पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · भाद्रपद शुक्ल अष्टमी

राधा अष्टमी 2027

Radha Ashtami 2027

आँखें अभी बंद हैं। किसी के आने की राह में।

राधा अष्टमी 2027 में 7 सितंबर, मंगलवार को है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि 7 सितंबर, सुबह 11:29 से 8 सितंबर, दोपहर 12:45 तक है। मध्याह्न की पूजा का समय सुबह 11:04 से दोपहर 1:35 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

राधा अष्टमी का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

उस शाम का चाँद, 48 प्रतिशत रोशन

सीढ़ियों पर पाँवों की आहट है, और पहाड़ी पर अभी भोर नहीं हुई।

ऊपर मंदिर में दूध, दही, घी, शहद और शक्कर एक साथ घुल रहे हैं।

औरतें बधाई गा रही हैं, जैसे किसी घर में बेटी हुई हो।

कल ही नंदगाँव से लोग मिठाई लेकर आ गए थे। कान्हा के गाँव से।

आज पीले कपड़े हैं, मुकुट है, छप्पन भोग है।

एक कथा कहती है, जन्म के बाद उन्होंने आँखें नहीं खोलीं।

खोलीं तब, जब कान्हा पालने के पास आए।

पंद्रह दिन पहले एक जन्म आधी रात को हुआ था। यह दूसरा दोपहर को है।

2027 में कब

राधा अष्टमी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़7 सितंबर, मंगलवार

तिथिभाद्रपद शुक्ल अष्टमी7 सितंबर, सुबह 11:29 से 8 सितंबर, दोपहर 12:45 तक

नक्षत्रअनुराधासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 6:02

सूर्यास्तशाम 6:36

चंद्रोदयदोपहर 12:46

मध्याह्न
सुबह 11:04 से दोपहर 1:35 तकदिन के पाँच हिस्सों में तीसरा, दोपहर का समय।

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शुभकामना

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पहचान

राधा अष्टमी क्या है

राधा अष्टमी राधा के जन्म का दिन है, जिन्हें ब्रज में राधा रानी, लाड़ली जी और श्रीजी कहते हैं। इसे राधाष्टमी और राधा जयंती भी कहते हैं। यह भादों के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को आती है, कृष्ण जन्माष्टमी के ठीक पंद्रह दिन बाद। राधा की पूजा मध्याह्न में होती है, यानी दिन के बीच वाले हिस्से में, क्योंकि मान्यता है कि वे दोपहर को जन्मीं। यह दिन पूरे ब्रज में बड़ा है, और सबसे बड़ा बरसाना में, जहाँ भानुगढ़ पहाड़ी पर राधा रानी का मंदिर है, जिसे श्रीजी का मंदिर भी कहते हैं। राधा बरसाना में जन्मीं या मथुरा के पास रावल में, इस पर दो राय हैं, और दोनों जगह यह दिन बड़ा होता है। गौड़ीय वैष्णव, निम्बार्क, राधावल्लभ, पुष्टिमार्ग और हरिदासी परंपराएँ इसे अपना बड़ा दिन मानती हैं।

कथा

राधा अष्टमी की कथा

ब्रज में राधा के पिता का नाम वृषभानु बताते हैं और माँ का कीर्तिदा। पद्म पुराण के हवाले से कथा कही जाती है कि एक दिन दोपहर को वृषभानु यमुना पर गए। वहाँ पानी पर सोने का एक कमल तैर रहा था, ऐसा चमकता जैसे हज़ार सूरज एक साथ हों। वृषभानु उसी पल पानी में उतर गए। कमल की पंखुड़ियों के बीच एक छोटी सी बच्ची थी।

वे बच्ची को घर ले आए। उसकी चमक देखकर कीर्तिदा ख़ुशी से भर गईं, और घर में जन्म की रस्में होने लगीं। पर थोड़ी देर में सबने देखा कि बच्ची न रोती है, न कोई आवाज़ करती है, और उसने अभी तक आँखें नहीं खोलीं। लोक में कहते हैं कि फिर एक दिन कृष्ण, जो तब बस एक बरस के थे, उसके पालने के पास आए। बच्ची तक कृष्ण के शरीर की महक पहुँची, उसने पहली बार आँखें खोलीं, और सीधे कृष्ण को देखा। यानी राधा ने इस दुनिया में सबसे पहले जिसे देखा, वह कृष्ण थे।

यह कथा किस जगह की है, इस पर ब्रज में दो बातें चलती हैं। एक मान्यता कहती है कि राधा रावल में जन्मीं, जो मथुरा के पास महावन की तरफ़ है, और बरसाना का श्रीजी मंदिर बनने से पहले रावल ही यात्रियों की बड़ी जगह थी। दूसरी कहती है कि उनका घर बरसाना था। बरसाना के मंदिर की कहानी भी पुरानी बताई जाती है: मान्यता है कि यहाँ पहला मंदिर राजा वज्रनाभ ने बनवाया, फिर सन 1675 में राजा बीर सिंह देव ने एक मंदिर बनवाया, और आज वाला मंदिर नारायण भट्ट ने राजा टोडरमल की मदद से खड़ा किया। आज भी राधा अष्टमी के दिन दोनों जगह, रावल में भी और बरसाना में भी, जन्म का अभिषेक होता है।

व्रत

राधा अष्टमी का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह नहाकर साफ़ कपड़े पहनते हैं, और राधा का व्रत रखने का संकल्प लेते हैं।
  2. बृहन्नारदीय पुराण कहता है कि जो कर सकें, वे पूरे दिन का व्रत रखें।
  3. जो पूरा दिन न रख सकें, वे एकभुक्त व्रत रखें, यानी दिन में बस एक बार खाना।
  4. गौड़ीय वैष्णव घरों में आधे दिन का व्रत आम है; कुछ लोग पूरा दिन रखते हैं, और कुछ पानी भी नहीं पीते।
  5. अगले दिन सुहागिन औरतों को खाना खिलाते हैं।
  6. पूजी हुई मूर्ति किसी आचार्य को दान करते हैं, और उसके बाद व्रत पूरा होता है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

बृहन्नारदीय पुराण वाली विधि में राधा अष्टमी का व्रत अगले दिन पूरा होता है। अगले दिन पहले सुहागिन औरतों को खाना खिलाते हैं, फिर जिस मूर्ति की पूजा हुई थी, वह किसी आचार्य को दान करते हैं, और उसके बाद अपने परिवार के साथ खाना खाकर व्रत खोलते हैं। जो एकभुक्त व्रत रखते हैं, वे उसी दिन एक बार खा लेते हैं। गौड़ीय वैष्णव घरों में आधे दिन का व्रत आम है, और उसे खोलने की घड़ी वे अपनी परंपरा के पंचांग में देखते हैं।

कहाँ कैसे

राधा अष्टमी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • बरसाना, श्रीजी मंदिर (मथुरा)

    भानुगढ़ पहाड़ी पर दो सौ से ज़्यादा सीढ़ियाँ चढ़कर लोग मंदिर पहुँचते हैं। यहाँ ब्रह्म मुहूर्त में, यानी भोर से पहले, राधा रानी का पंचामृत से अभिषेक होता है; मंदिर की मान्यता है कि राधा मूल नक्षत्र में जन्मीं, इसलिए मूल शांति की विधि भी होती है, फिर महाअभिषेक और महाआरती। राधा रानी को पीले कपड़े और मुकुट पहनाकर छप्पन भोग लगता है, और शाम को उन्हें सफ़ेद खंभों वाले मंडप में लाते हैं, जो बरस में बस तीन बार होता है।

  • नंदगाँव से बरसाना

    राधा अष्टमी से एक दिन पहले नंदगाँव के गोस्वामी लाड़ली जी के मंदिर आते हैं और मिठाई बाँटते हैं, यानी कृष्ण के गाँव से राधा के घर बधाई पहुँचती है। औरतें मंगल गीत गाती हैं, और रास्ते भर बधाई गीत चलते हैं।

  • रावल (महावन के पास, मथुरा)

    रावल को राधा का जन्मस्थान मानने वाले यहाँ के मंदिर में एक सौ एक किलो दूध, घी, शहद, शक्कर, यमुना जल, गंगा जल, फलों के रस और पंचामृत से राधा रानी का अभिषेक करते हैं, और फिर पीले कपड़े पहनाते हैं। यहाँ राधा छोटी बच्ची के रूप में दर्शन देती हैं।

  • वृंदावन, राधावल्लभ मंदिर

    मंगला आरती के बाद महाअभिषेक होता है, और फिर दधिकांदा: दूध, दही और हल्दी एक बड़े हौज़ में घोलकर सेवायतों पर डालते हैं। गर्भगृह से खिलौने, कपड़े, बिस्कुट और टॉफ़ियाँ प्रसाद की तरह उछाली जाती हैं, और शाम को राधा कृष्ण की सवारी निकलती है। यहाँ और सेवा कुंज में उत्सव नौ दिन चलता है।

  • मणिमहेश (चंबा, हिमाचल)

    मणिमहेश की यात्रा कृष्ण जन्माष्टमी से शुरू होती है और राधा अष्टमी पर पूरी होती है, जब हज़ारों लोग मणिमहेश झील के बर्फ़ीले पानी में डुबकी लगाते हैं।

  • इस्कॉन और गौड़ीय मंदिर

    इस्कॉन के मंदिरों में राधा रानी का महाअभिषेक होता है, और गौड़ीय वैष्णव इस दिन राधा अष्टमी का व्रत रखते हैं।

रीत

राधा अष्टमी के दिन क्या करते हैं

  1. पूजा की जगह या मंडप में एक मंडल बनाकर उसके बीच मिट्टी या ताँबे का कलश रखते हैं, उस पर ताँबे की थाली, और थाली पर राधा रानी की सोने की मूर्ति।
  2. मूर्ति को दो नए कपड़ों से ढकते हैं, और मध्याह्न में, यानी दिन के बीच वाले हिस्से में, षोडशोपचार पूजा होती है, यानी सोलह चीज़ों से; ठीक घड़ी पंचांग में देखते हैं।
  3. मंदिरों में पंचामृत से अभिषेक होता है: दूध, घी, शहद, शक्कर या गुड़, और दही।
  4. फिर नए कपड़े और गहने पहनाते हैं; ब्रज में कई जगह राधा कृष्ण को पूरे फूलों के कपड़े पहनाए जाते हैं।
  5. छप्पन भोग लगता है, यानी छप्पन तरह के पकवान, और फिर वही प्रसाद बँटता है।
  6. ब्रज में कहते हैं कि यही वह दिन है जब भक्त राधा के चरणों के दर्शन कर पाते हैं।

सवाल जवाब

राधा अष्टमी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

राधा अष्टमी 2027 कब है?

राधा अष्टमी 2027 में 7 सितंबर, मंगलवार को है। भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि 7 सितंबर, सुबह 11:29 से 8 सितंबर, दोपहर 12:45 तक है। मध्याह्न की पूजा का समय सुबह 11:04 से दोपहर 1:35 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

राधा अष्टमी जन्माष्टमी के कितने दिन बाद आती है?

पंद्रह दिन बाद। जन्माष्टमी भादों के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को होती है, और राधा अष्टमी उसी महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को।

राधा अष्टमी का व्रत कैसे रखें?

बृहन्नारदीय पुराण कहता है कि जो कर सकें, वे पूरे दिन का व्रत रखें, और जो न कर सकें, वे एकभुक्त व्रत, यानी दिन में एक बार खाना। गौड़ीय वैष्णवों में आधे दिन का व्रत आम है।

राधा अष्टमी का पारण कब करें?

बृहन्नारदीय पुराण की विधि में अगले दिन, सुहागिन औरतों को खाना खिलाने और पूजी हुई मूर्ति आचार्य को दान करने के बाद, परिवार के साथ खाना खाकर व्रत खोलते हैं।

राधा का जन्म कहाँ हुआ था, बरसाना या रावल?

इस पर दो राय हैं। एक मान्यता रावल को जन्मस्थान मानती है, जो मथुरा के पास महावन की ओर है, और दूसरी बरसाना को। राधा अष्टमी पर दोनों जगह जन्म का अभिषेक होता है।

राधा अष्टमी की पूजा दोपहर में क्यों होती है?

मान्यता है कि राधा दोपहर को जन्मीं, इसलिए उनकी पूजा मध्याह्न में होती है। पद्म पुराण से जुड़ी कथा में भी वृषभानु दोपहर को यमुना पर कमल में बच्ची पाते हैं।

बरसाना में राधा अष्टमी पर क्या होता है?

भोर से पहले पंचामृत से राधा रानी का अभिषेक, मूल शांति, महाअभिषेक और महाआरती, फिर पीले कपड़े, मुकुट और छप्पन भोग। शाम को राधा रानी सफ़ेद खंभों वाले मंडप में दर्शन देती हैं।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Radha Ashtami, Drik Panchangभादों शुक्ल अष्टमी, मध्याह्न पूजा, राधाष्टमी और राधा जयंती, बरसाना का लाड़ली जी मंदिर, बृहन्नारदीय पुराण वाली व्रत और पूजा विधि, अगले दिन का पारण
  2. Radhashtami, Wikipediaजन्माष्टमी के पंद्रह दिन बाद, दोपहर का जन्म, परंपराएँ, पंचामृत, फूलों के कपड़े, चरणों के दर्शन, राधावल्लभ और सेवा कुंज में नौ दिन, इस्कॉन, आधे दिन का व्रत, मणिमहेश
  3. Raval, Tirtha Yatraपद्म पुराण के हवाले से कमल वाली कथा, कीर्तिदा, आँखें खोलना, रावल पहले बड़ा तीर्थ
  4. Radha Ashtami celebrated with religious fervour in Mathura, ThePrintमूल शांति, महाअभिषेक, पीले कपड़े, मुकुट, छप्पन भोग, सफ़ेद खंभों वाला मंडप बरस में तीन बार, बरसाना और रावल पर दो राय
  5. Radha Ashtami celebrated with fervour in Mathura temple, The Weekरावल का अभिषेक, राधावल्लभ मंदिर का दधिकांदा और प्रसाद उछालना, शाम की सवारी, नंदगाँव के गोस्वामी, मंगल गीत
  6. UP: Radha Ashtami celebrated in Barsana, News On AIRब्रह्म मुहूर्त में पंचामृत अभिषेक, बधाई गीत
  7. Radha Rani Temple, Wikipediaभानुगढ़ पहाड़ी, दो सौ से ज़्यादा सीढ़ियाँ, श्रीजी नाम, वज्रनाभ, 1675, नारायण भट्ट और टोडरमल, राधाष्टमी पर छप्पन भोग
  8. Manimahesh yatra ends, The Tribuneमणिमहेश यात्रा जन्माष्टमी से राधाष्टमी तक, झील में डुबकी

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।