उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · कर्क संक्रांति
हरेला 2027
Harela 2027
दस दिन की हरियाली, और सिर पर रखा पूरा बरस।
हरेला 2027 में 16 जुलाई, शुक्रवार को है। सूर्य 17 जुलाई, सुबह 5:49 पर कर्क राशि में जाता है। समय नई दिल्ली के हैं।
पैरों पर कुछ ठंडा छूता है। फिर घुटनों पर। फिर कंधों पर।
घर की सबसे बड़ी औरत के हाथ में हरी पत्तियों की एक मुट्ठी है।
दस दिन पहले यही मुट्ठी सात दानों में बँटी थी, रिंगाल की टोकरी की मिट्टी में दबी।
आख़िर में हरेला सिर पर टिकता है, और एक तिनका कान के पीछे।
वे धीमे से कहती हैं: जी रये, जागि रये।
आँगन के कोने में एक नया पौधा अपनी पहली बारिश देख रहा है।
दस दिन में सात दाने हरियाली बन गए। कथा भी ऐसे ही बढ़ती है: हर बरस कोई उसे फिर से बोता है।
2027 में कब
हरेला 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़16 जुलाई, शुक्रवार
संक्रांतिसूर्य कर्क राशि में17 जुलाई, सुबह 5:49
नक्षत्रज्येष्ठासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 5:34
सूर्यास्तशाम 7:21
चंद्रोदयशाम 5:51
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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शुभकामना
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पहचान
हरेला क्या है
हरेला उत्तराखंड का, और सबसे पहले कुमाऊँ का, हरियाली का त्योहार है। हरेला का सीधा मतलब है हरियाली का दिन। साल में तीन हरेले माने जाते हैं, चैत में, सावन में और असोज में, पर सबसे बड़ा सावन वाला है। यह सावन के पहले दिन आता है, यानी कर्क संक्रांति को, जिस दिन सूरज कर्क राशि में जाता है। घर का मुखिया दस दिन पहले टोकरी में पाँच या सात तरह के अनाज बोता है, और संक्रांति के दिन वही हरी पौध काटकर घर के हर आदमी, औरत और बच्चे को लगाई जाती है। गढ़वाल में इससे मिलता जुलता दिन मोल संक्रांति या रै सग्रान कहलाता है। उत्तराखंड सरकार इस दिन को पर्यावरण के दिन के रूप में भी रखती है।
कथा
हरेला की कथा
हरेला की कोई पोथी वाली कथा नहीं है। इसकी कथा इसके दस दिन हैं, जो हर घर में एक ही क्रम से चलते हैं। लोक में यह दिन शिव और पार्वती से जुड़ा माना जाता है, और कई घरों में इस दिन शुद्ध मिट्टी से शिव परिवार की छोटी मूर्तियाँ बनाई जाती हैं, जिन्हें डिकारे कहते हैं। इन्हें प्राकृतिक रंगों से सजाकर पूजा जाता है।
कथा बुवाई से शुरू होती है। रिंगाल की टोकरी में, यानी पहाड़ के पतले बाँस से बुनी टोकरी में, पहले मिट्टी की एक परत बिछती है, फिर बीज, फिर मिट्टी, और यह पाँच छह बार दोहराया जाता है। कहीं टोकरी में तिमिल और मालू के पत्ते बिछाए जाते हैं। फिर रोज़ सुबह पानी, और सीधी धूप से बचाव। नौवें दिन किसी पेड़ की एक टहनी से पौध की गुड़ाई होती है। दसवें दिन हरेला कटता है। घर का मुखिया उस पर तिलक, चंदन और अक्षत लगाता है। इसे हरेला पतीसना कहते हैं। पहला हिस्सा घर के देवता को जाता है।
मान्यता है कि टोकरी की पौध जितनी अच्छी उगे, आने वाले साल की फ़सल उतनी अच्छी होगी। इसलिए दस दिन तक हर सुबह घर की आँख उसी टोकरी पर रहती है।
फिर आती है आशीष की घड़ी। बड़ी औरत हरेला पहले पैरों पर लगाती हैं, फिर घुटनों, कंधों और सिर पर, और कहती हैं: जी रये, जागि रये, धरती जस आगव, आकाश जस चाकव है जये। सूर्ज जस तराण, स्यावे जसि बुद्धि हो। दूब जस फलिये, सिल पिसि भात खाये, जांठि टेकि झाड़ जाये। इसका मतलब है: जीते रहो, जागते रहो। धरती जैसा धीरज हो, आकाश जैसा खुला मन। सूरज जैसी ताक़त, सियार जैसी बुद्धि हो। दूब की तरह फैलो। और इतना जियो कि दाँत न रहें तो भात भी पीसकर खाना पड़े, और चलने को लाठी टेकनी पड़े। हर घर में इसके बोल थोड़े अलग भी मिलते हैं।
कहाँ कैसे
हरेला कहाँ कैसे मनाया जाता है
कुमाऊँ: अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत
यहाँ हरेला सबसे बड़ा है। घर घर टोकरी बोई जाती है, डिकारे बनते हैं, और औरतें दीवारों और फ़र्श पर ऐपण बनाती हैं, यानी कुमाऊँ की लोक चित्रकारी।
भीमताल
सावन के हरेले के आसपास यहाँ हरेला मेला लगता है।
गढ़वाल
यहाँ इससे मिलता जुलता दिन मोल संक्रांति या रै सग्रान के नाम से जाना जाता है।
हिमाचल प्रदेश
कांगड़ा, शिमला और सिरमौर में यह दिन हरियाली या रिहयाली कहलाता है, और जुब्बल तथा किन्नौर में दखरैन।
पूरा उत्तराखंड
सरकार और गाँव के लोग इस दिन बड़े पैमाने पर पौधे लगाते हैं, और स्कूलों में बच्चे घर या स्कूल में पौधा लगाते हैं।
रीत
हरेला के दिन क्या करते हैं
- संक्रांति से दस दिन पहले, कहीं नौ या ग्यारह दिन पहले, रिंगाल की टोकरी या मिट्टी के बर्तन में मिट्टी और बीज की परतें बिछाई जाती हैं।
- पाँच या सात अनाज बोए जाते हैं: जौ, गेहूँ, मक्का, गहत यानी कुलथ, सरसों, उड़द और भट्ट यानी पहाड़ की काली सोयाबीन; शहरों में अक्सर बस गेहूँ, जौ और मक्का।
- रोज़ सुबह पानी दिया जाता है और टोकरी को सीधी धूप से बचाकर रखा जाता है।
- नौवें दिन किसी पेड़ की टहनी से पौध की गुड़ाई होती है।
- शुद्ध मिट्टी से शिव, पार्वती और गणेश के डिकारे बनाकर पूजे जाते हैं।
- संक्रांति के दिन हरेला काटकर उस पर तिलक, चंदन और अक्षत लगाया जाता है, और पहले घर के देवता और गाँव के मंदिर में चढ़ाया जाता है।
- बड़े हरेले को पैरों से सिर तक छुआते हैं, सिर पर रखते हैं और कान के पीछे खोंसते हैं, साथ में जी रये जागि रये वाली आशीष।
- इस दिन छाया वाले और फल वाले पेड़ लगाए जाते हैं; मान्यता है कि हरेले पर लगी टहनी जड़ पकड़ लेती है।
रसोई
हरेला का खाना
- भट्ट की चुड़कानी भट्ट यानी पहाड़ की काली सोयाबीन से बनी तरी।
- झंगोरे की खीर झंगोरा पहाड़ का एक छोटा अनाज है, उसी की खीर।
- सिंगोड़ी खोया जिसे मालू के पत्ते में लपेटा जाता है।
- आलू के गुटके मसाले में भुने आलू।
सवाल जवाब
हरेला 2027: पूछे जाने वाले सवाल
हरेला 2027 कब है?
हरेला 2027 में 16 जुलाई, शुक्रवार को है। सूर्य 17 जुलाई, सुबह 5:49 पर कर्क राशि में जाता है। समय नई दिल्ली के हैं।
हरेला क्यों मनाया जाता है?
हरेला हरियाली और नई ऋतु का त्योहार है। सावन की शुरुआत में बोई पौध से अच्छी फ़सल की कामना होती है, और मान्यता है कि पौध जितनी अच्छी उगे, फ़सल उतनी अच्छी होगी। लोक में यह दिन शिव और पार्वती से भी जुड़ा है।
हरेला में कौन कौन से अनाज बोए जाते हैं?
पाँच या सात अनाज, जैसे जौ, गेहूँ, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट। हर घर और गाँव की अपनी गिनती होती है, कहीं ग्यारह तरह के बीज भी बोए जाते हैं।
जी रये जागि रये का क्या मतलब है?
इसका मतलब है जीते रहो, जागते रहो। पूरी आशीष में धरती जैसा धीरज, आकाश जैसा खुला मन, सूरज जैसी ताक़त और सियार जैसी बुद्धि माँगी जाती है, और इतनी लंबी उम्र कि लाठी टेककर चलना पड़े।
हरेला साल में कितनी बार आता है?
तीन बार माना जाता है: चैत में, सावन में और असोज में। सबसे बड़ा और सबसे ज़्यादा मनाया जाने वाला सावन का हरेला है, जो कर्क संक्रांति को आता है।
हरेला पर पेड़ क्यों लगाते हैं?
मान्यता है कि हरेले के दिन लगाया गया पेड़ ज़रूर बढ़ता है और स्वस्थ रहता है, इसलिए इस दिन पौधे और टहनियाँ लगाई जाती हैं।
डिकारे क्या होते हैं?
डिकारे शुद्ध मिट्टी से बनी शिव, पार्वती और गणेश की छोटी मूर्तियाँ हैं, जिन्हें हरेले पर घर में बनाकर प्राकृतिक रंगों से सजाया और पूजा जाता है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- आज तक: हरेला पर्व के साथ सावन की शुरुआतआशीष के बोल और अर्थ, सात अनाज, रिंगाल टोकरी, नौ दस दिन का क्रम, डिकारे
- IANS: Harela festival celebrates nature, prosperity, environmental conservationतिमिल मालू के पत्ते, पैरों से सिर तक लगाना, कान के पीछे, पेड़ लगाना
- भक्ति भारत: हरेलाकर्क संक्रांति, नौ दस ग्यारह दिन पहले बुवाई, सरकार का पर्यावरण दिवस
- G.B. Pant National Institute of Himalayan Environment: Harela noticeहरेला का अर्थ, कर्क संक्रांति, पेड़ लगाने की मान्यता
- LEISA India: Ritual as Resilience, Celebration of Harela festivalतीन हरेले, अनाजों की सूची, डिकारे, भीमताल मेला
- Colors of Uttarakhand: Harela Festivalकुमाऊँ के ज़िले, गढ़वाल और हिमाचल के नाम, ऐपण, पकवान
- Wikipedia: Harelaमूल स्रोतों तक पहुँचने के लिए, गाँव के मंदिर में चढ़ाना, स्कूलों में पौधे
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।