे जो जो पाप हुए, उनसे आया मेरा रोग और दुख, मकर के सूरज वाली यह सप्तमी मिटा दे।
  4. सूरज निकलते ही खड़े होकर, सूरज की ओर मुँह करके, छोटे कलश या लोटे से धीरे धीरे जल चढ़ाया जाता है, और फिर दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया जाता है।
  5. दिन भर उपवास या सात्त्विक खाना रहता है: मांस नहीं, तेल की मालिश नहीं, और सूरज निकलने के बाद सोना नहीं।
  6. पूजा के बाद ब्राह्मणों को सब्ज़ियों वाला भोजन, कपड़े और दक्षिणा दी जाती है, जैसा भविष्य पुराण की विधि में है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

रथ सप्तमी के पारण की कोई अलग घड़ी नहीं बताई गई है, जैसी एकादशी में होती है। इस व्रत का सारा ज़ोर सुबह पर है: अरुणोदय का स्नान और सूर्योदय का अर्घ्य। उसके बाद पूजा, दान और ब्राह्मण भोजन होता है, और फिर घर के मुखिया और बाक़ी सब मिलकर सात्त्विक खाना खाते हैं। इस दिन के प्रसाद में उफने हुए दूध, नए चावल और गुड़ की खीर होती है, जो पहले सूरज को चढ़ती है। जो भविष्य पुराण की तरह षष्ठी और सप्तमी, दोनों दिन का व्रत रखते हैं, वे सप्तमी की पूजा के बाद ही अन्न लेते हैं।

कहाँ कैसे

रथ सप्तमी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • तिरुमला, आंध्र प्रदेश

    यहाँ यह एक दिन का ब्रह्मोत्सव है। मलयप्प स्वामी, श्रीदेवी और भूदेवी के साथ, एक ही दिन में सात वाहनों पर मंदिर की परिक्रमा करते हैं: भोर में सूर्य प्रभा वाहन से शुरू होकर रात के चंद्र प्रभा वाहन तक, और बीच में पुष्करिणी में सुदर्शन चक्र का चक्रस्नान होता है।

  • अरसवल्ली, आंध्र प्रदेश

    श्रीकाकुलम ज़िले के श्री सूर्यनारायण स्वामी मंदिर में यह तीन दिन का उत्सव है, और आंध्र प्रदेश सरकार ने रथ सप्तमी को राज्य का त्योहार घोषित किया है।

  • कोणार्क, ओड़िशा

    कोणार्क के सूर्य मंदिर के पास, जहाँ चंद्रभागा नदी बंगाल की खाड़ी से मिलती थी, माघ सप्तमी पर लाखों लोग, बूढ़े और औरतें भी, नहाकर सूरज से रोग और पाप दूर करने की प्रार्थना करते हैं।

  • माध्व परंपरा

    भोर में सात आक के पत्ते सिर, कंधों और पाँवों पर रखकर स्नान होता है, और सूरज को गेहूँ से बने पकवान चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि इसी दिन सूरज का रथ उत्तर की ओर मुड़ता है।

रीत

रथ सप्तमी के दिन क्या करते हैं

  1. सूरज की पूजा घी के दीये, कपूर, धूप और लाल फूलों से होती है; आक या जवा के फूल भी चढ़ते हैं।
  2. घर के बीच या दरवाज़े के बाहर सात रंगों की रंगोली बनाई जाती है, और उसके बीच चार बत्तियों वाला चौमुखा दीया जलता है।
  3. मिट्टी के बर्तन में दूध तब तक उबाला जाता है जब तक वह उफनकर बाहर न आ जाए, और इसे शुभ माना जाता है; फिर उसमें नए चावल और गुड़ डालकर खीर बनती है।
  4. आदित्य हृदय स्तोत्र और गायत्री मंत्र पढ़े जाते हैं, और सुबह शाम 'ॐ आदित्याय नमः' जपा जाता है।
  5. मान्यता है कि इस दिन सूरज की पूजा सात तरह के पाप धो देती है: जान बूझकर किए और अनजाने में, बोलकर, शरीर से और मन से, इस जन्म के और पिछले जन्मों के।
  6. दान में गेहूँ, गुड़, तिल, ताँबे का बर्तन और लाल कपड़ा दिया जाता है।

रसोई

रथ सप्तमी का खाना

  • परमान्न या खीर मिट्टी के बर्तन में उफनाया दूध, नए चावल और गुड़, जो पहले सूरज को चढ़ता है।
  • गेहूँ के पकवान माध्व परंपरा में सूरज को गेहूँ से बनी चीज़ें चढ़ाई जाती हैं।

सवाल जवाब

रथ सप्तमी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

रथ सप्तमी 2027 कब है?

रथ सप्तमी 2027 में 13 फ़रवरी, शनिवार को है। माघ शुक्ल सप्तमी तिथि 13 फ़रवरी, रात 3:00 से 14 फ़रवरी, रात 2:07 तक है। सुबह की पूजा का समय (प्रातः काल) सुबह 7:02 से सुबह 9:15 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

रथ सप्तमी पर आक के पत्ते क्यों रखते हैं?

नहाते समय आक के सात पत्ते सिर, कंधों, घुटनों और पाँवों पर रखकर सात जन्मों के पाप और रोग मिटाने की प्रार्थना की जाती है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि आक की पत्ती त्वचा और जोड़ों के लिए अच्छी होती है।

रथ सप्तमी का स्नान कब करें?

अरुणोदय में, यानी सूरज निकलने से पहले की उस घड़ी में जब पूरब लाल होने लगता है। पंचांग इसे लगभग चार घड़ी का समय बताते हैं और कहते हैं कि स्नान इसी समय होना चाहिए, और हो सके तो नदी में।

रथ सप्तमी को आरोग्य सप्तमी क्यों कहते हैं?

क्योंकि माना जाता है कि इस दिन का स्नान और सूरज की पूजा सेहत देती है। कोणार्क में कथा है कि कृष्ण के बेटे सांब इसी तरह चंद्रभागा में नहाकर कोढ़ से ठीक हुए थे।

रथ सप्तमी और मकर संक्रांति में क्या फ़र्क़ है?

मकर संक्रांति सूरज के मकर राशि में जाने का दिन है, जिससे पंचांग उत्तरायण गिनता है। रथ सप्तमी चाँद की तिथि है, माघ शुक्ल सप्तमी, जिसे सूरज का जन्मदिन माना जाता है, और कुछ परंपराएँ और भविष्य पुराण इसे भी उत्तरायण की शुरुआत से जोड़ते हैं।

रथ सप्तमी के व्रत में क्या खाएँ?

सात्त्विक खाना, और जो उपवास रखें वे पूजा के बाद ही खाएँ। मांस नहीं खाया जाता और तेल की मालिश नहीं की जाती। प्रसाद में नए चावल और गुड़ की खीर बनती है।

रथ सप्तमी पर क्या दान करें?

गेहूँ, गुड़, तिल, ताँबे का बर्तन और लाल कपड़ा। पंचांगों में लिखा है कि दान पुण्य के लिए यह दिन सूर्य ग्रहण जितना शुभ है।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Ratha Saptami, Drik Panchangनाम, अरुणोदय स्नान, नदी, अर्घ्य की रीत, घी का दीया और लाल फूल, सात पाप, ग्रहण जितना दान पुण्य
  2. Bhavishya Purana, essence, chapter on Surya and Saptami vratas, Kamakotiसांब को कृष्ण का उपदेश, सूरज का जन्म, संज्ञा और छाया की कथा, माघ शुक्ल सप्तमी, राजा कुरु, रथ, अरुण, रथ यात्रा, षष्ठी सप्तमी का व्रत
  3. रथ सप्तमी का महत्व, Online Jyotishआक के सात पत्ते, बेर और अक्षत, स्नान का श्लोक, उफनता दूध, खीर, क्या न करें, आदित्य हृदय
  4. Ratha Saptami, Wikipediaकश्यप और अदिति, रथ का उत्तर की ओर मुड़ना, तिरुमला के सात वाहन, अरसवल्ली का राज्य उत्सव
  5. Tirumala celebrates Ratha Saptami, Deccan Chronicleसूर्य प्रभा से चंद्र प्रभा तक के वाहन, चक्रस्नान
  6. Magh Saptami at Konark Sun Temple, Hindu Blogचंद्रभागा का स्नान, सांब की कथा, आरोग्य सप्तमी
  7. रथ सप्तमी पूजन विधि, Aaj Takअर्घ्य, सात रंगों की रंगोली, चौमुखा दीया, ॐ आदित्याय नमः, दान की चीज़ें, पूजा के बाद साथ खाना
  8. Ratha Sapthami, Madhwa Sakhaमाध्व रीत में सात पत्तों का स्नान, गेहूँ के पकवान, रथ का उत्तर की ओर मुड़ना

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।