उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · मेष संक्रांति
बैसाखी 2027
Baisakhi 2027
पाँच सिर माँगे गए। पाँच सिंह लौटे।
बैसाखी 2027 में 14 अप्रैल, बुधवार को है। सूर्य दोपहर 3:28 पर मेष राशि में जाता है। समय नई दिल्ली के हैं।
गली में सबसे पहले केसरी रंग आता है।
आगे पाँच लोग चल रहे हैं। उनके पीछे, पूरे आदर के साथ, गुरु ग्रंथ साहिब।
रास्ते में लड़के तलवार के दाँव दिखाते हैं। लोहा धूप में चमकता है।
किनारे पर एक बुज़ुर्ग हाथ जोड़े खड़े हैं। उनकी उँगली पकड़े एक बच्चा।
बच्चा पूछता है, ये पाँच ही सबसे आगे क्यों हैं?
वे कहते हैं, क्योंकि एक दिन, जब सब चुप थे, यही पाँच आगे आए थे।
2027 में कब
बैसाखी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़14 अप्रैल, बुधवार
संक्रांतिसूर्य मेष राशि मेंदोपहर 3:28
नक्षत्रपुनर्वसुसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 5:57
सूर्यास्तशाम 6:46
चंद्रोदयदोपहर 12:05
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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शुभकामना
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पहचान
बैसाखी क्या है
बैसाखी वैसाख महीने का पहला दिन है, जब सूरज मेष राशि में जाता है। इसे मेष संक्रांति कहते हैं। यह दिन चाँद की तिथि से नहीं, सूरज से गिना जाता है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह लगभग हर बरस एक ही जगह के आसपास आता है। पंजाब में यह साल की पहली फ़सल के शुरू होने का दिन है, और पंजाबी सौर साल भी इसी से गिना जाता है। सिखों के लिए यह खालसा साजना दिवस है: वह दिन जब 1699 की बैसाखी पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ सजाया। सिख स्रोत यह भी साफ़ कहते हैं कि यह सिखों का नया साल नहीं है; सिख साल चेत की पहली तारीख़ से शुरू होता है।
कथा
बैसाखी की कथा
सिख इतिहास में आता है कि 1699 की बैसाखी से पहले गुरु गोबिंद राय जी ने संगतों को हुकमनामे भेजे: इस बार आओ तो केश बिना कटे हों। आनंदपुर में केसगढ़ के पास भारी संगत जुटी। कीर्तन हुआ। फिर गुरु जी ने म्यान से तलवार खींची और पूछा: कौन है जो धर्म के लिए अपना सिर दे?
संगत में सन्नाटा छा गया। फिर एक आदमी उठा। गुरु जी उसे तंबू में ले गए, और जब लौटे तो तलवार पर ख़ून था। उन्होंने फिर वही माँग की। फिर एक उठा। ऐसा पाँच बार हुआ, और सिख स्रोत बताते हैं कि संगत में कई लोग डर गए कि यह क्या हो रहा है। तब तंबू से पाँचों बाहर आए, ज़िंदा। वे थे लाहौर के दया राम, हस्तिनापुर के धरम दास, जगन्नाथ पुरी के हिम्मत राय, द्वारका के मोहकम चंद और बीदर के साहिब चंद। कोई दुकानदार था, कोई किसान, कोई पानी भरने वाला, कोई दर्ज़ी, कोई नाई।
गुरु जी ने लोहे के बाटे में पानी लिया, उसे दोधारी खंडे से हिलाया और बाणी पढ़ी। सिख परंपरा बताती है कि माता साहिब कौर जी ने उसमें पतासे डाले, ताकि हिम्मत के साथ मिठास और नम्रता भी रहे। यही खंडे दी पाहुल है, जिसे आज अमृत कहते हैं। पाँचों को अमृत छकाया गया, और वे पंज प्यारे कहलाए, यानी पाँच प्यारे।
फिर वह हुआ जो किसी ने सोचा न था। गुरु जी ने उन्हीं पाँचों के आगे हाथ जोड़े और कहा, अब मुझे भी इसी तरह अमृत छकाओ। गुरु ख़ुद चेला बन गए। उन्होंने कहा, जहाँ पंज प्यारे हैं, वहाँ मैं हूँ। उस दिन से हर अमृतधारी के नाम के साथ सिंह और हर सिखणी के नाम के साथ कौर जुड़ा, और गुरु गोबिंद राय, गुरु गोबिंद सिंह कहलाए। खालसा को पाँच ककार मिले: केस, कंघा, कड़ा, कृपाण और कछहरा।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में बैसाखी
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
रामावतार
ब्रजभाषा · Ramavatar (Dasam Granth)
रामावतार, जिसे सिख परंपरा गुरु गोबिंद सिंह जी की रचना मानती है, अपने आख़िरी छंदों में बताता है कि वह आनंदपुर में, सतलुज के किनारे, नैना देवी की पहाड़ी के नीचे पूरा हुआ, विक्रम संवत 1755 में, यानी सन 1698 में। अगली ही बैसाखी को उसी आनंदपुर में खालसा सजा। एक ही धरती, एक बरस का फ़ासला: पहले एक रामकथा की आख़िरी पंक्ति लिखी गई, फिर पाँच प्यारे आगे आए।
कहाँ कैसे
बैसाखी कहाँ कैसे मनाया जाता है
आनंदपुर साहिब, पंजाब
जहाँ 1699 में खालसा सजा, वहाँ आज भी इस दिन सबसे बड़ा जमावड़ा होता है। केसगढ़ साहिब इसी जगह पर है।
पंजाब के गाँव और शहर
यहाँ यह साल की पहली फ़सल का दिन भी है। सुबह सुबह लोग, किसी भी धर्म के हों, फूल और भेंट लेकर गुरुद्वारों और मंदिरों में पहुँचते हैं।
दुनिया भर के गुरुद्वारे
सुबह का दीवान, गुरु ग्रंथ साहिब से पाठ, कीर्तन, और खालसा के जन्म की कथा होती है। बहुत से सिख इसी दिन अमृत छकते हैं।
स्मेथविक और वोल्वरहैम्प्टन, इंग्लैंड
यहाँ के सिख शहर की सड़कों पर नगर कीर्तन निकालते हैं। स्टॉल लगते हैं, बाणी और संगीत होता है, और सबके लिए लंगर चलता है।
रीत
बैसाखी के दिन क्या करते हैं
- सुबह गुरुद्वारे में दीवान सजता है, गुरु ग्रंथ साहिब से पाठ होता है और कीर्तन गाया जाता है।
- संगत को 1699 की वह बैसाखी सुनाई जाती है, जब आनंदपुर में खालसा सजा।
- अमृत संचार होता है: पाँच अमृतधारी सिख, पंज प्यारों की जगह, अमृत तैयार करके नए सिखों को छकाते हैं।
- नगर कीर्तन निकलता है, सबसे आगे पंज प्यारे, और गुरु ग्रंथ साहिब पूरे आदर के साथ।
- रास्ते में बच्चे और जवान गतका, यानी सिखों की युद्धकला, के दाँव दिखाते हैं।
- केसरी और पीला इस दिन के रंग हैं; गुरुद्वारे सजाए जाते हैं।
- लंगर में हर आने वाले को, बिना किसी भेद के, एक साथ खाना मिलता है।
रसोई
बैसाखी का खाना
- लंगर गुरुद्वारे की रसोई का खाना, जो हर आने वाले के लिए मुफ़्त है।
- पतासे चीनी के वही छोटे टुकड़े, जो परंपरा के अनुसार पहले अमृत में घोले गए थे।
सवाल जवाब
बैसाखी 2027: पूछे जाने वाले सवाल
बैसाखी 2027 कब है?
बैसाखी 2027 में 14 अप्रैल, बुधवार को है। सूर्य दोपहर 3:28 पर मेष राशि में जाता है। समय नई दिल्ली के हैं।
बैसाखी क्यों मनाई जाती है?
पंजाब में यह साल की पहली फ़सल के शुरू होने का दिन है। सिखों के लिए यह खालसा साजना दिवस है, क्योंकि 1699 की बैसाखी पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ सजाया था।
क्या बैसाखी सिखों का नया साल है?
नहीं। सिख स्रोत साफ़ कहते हैं कि सिख साल चेत की पहली तारीख़ से शुरू होता है। बैसाखी वैसाख की पहली तारीख़ है और खालसा के जन्म का दिन है।
पंज प्यारे कौन थे?
वे पाँच सिख जो 1699 में सिर देने को आगे आए: भाई दया सिंह, भाई धरम सिंह, भाई हिम्मत सिंह, भाई मोहकम सिंह और भाई साहिब सिंह। वे लाहौर, हस्तिनापुर, जगन्नाथ पुरी, द्वारका और बीदर से आए थे और अलग अलग जातियों के थे।
खालसा पंथ की स्थापना कहाँ हुई थी?
आनंदपुर साहिब में, केसगढ़ के पास, 1699 की बैसाखी को।
अमृत में पतासे किसने डाले थे?
सिख परंपरा के अनुसार माता साहिब कौर जी ने, ताकि अमृत में हिम्मत के साथ मिठास और नम्रता भी रहे।
बैसाखी हर साल लगभग एक ही तारीख़ को क्यों आती है?
क्योंकि यह सूरज के मेष राशि में जाने से गिनी जाती है, चाँद की तिथि से नहीं। सूरज का साल अंग्रेज़ी साल के क़रीब चलता है, इसलिए दिन बहुत नहीं खिसकता।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Vaisakhi, SikhiWiki1699 की घटना, पंज प्यारों का काम, पाँच ककार, सिंह कौर नाम, नया साल न होना
- Vaisakhi Day, SikhiWikiहुकमनामे, तंबू, गुरु का अमृत छकना, मेष संक्रांति
- Vaisakhi: the festival that changed Sikh history, DV Networkपंज प्यारों की जगहें, बाटा, खंडा, पतासे, आज का अमृत संचार
- Vaisakhi, SikhNetपंज प्यारों के नाम, नगर कीर्तन, लंगर, केसरी पीले रंग
- The story behind Vaisakhi, University of Birminghamकेसगढ़, कीर्तन के बाद सिर की माँग, पाँचों के पुराने नाम, इंग्लैंड के नगर कीर्तन
- Vaisakhi (2006 Wikipedia mirror)फ़सल का दिन, सुबह गुरुद्वारों और मंदिरों में जाना
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।