उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · आश्विन पूर्णिमा
कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2027
Kojagari Lakshmi Puja 2027
आज की रात लक्ष्मी एक ही सवाल पूछती हैं: कौन जाग रहा है?
कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2027 में 14 अक्टूबर, गुरुवार को है। आश्विन पूर्णिमा तिथि 14 अक्टूबर, शाम 6:50 से 15 अक्टूबर, शाम 7:17 तक है। निशीथ काल की पूजा 14 अक्टूबर, रात 11:42 से 15 अक्टूबर, रात 12:32 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
उँगली पिसे चावल के घोल में डूबती है।
फ़र्श पर दो छोटे पैर उभरते हैं। फिर दो और। सब भीतर की ओर।
दरवाज़े से पूजा के कोने तक। सीढ़ी के हर पायदान पर भी।
शाम को शंख बजता है। औरतों के गले से उलू की आवाज़ उठती है।
थाली में खील है, नारियल के लड्डू हैं, और एक कटोरी में नारियल पानी।
आधी रात हो गई। कोई सो नहीं रहा। कोई पाँचाली पढ़ रहा है, बच्चे उसे घेरकर सुन रहे हैं।
कहते हैं, आज रात लक्ष्मी घर घर झाँककर पूछती हैं: को जागर्ति? कौन जाग रहा है?
हर घर अपनी तरह जवाब देता है। कोई दीये से, कोई पाँचाली से, कोई पासे की एक चाल से।
2027 में कब
कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़14 अक्टूबर, गुरुवार
तिथिआश्विन पूर्णिमा14 अक्टूबर, शाम 6:50 से 15 अक्टूबर, शाम 7:17 तक
नक्षत्रउत्तरा भाद्रपदसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:21
सूर्यास्तशाम 5:53
चंद्रोदयशाम 4:57
- निशीथ काल
- 14 अक्टूबर, रात 11:42 से 15 अक्टूबर, रात 12:32 तकआधी रात के आसपास का मुहूर्त, रात के पंद्रह हिस्सों में आठवाँ।
पूर्णिमा तिथि 14 अक्टूबर की शाम 6:50 से 15 अक्टूबर की शाम 7:17 तक है। कोजागरी पूजा आधी रात, निशीथ काल में होती है, और उस घड़ी पूर्णिमा 14 अक्टूबर की रात को है। शरद पूर्णिमा की खीर भी इसी रात रखी जाती है।
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पहचान
कोजागरी लक्ष्मी पूजा क्या है
कोजागरी लक्ष्मी पूजा आश्विन महीने की पूर्णिमा की रात होने वाली लक्ष्मी पूजा है। बंगाल, ओड़िशा और असम में लक्ष्मी की बड़ी पूजा दीवाली की अमावस्या पर नहीं, इसी पूर्णिमा पर होती है। नियम यह है कि जिस दिन पूर्णिमा तिथि निशीथ काल में हो, यानी आधी रात के समय, वही दिन इस पूजा का माना जाता है। नाम संस्कृत के 'को जागर्ति' से जुड़ा है, जिसका मतलब है 'कौन जाग रहा है?', और इसी वजह से यह रात जागकर काटी जाती है। देश के बाक़ी हिस्सों में यही पूर्णिमा शरद पूर्णिमा कहलाती है, ओड़िशा में कुमार पूर्णिमा, और मिथिला में इसे कोजागरा कहते हैं। इसे कौमुदी व्रत भी कहते हैं, क्योंकि आश्विन की पूर्णिमा का एक नाम कौमुदी है।
कथा
कोजागरी लक्ष्मी पूजा की कथा
मान्यता है कि लक्ष्मी इसी पूर्णिमा को प्रकट हुई थीं, इसलिए मिथिला में और कई घरों में इसे उनके जन्म का दिन माना जाता है। और लोक में कहते हैं कि इसी रात वे धरती पर उतरकर घूमती हैं। वे घर घर देखती हैं कि कहाँ सफ़ाई है, कहाँ दीया जल रहा है, और कौन जाग रहा है। जो जागता मिलता है, उसके घर वे रुक जाती हैं और उसे धन देती हैं।
स्कंद पुराण के हवाले से कहा जाता है कि कोजागर व्रत सबसे अच्छा व्रत है। इसकी कथा वालखिल्य ऋषि की सुनाई हुई मानी जाती है। मगध में वलित नाम का एक ग़रीब ब्राह्मण रहता था। भक्त था, पर घर में चैन नहीं था, क्योंकि पत्नी उसकी हर बात का उलटा करती थी। एक दिन घर के झगड़े से तंग आकर वलित घर छोड़कर जंगल की ओर निकल गया। वह आश्विन की पूर्णिमा की रात थी।
जंगल में उसे तीन नागकन्याएँ मिलीं। वे कोजागर का व्रत कर रही थीं, रात भर जागकर। वलित भी उनके साथ जागा, और उनके साथ पासे खेलने लगा। पहले तो उसके पास जो थोड़ा बहुत था, वह भी हार गया। फिर बाज़ी पलटी। लक्ष्मी की कृपा से वह जीतता गया, जीतता गया, और जब घर लौटा तो धनवान होकर लौटा। इसीलिए कहा जाता है कि इस रात चौसर का खेल और नारियल का पानी लक्ष्मी को अच्छा लगता है।
लोक में एक और कथा कही जाती है। एक राजा ने बाज़ार से अलक्ष्मी की मूर्ति ख़रीद ली, यानी लक्ष्मी की उस बहन की, जो घर में ग़रीबी लाती है। देखते देखते राजा का सब कुछ चला गया। बस धर्म उसके साथ रुका रहा, और उसने राजा से कहा कि रात को जागते रहना। फिर कोजागरी की रात रानी ने लक्ष्मी की पूजा की। उसी रात वह मूर्ति गल गई, और राजा का भाग लौट आया।
कहाँ कैसे
कोजागरी लक्ष्मी पूजा कहाँ कैसे मनाया जाता है
पश्चिम बंगाल
घर घर लक्खी पूजो होती है: फ़र्श पर आलपना के पैर, सरा पर बनी लक्ष्मी या धान से भरी टोकरी, शंख और उलू, और रात को लक्खीर पाँचाली। पूर्व बंगाल से आए कई परिवार मूर्ति की जगह मिट्टी का वह घड़ा पूजते हैं जिस पर दुर्गा और उनके बच्चे बने होते हैं।
ओड़िशा
यह रात यहाँ कुमार पूर्णिमा है। कुँवारी लड़कियाँ कार्तिकेय की पूजा करती हैं, जिनका एक नाम कुमार है; सुबह सूरज को फूलों वाला जल चढ़ाती हैं और शाम को पूरे चाँद को चंदा नाम का आधे चाँद जैसा प्रसाद, जो केले, छेने और नारियल से बनता है। गाँवों में पुची का खेल खेला जाता है, और तुलसी के आगे चावल के घोल से झोटी बनाई जाती है।
ढेंकानाल और केंद्रपाड़ा, ओड़िशा
कुमार पूर्णिमा से गजलक्ष्मी पूजा शुरू होती है; गज यानी हाथी, और गजलक्ष्मी वे लक्ष्मी जिनके साथ हाथी हों। ढेंकानाल में यह ग्यारह दिन चलती है और इसकी शुरुआत वहाँ 1923 में बताई जाती है; केंद्रपाड़ा में यह सात दिन चलकर विसर्जन पर पूरी होती है।
मिथिला, बिहार
कोजागरा नई शादी वाले दूल्हे का पर्व है। ससुराल से पान, मखाना, बताशे, मिठाई, फल और कपड़े आते हैं, और मिठाई की टोकरी अरिपन पर रखी जाती है; अरिपन यानी आँगन में चावल के घोल, हल्दी और सिंदूर से बनी आकृति। दूल्हे का चुमावन होता है, बड़े आशीर्वाद देते हैं, औरतें गीत गाती हैं, और दूल्हा अपने साले के साथ पचीसी खेलता है।
असम
बंगाल और ओड़िशा की तरह यहाँ भी आश्विन की यह पूर्णिमा लक्ष्मी पूजा की बड़ी रात है।
रीत
कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दिन क्या करते हैं
- घर साफ़ किया जाता है, और कई घरों में लोग सूरज निकलने से पहले उठकर लक्ष्मी को उनके आसन पर रखते हैं।
- घर की औरतें चावल या धान के दाने के सफ़ेद घोल में कपड़ा या रुई डुबोकर आलपना बनाती हैं: दरवाज़े से पूजा की जगह तक छोटे पैरों की जोड़ियाँ, भीतर की ओर जाती हुई, और साथ में धान की बाली जैसी लहरदार बेल।
- पूजा के लिए मूर्ति रखी जाती है, या लक्खी सरा, यानी मिट्टी की गोल थाली जिस पर लक्ष्मी बनी हों, या आम के पत्तों वाला घट, या धान से भरी छोटी टोकरी।
- पूजा की शुरुआत और अंत में शंख बजता है, और औरतें उलू देती हैं, यानी जीभ हिलाकर निकाली जाने वाली वह शुभ आवाज़ जो बंगाल की हर पूजा में सुनाई देती है।
- लक्खीर पाँचाली पढ़ी जाती है, लक्ष्मी की व्रत कथा सीधे सादे छंदों में, जिसमें उन घरों की कहानियाँ हैं जिनका भाग लापरवाही और झगड़े से चला गया और भक्ति और सफ़ाई से लौट आया।
- रात भर दीये जलते रहते हैं; लोग गाते हैं, खेलते हैं, पोथी पढ़ते हैं, और आधी रात को नारियल पानी पिया और चढ़ाया जाता है।
- कई घर भोग का कुछ हिस्सा रात भर चाँदनी में छोड़ देते हैं।
रसोई
कोजागरी लक्ष्मी पूजा का खाना
- खिचुड़ी चावल और दाल की खिचड़ी, जो भोग के लिए पकती है।
- लाबड़ा कई सब्ज़ियों को मिलाकर बनी बंगाल की सब्ज़ी।
- नारकेल नाड़ू नारियल के छोटे लड्डू।
- तिल नाड़ू तिल के लड्डू।
- खील और मुड़ी भुने धान की खील और मुरमुरे से बनी चीज़ें।
- पायेश दूध और चावल की खीर, भोग की मिठाई।
- नारियल पानी आधी रात को, लक्ष्मी के लिए भी और जागने वालों के लिए भी।
- चंदा ओड़िशा में कुमार पूर्णिमा पर चाँद को चढ़ने वाला, केले, छेने और नारियल का आधे चाँद जैसा प्रसाद।
- मखाना और बताशे मिथिला के कोजागरा में पान के साथ बँटने वाला प्रसाद।
सवाल जवाब
कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2027: पूछे जाने वाले सवाल
कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2027 कब है?
कोजागरी लक्ष्मी पूजा 2027 में 14 अक्टूबर, गुरुवार को है। आश्विन पूर्णिमा तिथि 14 अक्टूबर, शाम 6:50 से 15 अक्टूबर, शाम 7:17 तक है। निशीथ काल की पूजा 14 अक्टूबर, रात 11:42 से 15 अक्टूबर, रात 12:32 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
कोजागरी का मतलब क्या है?
यह नाम संस्कृत के 'को जागर्ति' से जुड़ा है, यानी 'कौन जाग रहा है?'। मान्यता है कि इस रात लक्ष्मी यही पूछती हुई धरती पर घूमती हैं और जो जागता मिले, उसे धन देती हैं।
कोजागरी लक्ष्मी पूजा और दीवाली की लक्ष्मी पूजा में क्या फ़र्क़ है?
बंगाल, ओड़िशा और असम में लक्ष्मी आश्विन की पूर्णिमा की रात पूजी जाती हैं, जो कोजागरी है। देश के ज़्यादातर हिस्सों में लक्ष्मी पूजा दीवाली की अमावस्या की रात होती है।
कोजागरी पूजा में आलपना से लक्ष्मी के पैर क्यों बनाते हैं?
मान्यता है कि लक्ष्मी रात को हर घर आती हैं और उन कमरों में जाती हैं जहाँ उनके पैर बने हों। इसीलिए पैर भीतर की ओर बनते हैं, और पूरे घर में, सीढ़ियों तक पर बनाए जाते हैं।
कोजागरी की रात जागते क्यों हैं?
कहते हैं कि लक्ष्मी उसी घर रुकती हैं जो साफ़ हो, जिसमें दीया जल रहा हो और जिसके लोग जाग रहे हों। इसलिए लोग रात भर दीये जलाए रखते हैं, गाते हैं, खेलते हैं और पाँचाली पढ़ते हैं।
कोजागर व्रत की कथा क्या है?
मगध के ग़रीब ब्राह्मण वलित की कथा कही जाती है, जो घर के झगड़े से तंग आकर आश्विन पूर्णिमा की रात जंगल चला गया। वहाँ उसने नागकन्याओं के साथ रात भर जागकर कोजागर व्रत किया, पासे में पहले हारा, फिर लक्ष्मी की कृपा से जीतकर धनवान होकर लौटा।
लक्खीर पाँचाली क्या है?
यह बांग्ला में लक्ष्मी की व्रत कथा है, सीधे छंदों में, जो पूजा के समय गाकर पढ़ी जाती है। इसमें बताया गया है कि लापरवाही और झगड़े से घर का भाग जाता है, और भक्ति, सफ़ाई, बड़ों के आदर और ईमानदारी से लौट आता है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Kojagara Puja: Drik Panchangनिशीथ वाला नियम, बंगाल, ओड़िशा और असम, कौमुदी नाम, वलित की कथा, नारियल पानी और चौसर
- Kojagiri Purnima: The Free Press Journalको जागर्ति, वलित और नागकन्याओं की कथा, अलक्ष्मी वाली कथा, आधी रात का नारियल पानी
- Alpana: The Ritual Art Of Bengal (Outlook Traveller)आलपना किससे और कौन बनाता है, जोड़ी पैर, सीढ़ियों तक पैर, धान की बाली वाली बेल, लक्ष्मी का रात को कमरों में आना
- Kojagari Lakshmi Puja: Bengali Puja Vidhi, Alpana, Bhog and Lakshmir Panchali (Hindutone)भीतर जाते पैर, सरा और घट, शंख और उलू, पाँचाली की बातें, भोग की चीज़ें
- All You Need To Know About Bengal's Kojagari Laxmi Puja (The Quint)सूरज से पहले उठकर आसन, घर की सफ़ाई, चाँदनी में छोड़ा भोग, पूर्व बंगाल के परिवारों का घड़ा
- Sharad Purnima Attains Regional Flavour Of Kojagara In Mithilanchal (ETV Bharat)मिथिला का कोजागरा: अरिपन, चुमावन, पचीसी, मखाना और पान, लक्ष्मी का जन्म दिन
- Kumar Purnima: Appeasing divinity for a virtuous groom (OrissaPOST)ओड़िशा की कुमार पूर्णिमा: कार्तिकेय, चंदा प्रसाद, पुची, झोटी
- Tracing the history of Laxmi Puja in Odisha (OdishaBytes)ढेंकानाल और केंद्रपाड़ा की गजलक्ष्मी पूजा, कितने दिन, कब से
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।