उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · कार्तिक अमावस्या
दीपावली 2027
Diwali 2027
एक ही अमावस। कोई राम के लिए दीया रखता है, कोई महावीर के लिए, कोई गुरु के लिए।
इस बरस (2026) दीपावली 8 नवंबर, रविवार को है। दीपावली 2026: तारीख़, मुहूर्त और शुभकामना कार्ड · यह पन्ना 2027 का है।
दीपावली 2027 में 29 अक्टूबर, शुक्रवार को है। कार्तिक अमावस्या तिथि 28 अक्टूबर, रात 8:49 से 29 अक्टूबर, शाम 7:07 तक है। लक्ष्मी पूजा का सबसे शुभ समय शाम 6:36 से शाम 7:07 तक है (31 मिनट), जब प्रदोष काल, वृषभ लग्न और अमावस्या तीनों साथ हैं। समय नई दिल्ली के हैं।
हवा का एक झोंका आता है।
मुँडेर पर रखी सारी लौएँ एक साथ झुकती हैं, फिर सीधी हो जाती हैं।
नीचे पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछा है। उस पर लक्ष्मी और गणेश।
सूरज ढले देर नहीं हुई। दादी कहती हैं: बस, अब यही समय है।
सुबह गली के जैन मंदिर में निर्वाण का लाडू चढ़ा था।
और मोड़ वाले गुरुद्वारे पर आज दीपमाला है।
एक रात, और इतने दीये। हर लौ किसी और कथा के लिए जल रही है।
2027 में कब
दीपावली 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़29 अक्टूबर, शुक्रवार
तिथिकार्तिक अमावस्या28 अक्टूबर, रात 8:49 से 29 अक्टूबर, शाम 7:07 तक
नक्षत्रचित्रासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:31
सूर्यास्तशाम 5:39
चंद्रोदयसुबह 6:06
- लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त
- शाम 6:36 से शाम 7:07 तकप्रदोष काल, वृषभ लग्न और अमावस्या, तीनों एक साथ।
- प्रदोष काल
- शाम 5:39 से रात 8:03 तकसूर्यास्त के बाद के दो घंटे चौबीस मिनट।
- वृषभ लग्न
- शाम 6:36 से रात 8:32 तकस्थिर लग्न: जब पूर्व में वृषभ राशि उग रही हो।
- निशीथ काल
- 29 अक्टूबर, रात 11:39 से 30 अक्टूबर, रात 12:31 तकआधी रात के आसपास का मुहूर्त, रात के पंद्रह हिस्सों में आठवाँ।
अमावस्या 29 अक्टूबर की शाम 7:07 पर ख़त्म हो जाती है, इसलिए लक्ष्मी पूजा का सबसे शुभ समय छोटा है। प्रदोष काल और वृषभ लग्न उसके बाद भी चलते हैं, और कई घर उनमें पूजा करते हैं।
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शुभकामना
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पहचान
दीपावली क्या है
दीपावली कार्तिक महीने की अमावस्या की रात है (अमांत पंचांग में यही आश्विन की अमावस्या कहलाती है), और धनतेरस से भाई दूज तक के पाँच दिनों का बीच वाला दिन। इस रात घर घर लक्ष्मी पूजा होती है। नियम यह है कि पूजा प्रदोष काल में हो, यानी सूरज ढलने के बाद के उस पहर में, जब अमावस्या चल रही हो; और हो सके तो स्थिर लग्न में, यानी उस लग्न में जो अचल माना जाता है, जैसे वृषभ। मान्यता है कि स्थिर लग्न की पूजा से लक्ष्मी घर में टिकी रहती हैं। यह पन्ना दोनों समय ख़ुद निकालकर दिखाता है। एक ही रात को कई परंपराएँ अपनी अपनी वजह से रोशन करती हैं: हिंदू घर राम के लौटने और लक्ष्मी की याद में, जैन भगवान महावीर के निर्वाण की याद में, और सिख बंदी छोड़ दिवस के रूप में। बंगाल, ओड़िशा और असम में इसी रात काली पूजा होती है।
कथा
दीपावली की कथा
लोक में सबसे ज़्यादा सुनी जाने वाली कथा राम की है: चौदह बरस के वनवास और रावण पर जीत के बाद राम अयोध्या लौटे, और कहते हैं, नगर ने दीये जलाकर उनका स्वागत किया। पर यहाँ एक बात सच सच कहनी चाहिए। वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में भरत लौटते राम के लिए नगर सजवाते हैं: ज़मीन पर ठंडा पानी छिड़को, राजमार्ग पर फूल और सुगंध बिखेरो, गलियों में ऊँची पताकाएँ लगाओ, और सूरज उगने तक घरों को सजाओ। "समुच्छ्रितपताकास्तु रथ्याः पुरवरोत्तमे। शोभयन्तु च वेश्मानि सूर्यस्योदयनं प्रति॥" (युद्धकांड 127.8) यानी इस सबसे अच्छे नगर की गलियों में ऊँची पताकाएँ लगें, और सूरज उगने तक घर सजे रहें। राम के आने पर लोग हर घर पर झंडा चढ़ाते हैं। पर नगर भर में दीये जलाने की बात वाल्मीकि में नहीं है, और वे राम के लौटने को दीपावली से नहीं जोड़ते। दीयों वाला स्वागत लोक की परंपरा है।
दूसरी कथा लक्ष्मी की है। विष्णु पुराण में समुद्र मंथन की कथा है। एक बार ऋषि दुर्वासा की दी हुई एक माला, जिसमें श्री यानी लक्ष्मी का वास था, ज़मीन पर फेंक दी गई, और श्री समुद्र में समा गईं। फिर देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मथा, और उसमें से जो जो निकला, उसके साथ लक्ष्मी भी निकलीं, और उन्होंने विष्णु को अपना साथी चुना। कई जगह मान्यता है कि लक्ष्मी इसी दिन समुद्र से निकली थीं, और यह भी कि दीवाली की रात ही उन्होंने विष्णु को चुना था। इसीलिए आज की रात लक्ष्मी की पूजा की रात है।
जैन परंपरा में यह रात भगवान महावीर के निर्वाण की है। तिलोयपण्णत्ति कहती है कि कार्तिक के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के आख़िरी पहर, पावा नगरी में, वीर प्रभु सिद्ध हुए। श्वेतांबर कल्पसूत्र में आता है कि उस घड़ी देवताओं के उजाले से अँधेरा जगमगा उठा, और उसी अमावस को वैशाली के राजा चेटक और उनके साथी गणराजाओं ने दीये जलाए, यह कहकर कि ज्ञान का उजाला चला गया, अब हम मिट्टी के उजाले से रोशनी करेंगे। जैन आचार्य जिनसेन का हरिवंश पुराण, जो शक संवत 705 में रचा गया, इस त्योहार को दीपालिका कहता है: "ततस्तु लोकः प्रतिवर्षमादरात् प्रसिद्धदीपालिकयात्र भारते। समुद्यतः पूजयितुं जिनेश्वरं जिनेन्द्रनिर्वाणविभूतिभक्तिभाक्॥" यानी तभी से भारत के लोग हर बरस, बड़े आदर से, जिनेंद्र के निर्वाण की याद में, दीपालिका जलाकर जिनेश्वर की पूजा करते हैं।
सिख परंपरा में यह रात बंदी छोड़ दिवस है। छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी, को बादशाह जहाँगीर के समय ग्वालियर के क़िले में नज़रबंद किया गया। क़िले में बावन राजा क़ैद थे। जब गुरु जी की रिहाई हुई, तो उन्होंने उन बावन राजाओं को भी साथ छुड़ाया: गुरु जी के चोले की बावन कलियाँ थीं, और हर राजा एक कली थामकर क़िले से बाहर आया। इसीलिए गुरु जी को दाता बंदी छोड़ कहते हैं, यानी क़ैदियों को छुड़ाने वाले दाता। कुछ वृत्तांत कहते हैं कि छूटकर गुरु जी अमृतसर पहुँचे तो वहाँ दीवाली के दीये जल रहे थे। क़ैद और रिहाई के बरसों को लेकर पुराने लेखे एक राय नहीं हैं।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में दीपावली
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
वाल्मीकि रामायण
संस्कृत · Valmiki Ramayana
वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड के सर्ग 127 और 128 में राम का अयोध्या लौटना और राजतिलक है। सर्ग 127 में भरत शत्रुघ्न से कहते हैं कि राजमार्ग पर फूल और सुगंध बिखेरी जाए, ज़मीन पर ठंडा पानी छिड़का जाए, गलियों में पताकाएँ लगें और सूरज उगने तक घर सजे रहें; सर्ग 128 में राम के नगर में आते ही लोग हर घर पर झंडा चढ़ाते हैं। दीयों की बात इन सर्गों में बस एक जगह आती है, जब शत्रुघ्न के कहने पर सुग्रीव के ठहरने के घर में तेल के दीये पहुँचाए जाते हैं। यानी वाल्मीकि की अयोध्या फूलों, पानी और झंडों से सजती है; दीयों की कतार वाली दीवाली को इस लौटने से लोक परंपरा ने जोड़ा है।
पउमचरिय
प्राकृत, जैन परंपरा · Paumachariya
पउमचरिय सबसे पुरानी जैन रामकथा है, प्राकृत में, विमलसूरि की। इसके कवि अपनी रचना का समय भगवान महावीर के निर्वाण से गिनते हैं, और उसे निर्वाण के 530 बरस बाद का बताते हैं। जैन परंपरा का वीर निर्वाण संवत इसी निर्वाण से गिना जाता है, और उसका नया साल दीवाली के अगले दिन से शुरू होता है। यानी जिस रात की याद में जैन मंदिरों में दीये जलते हैं, उसी रात से यह रामकथा अपनी उम्र गिनती है।
सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में
कहाँ कैसे
दीपावली कहाँ कैसे मनाया जाता है
उत्तर भारत के घर
घर घर लक्ष्मी और गणेश की पूजा होती है, सूरज ढलने के बाद, जब तक अमावस्या चल रही हो। फिर देहरी से छत तक दीये जलते हैं।
गुजरात
गुजराती व्यापारी परिवार दीवाली की पूजा में चोपड़ा पूजन करते हैं: लक्ष्मी के सामने नए बही खाते खोले जाते हैं, उन पर शुभ और लाभ लिखा जाता है और स्वस्तिक बनता है। अगली सुबह गुजरात का नया साल है।
पावापुरी, बिहार
जैन इस दिन बिहार के पावापुरी और नालंदा जाकर प्रार्थना करते हैं। सुबह मंदिरों में महावीर को निर्वाण लाडू चढ़ता है, उत्तराध्ययन सूत्र का पाठ होता है, जिसमें महावीर की आख़िरी सीख मानी जाती है, और श्वेतांबर जैन दो दिन का उपवास रखते हैं। ज़्यादातर जैन पटाखे नहीं छोड़ते, ताकि कोई जीव न मरे।
अमृतसर
बंदी छोड़ दिवस पर हरमंदर साहिब का पूरा परिसर हज़ारों रोशनियों से जगमगाता है। दीये जलते हैं, आतिशबाज़ी होती है, नगर कीर्तन निकलता है, लंगर चलता है, और कीर्तन और अखंड पाठ होते हैं।
ग्वालियर
ग्वालियर के क़िले में, जहाँ गुरु हरगोबिंद साहिब जी नज़रबंद रहे, गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़ साहिब है।
बंगाल, ओड़िशा और असम
यहाँ इसी अमावस की रात लक्ष्मी की जगह काली की पूजा होती है, आधी रात को। उसका अपना पन्ना है।
रीत
दीपावली के दिन क्या करते हैं
- पूजा की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाते हैं, और उस पर लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियाँ रखते हैं।
- मूर्तियों को रेशमी कपड़े और गहने पहनाते हैं।
- पूजा प्रदोष काल में होती है, सूरज ढलने के बाद, जब अमावस्या चल रही हो।
- हो सके तो पूजा स्थिर लग्न में करते हैं, जैसे वृषभ लग्न, जो दीवाली पर अक्सर प्रदोष काल के भीतर पड़ता है।
- कुछ लोग आधी रात के महानिशीथ काल में भी पूजा करते हैं, पर पंचांग इसे तंत्र साधकों और जानकार पंडितों के लिए बताते हैं; आम घरों के लिए प्रदोष काल।
- व्यापारी परिवार लक्ष्मी के सामने नए बही खाते खोलते हैं, जिसे चोपड़ा पूजन कहते हैं।
- घर, देहरी और मुँडेर पर दीयों की कतारें जलती हैं।
रसोई
दीपावली का खाना
- निर्वाण लाडू दीवाली की सुबह जैन मंदिरों में भगवान महावीर को चढ़ने वाला लड्डू।
सवाल जवाब
दीपावली 2027: पूछे जाने वाले सवाल
दीपावली 2026 में कब है?
दीपावली 2026 में 8 नवंबर, रविवार को है। इस बरस की तिथि, मुहूर्त और शुभकामना कार्ड दीपावली 2026 के पन्ने पर हैं। यह पन्ना 2027 का है।
दीपावली 2027 कब है?
दीपावली 2027 में 29 अक्टूबर, शुक्रवार को है। कार्तिक अमावस्या तिथि 28 अक्टूबर, रात 8:49 से 29 अक्टूबर, शाम 7:07 तक है। लक्ष्मी पूजा का सबसे शुभ समय शाम 6:36 से शाम 7:07 तक है (31 मिनट), जब प्रदोष काल, वृषभ लग्न और अमावस्या तीनों साथ हैं। समय नई दिल्ली के हैं।
दीवाली पर लक्ष्मी पूजा किस समय करनी चाहिए?
पंचांग के नियम से प्रदोष काल में, यानी सूरज ढलने के बाद, जब अमावस्या चल रही हो। सबसे अच्छा वह समय माना जाता है जब प्रदोष के भीतर स्थिर लग्न भी हो। यह पन्ना दोनों समय दिखाता है।
स्थिर लग्न क्या होता है?
स्थिर यानी जो अपनी जगह से न हिले। वृषभ जैसे लग्न स्थिर माने जाते हैं, और मान्यता है कि इस लग्न में पूजा करने से लक्ष्मी घर में टिकी रहती हैं।
क्या वाल्मीकि रामायण में अयोध्या में दीये जलाने का ज़िक्र है?
नहीं। युद्धकांड में भरत नगर को फूलों, सुगंध, पानी और पताकाओं से सजवाते हैं, और लोग हर घर पर झंडे चढ़ाते हैं, पर नगर भर में दीयों की बात नहीं है। राम के लौटने को दीयों से जोड़ना लोक परंपरा है।
जैन धर्म में दीवाली क्यों होती है?
जैन परंपरा में यह भगवान महावीर के निर्वाण की रात है। कल्पसूत्र के अनुसार उनके जाने के बाद राजाओं ने दीये जलाए: ज्ञान का उजाला चला गया, तो मिट्टी के दीयों से उजाला किया।
बंदी छोड़ दिवस क्या है?
यह सिखों का दिन है, जब छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी, ग्वालियर के क़िले से छूटे और अपने साथ बावन क़ैदी राजाओं को भी छुड़ा लाए। यह अक्सर दीवाली की रात ही पड़ता है।
पुराने ग्रंथों में दीवाली का ज़िक्र कहाँ मिलता है?
सातवीं सदी में राजा हर्ष के नाटक नागानंद में इसे दीपप्रतिपदुत्सव कहा गया है, जब दीये जलते थे और नए जोड़ों को उपहार मिलते थे। जैन आचार्य जिनसेन के हरिवंश पुराण (शक संवत 705) में इसका नाम दीपालिका है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda, Sarga 127भरत का नगर सजवाना: फूल, सुगंध, ठंडा पानी, पताकाएँ, सूरज उगने तक घर; दीयों का ज़िक्र नहीं
- Valmiki Ramayana, Yuddha Kanda, Sarga 128हर घर पर झंडे, राजतिलक, सुग्रीव के घर तेल के दीये
- Lakshmi Puja timings (Drik Panchang)प्रदोष काल, स्थिर लग्न और वृषभ, महानिशीथ काल, लाल कपड़ा, लक्ष्मी गणेश, चोपड़ा पूजन
- Diwali (Wikipedia)लक्ष्मी के समुद्र से निकलने और विष्णु को चुनने की मान्यता, नागानंद, बंगाल में काली
- Samudra manthan (Wikipedia)विष्णु पुराण की कथा, दुर्वासा की माला, श्री का समुद्र में समाना, लक्ष्मी का विष्णु को चुनना
- Diwali (Jainism) (Wikipedia)कल्पसूत्र के दीये, पावापुरी, निर्वाण लाडू, उत्तराध्ययन सूत्र, उपवास, पटाखे नहीं, वीर निर्वाण संवत
- Lord Mahavira's Nirvana: Diwaliराजा चेटक और गणराजाओं के दीये, तिलोयपण्णत्ति का पाठ, हरिवंश पुराण का श्लोक, वाल्मीकि और मानस में दीवाली का न होना
- Bandi Chhor Divas (Wikipedia)ग्वालियर का क़िला, बावन राजा और चोला, अमृतसर, हरमंदर साहिब की रोशनी, गुरुद्वारा दाता बंदी छोड़, बरसों पर मतभेद
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।