उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी
बहुला चतुर्थी 2027
Bahula Chaturthi 2027
आज गाय का दूध बछड़े का है।
बहुला चतुर्थी 2027 में 20 अगस्त, शुक्रवार को है। भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि 20 अगस्त, शाम 6:54 से 21 अगस्त, रात 8:05 तक है। चाँद रात 8:23 निकलेगा। समय नई दिल्ली के हैं।
खूँटे से बँधा बछड़ा बार बार गर्दन उठाकर रँभाता है।
शाम हो रही है। माँ अभी चरकर नहीं लौटी।
आज कोई बाल्टी लेकर थन के पास नहीं जाता।
आँगन में मिट्टी की एक गाय बनी है, उसके पास एक छोटा बछड़ा, और थोड़ा हटकर एक शेर।
औरतें दाहिनी मुट्ठी में चावल के दाने लिए कथा सुन रही हैं।
फिर धूल उड़ती है, घंटी बजती है। गाय लौट आई है।
बछड़ा दौड़कर थन से लग जाता है। कथा में भी एक गाय ऐसे ही लौटी थी, शेर से किया वादा निभाने।
2027 में कब
बहुला चतुर्थी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़20 अगस्त, शुक्रवार
तिथिभाद्रपद कृष्ण चतुर्थी20 अगस्त, शाम 6:54 से 21 अगस्त, रात 8:05 तक
नक्षत्रपूर्वा भाद्रपदसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 5:53
सूर्यास्तशाम 6:56
चंद्रोदयरात 8:23
- चंद्रोदय
- रात 8:23नई दिल्ली में चाँद निकलने का समय। बादल हों तो इसी समय अर्घ्य देते हैं।
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पहचान
बहुला चतुर्थी क्या है
बहुला चतुर्थी, जिसे बहुला चौथ भी कहते हैं, भादों यानी भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी है, उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के हिसाब से। गुजरात और महाराष्ट्र के अमांत पंचांग में यही दिन श्रावण कृष्ण चतुर्थी है, और गुजरात में इसे बोल चोथ कहते हैं। यह साल की चार बड़ी चतुर्थियों में गिनी जाती है, और संकष्टी की महीनेवार सूची में यह हेरंब गणेश की चौथ है। इस दिन गणेश के साथ गाय और बछड़े की पूजा होती है, और कई जगह कृष्ण की भी, क्योंकि कथा गाय बहुला की है, जो अपने बछड़े के लिए शेर से वादा करके लौटी थी। माँएँ यह व्रत अपने बच्चों की रक्षा और सुख के लिए रखती हैं। दिन भर उपवास होता है, शाम को गाय बछड़े की पूजा, और रात को चाँद को अर्घ्य देकर व्रत पूरा होता है। इस दिन गाय का दूध और उससे बनी चीज़ें नहीं ली जातीं, क्योंकि मान्यता है कि आज का दूध बस बछड़े का है। इसी दिन कैलेंडर में कजरी तीज भी है, जिसका अपना पन्ना है।
कथा
बहुला चतुर्थी की कथा
लोक में यह कथा यों सुनाई जाती है। एक ब्राह्मण के घर बहुला नाम की एक गाय थी, और उसका एक छोटा बछड़ा। गाय रोज़ चरने जाती और शाम को लौटती, और जिस दिन देर हो जाती, बछड़ा बेचैन होकर रँभाने लगता। एक दिन चरते चरते बहुला झुंड से बिछड़ गई और घने जंगल में बहुत दूर निकल गई।
वहाँ अचानक एक शेर सामने आ खड़ा हुआ। बहुला काँप गई, पर उसे सबसे पहले अपने बछड़े की याद आई। उसने शेर से कहा, मेरा बछड़ा सुबह से भूखा मेरी राह देख रहा है। मुझे जाने दो। मैं उसे दूध पिलाकर लौट आऊँगी, फिर मुझे खा लेना। शेर हँसा। शिकार ख़ुद लौटकर आएगा, यह किसने सुना है? तब बहुला ने सत्य और धर्म की सौगंध खाई, और शेर ने उसे जाने दिया।
बहुला दौड़ती हुई घर पहुँची, बछड़े को दूध पिलाया, और फिर उसी रास्ते जंगल लौट गई, ठीक उसी जगह जहाँ शेर उसकी राह देख रहा था। शेर उसे देखकर हैरान रह गया। उसकी सच्चाई के आगे उसने सिर झुका दिया और उसे घर जाने दिया। कहते हैं, उसी दिन से इस व्रत की रीत चली।
ब्रज में यही कथा थोड़ी और आगे जाती है। वहाँ कहते हैं कि बहुला कोई साधारण गाय नहीं थी: कामधेनु ख़ुद कृष्ण की लीला देखने बहुला बनकर नंद बाबा की गोशाला में आई थी, और नंद की गायों में सबसे अच्छी थी। कृष्ण उसे बहुत चाहते थे। उसकी परीक्षा लेने के लिए कृष्ण ने ही शेर का रूप धरा था। जब बहुला वादा निभाकर लौटी, तो कृष्ण अपने रूप में आए और वर दिया कि भादों के कृष्ण पक्ष की इस चौथ को तुम्हारी पूजा होगी, तुम गौमाता कहलाओगी, और कलियुग में घर घर पूजी जाओगी; जो यह व्रत रखेगा, उसे सुख, धन और संतान मिलेगी।
मथुरा से लगभग ग्यारह किलोमीटर पश्चिम, राधाकुंड और वृंदावन के बीच, बाटी गाँव में बहुलावन है, जिसे पद्म पुराण ब्रज के बारह वनों में गिनता है। वहाँ इस कथा का एक और रूप सुनाया जाता है: तालाब पर पानी पीती बहुला को एक बाघ पकड़ लेता है, और जब वह वादा निभाने लौटती है, तो उसका बछड़ा और उसका ब्राह्मण भी साथ चल पड़ते हैं, तीनों अपने को सौंपने को तैयार। तभी कृष्ण प्रकट होते हैं और तीनों को घर लौटाते हैं। वहाँ संकर्षण कुंड के किनारे के मंदिर में कृष्ण बहुला बिहारी के नाम से पूजे जाते हैं, बाघ, बहुला, बछड़े और ब्राह्मण के साथ।
व्रत
बहुला चतुर्थी का व्रत कैसे रखें
- सुबह जल्दी उठकर नहाते हैं, साफ़ कपड़े पहनते हैं और बच्चों के लिए व्रत का संकल्प लेते हैं।
- दिन भर उपवास रहता है; कहीं इसे बिना अन्न का दिन माना जाता है, और कहीं यह लगभग निर्जल रखा जाता है।
- गाय का दूध और उससे बनी कोई चीज़ नहीं लेते।
- कई घरों में गेहूँ और चावल से बनी चीज़ें भी नहीं खाते।
- रात को चाँद निकलने पर उसे अर्घ्य देते हैं, कई घरों में जल में दूध मिलाकर, और तब व्रत पूरा होता है।
पारण: व्रत कैसे खोलें
बहुला चतुर्थी का व्रत रात को चाँद निकलने पर उसे अर्घ्य देकर पूरा होता है; अर्घ्य के साथ ही व्रत पूरा माना जाता है, और कई घरों में अर्घ्य के जल में दूध मिलाते हैं। व्रत खोलने में गाय का दूध नहीं लेते, और बहुत से घरों में गेहूँ और चावल भी नहीं। जहाँ जौ और सत्तू चढ़ते हैं, वहाँ औरतें वही प्रसाद खाती हैं, और गुजरात में बाजरे का रोटला और मूँग खाते हैं। चाँद निकलने का समय यह पन्ना ऊपर दिखाता है।
कहाँ कैसे
बहुला चतुर्थी कहाँ कैसे मनाया जाता है
गुजरात
यहाँ यह बोल चोथ है, श्रावण कृष्ण चतुर्थी, और ब्याही हुई औरतें इसे बच्चों की सेहत और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। गाय का दूध और उससे बनी चीज़ें नहीं लेते, बहुत से घर गेहूँ भी नहीं खाते और उस दिन चाकू से कुछ नहीं काटते; खाने में बाजरे का रोटला और मूँग बनते हैं।
ब्रज, मथुरा के पास बहुलावन
बाटी गाँव के बहुलावन में बहुला बिहारी जी का पुराना मंदिर है, और बहुला कुंड भी। यहाँ बहुला गाय की कथा इसी धरती की कथा मानी जाती है।
उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत
यहाँ यह भादों की बहुला चौथ है, और पूजा शाम को गाय बछड़े के आगे होती है। कई जगह जौ और सत्तू भी चढ़ते हैं, और औरतें वही प्रसाद खाती हैं।
गाँव
गाँवों में यह दिन उन गाय बैलों के नाम है जो खेत जोतते हैं और दूध देते हैं।
रीत
बहुला चतुर्थी के दिन क्या करते हैं
- शाम को गाय और बछड़े की षोडशोपचार पूजा होती है, यानी सोलह चीज़ों वाली पूरी पूजा; जहाँ घर में गाय न हो, वहाँ मिट्टी की गाय और बछड़ा बनाते हैं।
- मिट्टी की गाय के साथ मिट्टी का एक शेर भी बनाते हैं, और उसकी भी पूजा होती है।
- तरह तरह के पकवान बनाकर पहले गणेश और कृष्ण को भोग लगाते हैं, फिर वही गाय और बछड़े को खिलाते हैं; गुजरात में अंकुरित मूँग या चने और घास भी।
- गाय बछड़े के साथ गणेश की भी पूरी पूजा होती है।
- पूजा के बाद दाहिने हाथ में चावल के दाने लेकर बहुला चौथ की कथा सुनते हैं।
- फिर गाय और बछड़े की परिक्रमा करके बच्चों के सुख और शांति के लिए प्रार्थना करते हैं।
- कुछ जगह शंख में दूध, सुपारी, गंध और अक्षत भरकर गणेश और चतुर्थी तिथि को अर्घ्य देते हैं।
सवाल जवाब
बहुला चतुर्थी 2027: पूछे जाने वाले सवाल
बहुला चतुर्थी 2027 कब है?
बहुला चतुर्थी 2027 में 20 अगस्त, शुक्रवार को है। भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि 20 अगस्त, शाम 6:54 से 21 अगस्त, रात 8:05 तक है। चाँद रात 8:23 निकलेगा। समय नई दिल्ली के हैं।
बहुला चौथ पर गाय का दूध क्यों नहीं पीते?
मान्यता है कि इस दिन गाय का दूध बस उसके बछड़े का होता है, जैसे कथा में बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाने लौटी थी। इसलिए इस दिन गाय का दूध और उससे बनी चीज़ें नहीं लेते।
बहुला चतुर्थी और बोल चोथ क्या एक ही हैं?
हाँ, दिन एक ही है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह भादों कृष्ण चतुर्थी है और बहुला चौथ कहलाती है; गुजरात के अमांत पंचांग में यही दिन श्रावण कृष्ण चतुर्थी है और बोल चोथ कहलाता है।
बहुला चतुर्थी पर क्या खाएँ?
दिन में उपवास, और व्रत खोलने में गाय का दूध नहीं; कई घरों में गेहूँ और चावल भी नहीं। कई जगह जौ और सत्तू चढ़कर वही खाया जाता है, और गुजरात में बाजरे का रोटला और मूँग।
बहुला चौथ का व्रत कौन रख सकता है?
ज़्यादातर माँएँ इसे बच्चों की रक्षा और सुख के लिए रखती हैं। कहा गया है कि जिनके संतान नहीं, वे भी संकट और रुकावटें दूर करने के लिए यह व्रत रख सकते हैं।
बहुला चौथ पर मिट्टी के शेर की पूजा क्यों होती है?
क्योंकि कथा में शेर भी है, जिसने बहुला की सच्चाई देखकर उसे छोड़ दिया; ब्रज की कथा में वह शेर ख़ुद कृष्ण थे।
बहुला चौथ और कजरी तीज एक ही दिन क्यों दिखते हैं?
कजरी तीज भादों कृष्ण तृतीया है और बहुला चौथ उसके अगले दिन की चतुर्थी। तिथियाँ दिन के बीच बदलती हैं, इसलिए कई बार दोनों एक ही तारीख़ पर आ जाती हैं। दोनों के पन्ने अलग हैं।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- भारतकोश: बहुला चतुर्थीतिथि, चार बड़ी चतुर्थियाँ, गेहूँ चावल न खाना, मिट्टी की गाय और शेर, जौ सत्तू, शंख से अर्घ्य, दोनों कथाएँ
- BhaktiBharat: बहुला चौथदूसरे नाम, दूध की चीज़ें न लेना, गणेश और कृष्ण को भोग, चावल हाथ में लेकर कथा, परिक्रमा
- Patrika: बहुला चौथ की कथा और पूजा विधिकामधेनु का बहुला बनकर नंद की गोशाला में आना, कृष्ण का वर, हेरंब संकष्टी नाम, दूध मिले जल से अर्घ्य
- Navbharat Live: बहुला गाय की पौराणिक कथागाय का दूध बछड़े का, मिट्टी की गाय और बछड़ा, चाँद को अर्घ्य
- Shubh Panchang: Bol Choth rituals, significance and vrat kathaगुजरात की बोल चोथ, अमांत श्रावण, गेहूँ और चाकू से परहेज़, बाजरे का रोटला और मूँग, अंकुरित अनाज
- Braj Rasik: Bahulavanबाटी गाँव का बहुलावन, मथुरा से दूरी, बहुला बिहारी मंदिर और बहुला कुंड
- The Gaudiya Treasures of Bengal: Bahulavan Bati, the tale of Bahula Bihariबाघ वाली कथा, बछड़ा और ब्राह्मण, संकर्षण कुंड का मंदिर
- Krishnakosh: Vanas of Brajपद्म पुराण के बारह वनों में बहुलावन
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।