पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · हर महीने का व्रत

कालाष्टमी 2027

Kalashtami 2027

अँधेरे पाख की आठवीं रात, समय के देवता की।

कालाष्टमी 2027 में 12 बार आती है, हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को। पहली 29 जनवरी, शुक्रवार को है, और आख़िरी 20 दिसंबर, सोमवार को। हर तारीख़ की तिथि, निशीथ काल और उस दिन की अपनी बात नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।

उस शाम का चाँद, 49 प्रतिशत रोशन

एक काला कुत्ता मंदिर की सीढ़ी पर लेटा है। आज कोई उसे भगाता नहीं।

भीतर सरसों के तेल का दीया जल रहा है। लौ के ऊपर धुएँ की पतली लकीर।

थाली में काले तिल हैं, मुट्ठी भर उड़द, कुछ फूल।

रात गहरी हो चुकी है, पर आरती अभी बाक़ी है। यह पूजा रात की ही है।

आरती के बाद एक आदमी बाहर आता है। जेब से मीठी रोटी निकालकर कुत्ते के आगे रख देता है।

कुत्ता पहले सूँघता है, फिर खाता है।

कहते हैं, जिनकी यह सवारी है, उनसे काल भी डरता है।

हर महीने, अँधेरे पाख की आठवीं रात, यही सीढ़ी, यही रोटी। और उस देवता की कथा, जिसके नाम में ही समय है।

2027 में कब

कालाष्टमी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

जनवरी29

फ़रवरी27

मार्च29

अप्रैल28

मई28

जून26

जुलाई26

अगस्त24

सितंबर23

अक्टूबर22

नवंबर20

दिसंबर20

मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar

कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं

आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।

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सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।

पहचान

कालाष्टमी क्या है

कालाष्टमी हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी है, यानी पूर्णिमा के बाद की आठवीं तिथि। इस दिन शिव के रूप भैरव, यानी काल भैरव, की पूजा होती है, और उनके भक्त व्रत रखते हैं। भैरव की पूजा रात की है, इसलिए व्रत उस दिन रखा जाता है जिसकी रात में अष्टमी हो। व्रतराज नाम के ग्रंथ का यही नियम है, और इसी से कभी कभी कालाष्टमी का व्रत सप्तमी वाले दिन पड़ जाता है: पंचांग देखते हैं कि प्रदोष के बाद कम से कम एक घड़ी अष्टमी रहे, नहीं तो व्रत एक दिन पहले चला जाता है। साल की सबसे बड़ी कालाष्टमी मार्गशीर्ष की है, काल भैरव जयंती। उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग और दक्षिण का अमांत पंचांग इन अष्टमियों के महीने अलग नाम से गिनते हैं, पर दिन वही रहता है।

पूरी सूची

कालाष्टमी 2027: हर तारीख़

हर तारीख़, उस दिन की तिथि कब से कब तक, निशीथ काल का समय, और उस दिन की अपनी बात।

  1. 29जनवरी

    माघ कालाष्टमी

    माघ कृष्ण अष्टमी · तिथि 29 जनवरी, सुबह 4:03 से 30 जनवरी, सुबह 4:59 तक

    अमांत पंचांग में यह पौष की कालाष्टमी है। जाड़े की लंबी रात में भैरव के आगे सरसों के तेल का दीया जलता है।

    निशीथ काल: 30 जनवरी, रात 12:08 से रात 1:01 तक

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  2. 27फ़रवरी

    फाल्गुन कालाष्टमी

    फाल्गुन कृष्ण अष्टमी · तिथि 27 फ़रवरी, रात 9:55 से 28 फ़रवरी, रात 11:47 तक

    अमांत में यह माघ की है। इसी दिन शबरी जयंती भी है, राम की राह देखने वाली शबरी का दिन, जिसका अपना पन्ना है।

    निशीथ काल: 28 फ़रवरी, रात 12:09 से रात 12:59 तक

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  3. 29मार्च

    चैत्र कालाष्टमी

    चैत्र कृष्ण अष्टमी · तिथि 29 मार्च, शाम 5:12 से 30 मार्च, रात 7:40 तक

    होली के बाद की पहली कालाष्टमी। यही तिथि शीतला अष्टमी की भी है, जिसका अपना पन्ना है।

    निशीथ काल: 30 मार्च, रात 12:02 से रात 12:49 तक

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  4. 28अप्रैल

    वैशाख कालाष्टमी

    वैशाख कृष्ण अष्टमी · तिथि 28 अप्रैल, दोपहर 12:31 से 29 अप्रैल, दोपहर 3:02 तक

    शिव पुराण में शिव भैरव को कई नाम देते हैं: कालराज, क्योंकि वे समय पर राज करते हैं; आमर्दक, यानी दुष्टों को कुचलने वाले; और पापभक्षण, यानी भक्तों के पाप खाने वाले।

    निशीथ काल: 28 अप्रैल, रात 11:57 से 29 अप्रैल, रात 12:40 तक

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  5. 28मई

    ज्येष्ठ कालाष्टमी

    ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी · तिथि 28 मई, सुबह 6:27 से 29 मई, सुबह 8:21 तक

    आदि शंकराचार्य के कालभैरवाष्टक के हर श्लोक का अंत एक ही टेक पर होता है: काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे, यानी मैं काशी नगरी के स्वामी कालभैरव को भजता हूँ।

    निशीथ काल: 28 मई, रात 11:58 से 29 मई, रात 12:39 तक

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  6. 26जून

    आषाढ़ कालाष्टमी

    आषाढ़ कृष्ण अष्टमी · तिथि 26 जून, रात 9:52 से 27 जून, रात 10:45 तक

    भैरव की सवारी कुत्ता है। कालभैरवाष्टक की एक व्याख्या कुत्ते को इस पल का निशान मानती है: वह न बीते कल में जीता है, न आने वाले कल में।

    निशीथ काल: 27 जून, रात 12:04 से रात 12:44 तक

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  7. 26जुलाई

    श्रावण कालाष्टमी

    श्रावण कृष्ण अष्टमी · तिथि 26 जुलाई, सुबह 10:25 से 27 जुलाई, सुबह 10:13 तक

    इसी दिन सावन सोमवार का व्रत भी है। सावन शिव का महीना है, और इस महीने की कालाष्टमी ख़ास शुभ मानी गई है।

    निशीथ काल: 27 जुलाई, रात 12:07 से रात 12:49 तक

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  8. 24अगस्त

    भाद्रपद कालाष्टमी

    भाद्रपद कृष्ण अष्टमी · तिथि 24 अगस्त, रात 8:25 से 25 अगस्त, शाम 7:20 तक

    इसी रात जन्माष्टमी है, जिसका अपना पन्ना है। यह अष्टमी मंगलवार की है, और शिव पुराण कहता है कि जो काशी में मंगलवार वाली अष्टमी को कालराज को नहीं भजता, उसका पुण्य वैसे घटता है जैसे कृष्ण पक्ष में चाँद।

    निशीथ काल: 25 अगस्त, रात 12:02 से रात 12:46 तक

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  9. 23सितंबर

    आश्विन कालाष्टमी

    आश्विन कृष्ण अष्टमी · तिथि 23 सितंबर, सुबह 4:37 से 24 सितंबर, रात 2:58 तक

    इसी दिन जितिया, यानी जीवित्पुत्रिका व्रत, भी है, जिसका अपना पन्ना है। यह अष्टमी पितृ पक्ष के बीच पड़ती है।

    निशीथ काल: 23 सितंबर, रात 11:50 से 24 सितंबर, रात 12:37 तक

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  10. 22अक्टूबर

    कार्तिक कालाष्टमी

    कार्तिक कृष्ण अष्टमी · तिथि 22 अक्टूबर, सुबह 11:56 से 23 अक्टूबर, सुबह 10:00 तक

    इसी दिन अहोई अष्टमी है, जिसका अपना पन्ना है। अमांत पंचांग में यह आश्विन की कालाष्टमी गिनी जाती है।

    निशीथ काल: 22 अक्टूबर, रात 11:40 से 23 अक्टूबर, रात 12:31 तक

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  11. 20नवंबर

    काल भैरव जयंती

    मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी · तिथि 20 नवंबर, शाम 7:18 से 21 नवंबर, शाम 5:20 तक

    साल की सबसे बड़ी कालाष्टमी, जिसे भैरव अष्टमी भी कहते हैं। शिव पुराण कहता है कि मार्गशीर्ष की कृष्ण अष्टमी को ही परमेश्वर भैरव के रूप में प्रकट हुए। दक्षिण के अमांत पंचांग में यह कार्तिक में गिनी जाती है, और इसका अपना पन्ना है।

    निशीथ काल: 20 नवंबर, रात 11:40 से 21 नवंबर, रात 12:34 तक

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  12. 20दिसंबर

    पौष कालाष्टमी

    पौष कृष्ण अष्टमी · तिथि 20 दिसंबर, रात 3:34 से 21 दिसंबर, रात 1:53 तक

    अमांत पंचांग में यह मार्गशीर्ष की है, यानी वहाँ काल भैरव जयंती वाले महीने के ठीक बाद की पहली कालाष्टमी। उत्तर में यह जाड़े के पौष में आती है।

    निशीथ काल: 20 दिसंबर, रात 11:51 से 21 दिसंबर, रात 12:46 तक

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कथा

कालाष्टमी की कथा

कालाष्टमी की कथा शिव पुराण की शतरुद्र संहिता में है, भैरव के अवतार वाले दो अध्यायों में। पहले अध्याय में ब्रह्मा अपने को सबसे बड़ा कहते हैं, और उनका पाँचवाँ सिर शिव की निंदा करता है। तब शिव के क्रोध से भैरव जन्मे, और उन्होंने अपनी बाईं उँगली के नाख़ून की नोक से ब्रह्मा का वही पाँचवाँ सिर काट दिया। भैरव के जन्म की पूरी कथा काल भैरव जयंती के पन्ने पर है। यहाँ कथा उसके आगे चलती है।

सिर तो कट गया, पर ब्रह्महत्या का पाप लगा। शिव ने भैरव से कहा, ब्रह्मा की खोपड़ी हाथ में लो, कपाल का व्रत रखो, और भिक्षा माँगकर जियो। फिर शिव ने एक कन्या रची, ब्रह्महत्या, यानी उसी पाप का रूप, और उससे कहा कि वह भैरव के पीछे पीछे चले। वह हर जगह जा सकती थी, बस वाराणसी में नहीं। जिस पल भैरव वाराणसी में पाँव रखेंगे, उसका पीछा वहीं ख़त्म हो जाएगा।

भैरव हाथ में खोपड़ी लिए तीनों लोकों में घूमे। वे विष्णु के लोक भी पहुँचे, जहाँ विष्णु, देवता और ऋषि उनके आगे झुक गए। विष्णु ने पूछा, आप भिक्षा क्यों माँगते हैं? भैरव ने बताया कि उन्होंने नाख़ून से ब्रह्मा का सिर काटा है, और उसी पाप को काटने को यह व्रत है। विष्णु ने देखा कि एक स्त्री भैरव के पीछे पीछे चल रही है, और उससे कहा, इन्हें छोड़ दो। ब्रह्महत्या बोली, मैं इन्हीं की सेवा करूँगी; इन्हें देखते देखते ही मैं ख़ुद पवित्र हो जाऊँगी।

आख़िर भैरव मुक्ति की नगरी वाराणसी पहुँचे। वहाँ आते ही ब्रह्मा की खोपड़ी उनके हाथ से छूटकर धरती पर गिर पड़ी, और रुद्र ख़ुशी से नाच उठे। जिस जगह वह गिरी, वह कपालमोचन तीर्थ कहलाई, यानी जहाँ कपाल छूटा। ब्रह्महत्या ने भैरव का डरावना रूप देखा, चीख़ी, और पाताल में समा गई।

भैरव फिर काशी में ही रह गए, कपालमोचन पर, अपने भक्तों के पाप खाते हुए। शिव पुराण कहता है कि कपालमोचन में नहाकर तर्पण करने से ब्रह्महत्या का पाप भी छूट जाता है, और यह कथा सुनने से सब पाप, सब दुख, यहाँ तक कि क़ैद भी। आदि शंकराचार्य के कालभैरवाष्टक का पहला श्लोक भैरव को ऐसे याद करता है: 'देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्। नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥' मतलब: इंद्र जिनके पवित्र चरणों की सेवा करते हैं, जो साँप का जनेऊ पहनते हैं, माथे पर चाँद रखते हैं, दया की खान हैं, नारद जैसे योगी जिन्हें पूजते हैं, और दिशाएँ ही जिनके कपड़े हैं, उन काशी नगरी के स्वामी कालभैरव को मैं भजता हूँ।

व्रत

कालाष्टमी का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह नहाकर, भैरव का ध्यान करके व्रत का संकल्प लेते हैं।
  2. व्रत पूरे दिन का है, और रात की पूजा तक चलता है।
  3. व्रत का दिन वह होता है जिसकी रात में अष्टमी हो, चाहे पंचांग में सुबह सप्तमी लिखी हो।
  4. रात की आरती हो जाने के बाद ही व्रत खोलते हैं।
  5. मार्गशीर्ष वाली कालाष्टमी पर, जो काल भैरव जयंती है, शिव पुराण उपवास के साथ रात भर जागरण भी कहता है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

पंचांग कालाष्टमी के पारण की कोई अलग घड़ी नहीं देते, जैसी एकादशी की देते हैं। यह व्रत रात की पूजा से बँधा है, इसलिए रात की पूजा और आरती से पहले नहीं खुलता; उसके बाद हर घर अपनी रीत से इसे खोलता है। पूजा के विधान में लिखा है कि व्रत खोलने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियाँ खिलाएँ।

कहाँ कैसे

कालाष्टमी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • काशी

    काल भैरव यहाँ नगर के कोतवाल, यानी रखवाले, माने जाते हैं, और मान्यता है कि काशी में रहने की इजाज़त वही देते हैं। भक्त तेल, काले तिल और फूल चढ़ाते हैं, और विश्वनाथ के दर्शन के बाद यहाँ आने की रीत है।

  • उज्जैन

    शिप्रा के किनारे का काल भैरव मंदिर नगर का कोतवाल माना जाता है। यहाँ भक्त प्रसाद में मदिरा चढ़ाते हैं: पुजारी जी उसे चाँदी की तश्तरी में भरकर मूर्ति के होंठों की ओर झुकाते हैं।

  • काठमांडू

    दरबार चौक में काल भैरव की मूर्ति है, जिसे लोक की कथा राजा प्रताप मल्ल से जोड़ती है। मान्यता थी कि उसके आगे झूठ बोलने वाले को तुरंत सज़ा मिलती है, इसलिए लोग वहीं क़सम खाते और गवाही देते थे।

  • उत्तर और दक्षिण के पंचांग

    उत्तर भारत पूर्णिमांत पंचांग से चलता है, सो वहाँ जो माघ की कालाष्टमी है, वह दक्षिण के अमांत पंचांग में पौष की कहलाती है। महीने का नाम बदलता है, रात वही रहती है।

रीत

कालाष्टमी के दिन क्या करते हैं

  1. सुबह शिव या भैरव के किसी मंदिर में जाकर दर्शन और पूजा करते हैं।
  2. शाम को शिव, पार्वती और भैरव, तीनों की पूजा साथ होती है।
  3. भैरव को तांत्रिकों का देवता कहा गया है, इसलिए उनकी मुख्य पूजा रात में होती है।
  4. पूजा में धूप, दीया, काले तिल, उड़द और सरसों का तेल लगता है, और अंत में आरती होती है।
  5. भैरव का मंत्र जपते हैं: ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः।
  6. व्रत खोलने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियाँ खिलाते हैं, क्योंकि कुत्ता भैरव की सवारी है।

सवाल जवाब

कालाष्टमी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

कालाष्टमी 2027 में कब कब है?

कालाष्टमी 2027 में 12 बार आती है, हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी को। पहली 29 जनवरी, शुक्रवार को है, और आख़िरी 20 दिसंबर, सोमवार को। हर तारीख़ की तिथि, निशीथ काल और उस दिन की अपनी बात नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।

कालाष्टमी पर किसकी पूजा होती है?

भैरव की, जो शिव का ही एक रूप हैं। शिव पुराण में शिव उन्हें कालभैरव कहते हैं, क्योंकि उनसे काल भी डरता है।

कालाष्टमी कभी सप्तमी को क्यों पड़ती है?

क्योंकि भैरव की पूजा रात की है, और व्रतराज के नियम से व्रत उस दिन होता है जिसकी रात में अष्टमी हो। अगर प्रदोष के बाद अष्टमी कम से कम एक घड़ी न रहे, तो व्रत एक दिन पहले, सप्तमी वाले दिन, रखा जाता है।

कालाष्टमी पर कुत्ते को क्यों खिलाते हैं?

कुत्ता भैरव की सवारी है। पूजा के विधान में कहा गया है कि व्रत खोलने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियाँ खिलाएँ।

साल में कितनी कालाष्टमी होती हैं?

हर महीने एक, यानी साल में बारह। अधिक मास वाले साल में एक और जुड़ जाती है। इनमें सबसे बड़ी मार्गशीर्ष की काल भैरव जयंती है।

कालाष्टमी और काल भैरव जयंती में क्या फ़र्क़ है?

कालाष्टमी हर महीने आती है। काल भैरव जयंती उनमें से एक है, मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी वाली, जिस दिन शिव पुराण के हिसाब से भैरव प्रकट हुए थे।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Drik Panchang: Masik Kalashtamiहर महीने की कृष्ण अष्टमी, व्रतराज का रात वाला नियम, सप्तमी को व्रत, काल भैरव जयंती और दोनों पंचांग
  2. Aaj Tak: Kalashtami vrat pujan vidhiसंकल्प, मंदिर में पूजा, शाम को शिव पार्वती और भैरव, रात की पूजा, तिल उड़द और सरसों का तेल, मंत्र, कुत्ते को मीठी रोटी, सावन
  3. Shiva Purana, Shatarudra Samhita, Adhyaya 8: Bhairavavatara varnanam (VedaPath)भैरव का जन्म, उनके नाम, नाख़ून से पाँचवाँ सिर, कपाल व्रत, ब्रह्महत्या का रचा जाना
  4. Shiva Purana, Shatarudra Samhita, Adhyaya 9: Bhairava avatara lila (VedaPath)विष्णु के लोक की यात्रा, काशी, कपालमोचन, ब्रह्महत्या का पाताल जाना, मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, मंगलवार वाली अष्टमी, कथा सुनने का फल
  5. Shlokam: Kalabhairava Ashtakamकालभैरवाष्टक का पहला श्लोक और उसका अर्थ, आदि शंकराचार्य, कुत्ता भैरव की सवारी
  6. Madhya Pradesh Tourism: Kal Bhairav Temple, Ujjainशिप्रा का किनारा, उज्जैन का कोतवाल, मदिरा का प्रसाद
  7. Incredible India: Kaal Bhairav Temple, Varanasiकाशी का कोतवाल, रहने की इजाज़त, तेल और तिल, विश्वनाथ के बाद दर्शन
  8. Nepal Traveller: Kaal Bhairav of Basantapurकाठमांडू के काल भैरव, प्रताप मल्ल, झूठ पर सज़ा की मान्यता, क़सम और गवाही

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।