उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · चैत्र कृष्ण प्रतिपदा
होली 2027
Holi 2027
हाथ धो लिए, रंग नहीं गया।
होली 2027 में 23 मार्च, मंगलवार को है। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि 22 मार्च, शाम 4:14 से 23 मार्च, दोपहर 2:29 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
नल के नीचे दो हाथ रगड़े जा रहे हैं। पानी हरा होकर गिरता है, फिर गुलाबी।
नाख़ूनों में अब भी रंग है। कान के पीछे भी।
सुबह जो कुर्ता पहनकर निकले थे, अब उसका असली रंग कोई नहीं बता सकता।
गली में सूखे गुलाल की एक परत जमी है, उस पर चप्पलों के निशान।
छत से अब भी किसी ढोल की थाप आ रही है।
सीढ़ियों पर टिके एक बूढ़े ताऊ हँसते हैं: शुरुआत तो कृष्ण ने की थी, राधा के गाल पर रंग लगाकर।
एक ही रंग, पर हर गाँव उसे अपनी कहानी में घोलता है।
2027 में कब
होली 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़23 मार्च, मंगलवार
तिथिचैत्र कृष्ण प्रतिपदा22 मार्च, शाम 4:14 से 23 मार्च, दोपहर 2:29 तक
नक्षत्रहस्तसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:22
सूर्यास्तशाम 6:34
चंद्रोदयरात 7:40
होलिका दहन की तारीख़ पर पंचांगों में दो राय हैं, इसलिए कुछ जगह रंग 22 मार्च को भी खेले जाएँगे। भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची में होली 23 मार्च, मंगलवार को है।
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शुभकामना
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पहचान
होली क्या है
होली रंगों का दिन है, होलिका दहन की रात के अगले दिन, फाल्गुन पूर्णिमा के ठीक बाद। इसे धुलंडी और रंगवाली होली भी कहते हैं। लोग एक दूसरे पर गुलाल और रंग डालते हैं, गाते और ढोल की थाप पर नाचते हैं। ब्रज में यह एक दिन नहीं, कई दिन चलती है, फाल्गुन शुक्ल अष्टमी की लड्डू होली से लेकर दाऊजी के हुरंगे तक, और हर गाँव की होली अलग है। बंगाल में यही पूर्णिमा दोल कहलाती है, मणिपुर में याओशांग, और कुमाऊँ में होली गीतों का त्योहार है। और होली के अगले दिन आनंदपुर साहिब में होला मोहल्ला होता है, जो सिख परंपरा का अपना अलग उत्सव है।
कथा
होली की कथा
होली की रंग वाली कथा ब्रज की है, कृष्ण और राधा की। ब्रज में कहते हैं कि छोटे कृष्ण ने एक दिन माँ यशोदा से पूछा: मैं साँवला क्यों हूँ, और राधा इतनी गोरी क्यों? माँ ने हँसकर कहा, जा, राधा के मुँह पर भी रंग लगा दे। कृष्ण अपने सखाओं को लेकर नंदगाँव से बरसाना पहुँचे, और राधा के गाल रंग दिए।
बरसाना की गोपियों को यह ढिठाई पसंद नहीं आई। वे लाठियाँ लेकर निकलीं और कृष्ण और उनके सखाओं को खदेड़ दिया, और कृष्ण झूठमूठ डरकर भागे। लोक कहता है कि यहीं से लठमार होली चली। आज भी नंदगाँव के मर्द ढाल लेकर बरसाना आते हैं और राधा के मंदिर तक पहुँचने की कोशिश करते हैं, और बरसाना की औरतें नीम या अरार की लाठियों से उन पर वार करती हैं। अगले दिन नंदगाँव में बारी उलट जाती है।
दाऊजी के हुरंगे की कथा अलग है। कहते हैं कृष्ण ने औरत का भेस बनाकर यमुना किनारे गोपियों के कपड़े उठा लिए थे, और हुरंगा उसी का हँसी भरा बदला है। इसलिए दाऊजी में औरतें कपड़े के कोड़ों से मर्दों को पीटती हैं और खेल खेल में उनके कपड़े फाड़ती हैं, और मर्द रंग फेंककर अपना बचाव करते हैं।
और एक कथा मान जाने की। कहते हैं एक बार रंग लगने से कृष्ण रूठ गए। तब गोपियों ने एक पेड़ को फूलों से सजाया, आरती की और माफ़ी माँगी। कृष्ण मान गए और उन्होंने गोपियों पर फूल बरसाए। वृंदावन की फूलों वाली होली उसी दिन की याद है।
कहाँ कैसे
होली कहाँ कैसे मनाया जाता है
बरसाना, नंदगाँव और वृंदावन (ब्रज)
बरसाना में फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को लड्डू होली होती है, जिसमें लड्डू फेंके जाते हैं और फिर प्रसाद मानकर खाए जाते हैं, और उसके बाद लठमार होली। वृंदावन के बांके बिहारी और राधा रमण मंदिरों में होली से एक दिन पहले फूलों की होली होती है, और वहाँ की विधवाएँ भी एक दूसरे को गुलाल लगाकर गाती नाचती हैं।
दाऊजी, मथुरा के पास
होली के बाद यहाँ हुरंगा होता है। ट्रैक्टर ट्रॉली में मिट्टी लाकर पानी में घोली जाती है और लोगों पर फेंकी जाती है, इसलिए इसे कीचड़ होली भी कहते हैं, और औरतें मर्दों को कपड़े के कोड़ों से पीटती हैं।
बंगाल और ओड़िशा
यहाँ होली की पूर्णिमा चैतन्य महाप्रभु का जन्मदिन भी मानी जाती है। बंगाल में यह दिन दोल यात्रा कहलाता है।
मणिपुर
मैतेई लोगों का याओशांग पूर्णिमा से पाँच छह दिन चलता है। पूर्णिमा की साँझ घास फूस की एक झोंपड़ी जलाई जाती है, जिसे याओशांग मेई थाबा कहते हैं; कई जगह उसमें चैतन्य महाप्रभु की मूर्ति रखकर जलाने से पहले निकाल ली जाती है। बच्चे घर घर जाकर नाकाथेंग, यानी छोटे पैसे, माँगते हैं, और रात को चाँदनी में लड़के लड़कियाँ हाथ पकड़कर घेरे में थाबल चोंगबा नाचते हैं।
कुमाऊँ, उत्तराखंड
यहाँ होली लगभग एक महीने तक गीतों में चलती है। एक होली घेरे में गाई जाती है, शास्त्रीय साज़ों के साथ और कृष्ण की कथाओं के गीतों में; दूसरी खड़ी होली है, खड़े होकर कुमाऊँनी लोक धुनों में गाई जाने वाली, और औरतों की अपनी महिला होली भी होती है। आख़िर में लोग एक दूसरे को फूलों से बना अबीर लगाते हैं।
आनंदपुर साहिब, पंजाब
होली के अगले दिन यहाँ होला मोहल्ला होता है, जिसे दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1701 में शुरू किया, ताकि सिख नकली लड़ाइयों में अपना हुनर दिखाएँ। निहंग सिंह गतका और घुड़सवारी के करतब दिखाते हैं, श्री गुरु ग्रंथ साहिब की हज़ूरी में दरबार और कीर्तन होता है, गाँव वाले सेवा से लंगर चलाते हैं, और आख़िरी दिन पंज प्यारों की अगुवाई में तख़्त केसगढ़ साहिब से मोहल्ला, यानी फ़ौज की टुकड़ी जैसा जुलूस, निकलता है।
रीत
होली के दिन क्या करते हैं
- रंग होलिका दहन के अगले दिन खेला जाता है।
- लोग एक दूसरे पर गुलाल और रंग डालते हैं; आजकल फूलों से बना गुलाल भी ख़ूब चलता है।
- ढोल की थाप पर गीत गाए जाते हैं और नाच होता है।
- बरसाना में लड्डू होली में लोग एक दूसरे पर लड्डू फेंकते हैं और फिर उन्हें प्रसाद मानकर खाते हैं।
- लठमार होली में औरतें लाठियाँ चलाती हैं और मर्द ढाल से ख़ुद को बचाते हैं; यह सब खेल में होता है।
- वृंदावन में मंदिर फूलों से सजते हैं और भक्त राधा और कृष्ण पर फूलों की पंखुड़ियाँ बरसाते हैं।
सवाल जवाब
होली 2027: पूछे जाने वाले सवाल
होली 2027 कब है?
होली 2027 में 23 मार्च, मंगलवार को है। चैत्र कृष्ण प्रतिपदा तिथि 22 मार्च, शाम 4:14 से 23 मार्च, दोपहर 2:29 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
लठमार होली क्या है?
बरसाना और नंदगाँव की होली, जिसमें औरतें लाठियों से मर्दों पर खेल में वार करती हैं और मर्द ढाल से बचते हैं। कथा है कि राधा और गोपियों ने रंग लगाने आए कृष्ण और उनके सखाओं को ऐसे ही लाठियों से भगाया था।
हुरंगा क्या होता है?
दाऊजी मंदिर की होली, जो होली के बाद होती है और ब्रज की होली का आख़िरी पड़ाव मानी जाती है। इसमें मिट्टी और पानी की होली खेली जाती है, और औरतें कपड़े के कोड़ों से मर्दों को पीटती हैं।
याओशांग क्या है?
मणिपुर के मैतेई लोगों की होली, जो फाल्गुन पूर्णिमा से शुरू होकर पाँच छह दिन चलती है। इसमें घास फूस की झोंपड़ी जलती है, बच्चे नाकाथेंग माँगते हैं और रात को थाबल चोंगबा नाच होता है।
कुमाऊँ की खड़ी होली क्या है?
कुमाऊँ में होली के गीत खड़े होकर, लोक धुनों में गाए जाते हैं, इसे खड़ी होली कहते हैं। इसके साथ घेरे में शास्त्रीय साज़ों पर गाई जाने वाली होली और औरतों की महिला होली भी होती है।
होला मोहल्ला क्या है?
होली के अगले दिन आनंदपुर साहिब में होने वाला सिख उत्सव, जिसे गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1701 में शुरू किया। इसमें नकली लड़ाइयाँ, गतका, कीर्तन, लंगर और आख़िरी दिन का जुलूस होता है।
होली और होलिका दहन में क्या फ़र्क़ है?
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात की आग है, जिसकी कथा प्रह्लाद की है। होली, यानी रंगों का दिन, उसके अगले दिन आता है, और उसकी कथाएँ ब्रज के कृष्ण और राधा की हैं।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- The colours of Holi in Braj, 30 Stadesयशोदा और कृष्ण की कथा, लड्डू होली, लठमार, फूलों की होली, विधवाओं की होली, कीचड़ वाला हुरंगा
- Different types of Holi in Vrindavan, VCMलाठियाँ और ढाल, हुरंगे की कथा, फूलों वाली होली की कथा
- Unique places to celebrate Holi in India, Hostelworldकुमाऊँ की गीतों वाली होली, खड़ी होली, महिला होली, अबीर
- Yaosang, Holi the Manipur way, Live History Indiaझोंपड़ी और चैतन्य की मूर्ति, थाबल चोंगबा
- Yaosang, Wikipediaयाओशांग मेई थाबा, नाकाथेंग, दिनों की गिनती, दोल यात्रा का नाम
- Ek Bharat Shreshtha Bharat, March festivalsबंगाल और ओड़िशा में चैतन्य का जन्मदिन, याओशांग की झोंपड़ी
- Hola Mohalla, SikhNetहोला मोहल्ला, 1701, निहंग सिंह, गतका, दरबार, लंगर, पंज प्यारे, केसगढ़ साहिब
- Hola Mohalla, Wikipediaमोहल्ला शब्द का मतलब, होलगढ़, दिन
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।