पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · वैशाख शुक्ल सप्तमी

गंगा सप्तमी 2027

Ganga Saptami 2027

एक ऋषि ने पूरी नदी पी ली। फिर कान से लौटा दी।

गंगा सप्तमी 2027 में 12 मई, बुधवार को है। वैशाख शुक्ल सप्तमी तिथि रात 1:24 से रात 11:13 तक है। मध्याह्न की पूजा का समय सुबह 10:57 से दोपहर 1:39 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

गंगा सप्तमी का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

उस शाम का चाँद, 43 प्रतिशत रोशन

एक ऋषि की यज्ञशाला। आग जल रही है।

दूर से एक गड़गड़ाहट पास आ रही है।

फिर पानी आता है। यज्ञ की वेदी डूब जाती है।

ऋषि अंजुली उठाते हैं, और पीते जाते हैं, पीते जाते हैं।

धरती पर अब कोई नदी नहीं। बस गीली मिट्टी, और आगे खड़ा एक राजा, हाथ जोड़े।

देवता आते हैं, ऋषि की पूजा करते हैं। ऋषि प्रसन्न होते हैं, और नदी उनके कानों से बाहर निकल आती है।

उस दिन से गंगा का एक नाम और है: जाह्नवी, जह्नु की बेटी।

एक नदी, जो एक बार उतरी और एक बार फिर से जन्मी। और हर बार उसकी कथा कहने वाला कोई और।

2027 में कब

गंगा सप्तमी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़12 मई, बुधवार

तिथिवैशाख शुक्ल सप्तमीरात 1:24 से रात 11:13 तक

नक्षत्रपुष्यसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:33

सूर्यास्तशाम 7:03

चंद्रोदयसुबह 11:05

मध्याह्न
सुबह 10:57 से दोपहर 1:39 तकदिन के पाँच हिस्सों में तीसरा, दोपहर का समय।

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शुभकामना

गंगा सप्तमी का शुभकामना कार्ड

गंगा सप्तमी का शुभकामना कार्ड: गंगा सप्तमी की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

गंगा सप्तमी क्या है

गंगा सप्तमी वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी है। इसे गंगा जयंती, गंगा पूजन दिवस, गंगा जन्मोत्सव और जह्नु सप्तमी भी कहते हैं। गंगा की पूजा का सबसे अच्छा समय मध्याह्न, यानी दोपहर, माना जाता है, इसलिए इसे उस दिन मानते हैं जिस दिन दोपहर में सप्तमी हो। ज़्यादातर परंपराएँ कहती हैं कि यह गंगा के फिर से जन्म का दिन है: जह्नु ऋषि ने उन्हें पी लिया था, और इसी दिन अपने कान से बाहर निकाला। कुछ परंपराएँ इसे वह दिन बताती हैं जब गंगा स्वर्ग से शिव की जटाओं में आईं। गंगा दशहरा इससे अलग है: वह ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को आता है और गंगा के धरती पर उतरने का, या शिव के उन्हें जटाओं से छोड़ने का, दिन माना जाता है; उसका अपना पन्ना है। सीधे कहें तो गंगा दशहरा गंगा का उतरना है, और गंगा सप्तमी उनका दोबारा जन्म। यह कोई बँधे उपवास वाला व्रत नहीं; इस दिन का काम गंगा का स्नान, पूजा, दीपदान और दान है।

कथा

गंगा सप्तमी की कथा

यह कथा वाल्मीकि रामायण के बालकांड में है, जिसे विश्वामित्र राम को सुनाते हैं। अयोध्या के राजा सगर के साठ हज़ार बेटे कपिल मुनि के शाप से राख हो गए थे, और उन्हें मुक्ति तभी मिलती जब गंगा का पानी उनकी राख को छूता। सगर के वंश के भगीरथ ने गंगा को धरती पर लाने के लिए बहुत कठिन तप किया।

गंगा आईं, पर अपने घमंड में। उन्होंने सोचा कि मैं शिव को भी अपनी धार में बहाकर पाताल में ले जाऊँगी। तीन आँखों वाले शिव ने उनका घमंड देखा और उन्हें रोकने की ठानी। गंगा शिव के सिर पर गिरीं और उनकी जटाओं के घने घेरे में, जो हिमालय जैसा था, उलझ गईं। बहुत कोशिश करके भी उन्हें बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला। भगीरथ ने फिर तप किया, और शिव ने प्रसन्न होकर गंगा को बिंदु सरोवर की ओर छोड़ा। वहाँ से सात धाराएँ निकलीं, जिनमें से तीन, ह्लादिनी, पावनी और नलिनी, पूरब की ओर बहीं।

आगे रास्ते में जह्नु नाम के एक बड़े ऋषि यज्ञ कर रहे थे। गंगा का पानी उमड़कर आया और उनकी पूरी यज्ञशाला डुबो दी। जह्नु ने गंगा का यह घमंड देखा तो उन्हें ग़ुस्सा आया, और उन्होंने गंगा का सारा पानी पी लिया। यह देखकर देवता, गंधर्व और ऋषि हैरान रह गए। उन्होंने जह्नु की पूजा की, और गंगा को उनकी बेटी मान लिया।

वाल्मीकि कहते हैं: 'ततस्तुष्टो महातेजाः श्रोत्राभ्यामसृजत्प्रभुः। तस्माज्जह्नुसुता गङ्गा प्रोच्यते जाह्नवीति च॥' (बालकांड 1.43.38)। मतलब: तब प्रसन्न होकर उन तेजस्वी ऋषि ने गंगा को अपने दोनों कानों से बाहर निकाल दिया। इसीलिए गंगा जह्नु की बेटी कहलाती हैं, जाह्नवी।

वाल्मीकि इस घटना की तिथि नहीं बताते। लोक की कथा यह जोड़ती है कि गंगा जह्नु के कान से वैशाख शुक्ल सप्तमी को निकलीं, इसलिए इस दिन को गंगा का दूसरा जन्म कहते हैं। फिर गंगा आगे बढ़ीं, और उनके पानी के छूते ही सगर के साठ हज़ार बेटों को मुक्ति मिली। इसीलिए गंगा को मोक्ष देने वाली कहते हैं।

व्रत

गंगा सप्तमी का व्रत कैसे रखें

  1. सूरज निकलने से पहले उठकर गंगा में, या गंगाजल मिले पानी से, नहाते हैं।
  2. नहाते समय यह मंत्र पढ़ते हैं: 'गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥' यानी गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी, तुम सब इस पानी में आ जाओ।
  3. हाथ में जल और फूल लेकर पुरखों की शांति के लिए संकल्प लेते हैं।
  4. दोपहर, यानी मध्याह्न, तक गंगा की पूजा रुकती है, क्योंकि यही इस दिन की पूजा का सबसे अच्छा समय माना गया है।
  5. शाम को मिट्टी का एक जलता दीया नदी या किसी जलाशय में बहाते हैं।
  6. दिन भर मन गंगा की कथा और नाम में रहता है; उपवास का कोई बँधा नियम नहीं, जो रखना चाहे, अपने घर की रीत से रखता है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

गंगा सप्तमी कोई बँधे उपवास वाला व्रत नहीं है, इसलिए इसका कोई तय पारण भी नहीं। इस दिन का असली काम है सुबह का गंगा स्नान, संकल्प, दोपहर की गंगा पूजा, शाम का दीपदान और दान। जो अपने मन से उपवास रखते हैं, वे यह सब पूरा करके अपने घर की रीत से खोलते हैं। पूजा की दोपहर वाली घड़ी इसी पन्ने पर ऊपर दी है।

उनतालीस लंकाएँ

रामकथाओं में गंगा सप्तमी

उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।

वाल्मीकि रामायण

संस्कृत · Valmiki Ramayana

जह्नु वाली कथा वाल्मीकि रामायण के बालकांड के तैंतालीसवें सर्ग में है, जिसे विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को रास्ते में सुनाते हैं। यहाँ गंगा पहले शिव की जटाओं में उलझती हैं, फिर बिंदु सरोवर से सात धाराएँ बनकर निकलती हैं, और फिर जह्नु की यज्ञशाला डुबोने पर पी ली जाती हैं। जह्नु उन्हें दोनों कानों से लौटाते हैं, और वाल्मीकि साफ़ कहते हैं कि इसी से उनका नाम जाह्नवी पड़ा। यह राम के अपने पुरखों की कथा है, क्योंकि सगर और भगीरथ अयोध्या के ही राजा थे। वाल्मीकि इसे गंगा सप्तमी का नाम नहीं देते; दिन का जोड़ लोक का है।

कहाँ कैसे

गंगा सप्तमी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • हरिद्वार, वाराणसी और प्रयागराज

    गंगा के इन घाटों पर लोग इस दिन नदी में नहाते हैं, और शाम को घाटों पर गंगा आरती होती है।

  • गंगा के किनारे के मेले

    गंगा सप्तमी उन दिनों में गिनी जाती है जब गंगा के किनारे स्नान के मेले लगते हैं, कुंभ, गंगा दशहरा और मकर संक्रांति की तरह। गंगा के मंदिरों में, और दूसरे मंदिरों में भी, इस दिन ख़ास पूजा होती है।

  • नदी से दूर के घर

    जहाँ गंगा पास न हो, वहाँ नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर नहाते हैं और गंगा का स्तोत्र पढ़ते हैं। मान्यता है कि नहाते समय गंगा का मंत्र जपने से भी वैसा ही फल मिलता है।

  • शिव के मंदिर

    गंगा शिव की जटाओं से जुड़ी हैं, इसलिए इस दिन शिवलिंग पर गंगाजल में बेलपत्र चढ़ाते हैं, और शिव मंदिर में घी का दीया जलाकर गंगा का स्तोत्र पढ़ते हैं।

रीत

गंगा सप्तमी के दिन क्या करते हैं

  1. गंगा की मूर्ति या जल भरा कलश रखकर उन्हें सफ़ेद फूल, चंदन और फल चढ़ाते हैं।
  2. शिव की पूजा भी होती है, और महामृत्युंजय मंत्र का जप होता है।
  3. शाम को घाटों पर गंगा आरती होती है, और नदी किनारे कपूर का दीया जलाते हैं।
  4. गंगा स्तोत्र, गंगा स्तुति और गंगा के एक सौ आठ नाम पढ़ते हैं।
  5. ज़रूरतमंदों को कपड़े और दूसरी चीज़ें दान करते हैं; कुछ घर गेहूँ, गुड़, मूँग, चावल, दूध या सफ़ेद फूल भी देते हैं।
  6. घर के लोगों की सेहत की आस में घर में गंगाजल छिड़कते हैं।

सवाल जवाब

गंगा सप्तमी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

गंगा सप्तमी 2027 कब है?

गंगा सप्तमी 2027 में 12 मई, बुधवार को है। वैशाख शुक्ल सप्तमी तिथि रात 1:24 से रात 11:13 तक है। मध्याह्न की पूजा का समय सुबह 10:57 से दोपहर 1:39 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा में क्या अंतर है?

गंगा सप्तमी वैशाख शुक्ल सप्तमी को आती है और जह्नु ऋषि के कान से गंगा के फिर से जन्म का दिन मानी जाती है। गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को आता है और गंगा के धरती पर उतरने, या शिव के उन्हें जटाओं से छोड़ने, का दिन है। कुछ परंपराएँ गंगा सप्तमी को गंगा के शिव की जटाओं में आने का दिन भी कहती हैं।

गंगा को जाह्नवी क्यों कहते हैं?

वाल्मीकि रामायण में कथा है कि गंगा ने जह्नु ऋषि की यज्ञशाला डुबो दी, तो ऋषि ने उनका सारा पानी पी लिया, और फिर प्रसन्न होकर कानों से बाहर निकाला। इसलिए गंगा जह्नु की बेटी, जाह्नवी, कहलाती हैं।

गंगा सप्तमी की पूजा किस समय करें?

स्नान सूरज निकलने से पहले, और गंगा की पूजा मध्याह्न, यानी दोपहर में, जिसे इस दिन का सबसे अच्छा समय माना गया है। शाम को दीपदान होता है। दोपहर की घड़ी इसी पन्ने पर ऊपर दी है।

गंगा के पास न हों तो गंगा सप्तमी कैसे करें?

नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर नहाएँ और नहाते समय गंगा का मंत्र पढ़ें; मान्यता है कि इससे भी वैसा ही फल मिलता है। घर में कलश रखकर गंगा की पूजा करें और शाम को किसी जलाशय में दीया बहाएँ।

क्या गंगा सप्तमी पर व्रत रखना ज़रूरी है?

नहीं। इस दिन के लिए उपवास का कोई बँधा नियम नहीं मिलता। ज़ोर गंगा स्नान, पूजा, दीपदान और दान पर है।

गंगा सप्तमी पर क्या दान करें?

ज़रूरतमंदों को कपड़े और ज़रूरत की चीज़ें। कुछ घर गेहूँ, गुड़, मूँग, चावल, दूध या सफ़ेद फूल भी दान करते हैं।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Valmiki Ramayana, Bala Kanda, Sarga 43, valmikiramayan.netशिव की जटाओं में गंगा, बिंदु सरोवर, सात धाराएँ, जह्नु की यज्ञशाला, पानी पीना, कानों से निकालना, श्लोक 1.43.38, जाह्नवी नाम
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  4. गंगा सप्तमी, भारतकोशगंगा जन्मोत्सव, जटाओं में आने वाली परंपरा, सगर के बेटों की मुक्ति, मोक्षदायिनी, घाटों के मेले
  5. Ganga Saptami, Bhakti Bharatगंगा जयंती, जह्नु सप्तमी, फिर से जन्म वाली कथा, गंगा दशहरा पर उतरना
  6. Ganga Saptami, Ved Panchangहरिद्वार, वाराणसी, प्रयागराज में स्नान, शाम की आरती, जटाओं वाली परंपरा

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।