पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · श्रावण शुक्ल द्वादशी

वरलक्ष्मी व्रत 2027

Varalakshmi Vrat 2027

एक कलश को साड़ी पहनाई जाती है, और घर में देवी आ जाती हैं।

वरलक्ष्मी व्रत 2027 में 13 अगस्त, शुक्रवार को है। श्रावण शुक्ल द्वादशी तिथि 13 अगस्त, रात 3:00 से 14 अगस्त, सुबह 5:22 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

वरलक्ष्मी व्रत का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

उस शाम का चाँद, 88 प्रतिशत रोशन

दहलीज़ से पूजा घर तक फ़र्श पर छोटे छोटे पैर बने हैं। देवी के पैर।

पीतल का एक कलश। भीतर चावल, सिक्के, हल्दी की गाँठ, पान।

ऊपर हल्दी से पीला किया नारियल। उस पर चाँदी का एक चेहरा: अम्मन मुगम्, यानी देवी का मुख।

कोई कलश को छोटी सी साड़ी पहनाती है। गले में सोने की चेन। नारियल के पास चूड़ियाँ।

पहले उसे दरवाज़े के बाहर एक थाली पर रखते हैं। औरतें गीत गाती हैं, बुलाने का गीत।

फिर उसे भीतर लाते हैं, धीरे धीरे, जैसे घर की कोई बड़ी बरसों बाद लौटी हो।

दीया जलता है। और कथा शुरू होती है एक ब्राह्मणी के सपने से।

2027 में कब

वरलक्ष्मी व्रत 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़13 अगस्त, शुक्रवार

तिथिश्रावण शुक्ल द्वादशी13 अगस्त, रात 3:00 से 14 अगस्त, सुबह 5:22 तक

नक्षत्रमूलसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:49

सूर्यास्तशाम 7:03

चंद्रोदयशाम 4:36

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शुभकामना

वरलक्ष्मी व्रत का शुभकामना कार्ड

वरलक्ष्मी व्रत का शुभकामना कार्ड: वरलक्ष्मी व्रत की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

वरलक्ष्मी व्रत क्या है

वरलक्ष्मी व्रत सावन के शुक्ल पक्ष में, पूर्णिमा से ठीक पहले वाले शुक्रवार को रखते हैं। वरलक्ष्मी यानी लक्ष्मी का वह रूप जो वर देती हैं, मुँह माँगी चीज़ देती हैं। इसे सुहागिनें, जिन्हें दक्षिण में सुमंगली कहते हैं, अपने और अपने घर के भले के लिए और पति की सेहत और लंबी उम्र के लिए रखती हैं। यह व्रत सबसे ज़्यादा कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में रखते हैं, और महाराष्ट्र के कुछ समुदायों में भी। तमिल में इसे वरलक्ष्मी नोन्बु कहते हैं (नोन्बु यानी व्रत), और कर्नाटक में वरमहालक्ष्मी व्रत। इस दिन की पहचान है कलश: उसे साड़ी, गहने और देवी का चेहरा पहनाकर वरलक्ष्मी बना देते हैं। अगर बीमारी या किसी और वजह से उस शुक्रवार पूजा न हो सके, तो नवरात्रि के शुक्रवार को कर लेने की बात कही गई है।

कथा

वरलक्ष्मी व्रत की कथा

स्कंद पुराण की परंपरा में यह कथा शिव पार्वती को सुनाते हैं। एक दिन पार्वती ने शिव से पूछा: कोई ऐसा व्रत बताइए जो औरतों का भला करे, जिससे घर में सुख और धन आए। शिव बोले: ऐसा व्रत है वरलक्ष्मी व्रत। और फिर उन्होंने चारुमती की कहानी सुनाई।

कुंडिन नाम के नगर में, जिसे कोई विदर्भ में बताता है और कोई मगध में, चारुमती नाम की एक ब्राह्मणी रहती थी। वह अपने पति और सास ससुर की सेवा बड़े मन से करती थी। एक रात उसके सपने में लक्ष्मी आईं। उन्होंने चारुमती की सेवा की बात कही, और कहा: सावन के शुक्ल पक्ष में, पूर्णिमा से पहले वाले शुक्रवार को, वरलक्ष्मी की पूजा करो। जो माँगोगी, मिलेगा। और देवी ने उसे पूजा की पूरी विधि भी बता दी।

सुबह उठकर चारुमती ने घरवालों को सपना सुनाया। सबने कहा: ज़रूर करो। बात नगर में फैल गई, और उस शुक्रवार नगर की बहुत सी औरतें सज धजकर चारुमती के साथ आ गईं। सबने मीठे पकवान बनाए, देवी के आगे रखे, और यह श्लोक पढ़ा: "पद्मासने पद्मकरे सर्वलोकैकपूजिते", यानी कमल पर विराजी, हाथ में कमल लिए, सारे लोकों में पूजी जाने वाली देवी। चारुमती ने कथा के अनुसार अपने दाएँ हाथ पर नौ धागों का तोरणम्, यानी पूजा का धागा, बाँधा।

फिर परिक्रमा शुरू हुई। पहली परिक्रमा पूरी हुई तो औरतों के शरीर पर गहने आ गए। दूसरी परिक्रमा में हाथों में नवरत्न के कंगन। तीसरी परिक्रमा पूरी हुई तो इतना धन कि सँभाले न सँभले, और घर लौटीं तो घर भी भरे मिले। औरतों ने पूजा कराने वाले पुरोहित को पान सुपारी और दक्षिणा दी, प्रसाद आपस में बाँटा, और चारुमती को धन्यवाद दिया। कहते हैं, तभी से हर बरस यह पूजा होती आई है।

कुछ घरों में एक और कथा भी सुनाते हैं। शिव और पार्वती चौसर खेल रहे थे, और खेल का फ़ैसला चित्रनेमि नाम के एक गण को करना था। पार्वती को उसका फ़ैसला ठीक नहीं लगा, और उन्होंने उसे कोढ़ का शाप दे दिया। फिर पार्वती ही बोलीं: जब तुम किसी तालाब के किनारे औरतों को यह व्रत करते देखोगे, तब यह शाप उतर जाएगा।

व्रत

वरलक्ष्मी व्रत का व्रत कैसे रखें

  1. एक दिन पहले ही पूजा की जगह साफ़ करके सारा सामान जुटा लेते हैं, ताकि शुक्रवार की पूजा बीच में न रुके।
  2. शुक्रवार को सूरज निकलने से पहले, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर, तेल लगाकर नहाते हैं और पारंपरिक कपड़े और गहने पहनते हैं।
  3. देवी के आगे वरलक्ष्मी व्रत का संकल्प लेते हैं।
  4. पूजा पूरी होने तक कुछ नहीं खाते; कई औरतें शाम तक बिना खाए रहती हैं।
  5. पूजा के आख़िर में वरलक्ष्मी की कथा पढ़ती हैं।
  6. अगली सुबह एक छोटी पूजा होती है, जिसे तमिल घरों में पुनर्पूजा कहते हैं, और उसके साथ व्रत पूरा माना जाता है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

वरलक्ष्मी व्रत में खाना पूजा पूरी होने के बाद ही खाते हैं। जो औरतें शाम तक व्रत रखती हैं, वे रात के खाने से व्रत खोलती हैं, और कई घरों में देवी के आगे रखा नैवेद्य ही रात का खाना बन जाता है: कोषुक्कट्टै, पायसम्, वडै, सुंडल। कुछ घरों में उस रात चावल वाला पूरा खाना नहीं खाते, हल्का नाश्ता लेते हैं। अगली सुबह फलों का नैवेद्य चढ़ाकर कलश हटाते हैं।

कहाँ कैसे

वरलक्ष्मी व्रत कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • तमिलनाडु

    यहाँ यह वरलक्ष्मी नोन्बु है। कलश पर चाँदी का अम्मन मुगम्, यानी देवी का चेहरा, लगाते हैं, और पूजा के बाद नोन्बु सरडु, यानी बीच में छोटा फूल बँधा पीला धागा, घर की कोई बड़ी सुहागिन दाएँ हाथ पर बाँधती है, फिर बाक़ी औरतों और लड़कियों को। अगले दिन पुनर्पूजा होती है और कलश को चावल के बर्तन में रख देते हैं, ताकि देवी अगली बार तक घर में ही रहें।

  • कर्नाटक

    यहाँ यह वरमहालक्ष्मी व्रत है। नौ गाँठों वाला पीला धागा पूजकर दाएँ हाथ पर बाँधते हैं, और देवी को ओब्बट्टु या होळिगे, यानी मीठी भरवाँ रोटी, चढ़ाते हैं। शुक्रवार शाम को कलश नहीं हिलाते, अगली सुबह ही उठाते हैं।

  • आंध्र प्रदेश और तेलंगाना

    तिरुचानूर के पद्मावती अम्मवारु मंदिर में इस दिन देवी को वरलक्ष्मी के रूप में सजाते हैं, और शाम को उन्हें सोने के रथ में घुमाते हैं। घरों में भी यही पूजा होती है, कलश और पीले धागे के साथ।

  • महाराष्ट्र के कुछ समुदाय

    महाराष्ट्र में भी कुछ समुदायों की सुहागिनें इस दिन यह व्रत रखती हैं।

रीत

वरलक्ष्मी व्रत के दिन क्या करते हैं

  1. घर धोकर साफ़ करते हैं, दरवाज़े पर आम के पत्ते बाँधते हैं, और कोलम, यानी चावल के आटे की रंगोली, बनाते हैं; दहलीज़ से पूजा घर तक देवी के पैर बनाते हैं।
  2. चाँदी या पीतल के कलश पर चंदन लगाकर उसमें पानी या चावल भरते हैं, और सिक्के, हल्दी की गाँठ, पान और सुपारी डालते हैं; मुँह पर आम के पत्ते, और ऊपर हल्दी लगा नारियल।
  3. नारियल पर हल्दी से देवी का चेहरा बनाते हैं, या चाँदी या पीतल का चेहरा लगाते हैं, और कलश को साड़ी, फूल और गहने पहनाते हैं।
  4. सजा हुआ कलश पहले दहलीज़ के बाहर एक थाली पर रखते हैं, और बुलाने का गीत गाकर भीतर लाते हैं और मंडप पर रखते हैं।
  5. पहले गणेश की पूजा होती है, फिर देवी की सोलह उपचारों वाली पूजा, और लक्ष्मी के एक सौ आठ या हज़ार नाम पढ़ते हैं।
  6. पीला धागा देवी के चरणों में रखकर पूजते हैं, फिर औरतें उसे अपने दाएँ हाथ पर बाँधती हैं।
  7. शाम को पड़ोस की औरतें मिलकर आरती करती हैं, और चूड़ियाँ, कुमकुम, पान, फल और फूल आपस में बाँटती हैं।
  8. कलश उठाने के बाद कहीं उसका पानी घर के चारों कोनों में छिड़कते हैं, और कहीं उसका नारियल अगले शुक्रवार की खीर में लगता है।

रसोई

वरलक्ष्मी व्रत का खाना

  • कोषुक्कट्टै चावल के आटे में नारियल भरकर बनी मिठाई; तमिल घरों में चार तरह की बनती है।
  • पायसम् दूध और चावल की खीर।
  • वडै दाल के वड़े, नैवेद्य की थाली में ज़रूर होते हैं।
  • सुंडल उबले चने, जो पूजा में आई औरतों को भी देते हैं।
  • ओब्बट्टु या होळिगे कर्नाटक में देवी को चढ़ने वाली मीठी भरवाँ रोटी।
  • पच्चरिसि इडली और अप्पम् तमिल घरों के नैवेद्य में।

सवाल जवाब

वरलक्ष्मी व्रत 2027: पूछे जाने वाले सवाल

वरलक्ष्मी व्रत 2027 कब है?

वरलक्ष्मी व्रत 2027 में 13 अगस्त, शुक्रवार को है। श्रावण शुक्ल द्वादशी तिथि 13 अगस्त, रात 3:00 से 14 अगस्त, सुबह 5:22 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

वरलक्ष्मी व्रत किस दिन रखते हैं?

सावन के शुक्ल पक्ष में, पूर्णिमा से ठीक पहले वाले शुक्रवार को। अगर उस दिन पूजा न हो सके, तो नवरात्रि के शुक्रवार को करने की बात कही गई है।

वरलक्ष्मी व्रत में क्या खा सकते हैं?

पूजा पूरी होने तक कुछ नहीं खाते, और कई औरतें शाम तक व्रत रखती हैं। उसके बाद देवी का नैवेद्य, जैसे कोषुक्कट्टै, पायसम् और वडै, खाते हैं।

क्या कुँवारी लड़कियाँ वरलक्ष्मी व्रत रख सकती हैं?

यह व्रत ज़्यादातर सुहागिनें रखती हैं। पर तमिल घरों में पूजा के बाद घर की बड़ी सुहागिन कुँवारी लड़कियों के हाथ पर भी नोन्बु सरडु बाँधती है, और जो पूजा न करें वे लक्ष्मी के स्तोत्र पढ़ सकते हैं।

नोन्बु सरडु क्या है?

पीला धागा, जिसके बीच में एक छोटा फूल बँधा होता है। पूजा में इसे देवी के चरणों में रखते हैं और फिर दाएँ हाथ पर बाँधते हैं। कर्नाटक में इसमें नौ गाँठें होती हैं।

वरलक्ष्मी व्रत के कलश का अगले दिन क्या करें?

अगली सुबह छोटी पूजा करके कलश उठाते हैं। तमिल घरों में उसे चावल के बर्तन में रख देते हैं, और कुछ घरों में उसका पानी घर के चारों कोनों में छिड़कते हैं।

वरलक्ष्मी व्रत की कथा किस पुराण से है?

परंपरा इसे स्कंद पुराण से जोड़ती है, जहाँ शिव पार्वती को चारुमती की कथा सुनाते हैं। इसमें चारुमती को सपने में लक्ष्मी यह व्रत बताती हैं।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Hindu Blog: Story of Varalakshmi Vratamस्कंद पुराण, शिव और पार्वती का संवाद, चारुमती का सपना और पूजा
  2. Madhwasakha: Varalakshmi Poojaविदर्भ का कुंडिन नगर, तीन परिक्रमाएँ और उनके फल, नौ धागों का तोरणम्, चित्रनेमि की कथा, नवरात्रि का शुक्रवार
  3. iKolam: Varalakshmi Virathamमगध का कुंडिन नगर, घरवालों की हामी, नगर की औरतें, पद्मासने श्लोक, शाम तक व्रत, नोन्बु का धागा, रात के खाने से पारण
  4. Wikipedia: Varalakshmi Vratamवरलक्ष्मी का अर्थ, सुमंगली, कलश की सजावट, दहलीज़ पर स्वागत, पीला धागा, तमिल नैवेद्य, कलश को चावल में रखना
  5. Subbus Kitchen: Varalakshmi Vratham poojaअम्मन मुगम्, नोन्बु सरडु, तेल स्नान, नैवेद्य, हल्का रात का खाना, पुनर्पूजा, नारियल की खीर
  6. Hindu Blog: Varalakshmi Vratham nombu rulesपूजा तक व्रत, देवी के पैर, शाम की आरती, बाँटने की चीज़ें, तिरुचानूर, महाराष्ट्र के समुदाय, वडै और आम वाले चावल
  7. SmartPuja: Vara Mahalakshmi Vratनौ गाँठों वाला पीला धागा, ओब्बट्टु और होळिगे, अगली सुबह कलश उठाना
  8. Boldsky: Varalakshmi Vratam puja rituals and kathaएक दिन पहले की तैयारी, ब्रह्म मुहूर्त, गणेश पूजा पहले, अगले दिन कलश का पानी चारों कोनों में

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।