उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · आषाढ़ शुक्ल द्वितीया
रथ यात्रा 2027
Rath Yatra 2027
राजा के हाथ में झाड़ू, और रथ पर भगवान।
रथ यात्रा 2027 में 5 जुलाई, सोमवार को है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि 5 जुलाई, सुबह 4:51 से 6 जुलाई, रात 1:14 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
सोने की मूठ वाली एक झाड़ू लकड़ी के फ़र्श पर चलती है।
झाड़ने वाला कोई सेवक नहीं। पुरी के गजपति राजा हैं।
नीचे सड़क पर इतने लोग हैं कि ज़मीन नहीं दिखती।
तीन रथ, तीन रंग। सबसे ऊँचे पर लाल और पीला कपड़ा, नीचे सोलह पहिए।
इन रथों में एक भी लोहे की कील नहीं। हर बरस नए बनते हैं, अक्षय तृतीया से बढ़ई इन्हीं में लगे थे।
पत्थर का मंदिर पीछे छूटता है। आज भगवान सड़क पर हैं, लोगों के बीच।
रथ हिलते हैं, और भीड़ के साथ आगे सरकते हैं, गुंडिचा की ओर।
पुरी की ही एक ओड़िया रामकथा जगन्नाथ में राम को देखती है। आज वही राम, वही जगन्नाथ, सड़क पर हैं।
2027 में कब
रथ यात्रा 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़5 जुलाई, सोमवार
तिथिआषाढ़ शुक्ल द्वितीया5 जुलाई, सुबह 4:51 से 6 जुलाई, रात 1:14 तक
नक्षत्रपुनर्वसुसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 5:28
सूर्यास्तशाम 7:23
चंद्रोदयसुबह 6:31
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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शुभकामना
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पहचान
रथ यात्रा क्या है
रथ यात्रा पुरी, ओड़िशा का त्योहार है, जो आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को शुरू होता है और आषाढ़ शुक्ल दशमी तक चलता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने बड़े मंदिर, श्रीमंदिर, से निकलकर तीन अलग रथों पर लगभग दो मील दूर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। गुंडिचा को भगवान का बग़ीचे वाला घर और जन्म की जगह माना जाता है, और मंदिर की परंपरा उसे उनकी मौसी का घर भी कहती है। वहाँ लगभग सात दिन रुककर वे बाहुड़ा यात्रा में लौटते हैं। तीनों रथ हर बरस नए बनते हैं, और उनका बनना अक्षय तृतीया से शुरू होता है।
कथा
रथ यात्रा की कथा
कहते हैं, साल में एक बार भगवान अपने घर से निकलकर वहाँ जाते हैं जहाँ से वे आए थे। गुंडिचा को उनका जन्म स्थान और बग़ीचे वाला घर माना जाता है, और लोक में वह मौसी बाड़ी है, मौसी का घर। इसलिए यह यात्रा किसी राजा की सवारी नहीं, एक घर से दूसरे घर जाना है। और इसी दिन पुरी के गजपति राजा, जिन्हें भगवान का पहला सेवक माना जाता है, सोने की मूठ वाली झाड़ू से रथों को बुहारते हैं। इस रीत को छेरा पहंरा कहते हैं: भगवान के आगे राजा और रंक एक बराबर।
पर घर में कोई पीछे भी छूटा है। लक्ष्मी। आषाढ़ शुक्ल पंचमी को, हेरा पंचमी पर, महालक्ष्मी पालकी में ख़ुद गुंडिचा जाती हैं। उन्हें वहाँ सहमति की माला दी जाती है, और रस्म के तौर पर रथ का एक हिस्सा तोड़ा जाता है। फिर लक्ष्मी एक अलग रास्ते से, हेरा गोहिरी गली से, चुपचाप लौट आती हैं। यह कथा हर बरस इसी तरह, रस्म बनकर, खेली जाती है।
फिर लौटने का दिन आता है, बाहुड़ा। लौटते हुए रथ मौसी माँ के मंदिर के पास रुकते हैं, और वहाँ भगवान को पोडा पीठा चढ़ता है, जो उनका सबसे प्यारा माना जाता है। मंदिर पहुँचकर भी भगवान तुरंत भीतर नहीं जाते। रथों पर ही उन्हें सोने के गहनों से सजाया जाता है, जिसे सुना बेशा कहते हैं। परंपरा इसे राजा कपिलेंद्र देव से जोड़ती है, पंद्रहवीं सदी में।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में रथ यात्रा
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
जगमोहन रामायण
ओड़िया · Jagamohana Ramayana
जगमोहन रामायण पुरी की धरती की रामकथा है, ओड़िया में, जिसे बलराम दास ने लगभग 1500 ईस्वी में रचा। जिस छंद में यह लिखी है, उसके नाम पर इसे दांडी रामायण भी कहते हैं। ओड़िशा में यह घर घर की पोथी है, और इसकी एक पहचान यह है कि इसमें राम जगन्नाथ से जोड़े जाते हैं। यानी जिन जगन्नाथ का रथ आज बड़ी सड़क पर खिंचता है, पुरी की यह कथा उन्हीं में राम को भी देखती है। यह पूरी रामकथा है, लंका के बाद वाली सारला दास की विलंका रामायण से अलग।
कहाँ कैसे
रथ यात्रा कहाँ कैसे मनाया जाता है
श्रीमंदिर, पुरी
तीनों रथ मंदिर के पूरबी दरवाज़े, सिंहद्वार, के आगे खड़े किए जाते हैं, और तीनों देवता यहीं से रथों पर लाए जाते हैं।
रथ खला
मंदिर के बाहर बड़ी सड़क पर रथ बनाने का आँगन, जहाँ अक्षय तृतीया से मंदिर के बढ़ई तीनों रथ नए सिरे से बनाते हैं, बिना लोहे की कील के।
गुंडिचा मंदिर
श्रीमंदिर से लगभग दो मील दूर, जिसे भगवान का बग़ीचे वाला घर, जन्म स्थान और मौसी का घर कहा जाता है। तीनों देवता यहाँ लगभग सात दिन रहते हैं।
मौसी माँ मंदिर
बाहुड़ा पर लौटते रथ यहाँ रुकते हैं, और भगवान को पोडा पीठा चढ़ता है।
दसपल्ला और महानदी
रथों की लकड़ी के लट्ठे पुराने दसपल्ला राज से आते हैं; उन्हें बेड़ों की तरह महानदी में बहाकर पुरी के पास लाया जाता है।
रीत
रथ यात्रा के दिन क्या करते हैं
- तीनों रथ हर बरस फस्सी और धौरा जैसे तय पेड़ों की लकड़ी से नए बनते हैं, और उनमें लोहे की कील नहीं लगती।
- जगन्नाथ का रथ नंदीघोष है, जिसे गरुड़ध्वज भी कहते हैं: सोलह पहिए, लाल और पीला कपड़ा।
- बलभद्र का रथ तालध्वज है: चौदह पहिए, लाल और हरा कपड़ा, जिसे कुछ स्रोत नीला हरा कहते हैं।
- सुभद्रा का रथ दर्पदलन है, जिसे देवदलन भी कहते हैं: बारह पहिए, लाल और काला कपड़ा।
- देवताओं के रथ पर आ जाने के बाद गजपति राजा सोने की मूठ वाली झाड़ू से रथ बुहारते हैं और पूजा करते हैं; यह छेरा पहंरा है।
- रथ गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं, जहाँ देवता लगभग सात दिन रहते हैं; आषाढ़ शुक्ल पंचमी को हेरा पंचमी होती है।
- बाहुड़ा यात्रा में रथ लौटते हैं, मौसी माँ मंदिर पर पोडा पीठा चढ़ता है, और फिर रथों पर ही सुना बेशा होता है।
रसोई
रथ यात्रा का खाना
- पोडा पीठा जगन्नाथ का सबसे प्यारा माना जाने वाला पीठा, जो बाहुड़ा पर मौसी माँ मंदिर में चढ़ता है।
सवाल जवाब
रथ यात्रा 2027: पूछे जाने वाले सवाल
रथ यात्रा 2027 कब है?
रथ यात्रा 2027 में 5 जुलाई, सोमवार को है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि 5 जुलाई, सुबह 4:51 से 6 जुलाई, रात 1:14 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
पुरी के तीन रथों के नाम क्या हैं?
जगन्नाथ का नंदीघोष, बलभद्र का तालध्वज, और सुभद्रा का दर्पदलन। नंदीघोष में सोलह पहिए होते हैं, तालध्वज में चौदह, और दर्पदलन में बारह।
छेरा पहंरा क्या है?
रथ यात्रा के दिन पुरी के गजपति राजा, जो भगवान के पहले सेवक माने जाते हैं, सोने की मूठ वाली झाड़ू से तीनों रथ बुहारते हैं। यह भगवान के आगे सबके बराबर होने का निशान है।
गुंडिचा मंदिर क्या है और भगवान वहाँ क्यों जाते हैं?
गुंडिचा मंदिर श्रीमंदिर से लगभग दो मील दूर है। इसे भगवान का बग़ीचे वाला घर, जन्म स्थान और मौसी का घर माना जाता है, और देवता वहाँ लगभग सात दिन रहते हैं।
बाहुड़ा यात्रा क्या है?
गुंडिचा से श्रीमंदिर की वापसी की रथ यात्रा। रास्ते में रथ मौसी माँ मंदिर पर रुकते हैं, जहाँ भगवान को पोडा पीठा चढ़ता है।
हेरा पंचमी क्या है?
आषाढ़ शुक्ल पंचमी को महालक्ष्मी पालकी में गुंडिचा जाती हैं, रस्म के तौर पर रथ का एक हिस्सा तोड़ा जाता है, और वे एक अलग गली से चुपचाप लौट आती हैं।
पुरी के रथ किस लकड़ी से बनते हैं?
रथ हर बरस फस्सी और धौरा जैसे तय पेड़ों की लकड़ी से नए बनते हैं। लट्ठे दसपल्ला से महानदी के रास्ते आते हैं, और रथों में लोहे की कील नहीं लगती।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Rath Yatra (Incredible India, Ministry of Tourism)आषाढ़ की द्वितीया, गुंडिचा दो मील, बग़ीचे वाला घर और जन्म स्थान, सिंहद्वार, छेरा पहंरा, सात दिन, बाहुड़ा
- 10 fascinating facts about Rath Yatra (Shri Jagannath Mandir, Delhi)तीनों रथ, पहिए और रंग, फस्सी और धौरा, लोहे की कील नहीं, सोने की झाड़ू, मौसी का घर
- 10 facts behind India's grand chariot festival (ISKCON Bangalore)रथ, पहिए, रंग, देवदलन नाम, गजपति पहले सेवक, मौसी बाड़ी, बाहुड़ा
- Ratha Yatra (Puri) (Wikipedia)द्वितीया से दशमी, गरुड़ध्वज नाम, दसपल्ला और महानदी, हेरा पंचमी, मौसी माँ और पोडा पीठा, सुना बेशा
- Akshaya Tritiya: Chandan Yatra and Rath construction begin in Puri (Odia Samaj)अक्षय तृतीया से रथ खला में रथ बनना, मंदिर के बढ़ई
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।