पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · भाद्रपद कृष्ण षष्ठी

हल षष्ठी 2027

Hal Shashthi 2027

हलधर का जन्मदिन। और उस दिन की थाली में हल की उपज का एक दाना भी नहीं।

हल षष्ठी 2027 में 23 अगस्त, सोमवार को है। भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि 22 अगस्त, रात 8:46 से 23 अगस्त, रात 8:53 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

हल षष्ठी का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

उस शाम का चाँद, 66 प्रतिशत रोशन

आँगन के कोने में एक छोटा सा गड्ढा खुदा है। उसमें पानी भरा है।

पानी पर मिट्टी की एक नाव तैर रही है।

किनारे पर झरबेरी, पलाश और कुश की डालियाँ एक साथ बँधी गड़ी हैं, कच्चे सूत में लिपटी।

माँओं ने सुबह से पानी नहीं पिया। आज रसोई में गेहूँ नहीं उतरा।

थाली में खेत की मेड़ पर अपने आप उगा पसही का चावल रखा है, और कटोरी में भैंस का दही।

पूजा से लौटकर एक माँ बेटे की पीठ पर हल्दी वाली पीली पोती छुआती है।

कथा में भी एक बच्चा है। झरबेरी की ओट में। और पास के खेत में चलता एक हल।

2027 में कब

हल षष्ठी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़23 अगस्त, सोमवार

तिथिभाद्रपद कृष्ण षष्ठी22 अगस्त, रात 8:46 से 23 अगस्त, रात 8:53 तक

नक्षत्रअश्विनीसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:54

सूर्यास्तशाम 6:53

चंद्रोदयरात 10:02

मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar

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शुभकामना

हल षष्ठी का शुभकामना कार्ड

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पहचान

हल षष्ठी क्या है

हल षष्ठी बलराम का दिन है, कृष्ण के बड़े भाई का, जिनका अस्त्र हल है। इसीलिए उन्हें हलधर कहते हैं। यह भादों के कृष्ण पक्ष की षष्ठी को पड़ती है, जैसा उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग गिनता है; अमांत पंचांग में यही दिन सावन कृष्ण की षष्ठी कहलाता है, दिन वही रहता है, बस महीने का नाम बदलता है। यानी यह जन्माष्टमी से दो दिन पहले आती है। इसके कई नाम हैं: हलछठ, हरछठ, ललही छठ, चंदन छठ, कमरछठ, खमर छठ और तिन्नी छठ। यह व्रत माँएँ रखती हैं, अपने बच्चों की लंबी उम्र और सेहत के लिए, और जिन्हें संतान की आस है वे भी रखते हैं। बहुत से लोग इसे बलराम का जन्मदिन मानते हैं, पर गर्ग संहिता कहती है कि बलराम भादों शुक्ल की षष्ठी को स्वाति नक्षत्र में जन्मे थे, और ब्रज में उनकी जयंती उसी दिन होती है। छत्तीसगढ़ में यह भी माना जाता है कि इसी दिन कार्तिकेय का जन्म हुआ। इस दिन हल से जुते खेत की कोई उपज नहीं खाई जाती, और गाय का दूध, दही और घी भी नहीं।

कथा

हल षष्ठी की कथा

पहले बलराम के जन्म की कथा, जो भागवत पुराण के दसवें स्कंध के दूसरे अध्याय में है। मथुरा में कंस देवकी के छह बेटों को मार चुका था। तब विष्णु का एक अंश, अनंत, जिन्हें शेष भी कहते हैं, देवकी के सातवें गर्भ में आया। भगवान ने योगमाया से कहा कि इस गर्भ को देवकी के पेट से निकालकर गोकुल में, नंद के गाँव में रहने वाली रोहिणी के गर्भ में रख दो। योगमाया ने ऐसा ही किया, और मथुरा के महल में सब रोने लगे कि देवकी का गर्भ गिर गया।

भगवान ने कहा था कि यह बेटा गर्भ से खींचकर लाया गया है, इसलिए संकर्षण कहलाएगा; सबका मन रमाएगा, इसलिए राम; और इसकी ताक़त बहुत बड़ी होगी, इसलिए बलभद्र। हल इन्हीं बलराम का अस्त्र है। मान्यता है कि इसीलिए उनके दिन का नाम हल षष्ठी पड़ा, और इसीलिए उस दिन हल का काम छोड़ा जाता है।

अब वह कथा जो इस दिन घर घर सुनी जाती है, एक ग्वालिन की। लोक कथा है कि बहुत पहले एक ग्वालिन नगर में घूम घूमकर दूध और दही बेचती थी। उसके पेट में बच्चा था। हल षष्ठी के दिन उसने गाय और भैंस का मिला हुआ दूध यह कहकर बेच दिया कि यह बस भैंस का है, और गाँव की औरतों ने वही दूध अपने व्रत में ले लिया।

रास्ते में उसे दर्द उठा। उसने एक झरबेरी की झाड़ी की ओट में बच्चे को जन्म दिया, और नए जन्मे बच्चे को वहीं छोड़कर पास के गाँवों में दूध बेचने चली गई। उसी झरबेरी के पास एक किसान खेत जोत रहा था। अचानक उसके हल का फल, यानी लोहे की नोक, बच्चे को लगा, और बच्चे के प्राण चले गए।

ग्वालिन लौटी तो उसने बच्चे को देखा, और समझ गई कि यह उसके झूठ की सज़ा है: उसने हल षष्ठी के दिन झूठ बोलकर गाँव की औरतों का व्रत बिगाड़ा था। वह रोती हुई गाँव गाँव गई और हर घर में अपनी ग़लती बताकर माफ़ी माँगी। औरतों ने उसे माफ़ कर दिया और आशीष दी। सब मिलकर खेत पर पहुँचीं तो बच्चा जीता जागता मिला। उस दिन ग्वालिन ने ठान लिया कि अब वह कभी झूठ नहीं बोलेगी।

व्रत

हल षष्ठी का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह जल्दी नहाकर महुए की दातुन की जाती है, और बच्चों की लंबी उम्र के लिए व्रत का संकल्प लिया जाता है।
  2. दिन भर हल से जुते खेत में उगा कोई अनाज या सब्ज़ी नहीं खाई जाती, क्योंकि हल बलराम का अस्त्र माना जाता है।
  3. गाय का दूध, दही और घी नहीं लिया जाता; उसकी जगह भैंस का दूध, दही और घी काम आता है।
  4. जो खाया जाता है वह बिना हल के उगा होता है: पसही या तिन्नी का चावल, तालाब और पोखर में उगी चीज़ें, और महुआ।
  5. छत्तीसगढ़ में माँएँ सुबह से सूरज डूबने तक निर्जला रहती हैं, यानी पानी भी नहीं पीतीं।
  6. दोपहर या शाम की पूजा में हल षष्ठी की कथा सुनी जाती है, कहीं मंदिरों में औरतें टोली बनाकर जाती हैं।

पारण: व्रत कैसे खोलें

छत्तीसगढ़ की कमरछठ में व्रत शाम को खुलता है: डूबते सूरज को अर्घ्य देकर, सूरज डूबने के बाद। पारण की थाली भी बिना हल वाली होती है: पसहर चावल, छह तरह की भाजी और भैंस का दही। पूजा का सात अनाज वाला प्रसाद पहले बच्चों को दिया जाता है। शेखावाटी की ऊब छठ में रीत दूसरी है: वहाँ औरतें चाँद निकलने पर उसे अर्घ्य देकर व्रत पूरा करती हैं। इन घड़ियों का समय यह पन्ना ऊपर अपने आप दिखाता है।

कहाँ कैसे

हल षष्ठी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • छत्तीसगढ़

    यहाँ इसे कमरछठ कहते हैं। गली मोहल्ले की औरतें मिलकर सगरी बनाती हैं, यानी छोटा सा तालाब, उसमें मिट्टी की नाव छोड़ती हैं, और उसके पास शिव और पार्वती की पूजा करती हैं। इस दिन हल को छूना मना है, और औरतें हल चली ज़मीन पर पाँव भी नहीं रखतीं।

  • उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश

    यहाँ यह हरछठ और ललही छठ कहलाती है। शाम को मिट्टी की वेदी बनती है, उस पर हरछठ गाड़ा जाता है, यानी झरबेरी, कुश और पलाश की बँधी डालियाँ, और फिर ग्वालिन की कथा सुनी जाती है।

  • शेखावाटी, राजस्थान

    यहाँ यह दिन ऊब छठ या चना छठ कहलाता है, और इसका रूप अलग है। ब्याही औरतें पति की लंबी उम्र के लिए और कुँवारी लड़कियाँ अच्छे वर के लिए व्रत रखती हैं, सूरज डूबने से चाँद निकलने तक खड़ी रहती हैं, और फिर चाँद को अर्घ्य देती हैं।

  • ब्रज, बलदेव गाँव

    बलदेव गाँव के दाऊजी महाराज मंदिर में बलराम जयंती भादों शुक्ल की षष्ठी को होती है, गर्ग संहिता के हिसाब से। यानी ब्रज में हलधर का जन्मदिन इस दिन से पंद्रह दिन बाद आता है।

रीत

हल षष्ठी के दिन क्या करते हैं

  1. दीवार पर भैंस के गोबर से हलछठ माता, हल, सप्तऋषि, पशु और किसान के चित्र बनाए जाते हैं।
  2. हरछठ बनता है: झरबेरी, पलाश और गूलर की एक एक डाली एक साथ बाँधी जाती है, कहीं गूलर की जगह कुश, और उसे छोटे कुंड में या आटे से बने चौक में गाड़कर कच्चा सूत या जनेऊ लपेटा जाता है।
  3. लकड़ी की चौकी पर मिट्टी के गौरी गणेश, शिव और कार्तिकेय रखे जाते हैं, और मिट्टी के एक बर्तन में सात भुने अनाज और मेवे।
  4. सात अनाज चढ़ाए जाते हैं: गेहूँ, चना, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ, साथ में हल्दी से रँगा कपड़ा, सुहाग का सामान, चंदन, सिंदूर, फूल और फल।
  5. कलश पर छठी मैया का चित्र बनाया जाता है, भैंस के घी में सिंदूर मिलाकर, और मिट्टी के कुल्हड़ में ज्वार की लाई और महुआ भरा जाता है।
  6. हवन भी भैंस के दूध से बने मक्खन से होता है, गाय के नहीं।
  7. कथा के बाद बलराम और कृष्ण की आरती होती है, और सात अनाज का प्रसाद बच्चों को दिया जाता है।
  8. पूजा से लौटकर माँ बच्चों की पीठ पर पीली पोती मारती है, यानी हल्दी वाला कपड़ा छुआती है; कहीं वह बेटे की कमर से लगाया जाता है, रक्षा के लिए।

रसोई

हल षष्ठी का खाना

  • पसही चावल इसे पसहर या तिन्नी का चावल भी कहते हैं, जो बिना हल चलाए खेत की मेड़ पर या तालाब में अपने आप उगता है।
  • छह तरह की भाजी वे भाजियाँ जिनमें हल नहीं लगता, जैसे चरोटा, चेंच, मुनगा, कुम्हड़ा और चौलाई।
  • भैंस का दही और घी इस दिन गाय के दूध की जगह यही चलता है।
  • महुआ इसकी दातुन भी होती है, और यह पूजा के कुल्हड़ में भी भरा जाता है।
  • सात भुने अनाज पूजा का प्रसाद, जो बच्चों को बाँटा जाता है।

सवाल जवाब

हल षष्ठी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

हल षष्ठी 2027 कब है?

हल षष्ठी 2027 में 23 अगस्त, सोमवार को है। भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि 22 अगस्त, रात 8:46 से 23 अगस्त, रात 8:53 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

हल षष्ठी के व्रत में क्या खाएँ?

वही जो बिना हल के उगा हो: पसही या तिन्नी का चावल, तालाब में उगी चीज़ें, भाजियाँ और महुआ। दूध, दही और घी भैंस का लिया जाता है।

हल षष्ठी पर गाय का दूध क्यों नहीं पीते?

मान्यता है कि गाय का दूध उसके बछड़े का होता है, इसलिए इस दिन भैंस का दूध और दही लिया जाता है। व्रत की कथा में भी ग्वालिन का पाप यही था कि उसने गाय का दूध भैंस का बताकर बेचा।

हल षष्ठी का पारण कब करें?

छत्तीसगढ़ की रीत में शाम को, डूबते सूरज को अर्घ्य देकर और सूरज डूबने के बाद, पसहर चावल, छह भाजी और दही से। शेखावाटी में चाँद निकलने पर चाँद को अर्घ्य देकर व्रत पूरा होता है।

क्या हल षष्ठी के व्रत में पानी पी सकते हैं?

यह घर की रीत पर है। छत्तीसगढ़ में माँएँ सुबह से सूरज डूबने तक निर्जला रहती हैं, जबकि कई जगह व्रत पसही चावल और भैंस के दूध दही पर रखा जाता है।

हल षष्ठी का व्रत कौन रख सकता है?

ज़्यादातर माँएँ, अपने बच्चों की लंबी उम्र और सेहत के लिए। जिन्हें संतान की आस है, वे भी यह व्रत रखते हैं।

बलराम जयंती हल षष्ठी को है या भादों शुक्ल षष्ठी को?

दोनों मान्यताएँ हैं। बहुत से लोग भादों कृष्ण की हल षष्ठी को बलराम का जन्मदिन मानते हैं, जबकि गर्ग संहिता के हिसाब से ब्रज में बलराम जयंती भादों शुक्ल की षष्ठी को होती है।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Drik Panchang: Hala Shashthiतिथि का नियम, दूसरे नाम, क्या खाएँ क्या नहीं, पूजा की सामग्री, शेखावाटी, गर्ग संहिता और ब्रज
  2. Patrika: हर छठ, ललही छठ की कथाग्वालिन की पूरी कथा, व्रत के नियम, पसही चावल, महुए की दातुन, हरछठ की डालियाँ
  3. Patrika (Durg): कमरछठ, छत्तीसगढ़ का पारंपरिक पर्वसगरी और मिट्टी की नाव, निर्जला व्रत, छह भाजी, सूरज डूबने पर पारण
  4. Patrika (Bhilai): संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने की हलषष्ठी की पूजापसहर चावल, पीली पोती, पारण का खाना, कार्तिकेय वाली मान्यता, हल न छूना
  5. Navbharat Live: जन्माष्टमी से दो दिन पहले क्यों रखा जाता है हल छठ व्रतदीवार के चित्र, कुल्हड़ और महुआ, भैंस के मक्खन से हवन, गाय का दूध बछड़े का
  6. Srimad Bhagavata Mahapurana, Book 10, Chapter 2, 1 to 16 (Krishnakosh)देवकी का सातवाँ गर्भ, योगमाया, रोहिणी, संकर्षण, राम और बल नाम
  7. Srimad Bhagavatam, Canto 10, Chapter 2 (Vedabase)संकर्षण यानी शेष, बलभद्र नाम, मथुरा में गर्भ गिरने का रोना

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।