उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · हर महीने का व्रत
एकादशी 2027
Ekadashi 2027
चाँद का ग्यारहवाँ दिन। थाली हल्की, कथा लंबी।
2027 में 25 एकादशी हैं, जिनमें से 24 इस पन्ने पर हैं और देवउठनी एकादशी अपने पन्ने पर। पहली 3 जनवरी, रविवार को सफला एकादशी है, और आख़िरी 23 दिसंबर, गुरुवार को फिर सफला। हर एकादशी की तिथि, उसका पारण और उसकी कथा नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।
चावल वाले की दुकान का शटर आज आधा ही उठा है।
बोरियाँ बँधी पड़ी हैं। तराज़ू ख़ाली झूल रहा है।
बगल के ठेले पर भीड़ है। केले, अमरूद, एक टोकरी नारियल।
मंदिर की सीढ़ियों पर गीले पाँवों के निशान हैं, नदी से ऊपर तक।
भीतर पुजारी जी तुलसी के पत्ते धोकर एक एक करके थाली में रख रहे हैं।
किसी ने कल रात से कुछ नहीं खाया। किसी ने पानी भी नहीं पिया।
कल सुबह सूरज निकलेगा, तब यह दुकान पूरी खुलेगी।
महीने में दो बार यही सुबह लौटती है। वही तिथि, और हर बार एक नई कथा।
2027 में कब
एकादशी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं
आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।
फ़ोन पर Google का पन्ना ठीक से न खुले, तो यही बटन कंप्यूटर पर दबाइए। जुड़ते ही यह फ़ोन में भी दिखेगा।
जोड़ते समय “Remove Alerts” बंद कर दें (टिक हटा दें), तो बड़े त्योहारों की सुबह 7 बजे याद भी आएगी कि अपनों को कार्ड भेजना है।
- मुफ़्त
- कोई साइन अप नहीं
- नाम, नंबर या ईमेल नहीं
- जब चाहें हटा दें
दूसरा कैलेंडर: iPhone या Mac · Google · Outlook · फ़ाइल
सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।
पहचान
एकादशी क्या है
एकादशी चाँद की ग्यारहवीं तिथि है। हर महीने यह दो बार आती है: एक बार अमावस्या के बाद, शुक्ल पक्ष में, और एक बार पूर्णिमा के बाद, कृष्ण पक्ष में। इसे हरि का दिन कहते हैं, और विष्णु के भक्त इस दिन एक सूरज निकलने से अगले सूरज निकलने तक व्रत रखते हैं। अन्न और दालें नहीं खाई जातीं, और लोक में चावल को तो ख़ास तौर पर मना माना जाता है। व्रत अगली सुबह, द्वादशी को, सूरज निकलने के बाद खोला जाता है। इसे पारण कहते हैं, और हरि वासर नाम की घड़ी में पारण नहीं होता। हर तारीख़ के लिए पारण की घड़ी यह पन्ना ऊपर अपने आप निकालता है। साल में बारह महीने हैं, सो चौबीस एकादशियाँ। जिस साल अधिक मास, यानी लौंद का महीना, जुड़ता है, उसमें दो और आती हैं, पद्मिनी और परमा, और गिनती छब्बीस हो जाती है। इस पन्ने की सूची जनवरी से दिसंबर तक चलती है, इसलिए उसमें पच्चीस नाम हैं: पौष की सफला एकादशी साल के दोनों सिरों पर आती है।
पूरी सूची
2027 की हर एकादशी
हर एकादशी की तारीख़, उसकी तिथि कब से कब तक, उसकी अपनी कथा, और अगले दिन पारण का समय।
3जनवरी
सफला एकादशी
पौष कृष्ण · एकादशी 2 जनवरी, दोपहर 2:25 से 3 जनवरी, शाम 4:09 तक
भविष्योत्तर पुराण की कथा है। चंपावती के राजा माहिष्मत का बड़ा बेटा लुंपक बुरी राह पर था, सो राजा ने उसे जंगल भेज दिया, जहाँ वह एक पुराने बरगद के नीचे रहता था। इस एकादशी से पहले की रात वह ठंड में काँपता रहा, अगले दिन कमज़ोरी से शिकार न कर सका, बस अपने आप गिरे फल बीने और उन्हें बरगद की जड़ में रखकर हरि को पुकारा। अनजाने में उसका पूरा व्रत हो गया, अगली सुबह एक घोड़ा उसे घर ले जाने को खड़ा था, और पिता ने उसे राज सौंप दिया।
पारण: 4 जनवरी, सुबह 7:15 से सुबह 9:19 तक
19जनवरी
पौष पुत्रदा एकादशी
पौष शुक्ल · एकादशी 18 जनवरी, सुबह 10:28 से 19 जनवरी, सुबह 7:50 तक
भविष्य पुराण की कथा है। भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या के कोई बेटा नहीं था, और इसी दुख में राजा अकेले घने जंगल में निकल गया। दोपहर को भूखा प्यासा वह कमल वाले एक तालाब पर पहुँचा, जहाँ दस विश्वेदेव नहाने आए थे; उन्होंने बताया कि आज पुत्रदा एकादशी है। राजा ने व्रत रखा, द्वादशी को पारण किया, और लौटने पर रानी के बेटा हुआ।
पारण: 20 जनवरी, सुबह 7:14 से सुबह 9:21 तक
2फ़रवरी
षटतिला एकादशी
माघ कृष्ण · एकादशी 1 फ़रवरी, सुबह 8:42 से 2 फ़रवरी, सुबह 11:11 तक
भविष्योत्तर पुराण में दाल्भ्य ऋषि पुलस्त्य मुनि से पूछते हैं कि पाप से छुटकारा कैसे मिले। पुलस्त्य बताते हैं कि माघ की इस एकादशी पर तिल छह तरह से काम आता है: तिल मिले पानी से नहाना, तिल का लेप, तिल की आहुति, तिल खाना, तिल दान करना और तिल दान में लेना। इसी से इसका नाम षटतिला है, यानी छह तिलों वाली।
पारण: 3 फ़रवरी, सुबह 7:08 से सुबह 9:19 तक
17फ़रवरी
जया एकादशी
माघ शुक्ल · एकादशी 16 फ़रवरी, रात 8:20 से 17 फ़रवरी, शाम 5:32 तक
पद्म पुराण की कथा है। इंद्र की सभा में गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती एक दूसरे में ऐसे खोए कि गाना और नाचना बिगड़ गया, और इंद्र ने दोनों को पिशाच बनाकर धरती पर गिरा दिया। हिमालय की ठंड में, एक पीपल के नीचे, उस दिन उन्होंने न कुछ खाया न पिया और रात भर जागते रहे; उन्हें पता भी नहीं था कि आज जया एकादशी है। द्वादशी की भोर उनके पुराने रूप लौट आए, और इंद्र ने हैरान होकर पूछा कि उसका शाप किसने काटा।
पारण: 18 फ़रवरी, सुबह 6:57 से सुबह 9:13 तक
3मार्च
विजया एकादशी
फाल्गुन कृष्ण · एकादशी 3 मार्च, सुबह 4:45 से 4 मार्च, सुबह 7:25 तक
इस कथा में ब्रह्मा नारद को राम की बात सुनाते हैं। सीता को ढूँढते हुए राम सेना के साथ समुद्र के किनारे पहुँचे, पर पार जाने का कोई सीधा रास्ता नहीं सूझा। लक्ष्मण के कहने पर वे पास के एक द्वीप पर रहने वाले बूढ़े ऋषि बकदाल्भ्य के पास गए, जिन्होंने फाल्गुन की इस एकादशी का व्रत बताया: सात अनाजों के ढेर पर जल का कलश, उसकी पूजा और रात भर जागरण। राम ने व्रत रखा और जीते, इसीलिए नाम है विजया, यानी जीत दिलाने वाली।
पारण: 4 मार्च, दोपहर 2:02 के बाद
18मार्च
आमलकी एकादशी
फाल्गुन शुक्ल · एकादशी 18 मार्च, सुबह 4:22 से 19 मार्च, रात 1:52 तक
वसिष्ठ मुनि राजा मांधाता को यह कथा सुनाते हैं। वैदिश नगर में राजा चित्ररथ और सारी प्रजा ने इस एकादशी पर विष्णु मंदिर के आँवले के पेड़ की पूजा की और रात भर जागे; पास में छिपा एक शिकारी रात भर यह सब देखता सुनता रहा, और उसी पुण्य से अगले जन्म में राजा वसुरथ बना। एक दिन जंगल में सोते हुए वसुरथ को दुश्मनों ने घेरा, तो उसके शरीर से एक स्त्री निकली और चक्र से सबको मार गिराया; आकाशवाणी ने बताया कि यह केशव की रक्षा थी।
पारण: 19 मार्च, सुबह 7:13 से सुबह 8:52 तक
2अप्रैल
पापमोचनी एकादशी
चैत्र कृष्ण · एकादशी 2 अप्रैल, रात 12:46 से 3 अप्रैल, रात 2:52 तक
लोमश ऋषि ने यह कथा राजा मांधाता को सुनाई थी। फूलों भरे एक वन में तप करते ऋषि मेधावी का मन अप्सरा मंजुघोषा पर ऐसा रमा कि सत्तावन बरस निकल गए और उन्हें एक पल जैसे लगे। होश आया तो ग़ुस्से में उन्होंने उसे पिशाची होने का शाप दे दिया, और ख़ुद अपने पिता च्यवन ऋषि से डाँट खाई। दोनों ने चैत्र की इस एकादशी का व्रत रखा, मंजुघोषा शाप से छूटी और मेधावी के पाप धुल गए; इसीलिए नाम है पापमोचनी, यानी पाप छुड़ाने वाली।
पारण: 3 अप्रैल, सुबह 9:16 के बाद
17अप्रैल
कामदा एकादशी
चैत्र शुक्ल · एकादशी 16 अप्रैल, सुबह 11:22 से 17 अप्रैल, सुबह 9:28 तक
वराह पुराण की कथा है, जिसे वसिष्ठ ने राजा दिलीप को सुनाया। रत्नपुर के राजा पुंडरीक की सभा में गंधर्व ललित गाते गाते अपनी पत्नी ललिता की याद में सुर भूल गया, और राजा ने शाप देकर उसे आदमख़ोर राक्षस बना दिया। ललिता उसके साथ जंगलों में भटकती हुई विंध्य पर्वत पर शृंगी ऋषि के पास पहुँची, और उनके कहने पर इस एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य पति को दे दिया। ललित उसी पल अपने गंधर्व रूप में लौट आया।
पारण: 18 अप्रैल, सुबह 5:53 से सुबह 7:43 तक
2मई
वरूथिनी एकादशी
वैशाख कृष्ण · एकादशी 1 मई, शाम 6:54 से 2 मई, रात 7:52 तक
इसके माहात्म्य में कोई अलग कहानी नहीं, कृष्ण की युधिष्ठिर को दी हुई सीख है। कृष्ण कहते हैं कि इस एकादशी का व्रत कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण पर सोना दान करने जितना फल देता है। दानों में अन्न का दान सबसे बड़ा है, और उससे भी ऊपर है किसी अनजान को ज्ञान देना; यह व्रत इन सबका फल देता है, और रात भर जनार्दन की पूजा में जागने का भी यही फल है।
पारण: 3 मई, सुबह 5:39 से सुबह 8:19 तक
16मई
मोहिनी एकादशी
वैशाख शुक्ल · एकादशी 15 मई, शाम 6:18 से 16 मई, शाम 5:14 तक
यहाँ वसिष्ठ मुनि यह कथा स्वयं राम को सुनाते हैं, जो सीता के बिछोह के दुख से छूटना चाहते हैं। सरस्वती के किनारे भद्रावती नगर में सेठ धनपाल का पाँचवाँ बेटा धृष्टबुद्धि जुए, शराब और बुरी संगत में सब गँवाकर घर से निकाला गया और जंगल में भटकने लगा। वैशाख में एक दिन वह कौंडिन्य मुनि के आश्रम पहुँचा; गंगा से नहाकर लौटे मुनि के कपड़ों से कुछ बूँदें उस पर पड़ीं और उसकी बुद्धि जागी। मुनि के कहने पर उसने मोहिनी एकादशी का व्रत रखा, पापों से छूटा और गरुड़ पर विष्णु के धाम गया।
पारण: 17 मई, सुबह 5:30 से सुबह 8:13 तक
1जून
अपरा एकादशी
ज्येष्ठ कृष्ण · एकादशी 31 मई, सुबह 10:03 से 1 जून, सुबह 9:40 तक
इसके माहात्म्य में कृष्ण युधिष्ठिर को कोई कहानी नहीं, पापों की एक सूची सुनाते हैं। झूठी गवाही, कम तौलना, नक़ली वैद्य या ज्योतिषी बनकर ठगना, लड़ाई से भाग जाना, गुरु की निंदा: ऐसे पाप भी इस एकादशी के व्रत से कट जाते हैं। कृष्ण इसे पापों के घने जंगल को काटने वाली कुल्हाड़ी कहते हैं, और इस दिन त्रिविक्रम रूप की पूजा बताते हैं।
पारण: 2 जून, सुबह 5:24 से सुबह 8:10 तक
14जून
निर्जला एकादशी
ज्येष्ठ शुक्ल · एकादशी 14 जून, रात 2:13 से 15 जून, रात 2:09 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। भीम ने व्यास जी से कहा कि माँ कुंती, द्रौपदी और सारे भाई हर एकादशी रखते हैं, पर उनके पेट में वृक नाम की जो आग है वह उन्हें भूखा नहीं रहने देती। व्यास जी ने बताया कि ज्येष्ठ शुक्ल की इस एकादशी पर सूरज निकलने से अगले सूरज तक बिना अन्न और बिना पानी रहो, तो साल की सारी एकादशियों का फल मिलेगा। तब से इसे भीमसेनी या पांडव निर्जला एकादशी भी कहते हैं।
पारण: 15 जून, सुबह 8:14 के बाद
30जून
योगिनी एकादशी
आषाढ़ कृष्ण · एकादशी 29 जून, रात 10:05 से 30 जून, रात 8:31 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। अलकापुरी में कुबेर का माली यक्ष हेममाली रोज़ मानसरोवर से शिव पूजा के फूल लाता था, पर एक दिन वह अपनी पत्नी स्वरूपवती के पास रुक गया और फूल पहुँचे ही नहीं। कुबेर के शाप से कोढ़ झेलता हेममाली जंगलों में भटकता हुआ हिमालय में मार्कंडेय ऋषि के पास पहुँचा और सच सच सब बता दिया। ऋषि के कहने पर उसने इस एकादशी का व्रत रखा, अपना रूप वापस पाया और घर लौट आया।
पारण: 1 जुलाई, सुबह 5:27 से सुबह 8:14 तक
14जुलाई
देवशयनी एकादशी
आषाढ़ शुक्ल · एकादशी 13 जुलाई, दोपहर 12:09 से 14 जुलाई, दोपहर 1:11 तक
ब्रह्मा अपने बेटे नारद को यह कथा सुनाते हैं। सूर्यवंश के राजा मांधाता के राज में तीन बरस बारिश नहीं हुई, तो राजा उपाय ढूँढते हुए अंगिरा मुनि के पास पहुँचे; मुनि ने पहले एक कठोर दंड बताया, पर राजा ने किसी निर्दोष को मारने से मना कर दिया, तब मुनि ने इस पद्मा एकादशी का व्रत बताया। राजा और प्रजा ने व्रत रखा, बारिश आई और खेत भर गए। देवशयनी नाम विष्णु की नींद का है: परिवर्तिनी की कथा में कृष्ण कहते हैं कि वे क्षीर सागर में कार्तिक की हरिबोधिनी एकादशी तक सोते हैं।
पारण: 15 जुलाई, सुबह 5:33 से सुबह 8:19 तक
29जुलाई
कामिका एकादशी
श्रावण कृष्ण · एकादशी 29 जुलाई, सुबह 7:35 से 30 जुलाई, सुबह 5:14 तक
इसमें कोई कहानी नहीं, ब्रह्मा की नारद को दी हुई सीख है, जिसे कृष्ण युधिष्ठिर को सुनाते हैं। इस दिन गदाधर विष्णु की पूजा, रात का जागरण, और सबसे बढ़कर तुलसी: एक तुलसी का पत्ता भगवान को मोती और हीरे से ज़्यादा प्यारा है। तुलसी को पानी देने से यम का डर जाता है, और तुलसी के आगे घी का दीया जलाने के पुण्य का हिसाब चित्रगुप्त भी नहीं लगा पाते।
पारण: 30 जुलाई, सुबह 10:30 के बाद
12अगस्त
श्रावण पुत्रदा एकादशी
श्रावण शुक्ल · एकादशी 12 अगस्त, रात 12:59 से 13 अगस्त, रात 3:00 तक
भविष्य पुराण की कथा है; इस्कॉन इसे पवित्रोपना एकादशी भी कहता है। माहिष्मती के राजा महीजित के बेटा नहीं था, तो उसके मंत्री लोमश ऋषि के पास गए, और ऋषि ने ध्यान लगाकर देखा कि पिछले जन्म में राजा एक व्यापारी था, जिसने दोपहर की प्यास में तालाब पर आई गाय और उसके नए जन्मे बछड़े को हटाकर पहले ख़ुद पानी पिया। ऋषि के कहने पर राजा और सारी प्रजा ने इस एकादशी का व्रत रखा, द्वादशी को अपना पुण्य राजा को दिया, और रानी के एक सुंदर बेटा हुआ।
पारण: 13 अगस्त, सुबह 9:35 के बाद
28अगस्त
अजा एकादशी
भाद्रपद कृष्ण · एकादशी 27 अगस्त, दोपहर 3:26 से 28 अगस्त, दोपहर 12:43 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। सच के लिए जाने जाने वाले राजा हरिश्चंद्र राज गँवा चुके थे, पत्नी चंद्रमती और बेटे लोहिताश्व को बेच चुके थे, और श्मशान की चौकीदारी कर रहे थे। बरसों बाद गौतम मुनि उधर से निकले और उन्हें भादों कृष्ण की इस एकादशी का व्रत और रात भर का जागरण बताया। व्रत रखते ही उनके पाप मिट गए, बेटा फिर जी उठा, पत्नी फिर साथ थी, देवताओं ने फूल बरसाए और राज भी लौट आया।
पारण: 29 अगस्त, सुबह 5:58 से सुबह 8:31 तक
11सितंबर
परिवर्तिनी एकादशी
भाद्रपद शुक्ल · एकादशी 10 सितंबर, शाम 5:01 से 11 सितंबर, रात 7:37 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण में कृष्ण इसे पार्श्व या वामन एकादशी भी कहते हैं। दैत्य कुल के भक्त राजा बलि ने इंद्र का स्वर्ग जीत लिया, तो भगवान वामन बनकर आए और तीन पग धरती माँगी; दो पगों में धरती और आकाश नाप लिए, और तीसरे के लिए बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान ने उसे पाताल भेजा और उसके महल में रहने का वचन दिया। कृष्ण कहते हैं कि क्षीर सागर में सोते हुए वे इस दिन करवट बदलते हैं, इसीलिए नाम है परिवर्तिनी।
पारण: 12 सितंबर, सुबह 6:04 से सुबह 8:34 तक
26सितंबर
इंदिरा एकादशी
आश्विन कृष्ण · एकादशी 25 सितंबर, रात 10:31 से 26 सितंबर, रात 7:50 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। माहिष्मती के राजा इंद्रसेन की सभा में नारद आए और बताया कि यमलोक में उन्होंने राजा के पिता को देखा है, जिन्होंने एक बार एकादशी का व्रत बीच में ही तोड़ दिया था, और पिता ने संदेश भेजा है कि बेटा इंदिरा एकादशी रखे। राजा ने परिवार और सेवकों के साथ व्रत रखा; द्वादशी को पारण करते ही आकाश से फूल बरसे, और उसने अपने पिता को गरुड़ पर हरि के धाम जाते देखा।
पारण: 27 सितंबर, सुबह 6:12 से सुबह 8:36 तक
11अक्टूबर
पापांकुशा एकादशी
आश्विन शुक्ल · एकादशी 10 अक्टूबर, सुबह 11:41 से 11 अक्टूबर, दोपहर 2:09 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसकी कोई अलग कहानी नहीं, कृष्ण की सीख है। इस दिन पद्मनाभ विष्णु की पूजा होती है, और कृष्ण कहते हैं कि सौ अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ भी एकादशी के व्रत के सोलहवें हिस्से के बराबर नहीं। इस एक व्रत से माँ, पिता और पत्नी, तीनों के कुल की दस दस पीढ़ियाँ तर जाती हैं, और इस दिन सोना, तिल, अन्न, पानी, छाता या जूते दान करने वाला यम के घर नहीं जाता।
पारण: 12 अक्टूबर, सुबह 6:20 से सुबह 8:39 तक
25अक्टूबर
रमा एकादशी
कार्तिक कृष्ण · एकादशी 25 अक्टूबर, सुबह 5:41 से 26 अक्टूबर, रात 3:23 तक
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है। राजा मुचुकुंद की बेटी चंद्रभागा का पति शोभन एकादशी के दिन ससुराल आया, जहाँ उस दिन पशु भी नहीं खाते थे; कमज़ोर शोभन ने फिर भी व्रत रखा, और द्वादशी का सूरज निकलते ही उसके प्राण चले गए। उस पुण्य से उसे मंदराचल पर्वत पर एक राज मिला, पर वह टिकने वाला नहीं था, क्योंकि व्रत श्रद्धा से नहीं रखा गया था। चंद्रभागा ने आठ बरस की उम्र से रखी अपनी सारी एकादशियों का पुण्य उसे दे दिया, और वह राज सदा के लिए उसका हो गया।
पारण: 26 अक्टूबर, सुबह 8:48 के बाद
10नवंबर
देवउठनी एकादशी
कार्तिक शुक्ल · इसका अपना पन्ना है
24नवंबर
उत्पन्ना एकादशी
मार्गशीर्ष कृष्ण · एकादशी 23 नवंबर, दोपहर 1:45 से 24 नवंबर, दोपहर 12:12 तक
यह देवी एकादशी के जन्म की एकादशी है। पद्म पुराण के उत्तर खंड के अड़तीसवें अध्याय में विष्णु के शरीर से निकली कन्या दैत्य मुर को मारती है, और विष्णु उसे एकादशी नाम देकर वर देते हैं कि उसका व्रत पाप मिटाएगा; पूरी कथा ऊपर है। इस्कॉन की कथा इसे मार्गशीर्ष कृष्ण की इसी एकादशी से जोड़ती है, जबकि पद्म पुराण का वह अध्याय किसी महीने का नाम नहीं लेता।
पारण: 25 नवंबर, सुबह 6:51 से सुबह 8:58 तक
9दिसंबर
मोक्षदा एकादशी
मार्गशीर्ष शुक्ल · एकादशी 9 दिसंबर, रात 2:59 से 10 दिसंबर, रात 3:20 तक
ब्रह्मांड पुराण की कथा है। चंपक नगर के राजा वैखानस ने सपने में अपने पिता को यम के नरक में दुख पाते देखा, और पर्वत मुनि ने ध्यान लगाकर बताया कि पिछले जन्म में पिता ने अपनी पत्नी के साथ बुरा बर्ताव किया था। मुनि के कहने पर राजा ने पूरे परिवार के साथ यह एकादशी रखकर उसका पुण्य पिता को दिया, और देवताओं के दूत पिता को स्वर्ग ले गए; इसीलिए नाम है मोक्षदा, यानी मुक्ति देने वाली। इसी दिन गीता जयंती भी आती है, जिसका अपना पन्ना है।
पारण: 10 दिसंबर, सुबह 9:14 के बाद
23दिसंबर
सफला एकादशी
पौष कृष्ण · एकादशी 22 दिसंबर, रात 11:41 से 23 दिसंबर, रात 11:12 तक
यह वही पौष कृष्ण की सफला एकादशी है जो जनवरी में आई थी; साल घूमकर वह फिर आ गई है, और उसकी कथा इस सूची की पहली एकादशी में है।
पारण: 24 दिसंबर, सुबह 7:11 से सुबह 9:15 तक
कथा
एकादशी की कथा
एकादशी किसी एक दिन का नाम भर नहीं, एक देवी का नाम भी है। पद्म पुराण के उत्तर खंड के अड़तीसवें अध्याय में कृष्ण युधिष्ठिर को उनके जन्म की कथा सुनाते हैं। तालजंघ नाम के दैत्य का बेटा मुर, जिसे ब्रह्मा के कुल में जन्मा बताया गया है, चंद्रावती नगरी से राज करता था। उसने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया, और इंद्र, वायु, अग्नि, चंद्रमा, सूर्य और वरुण की जगह अपने लोग रख दिए।
देवता शिव के पास गए, और शिव ने उन्हें विष्णु के पास भेजा। विष्णु ने बाणों और चक्र से मुर की सेना पर वार किया, पर मुर बचा रहा, और लड़ाई देवताओं के हज़ार बरस तक चली। इस्कॉन की सुनाई कथा में तो मुर की ताक़त से विष्णु के अस्त्र फूल बन जाते हैं। थककर विष्णु बदरिकाश्रम गए और सिंहवती नाम की एक गुफा में सो गए, जो बारह योजन लंबी थी और जिसका बस एक दरवाज़ा था। मुर पीछे पीछे वहाँ भी पहुँच गया, सोते हुए विष्णु को मारने।
तभी विष्णु के शरीर से, उनके तेज के एक अंश से, एक कन्या निकली। मुर ने उसे लड़ने को ललकारा। पद्म पुराण कहता है कि उसने बस एक हुंकार से मुर को मार गिराया; इस्कॉन वाली कथा में वह लड़ती है, उसे बेहोश करती है और उसका सिर काट देती है। विष्णु जागे तो पूछा, यह किसने किया? कन्या बोली, आपकी कृपा से मैंने इस बड़े दैत्य को मारा है। मैं एकादशी हूँ।
विष्णु ने उससे वर माँगने को कहा। एकादशी ने माँगा कि वह सब तीर्थों में सबसे बड़ी हो, मुश्किलें हरे, और जो उसके दिन उपवास करे, या बस रात को एक बार खाए, या दिन में एक ही बार खाए, उसे धर्म, धन और मोक्ष मिले। विष्णु ने हाँ कह दिया। इसी अध्याय में आगे कहा गया है कि पाप मिटाने वाला एकादशी जैसा कोई दूसरा व्रत नहीं, और शुक्ल और कृष्ण, दोनों पक्षों की एकादशी बराबर है, उनमें भेद नहीं करना चाहिए।
कहाँ कैसे
एकादशी कहाँ कैसे मनाया जाता है
पंढरपुर, महाराष्ट्र
वारकरी, यानी वारी करने वाले, औसतन तीन हफ़्ते पैदल चलकर आषाढ़ शुक्ल की एकादशी को पंढरपुर के विट्ठल रुक्मिणी मंदिर पहुँचते हैं। सबसे पुरानी और सबसे बड़ी पालकियाँ संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम की हैं, जिनमें संतों की पादुकाएँ, यानी खड़ाऊँ, चलती हैं। वारी साल में चार बार होती है, चैत्र, माघ, आषाढ़ और कार्तिक में; आषाढ़ी वारी सबसे बड़ी है, और कार्तिक वाली कार्तिकी वारी कहलाती है।
इस्कॉन और वैष्णव घर
इस्कॉन की सूची में छब्बीस एकादशियों के नाम हैं, और आठ से अस्सी बरस तक हर किसी से व्रत की उम्मीद की जाती है। अन्न, दालें, सरसों और हींग नहीं खाए जाते, और दिन हरे कृष्ण नाम जपने, गीता और भागवत पढ़ने और मंदिर जाने में बीतता है।
बंगाल
बंगाल की गौड़ीय वैष्णव परंपरा में यह नियम चैतन्य महाप्रभु से जुड़ता है। बांग्ला की चैतन्य चरितामृत (आदि लीला) में आता है: एक दिन मातार पदे करिया प्रणाम, प्रभु कहे, माता, मोरे देह एक दान। मतलब, एक दिन माँ के पैर छूकर प्रभु बोले, माँ, मुझे एक दान दो; माँ ने हाँ कहा, तो उन्होंने माँगा कि एकादशी को अन्न मत खाना।
पुरी, ओड़िशा
लोक कथा है कि एक एकादशी पर ब्रह्मा महाप्रसाद लेने पुरी आए तो वह ख़त्म हो चुका था; एक पत्ते पर बचे चावल के कुछ दाने एक कुत्ता चाट रहा था, और ब्रह्मा ने उसी के साथ वे दाने खा लिए। तब जगन्नाथ ने कहा कि उनके महाप्रसाद पर एकादशी का नियम नहीं चलेगा, और यहाँ की एकादशी उल्टी एकादशी कहलाने लगी। गौड़ीय परंपरा की पुरानी पोथी प्रेम विवर्त कुछ अलग कहती है: उसमें पुरी में ही चैतन्य महाप्रभु साथियों से कहते हैं कि एकादशी को महाप्रसाद को प्रणाम करो और उसे अगले दिन खाओ।
रीत
एकादशी के दिन क्या करते हैं
- दशमी को, यानी एक दिन पहले, बस एक बार खाते हैं। इंदिरा एकादशी की विधि में उस रात ज़मीन पर सोने की बात भी है।
- एकादशी की सुबह नहाकर भगवान के आगे व्रत का संकल्प लेते हैं, यानी मन में पक्का करते हैं कि आज व्रत है।
- अन्न और दालें नहीं खाई जातीं; इस्कॉन के नियम में सरसों और हींग भी नहीं, और तिल बस षटतिला एकादशी पर।
- व्रत हर कोई अपनी ताक़त के हिसाब से रखता है: कोई निर्जल रहता है, कोई बस पानी पर, कोई फल और दूध पर, और कोई बिना अन्न का एक बार का खाना लेता है।
- दिन हरि के नाम, गीता और भागवत के पाठ और विष्णु या कृष्ण के मंदिर के दर्शन में जाता है।
- रात को जागरण होता है, भजन और कथा के साथ; सफला और आमलकी जैसी कई कथाओं में फल रात भर जागने से ही पूरा होता है।
- अगली सुबह, द्वादशी को, सूरज निकलने के बाद और हरि वासर बीत जाने पर पारण होता है; कथाओं की विधि में उससे पहले ब्राह्मण को खिलाने और दान देने की बात है।
सवाल जवाब
एकादशी 2027: पूछे जाने वाले सवाल
एकादशी 2027 में कब कब है?
2027 में 25 एकादशी हैं, जिनमें से 24 इस पन्ने पर हैं और देवउठनी एकादशी अपने पन्ने पर। पहली 3 जनवरी, रविवार को सफला एकादशी है, और आख़िरी 23 दिसंबर, गुरुवार को फिर सफला। हर एकादशी की तिथि, उसका पारण और उसकी कथा नीचे है। समय नई दिल्ली के हैं।
एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?
क्योंकि एकादशी के व्रत में अन्न छोड़ा जाता है, और चावल भी अन्न है। इस्कॉन के नियम में हर तरह का अन्न और दालें छूटती हैं, और लोक मान्यता में चावल को ख़ास तौर पर मना माना जाता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर का महाप्रसाद इस नियम से बाहर माना जाता है।
एकादशी का पारण कब करें?
अगले दिन, द्वादशी को, सूरज निकलने के बाद। हरि वासर की घड़ी में पारण मना है; द्रिक पंचांग कहता है कि जो दोपहर तक न रुक सके वह हरि वासर ख़त्म होते ही व्रत खोल सकता है, पर उसके कुछ देर बाद खोलना ज़्यादा ठीक है। इस्कॉन के नियम में बिना अन्न का व्रत अन्न से खुलता है, और निर्जल व्रत दूध या फल से खोला जा सकता है।
एकादशी कैलेंडर में दो दिन क्यों दिखती है?
एकादशी तिथि दिन के किसी भी समय शुरू हो सकती है, इसलिए अक्सर दो तारीख़ों में फैल जाती है। द्रिक पंचांग कहता है कि एक दिन का व्रत पहली तारीख़ को रखना ठीक है, और जिसमें ताक़त हो वह दोनों दिन रख सकता है।
निर्जला एकादशी पर क्या पानी की एक बूँद भी नहीं पीते?
ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा में यह व्रत सूरज निकलने से अगले सूरज तक बिना अन्न और बिना पानी का है। आचमन के लिए दाईं हथेली में बस इतना पानी लिया जा सकता है जिसमें सरसों का एक दाना डूब जाए। अगली सुबह नहाकर, दान देकर और ब्राह्मण को खिलाकर व्रत खुलता है।
एक साल में कितनी एकादशी होती हैं?
हर महीने दो, यानी साल में चौबीस। अधिक मास वाले साल में पद्मिनी और परमा जुड़ जाती हैं और गिनती छब्बीस हो जाती है।
उत्पन्ना एकादशी का क्या महत्व है?
इस्कॉन की कथा में मार्गशीर्ष कृष्ण की इसी एकादशी के साथ वह कथा जुड़ी है जिसमें विष्णु के शरीर से निकली कन्या मुर को मारती है और विष्णु उसे एकादशी नाम देते हैं। उत्पन्ना का मतलब ही है जो जन्मी।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- ISKCON Bangalore: Ekadashi tag (Glories of Saphala, Putrada, Sat-tila, Bhaimi, Vijaya, Amalaki ... Mokshada Ekadashi)हर एकादशी की अपनी कथा, अलग अलग लेखों में, और उत्पन्ना वाली मुर कथा
- ISKCON Bangalore: Ekadashi, Dates, Rituals and Significanceव्रत के नियम, क्या नहीं खाते, व्रत के ढंग, पारण किससे करें
- Padma Purana, Uttara Khanda, Chapter 38: The Origin of Ekadashi and the Killing of Demon Mura (wisdomlib.org)देवी एकादशी के जन्म और मुर के वध की कथा, उनके वरदान
- The Gaudiya Treasures of Bengal: Chaitanya Mahaprabhu on Ekadashiचैतन्य चरितामृत का माँ से दान माँगने वाला प्रसंग, प्रेम विवर्त की पुरी वाली बात
- Drik Panchang: Ekadashi Vrat Mahatmyaसाल में चौबीस एकादशी, अधिक मास में पद्मिनी और परमा मिलाकर छब्बीस
- Drik Panchang: Ekadashi Fasting FAQदो दिन की एकादशी, पारण और हरि वासर
- Scroll.in: As Covid-19 puts curbs on Pandharpur pilgrimage, recalling the devotion to the poet-saint traditionपंढरपुर की वारी, ज्ञानेश्वर और तुकाराम की पालकियाँ, साल की चार वारियाँ
- Jagran English: Jagannath Puri is the only temple where rice is consumed on Ekadashiपुरी के महाप्रसाद और उल्टी एकादशी की लोक कथा, चावल वाली लोक मान्यता
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।