पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · वैशाख शुक्ल चतुर्दशी

नरसिंह जयंती 2027

Narasimha Jayanti 2027

न दिन, न रात। न भीतर, न बाहर। बस एक खंभा।

नरसिंह जयंती 2027 में 18 मई, मंगलवार को है। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि 18 मई, शाम 4:04 से 19 मई, शाम 4:03 तक है। शाम की पूजा का समय (सायं काल) शाम 4:23 से शाम 7:06 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

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उस शाम का चाँद, 96 प्रतिशत रोशन

आसमान का रंग ऐसा है कि उसे न दिन कह सको, न रात।

सूरज ढल रहा है, पर अँधेरा अभी उतरा नहीं।

मंदिर की देहरी पर एक बच्चा अटका खड़ा है। एक पाँव भीतर, एक बाहर।

घर में आज सुबह से किसी ने अन्न नहीं छुआ। बस घी के दीये जल रहे हैं।

पुजारी जी एक खंभे पर फूल रखते हैं, जैसे उसके भीतर कोई हो।

बच्चा पूछता है: खंभे में कौन है?

एक और बच्चे से यही बात उसके पिता ने पूछी थी। उसने कहा था: वहाँ भी।

और वही कथा समुद्र पार लंका के दरबार तक पहुँची, एक भाई के मुँह से, दूसरे भाई को समझाने।

2027 में कब

नरसिंह जयंती 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़18 मई, मंगलवार

तिथिवैशाख शुक्ल चतुर्दशी18 मई, शाम 4:04 से 19 मई, शाम 4:03 तक

नक्षत्रचित्रासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:29

सूर्यास्तशाम 7:06

चंद्रोदयशाम 5:17

सायं काल
शाम 4:23 से शाम 7:06 तकसूर्यास्त से पहले दिन का आख़िरी पाँचवाँ हिस्सा।

चतुर्दशी 18 मई की शाम 4:04 से 19 मई की शाम 4:03 तक है। भगवान नरसिंह संध्या के समय प्रकट हुए थे, इसलिए जयंती उस दिन मनाई जाती है जिस दिन शाम को चतुर्दशी हो, और वह दिन 18 मई है। जो पंचांग सूर्योदय की तिथि लेते हैं, वे 19 मई बताते हैं।

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शुभकामना

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नरसिंह जयंती का शुभकामना कार्ड: नरसिंह जयंती की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

नरसिंह जयंती क्या है

नरसिंह जयंती विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह के प्रकट होने का दिन है। नरसिंह यानी आधा सिंह और आधा नर, वह रूप जो भक्त प्रह्लाद को बचाने और उसके पिता हिरण्यकशिपु को मारने आया। यह वैशाख के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को आती है, इसलिए इसे नरसिंह चतुर्दशी भी कहते हैं। मान्यता है कि नरसिंह सायंकाल में प्रकट हुए, यानी सूरज डूबने से पहले वाली शाम की घड़ी में, जब चतुर्दशी चल रही थी। इसलिए जयंती उस दिन मानते हैं जिस दिन सायंकाल में चतुर्दशी हो। कुछ कैलेंडर सूर्योदय वाली तिथि लेते हैं, यानी वह दिन जिसकी सुबह चतुर्दशी हो, और इसलिए उनमें कभी कभी जयंती एक दिन बाद लिखी मिलती है। स्वाति नक्षत्र साथ हो तो इस व्रत को और भी शुभ मानते हैं। आंध्र का अहोबिलम नरसिंह की पूजा का केंद्र माना जाता है, और तमिलनाडु के मेलट्टूर में इसी रात प्रह्लाद की कथा मंच पर खेली जाती है।

कथा

नरसिंह जयंती की कथा

भागवत पुराण के सातवें स्कंध में कथा है। दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु अमर होना चाहता था। उसने ब्रह्मा के लिए कड़ा तप किया, और जब ब्रह्मा वर देने आए तो उसने ऐसा वर माँगा कि मौत के लिए कोई रास्ता ही न बचे: “नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपि चायुधैः। न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्न मृगैरपि॥” (भागवत 7.3.36) यानी मेरी मौत न घर के भीतर हो, न बाहर; न दिन में, न रात में; न किसी हथियार से; न धरती पर, न आकाश में; न किसी आदमी से, न किसी पशु से। वर मिल गया, और हिरण्यकशिपु अपने को अमर समझने लगा।

पर उसके अपने घर में उसका बेटा प्रह्लाद विष्णु का भक्त निकला। पिता ने बहुत समझाया, फिर डराया, फिर मारने के उपाय किए। भागवत गिनाता है: हाथियों से कुचलवाया, ज़हरीले साँपों से कटवाया, पहाड़ से फिंकवाया, ज़हर दिया, भूखा रखा, क़ैद किया, ठंड, हवा, आग और पानी में डाला, और भारी पत्थरों के नीचे दबाया। प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। आख़िर एक दिन भरी सभा में हिरण्यकशिपु ने पूछा: “क्वासौ यदि स सर्वत्र कस्मात् स्तम्भे न दृश्यते” (भागवत 7.8.12) यानी कहाँ है तेरा भगवान? अगर वह हर जगह है, तो इस खंभे में क्यों नहीं दिखता? प्रह्लाद ने कहा, वह इसमें भी है। हिरण्यकशिपु तलवार लेकर आसन से उछला और खंभे पर मुक्का मारा।

खंभे से ऐसी गरज उठी कि ब्रह्मा जैसे देवताओं को लगा, उनके लोक टूट रहे हैं। भागवत कहता है: “सत्यं विधातुं निजभृत्यभाषितं व्याप्तिं च भूतेष्वखिलेषु चात्मनः। अदृश्यतात्यद्भुतरूपमुद्वहन् स्तम्भे सभायां न मृगं न मानुषम्॥” (भागवत 7.8.17) यानी अपने सेवक की बात सच करने के लिए, और यह दिखाने के लिए कि वे हर जीव में हैं, भगवान सभा के उस खंभे में एक ऐसे रूप में दिखे जो न पशु था, न मनुष्य। हिरण्यकशिपु गदा लेकर टूट पड़ा। नरसिंह ने उसे ऐसे पकड़ा जैसे गरुड़ साँप को पकड़ते हैं। वह छूट गया, फिर तलवार और ढाल लेकर लौटा, और नरसिंह ज़ोर से हँसे और उसे फिर पकड़ लिया।

फिर वह घड़ी आई जिसमें वर का हर कोना एक एक करके हार गया। साँझ थी, जो न दिन है न रात। सभा का द्वार था, जो न भीतर है न बाहर। नरसिंह ने उसे अपनी जाँघों पर रखा, जो न धरती है न आकाश। और अपने नाख़ूनों से उसे चीर दिया, जो हथियार नहीं हैं। और मारने वाला न नर था, न पशु। इसके बाद नरसिंह हिरण्यकशिपु के सिंहासन पर जा टिके, और किसी देवता की हिम्मत उनके पास जाने की नहीं हुई। तब प्रह्लाद आगे आए, हाथ जोड़कर लंबी स्तुति की, और भगवान का ग़ुस्सा शांत हुआ।

इस दिन जो व्रत कथा पढ़ते हैं, वह प्रह्लाद के पिछले जन्म की है। हरिभक्तिविलास इसे बृहन्नरसिंह पुराण से कहता है। प्रह्लाद ने एक दिन नरसिंह से पूछा, मेरे भीतर आपकी इतनी भक्ति कहाँ से आई? नरसिंह बोले: पिछले जन्म में तुम अवंतीपुर के विद्वान ब्राह्मण वसुशर्मा के पाँच बेटों में सबसे छोटे थे, नाम था वासुदेव। तुमने शास्त्र छोड़ दिए थे, शराब पीते थे और एक गणिका के घर पड़े रहते थे। एक दिन उस गणिका से तुम्हारा झगड़ा हुआ। उस दिन तुमने खाना नहीं खाया, वह भी भूखी रही, और रात भर तुम दोनों में से कोई नहीं सोया। वह दिन वैशाख शुक्ल चतुर्दशी था। अनजाने में तुम दोनों ने मेरा व्रत और जागरण कर लिया, और उसी से दोनों पवित्र हो गए। वह गणिका स्वर्ग में अप्सरा बनी, और तुम इस जन्म में प्रह्लाद। कथा आगे कहती है कि यही व्रत ब्रह्मा ने सृष्टि रचने की शक्ति पाने के लिए रखा था, और शिव ने त्रिपुरासुर को जीतने के लिए।

व्रत

नरसिंह जयंती का व्रत कैसे रखें

  1. जयंती से एक दिन पहले, यानी त्रयोदशी को, बस एक बार हल्का खाना खाते हैं।
  2. जयंती की सुबह जल्दी उठकर, भगवान को याद करते हुए व्रत का मन बनाते हैं, और संकल्प मध्याह्न में लेते हैं, यानी दोपहर के बीच वाले हिस्से में।
  3. व्रत के नियम एकादशी जैसे हैं: पूरे दिन किसी तरह का अनाज नहीं खाते।
  4. दिन भर बुरी संगत, बेकार की बातों और शतरंज जैसे खेलों से दूर रहते हैं।
  5. सायंकाल की पूजा के बाद व्रत कथा सुनते हैं: प्रह्लाद के पिछले जन्म की कथा और नरसिंह जयंती का माहात्म्य।
  6. रात को जागरण होता है: भजन, कीर्तन, बाजे और पुराण का पाठ, सुबह तक।
  7. व्रत रात भर चलता है, और अगली सुबह की पूजा के बाद ही खुलता है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

नरसिंह जयंती का पारण अगले दिन होता है। सीधा नियम यह है कि अगले दिन सूर्योदय के बाद, जब चतुर्दशी ख़त्म हो चुकी हो, तब विसर्जन पूजा करके और ब्राह्मण को दान देकर व्रत खोलें। अगर चतुर्दशी सूर्योदय से पहले ही ख़त्म हो गई हो, तो सूर्योदय के बाद जयंती की बाक़ी विधि पूरी करके कभी भी पारण कर सकते हैं। और अगर चतुर्दशी दिन के तीन चौथाई हिस्से से भी आगे तक चले, तो पारण दिन के पहले आधे हिस्से में कर लेते हैं। वैष्णव रीत में सुबह फिर नहाकर पूजा होती है, आचार्य को खाना और ब्राह्मणों को दक्षिणा देते हैं, और फिर भगवान का ध्यान करते हुए मित्रों के साथ प्रसाद लेते हैं।

उनतालीस लंकाएँ

रामकथाओं में नरसिंह जयंती

उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।

कंब रामायण

तमिल · Kamba Ramayanam

कंबन के कंब रामायणम् में नरसिंह की पूरी कथा रामकथा के भीतर आती है, युद्धकांड की शुरुआत में, हिरण्यकशिपु वधै पडलम् में, यानी हिरण्यकशिपु के वध वाले अध्याय में। राम और वानर लंका पहुँच चुके हैं, और रावण के दरबार में युद्ध की सलाह चल रही है। रावण विभीषण का मज़ाक उड़ाता है कि वह राम को भगवान मानता है। तब विभीषण उसका घमंड तोड़ने के लिए प्रह्लाद और हिरण्यकशिपु की कथा सुनाते हैं: दिखा मुझे इस खंभे में, नरसिंह का निकलना, और उनकी गरजती हँसी। कंबन के प्रह्लाद आख़िर में अपने पिता के लिए भी क्षमा माँगते हैं। पर रावण कथा से कुछ नहीं सीखता। उलटे प्रह्लाद की तारीफ़ पर विभीषण को ताना देता है और दरबार से निकाल देता है। और विभीषण राम की शरण में चले जाते हैं। यानी कंबन के यहाँ नरसिंह की कथा ही वह मोड़ है जिस पर लंका का एक भाई दूसरी तरफ़ चला गया।

कहाँ कैसे

नरसिंह जयंती कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • मेलट्टूर (तमिलनाडु)

    मेलट्टूर और पास के सालियमंगलम और तेप्पेरुमानल्लूर गाँवों में नरसिंह जयंती पर भागवत मेला होता है, यानी नाच और गाने वाला नाटक, और उसकी पहली रात प्रह्लाद चरितम् खेलते हैं। नरसिंह का मुखौटा मेलट्टूर के मंदिर में रहता है; जयंती से एक दिन पहले विधि से उसकी शक्ति पानी भरे कलश में ली जाती है, मुखौटा चुपचाप धोकर फिर से रंगा जाता है, और प्राण प्रतिष्ठा से शक्ति लौटाई जाती है। सुबह होते होते नरसिंह मंच पर आते हैं, और कहते हैं कि मुखौटा पहनने वाला कलाकार तब अपने आप में नहीं रहता।

  • अहोबिलम (आंध्र प्रदेश)

    अहोबिलम को नरसिंह की पूजा का केंद्र मानते हैं, और मान्यता है कि विष्णु ने यहीं नरसिंह का रूप लिया। यहाँ नरसिंह के नौ मंदिर हैं, जैसे ज्वाला नरसिंह, मालोल नरसिंह, योगानंद नरसिंह और भार्गव नरसिंह। अहोबिल नरसिंह वाले मंदिर में उग्र नरसिंह खंभे से निकलते रूप में पूजे जाते हैं।

  • वैष्णव परंपरा के घर

    हरिभक्तिविलास को मानने वाले वैष्णव यह व्रत नियम से रखते हैं, और जिस चतुर्दशी में त्रयोदशी मिली हो, उस दिन व्रत नहीं रखते। वे रात भर जागकर नाचते, गाते और पुराण सुनते हैं।

रीत

नरसिंह जयंती के दिन क्या करते हैं

  1. नरसिंह की मुख्य पूजा सायंकाल में होती है, सूरज डूबने से पहले वाली घड़ी में, क्योंकि मान्यता है कि वे उसी घड़ी प्रकट हुए थे; ठीक घड़ी पंचांग में देखते हैं।
  2. पूजा की जगह गोबर से लीपकर उस पर आठ पंखुड़ियों वाला कमल बनाते हैं।
  3. कमल पर चावल से भरा ताँबे का कलश रखते हैं, और उस पर लक्ष्मी और नरसिंह की मूर्ति।
  4. हरि की पूजा से पहले प्रह्लाद की पूजा होती है।
  5. फिर फूल, धूप, घी के दीये और नैवेद्य, यानी भोग, चढ़ाकर मंत्रों के साथ अर्घ्य देते हैं, यानी जल चढ़ाते हैं।
  6. पूजा में पुराणों के मंत्र पढ़ते हैं, और किसी शांत, जानकार पुजारी जी से पूजा कराना अच्छा माना गया है।
  7. अगली सुबह फिर पूजा करके मूर्ति को गंगा में विसर्जित करते हैं।

सवाल जवाब

नरसिंह जयंती 2027: पूछे जाने वाले सवाल

नरसिंह जयंती 2027 कब है?

नरसिंह जयंती 2027 में 18 मई, मंगलवार को है। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी तिथि 18 मई, शाम 4:04 से 19 मई, शाम 4:03 तक है। शाम की पूजा का समय (सायं काल) शाम 4:23 से शाम 7:06 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

नरसिंह जयंती का पारण कब करें?

अगले दिन सूर्योदय के बाद, जब चतुर्दशी ख़त्म हो जाए, विसर्जन पूजा और दान के बाद। चतुर्दशी सूर्योदय से पहले ख़त्म हो गई हो तो सूर्योदय के बाद विधि पूरी करके पारण कर सकते हैं।

नरसिंह जयंती के व्रत में क्या खाएँ?

इसके नियम एकादशी के व्रत जैसे हैं, इसलिए पूरे दिन कोई अनाज नहीं खाते। एक दिन पहले बस एक बार हल्का खाना खाते हैं।

नरसिंह की पूजा शाम को क्यों होती है?

मान्यता है कि नरसिंह शाम की घड़ी में प्रकट हुए थे, जब चतुर्दशी चल रही थी। भागवत में हिरण्यकशिपु का वध भी साँझ को, सभा के द्वार पर होता है, क्योंकि उसका वर दिन और रात दोनों में मौत रोकता था।

कुछ कैलेंडर में नरसिंह जयंती एक दिन बाद क्यों लिखी होती है?

ज़्यादातर पंचांग वह दिन लेते हैं जिसकी शाम को चतुर्दशी हो। कुछ कैलेंडर सूर्योदय वाली तिथि लेते हैं, यानी वह दिन जिसकी सुबह चतुर्दशी हो, और वह कभी कभी अगला दिन निकलता है।

नरसिंह जयंती की व्रत कथा क्या है?

यह प्रह्लाद के पिछले जन्म की कथा है: वे अवंतीपुर के वासुदेव नाम के ब्राह्मण थे, जिन्होंने एक झगड़े के कारण अनजाने में इस दिन भूखे रहकर रात भर जागरण कर लिया, और उसी व्रत के फल से प्रह्लाद बनकर जन्मे।

हिरण्यकशिपु को क्या वरदान मिला था?

भागवत 7.3.36 में है कि उसकी मौत न भीतर हो न बाहर, न दिन में न रात में, न धरती पर न आकाश में, न किसी हथियार से, न आदमी से न पशु से। नरसिंह ने साँझ को, द्वार पर, अपनी जाँघों पर रखकर, नाख़ूनों से उसे मारा।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Narasimha Jayanti, Drik Panchangवैशाख शुक्ल चतुर्दशी, सायंकाल पूजा, मध्याह्न संकल्प, एकादशी जैसे नियम, जागरण, विसर्जन, पारण के तीनों नियम, स्वाति नक्षत्र, व्रत कथा
  2. Srimad Bhagavatam 7.3.36, VedaBaseहिरण्यकशिपु का वर, श्लोक 7.3.36
  3. Srimad Bhagavatam 7.5.43 and 44, VedaBaseप्रह्लाद को मारने के उपाय
  4. Srimad Bhagavatam Canto 7 Chapter 8, VedaBaseश्लोक 7.8.12 और 7.8.17, खंभा, नरसिंह की हँसी, साँझ, द्वार, जाँघ, नाख़ून, सिंहासन
  5. How Prahlada Became a Devotee of Nrsimhadeva (Hari Bhakti Vilasa 14), Shyamasundara Dasaप्रह्लाद के पिछले जन्म की व्रत कथा, वासुदेव और वसुशर्मा, ब्रह्मा और शिव का व्रत, पूजा की विधि, त्रयोदशी वाला नियम, जागरण, सुबह का पारण
  6. Narasimha in Kamba Ramayana, eSamskritiहिरण्यकशिपु वधै पडलम्, विभीषण का रावण को कथा सुनाना, नरसिंह की हँसी, प्रह्लाद की क्षमा की माँग
  7. Bhagavata Mela Masks, IGNCAमेलट्टूर, सालियमंगलम, तेप्पेरुमानल्लूर, जयंती पर भागवत मेला, प्रह्लाद चरितम्, मुखौटे की विधि
  8. Nava Narasimha temples of Ahobilam, Northeast Nowअहोबिलम नरसिंह पूजा का केंद्र, नौ मंदिर, खंभे से निकले उग्र नरसिंह

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।