उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · ज्येष्ठ पूर्णिमा
वट पूर्णिमा 2027
Vat Purnima 2027
सफ़ेद सूत के सात फेरे, एक बूढ़े बरगद के गिर्द।
वट पूर्णिमा 2027 में 18 जून, शुक्रवार को है। ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि 18 जून, सुबह 4:35 से 19 जून, सुबह 6:14 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
जन्म सावित्री हो।
सुबह की गली में एक औरत दूसरी से यही कहती है। जवाब में वही बात लौट आती है।
दोनों के हाथ में थाली है: पाँच फल, एक नारियल, कुछ ताँबे के सिक्के।
आगे पुराना बरगद है। उसके तने पर पहले से कई सफ़ेद धागे लिपटे हैं, सुबह से आई औरतों के।
वह सूत का सिरा तने से छुआती है और चलना शुरू करती है। एक फेरा। दो।
सात पर रुकती है।
घर लौटकर दीवार पर चंदन और चावल के लेप से एक बरगद बनेगा। उसके नीचे सावित्री, सत्यवान, और यम भी।
मौत की तस्वीर भी उसी दीवार पर, उसी लगन से। कथा में आख़िर वे भी तो मान गए थे।
2027 में कब
वट पूर्णिमा 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़18 जून, शुक्रवार
तिथिज्येष्ठ पूर्णिमा18 जून, सुबह 4:35 से 19 जून, सुबह 6:14 तक
नक्षत्रज्येष्ठासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 5:23
सूर्यास्तशाम 7:21
चंद्रोदयशाम 7:04
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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शुभकामना
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पहचान
वट पूर्णिमा क्या है
वट पूर्णिमा जेठ महीने की पूर्णिमा का व्रत है, जिसे महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और दक्षिण के राज्यों में सुहागिनें अपने पति के लंबे जीवन के लिए रखती हैं। यह वही व्रत है जिसे ओड़िशा, बिहार और नेपाल में जेठ की अमावस्या को वट सावित्री कहते हैं; यहाँ के पंचांग में महीना अमावस्या पर पूरा होता है, इसलिए व्रत लगभग पंद्रह दिन बाद, पूर्णिमा को आता है। परंपरा में यह जेठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक तीन दिन का व्रत है, सावित्री के तीन रात के व्रत की याद में, पर आज बहुत सी औरतें बस पूर्णिमा का पूरा दिन उपवास रखती हैं। इस दिन का केंद्र बरगद है: उसकी पूजा, उस पर सूत, और उसके नीचे सावित्री की याद।
कथा
वट पूर्णिमा की कथा
महाराष्ट्र में यह कथा अक्सर एक सवाल से शुरू होती है: पूजा बरगद की ही क्यों? लोक की कथा कहती है कि वन में लकड़ी काटते हुए जब सत्यवान गिरे और उनके प्राण गए, तो सावित्री ने उनका शरीर एक बरगद के नीचे रखा। वहीं यम आए, और वहीं सावित्री उन्हें बातों से हराकर सत्यवान को लौटा लाई। मज़े की बात यह है कि कथा में पेड़ ख़ुद कुछ नहीं करता; न बोलता है, न कोई चमत्कार दिखाता है। वह बस वहाँ खड़ा रहा, जब सब हुआ। और इसी के लिए उसे पूजा जाता है, उस प्रेम की याद में जो उसकी छाँव में जीता।
बरगद को चुनने की एक वजह उसका अपना स्वभाव भी बताई जाती है। उसकी जटाएँ ऊपर से नीचे उतरती हैं, ज़मीन पकड़ती हैं और नए तने बन जाती हैं, इसलिए यह पेड़ लंबी, न ख़त्म होने वाली उम्र का निशान माना जाता है। जो चीज़ सावित्री यम से माँग रही थी, वह यह पेड़ अपने भीतर रोज़ करता है।
महाराष्ट्र में इस कथा का एक पहलू सबसे ज़्यादा याद किया जाता है: सावित्री रोकर नहीं, बोलकर जीती। महाभारत में वह यम के पीछे पीछे चलती रही और उनसे धर्म और भलाई की ऐसी बातें करती रही, जब तक यम ख़ुद उसकी बात में बँध न गए। पूरी कथा वट सावित्री व्रत के पन्ने पर है। इसीलिए औरतें आज एक दूसरे से कहती हैं, जन्म सावित्री हो, यानी तुम भी सावित्री जैसी बनो: अडिग, और बात की पक्की।
एक बात सच्चाई से कहनी चाहिए। महाभारत के जिस पाठ में यह कथा है, उसमें सत्यवान के गिरने के दृश्य में बरगद का नाम नहीं आता। बरगद लोक ने जोड़ा, और सदियों से जोड़ता आया है। कथा एक है, पर उसे सँभालने वाला पेड़ लोक का अपना है।
कहाँ कैसे
वट पूर्णिमा कहाँ कैसे मनाया जाता है
महाराष्ट्र
औरतें बरगद के तने पर सफ़ेद सूत सात बार लपेटती हैं और ताँबे के सिक्के चढ़ाती हैं। घर में फ़र्श या दीवार पर चंदन और चावल के लेप से बरगद, सावित्री, सत्यवान और यम बनाए जाते हैं, और औरतें एक दूसरे से कहती हैं, जन्म सावित्री हो।
गोवा
सुहागिनें पूरे दिन का उपवास रखती हैं और बरगद की पूजा करती हैं।
गुजरात
यहाँ भी यह व्रत जेठ की पूर्णिमा को ही रखा जाता है, उसी बरगद और उसी सावित्री की याद में।
जहाँ पास में बरगद न हो
कुछ लोग बाज़ार से बरगद की टहनी लाकर पूजते हैं, पर इसे ग़लत रीत कहा गया है। उसकी जगह एक बरगद लगाकर उसकी पूजा करना अच्छा माना गया है, ताकि अगली पूर्णिमा पर पेड़ भी हो और छाँव भी।
रीत
वट पूर्णिमा के दिन क्या करते हैं
- परंपरा में जेठ शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक तीन दिन का व्रत रहता है; आज बहुत सी औरतें बस पूर्णिमा का पूरा दिन उपवास करती हैं।
- औरतें अच्छी साड़ियाँ और गहने पहनकर पूजा को निकलती हैं।
- दिन की शुरुआत पाँच फल और एक नारियल चढ़ाकर होती है।
- घर में फ़र्श या दीवार पर चंदन और चावल के लेप से बरगद, सावित्री, सत्यवान और यम के चित्र बनाए जाते हैं।
- रेत भरी थाली में सावित्री सत्यवान की सोने की छोटी आकृतियाँ रखकर मंत्रों और वट के पत्तों से पूजा होती है।
- बरगद के तने पर सफ़ेद सूत सात बार लपेटा जाता है, और ताँबे के सिक्के चढ़ते हैं।
- व्रत के दिनों में औरतें एक दूसरे से कहती हैं, जन्म सावित्री हो।
- मान्यता है कि यह व्रत निष्ठा से रखने पर पति लंबी उम्र पाता है, और सात जन्मों तक भला रहता है।
रसोई
वट पूर्णिमा का खाना
- पाँच फल और नारियल पूजा की थाली की शुरुआत।
- फलों के टुकड़े बरसात के इन दिनों पत्तों के दोनों में बँटने वाला प्रसाद।
सवाल जवाब
वट पूर्णिमा 2027: पूछे जाने वाले सवाल
वट पूर्णिमा 2027 कब है?
वट पूर्णिमा 2027 में 18 जून, शुक्रवार को है। ज्येष्ठ पूर्णिमा तिथि 18 जून, सुबह 4:35 से 19 जून, सुबह 6:14 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
वट पूर्णिमा और वट सावित्री में क्या फ़र्क़ है?
व्रत एक ही है, बस दिन अलग। महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और दक्षिण में यह जेठ की पूर्णिमा को वट पूर्णिमा कहलाता है, और ओड़िशा, बिहार और नेपाल में लगभग पंद्रह दिन पहले जेठ की अमावस्या को वट सावित्री।
वट पूर्णिमा पर बरगद पर कितनी बार सूत लपेटते हैं?
महाराष्ट्र की रीत में सफ़ेद सूत बरगद के तने पर सात बार लपेटा जाता है, और साथ में ताँबे के सिक्के चढ़ाए जाते हैं।
'जन्म सावित्री हो' का क्या मतलब है?
यह व्रत के दिनों की आपसी शुभकामना है, जिसका मतलब है कि तुम भी सावित्री जैसी बनो, जिसने अपनी बातों और निष्ठा से पति को यम से लौटा लिया।
वट पूर्णिमा का व्रत कितने दिन का होता है?
परंपरा में जेठ शुक्ल त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा, यानी तीन दिन का। आज बहुत सी औरतें बस पूर्णिमा का एक दिन व्रत रखती हैं।
क्या बरगद की टहनी घर लाकर पूजा कर सकते हैं?
बाज़ार से टहनी लाकर पूजने को ग़लत रीत माना गया है। अच्छा यह माना गया है कि एक बरगद लगाया जाए और उसकी पूजा की जाए।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Vata Purnima (Wikipedia)तीन दिन का व्रत, सात बार सफ़ेद सूत, ताँबे के सिक्के, पाँच फल और नारियल, चित्र, सोने की आकृतियाँ, जन्म सावित्री हो, बरगद के नीचे शरीर रखना
- Vat Purnima, Vat Savitri Vratha (Culture and Heritage)गोवा का पूरे दिन का उपवास, पेड़ की कथा में कम भूमिका, जटाएँ और लंबी उम्र, टहनी वाली ग़लत रीत, पत्तों के दोने
- Vat Purnima (Maharashtra Tourism)महाराष्ट्र में सुहागिनों का उपवास, सुबह स्नान, बरगद पर धागे
- Significance of Vat Savitri fasting (Shree Hindu Temple)अमांत पंचांग में जेठ पूर्णिमा, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण, पंद्रह दिन का अंतर
- Mahabharata, Vana Parva, Section CCLXLV (SriPedia, ibiblio)यम से सावित्री की बातें, वरों का क्रम, पाठ में बरगद का न होना
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।