उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · चैत्र शुक्ल तृतीया
गणगौर 2027
Gangaur 2027
होली के अगले दिन से सोलह दिन, और फिर गौरी की विदाई।
गणगौर 2027 में 9 अप्रैल, शुक्रवार को है। चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि 9 अप्रैल, रात 3:11 से 10 अप्रैल, रात 1:32 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
हथेली पर मेहँदी से एक सूरज बना है। बगल में चाँद, और कुछ तारे।
आँगन में मिट्टी के दो छोटे पुतले हैं, नए कपड़ों में। गौरी और ईसर।
लड़कियाँ आज भी दिन में एक ही बार खाती हैं। होली के अगले दिन से यही चल रहा है।
साँझ होते ही एक लड़की सिर पर मिट्टी का घड़ा रखती है। घड़े में ढेर सारे छेद हैं, और भीतर एक दीया जल रहा है।
छेदों से रोशनी गली की दीवारों पर बिखर जाती है, छोटे छोटे तारों की तरह। पीछे पीछे गीत।
गीतों में गौरी ससुराल जा रही हैं।
हर घर की बेटी, हर बरस, वही विदाई अपने मुँह से गाती है।
2027 में कब
गणगौर 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़9 अप्रैल, शुक्रवार
तिथिचैत्र शुक्ल तृतीया9 अप्रैल, रात 3:11 से 10 अप्रैल, रात 1:32 तक
नक्षत्रभरणीसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:03
सूर्यास्तशाम 6:43
चंद्रोदयसुबह 7:09
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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शुभकामना
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पहचान
गणगौर क्या है
गणगौर राजस्थान का त्योहार है, गौरी यानी पार्वती और ईसर यानी शिव की पूजा का। नाम में गण शिव के लिए है और गौर पार्वती के लिए। पूजा होली के अगले दिन से, चैत्र के पहले दिन से, शुरू होती है और सोलह दिन चलती है; नई ब्याहता ब्याह के बाद पहली बार पूरे अठारह दिन रखती है। मुख्य दिन चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया है, जब गौरी और ईसर को पानी में विदा किया जाता है। यही तिथि चैत्र नवरात्रि का तीसरा दिन भी है। ब्याही औरतें पति की सेहत और लंबी उम्र के लिए, और कुँवारी लड़कियाँ अच्छे वर के लिए यह पूजा करती हैं। यह वसंत और फ़सल का त्योहार भी है।
कथा
गणगौर की कथा
गणगौर की व्रत कथा में शिव, पार्वती और नारद धरती पर घूमने निकलते हैं। एक गाँव में ग़रीब औरतों को ख़बर लगी कि भगवान आए हैं। उनके पास जो था, वही लेकर वे दौड़ीं: पानी, फल और फूल। पार्वती इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्होंने उन औरतों को सुहाग का आशीर्वाद दिया, कि उनका ब्याह सदा बना रहे।
थोड़ी देर बाद गाँव की अमीर औरतें आईं, भरपूर पकवान लेकर। अब पार्वती ने अपनी उँगली काटी और अपने लहू की बूँदें उन पर छिड़कीं। कथा कहती है कि वह लहू अमृत बन गया, और इन औरतों को भी वही आशीर्वाद मिला।
फिर पार्वती ने रेत का एक लिंग बनाया और शिव की पूजा की। शिव प्रसन्न हुए और बोले: जो ब्याही औरतें चैत्र महीने की तीज को हमारी पूजा करेंगी, उनका सुहाग बना रहेगा। तभी से चैत्र शुक्ल तृतीया को गणगौर पूजी जाती है।
लोक में एक कथा और है। ब्याह के बाद गौरी अपने मायके आती हैं, और गाँव की औरतें गीत, मेहँदी और मिठाई से उनका स्वागत करती हैं। विदा होते समय गौरी उनसे कहती हैं: हर बरस ऐसे ही व्रत रखना, गाना और मुझे याद करना, मैं तुम्हारी रक्षा करूँगी। इसीलिए गणगौर के गीतों में सबसे ज़्यादा गौरी के ससुराल जाने की बात है।
कहाँ कैसे
गणगौर कहाँ कैसे मनाया जाता है
जयपुर
आख़िरी दिनों में सिटी पैलेस की ज़नानी ड्योढ़ी से गौरी की सवारी निकलती है, बाज़ारों और चौगान से होती हुई तालकटोरा के पास तक, साथ में ऊँट, हाथी और नाचने वाले। यहाँ इस मौसम में घेवर ख़रीदकर खाया और बाँटा जाता है।
उदयपुर
सवारी सिटी पैलेस से पिछोला झील के गणगौर घाट तक जाती है, पुरानी पालकियों, रथों, बैलगाड़ियों और लोक कलाकारों के साथ। मूर्तियाँ सजी नावों पर रखी जाती हैं, और औरतें सिर पर पीतल के कलश सँभालकर चलती हैं।
जोधपुर और बीकानेर
जोधपुर में मेहरानगढ़ से गुलाब सागर तक सवारी जाती है। दोनों शहरों में मिलकर खाना होता है और लोक गीत गाए जाते हैं।
नाथद्वारा, मेवाड़
श्रीनाथजी के मंदिर में सुबह से देर शाम तक उत्सव रहता है। मेवाड़ में घेवर साल में इसी समय बनता है, और उसका पहला कौर गौरी को चढ़ता है।
राजस्थान के घर
कई परिवारों में लकड़ी की पुरानी मूर्तियाँ होती हैं, जिन्हें मथेरण कहलाने वाले चितेरे हर साल त्योहार से पहले नए रंग देते हैं।
रीत
गणगौर के दिन क्या करते हैं
- होली के अगले दिन से औरतें और लड़कियाँ मिट्टी से गौरी और ईसर की मूर्तियाँ बनाती और सजाती हैं।
- कुँवारी लड़कियाँ सोलह दिन व्रत रखती हैं और दिन में एक ही बार खाती हैं।
- हाथों और पैरों पर मेहँदी लगती है, जिसमें सूरज, चाँद, तारे, फूल और रेखाओं वाली आकृतियाँ बनती हैं।
- होली के सातवें दिन की साँझ को लड़कियाँ घुड़लिया, यानी छेदों वाला मिट्टी का घड़ा जिसमें दीया जलता है, सिर पर रखकर गीत गाती घूमती हैं, और घरों से पैसे, मिठाई, गुड़, घी और तेल पाती हैं।
- दस दिन बाद वे घड़े तोड़कर टुकड़े कुएँ या तालाब में डाल देती हैं, और जमा की हुई चीज़ों से भोज करती हैं।
- आख़िरी दिनों में मूर्तियों को नए कपड़े पहनाए जाते हैं, और ब्याही औरतें उन्हें किसी बाग़, बावड़ी, जोहड़ या कुएँ तक ले जाती हैं।
- आख़िरी दिन, चैत्र शुक्ल तृतीया को, गौरी और ईसर को पानी में विदा किया जाता है।
रसोई
गणगौर का खाना
- घेवर इसी मौसम की मिठाई; जयपुर में घर घर बँटती है, और मेवाड़ में पहला कौर गौरी को चढ़ता है।
- मालपुआ और बादाम का हलवा जोधपुर और बीकानेर के साझा भोज में।
सवाल जवाब
गणगौर 2027: पूछे जाने वाले सवाल
गणगौर 2027 कब है?
गणगौर 2027 में 9 अप्रैल, शुक्रवार को है। चैत्र शुक्ल तृतीया तिथि 9 अप्रैल, रात 3:11 से 10 अप्रैल, रात 1:32 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
गणगौर का मतलब क्या है?
गण यानी शिव और गौर यानी गौरी, पार्वती। गणगौर शिव और पार्वती की साथ में पूजा का त्योहार है, जिसमें शिव को ईसर कहा जाता है।
गणगौर कितने दिन की पूजा है?
होली के अगले दिन से सोलह दिन, और चैत्र शुक्ल तृतीया को पूरी होती है। नई ब्याहता पहली बार पूरे अठारह दिन यह पूजा करती है।
घुड़लिया क्या है?
मिट्टी का घड़ा जिसमें बहुत से छेद होते हैं और भीतर दीया जलता है। कुँवारी लड़कियाँ इसे सिर पर रखकर गीत गाती घर घर जाती हैं।
गणगौर की व्रत कथा क्या है?
शिव, पार्वती और नारद धरती पर घूमने आते हैं, और पार्वती ग़रीब और अमीर, दोनों तरह की औरतों को सुहाग का आशीर्वाद देती हैं। फिर पार्वती रेत के लिंग की पूजा करती हैं, और शिव कहते हैं कि चैत्र की तीज को पूजने वाली औरतों का सुहाग बना रहेगा।
कुँवारी लड़कियाँ गणगौर क्यों पूजती हैं?
मान्यता है कि गौरी की पूजा से अच्छा वर मिलता है, जैसे पार्वती को शिव मिले। इसलिए कुँवारी लड़कियाँ सोलह दिन व्रत रखकर रोज़ पूजा करती हैं।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Gangaur, Wikipediaसोलह और अठारह दिन, गण और गौर, मथेरण, घुड़लिया, जयपुर और उदयपुर की सवारी, व्रत कथा, घेवर
- Know more about Gangaur, The Hostellerगौरी की मायके वाली लोक कथा, जोधपुर, बीकानेर, नाथद्वारा, मेवाड़ का घेवर
- Gangaur Festival, Ruchi's Kitchenमिट्टी के गौरी ईसर, होली के सातवें दिन का घुड़लिया, उदयपुर के पीतल के कलश
- Chaitra Navratri, Infinity Learnनवरात्रि का तीसरा दिन और गौरी तीज
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।