पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · माघ शुक्ल अष्टमी

भीष्म अष्टमी 2027

Bhishma Ashtami 2027

जिसका कोई बेटा नहीं था, आज उसके लिए हर घाट पर जल गिरता है।

भीष्म अष्टमी 2027 में 14 फ़रवरी, रविवार को है। माघ शुक्ल अष्टमी तिथि 14 फ़रवरी, रात 2:07 से 15 फ़रवरी, रात 12:42 तक है। मध्याह्न की पूजा का समय सुबह 11:29 से दोपहर 1:42 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

भीष्म अष्टमी का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

उस शाम का चाँद, 52 प्रतिशत रोशन

हथेली में थोड़े से काले तिल हैं, और उन पर नदी का ठंडा पानी।

पानी अँगूठे की ओर से नहीं गिरता। चारों उँगलियों के सिरों से टपकता है।

घाट पर एक जवान भी खड़ा है। उसके पिता घर पर हैं, ठीक ठाक। फिर भी आज वह जल दे रहा है।

यह जल अपने पुरखों के लिए नहीं है।

यह उसके लिए है जिसने ब्याह नहीं किया, जिसका कोई बेटा नहीं हुआ।

अट्ठावन रातें वह तीरों पर लेटा रहा, सूरज के उत्तर की ओर मुड़ने की राह देखता।

फिर माघ का उजला पखवाड़ा आया।

आज घाट पर जितने हाथ हैं, सब उसी के बेटों के हाथ हैं।

2027 में कब

भीष्म अष्टमी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़14 फ़रवरी, रविवार

तिथिमाघ शुक्ल अष्टमी14 फ़रवरी, रात 2:07 से 15 फ़रवरी, रात 12:42 तक

नक्षत्रकृत्तिकासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 7:01

सूर्यास्तशाम 6:10

चंद्रोदयसुबह 11:11

मध्याह्न
सुबह 11:29 से दोपहर 1:42 तकदिन के पाँच हिस्सों में तीसरा, दोपहर का समय।

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शुभकामना

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भीष्म अष्टमी का शुभकामना कार्ड: भीष्म अष्टमी की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

भीष्म अष्टमी क्या है

भीष्म अष्टमी माघ महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी है, और मान्यता है कि इसी दिन भीष्म पितामह ने प्राण छोड़े थे। यह उनकी पुण्यतिथि है, कोई ख़ुशी का त्योहार नहीं। इस दिन भीष्म के नाम का तर्पण और अर्घ्य होता है, और इसका सबसे अच्छा समय मध्याह्न, यानी दोपहर का माना जाता है, इसलिए इसे उस दिन रखते हैं जिस दिन दोपहर में अष्टमी हो। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म ख़ुद कहते हैं कि माघ का चंद्र महीना आ गया है और यह उजला पखवाड़ा है; पर इसे अष्टमी से जोड़ना परंपरा की बात है। इस दिन की सबसे अलग बात यह है कि भीष्म का तर्पण वे भी करते हैं जिनके पिता जीवित हैं, क्योंकि भीष्म का अपना कोई बेटा नहीं था। बंगाल और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में लोग यह दिन ख़ास तौर पर रखते हैं, और विष्णु के मंदिरों में भी इसकी पूजा होती है। तीन दिन बाद आने वाली माघ शुक्ल एकादशी को उन्हीं की याद में भीष्म एकादशी भी कहते हैं।

कथा

भीष्म अष्टमी की कथा

भीष्म का पहला नाम देवव्रत था। वे राजा शांतनु और गंगा के बेटे थे। जब शांतनु सत्यवती से ब्याह करना चाहते थे, तो देवव्रत ने पिता के लिए राजगद्दी छोड़ दी और जीवन भर ब्याह न करने की प्रतिज्ञा ली। ऐसी कठिन प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम भीष्म पड़ा। पिता ने उन्हें वर दिया कि मौत उनके पास तभी आएगी जब वे ख़ुद चाहेंगे। इसे इच्छा मृत्यु कहते हैं।

कुरुक्षेत्र के युद्ध में भीष्म कौरवों के सेनापति थे। दसवें दिन, जब शिखंडी सामने था, अर्जुन के बाणों से वे रथ से गिरे, और इतने तीर उनके शरीर में थे कि वे तीरों की ही सेज पर टिके रहे। पर उन्होंने प्राण नहीं छोड़े। उस समय सूरज दक्षिण की चाल में था, और भीष्म उत्तरायण की राह देखने लगे, क्योंकि उस समय देह छोड़ना सबसे शुभ माना जाता था। इन्हीं दिनों उन्होंने युधिष्ठिर को धर्म, राजधर्म और मोक्ष की बातें सिखाईं, और जब युधिष्ठिर ने पूछा कि किसका जप करें, तो उन्हें विष्णु के हज़ार नाम, विष्णु सहस्रनाम, दिए।

महाभारत के अनुशासन पर्व में आगे की कथा है। युधिष्ठिर पचास रातें हस्तिनापुर में रहे। फिर जब उन्होंने देखा कि सूरज ने दक्षिण जाना छोड़कर उत्तर की ओर चलना शुरू कर दिया है, तो वे घी, मालाएँ, चंदन और अंतिम संस्कार की सब चीज़ें लेकर निकल पड़े। साथ में धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, चारों भाई, कृष्ण और विदुर थे। भीष्म के चारों ओर व्यास, नारद, देवल और असित जैसे ऋषि थे। युधिष्ठिर ने पास जाकर कहा: मैं युधिष्ठिर हूँ, सब तैयारी हो गई है। भीष्म ने कहा: अट्ठावन रातें मुझे इस सेज पर लेटे हो गईं। इन तीखे तीरों पर यह समय मुझे सौ बरस जैसा लगा। युधिष्ठिर, माघ का चंद्र महीना आ गया है, यह उजला पखवाड़ा है, और मेरे हिसाब से इसका एक चौथाई बीत चुका होगा।

फिर भीष्म ने धृतराष्ट्र से कहा, दुख मत करो, जो होना था वही हुआ। कृष्ण से उन्होंने जाने की आज्ञा माँगी, और कृष्ण बोले: भीष्म, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। सबसे विदा लेते हुए भीष्म ने आख़िरी सीख दी: सत्य ही सबसे बड़ी ताक़त है। फिर वे चुप हो गए और अपने प्राणों को योग से ऊपर की ओर खींचने लगे। प्राण जिस जिस अंग से ऊपर उठते, वह अंग तीरों के दर्द से छूट जाता, यहाँ तक कि पूरा शरीर बिना घाव और बिना पीड़ा का हो गया। आख़िर में प्राण सिर के सबसे ऊपर के हिस्से को भेदकर आकाश की ओर निकल गए। आकाश में नगाड़े बजे, फूल बरसे, और उनकी आत्मा एक बड़ी उल्का की तरह चमकती हुई आसमान में उठी और ओझल हो गई।

पांडवों और विदुर ने चिता बनाई और भीष्म का दाह संस्कार हुआ। फिर सब भागीरथी के किनारे गए और भीष्म को जल दिया। तभी गंगा पानी से बाहर आईं, रोती हुईं। वे बोलीं: मेरा बेटा, जिसे परशुराम भी नहीं हरा सके, वह शिखंडी के हाथों गिरा; मेरा दिल ज़रूर पत्थर का है जो अब भी नहीं फटा। तब कृष्ण ने उन्हें समझाया: भीष्म आठ वसुओं में से एक थे, जो शाप से मनुष्य बने थे, और अब वे सबसे ऊँचे लोक में गए हैं। उन्हें शिखंडी ने नहीं, क्षत्रिय के धर्म के अनुसार अर्जुन ने युद्ध में गिराया, और धनुष हाथ में हो तो उन्हें इंद्र भी नहीं मार सकते थे। मन का दुख छोड़ दो। गंगा का दुख शांत हुआ।

व्रत

भीष्म अष्टमी का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह जल्दी नहाते हैं, हो सके तो नदी में, और भीष्म पितामह और अपने पुरखों के नाम का संकल्प लेते हैं।
  2. दिन भर व्रत रखते हैं, पूरा या आधा: फल और दूध ले सकते हैं, अन्न और नमक नहीं।
  3. व्रत का सबसे बड़ा काम दोपहर का है: मध्याह्न में, नदी किनारे या घर पर, काले तिल, पानी और कुश से भीष्म का तर्पण और अर्घ्य।
  4. पुराना नियम कहता है: 'माघे मासे सिताष्टम्यां सतिलं भीष्मतर्पणम्। जीवत्पितापि कुर्वीत तर्पणं यमभीष्मयोः॥' यानी माघ की उजली अष्टमी को तिल के साथ भीष्म का तर्पण हो, और जिसके पिता जीवित हों, वह भी यम और भीष्म का तर्पण करे।
  5. जिनके पिता नहीं रहे, वे चाहें तो भीष्म के नाम का एकोद्दिष्ट श्राद्ध भी करते हैं।
  6. शाम को हल्के सात्विक खाने से व्रत खोलते हैं।

पारण: व्रत कैसे खोलें

भीष्म अष्टमी का व्रत दिन का व्रत है; इसमें अगली सुबह या चाँद की राह नहीं देखनी पड़ती। दोपहर का तर्पण और अर्घ्य हो जाने के बाद, शाम को हल्का सात्विक खाना लेकर व्रत खोलते हैं। जो पूरा उपवास न रख सकें, वे दिन में फल और दूध ले लेते हैं, पर अन्न और नमक नहीं। माध्व परंपरा यह भी कहती है कि भीष्म को दिया गया जल पितरों वाला तर्पण नहीं, एक अर्घ्य है, इसलिए इस दिन रात के खाने पर कोई रोक नहीं, जैसी पितरों के श्राद्ध वाले दिन होती है। तर्पण की दोपहर वाली घड़ी इसी पन्ने पर ऊपर दी है।

कहाँ कैसे

भीष्म अष्टमी कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • गंगा और नदियों के घाट

    लोग नदी किनारे भीष्म का तर्पण करते हैं और उसी तरह अपने पुरखों को भी जल देते हैं। गंगा में डुबकी लगाकर उबले चावल और तिल अर्पित करने की रीत है।

  • बंगाल और दक्षिण भारत

    इन इलाक़ों में लोग भीष्म अष्टमी ख़ास तौर पर मानते हैं। माता पिता भीष्म के नाम पर अर्पण करते हैं, इस आस में कि उनके बेटों में भी भीष्म जैसे गुण आएँ।

  • विष्णु और इस्कॉन के मंदिर

    यहाँ यह दिन भीष्म के सत्य, संयम और वीरता को याद करने का दिन है। मंदिरों में विष्णु या नारायण की पूजा होती है और विष्णु सहस्रनाम का मिलकर पाठ होता है, वही नाम जो भीष्म ने तीरों की सेज से युधिष्ठिर को दिए थे।

  • माध्व परंपरा के घर

    यहाँ भीष्माचार्य का तर्पण इस दिन का ज़रूरी काम है, उन लोगों के लिए भी जिनके पिता जीवित हैं। जिनके पिता नहीं रहे, वे एकोद्दिष्ट श्राद्ध भी करते हैं, यानी एक ही आत्मा के नाम का श्राद्ध।

रीत

भीष्म अष्टमी के दिन क्या करते हैं

  1. जिनके पिता जीवित हैं, वे जनेऊ बाएँ कंधे पर रखकर चावल और जल से तर्पण करते हैं; बाक़ी लोग जनेऊ दाएँ कंधे पर रखकर तिल से।
  2. तर्पण का मंत्र है: 'वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च। गङ्गापुत्राय भीष्माय आजन्मब्रह्मचारिणे॥' मतलब: वैयाघ्रपद गोत्र और सांकृत्य प्रवर वाले, गंगा के बेटे, जन्म से ब्रह्मचारी भीष्म को यह जल।
  3. फिर तिल मिला जल अँगूठे से नहीं, चारों उँगलियों के सिरों से अर्घ्य की तरह देते हैं, यह कहते हुए: 'वसूनामवताराय शन्तनोरात्मजाय च। अर्घ्यं ददामि भीष्माय आबालब्रह्मचारिणे॥' यानी वसुओं के अवतार, शांतनु के बेटे, बचपन से ब्रह्मचारी भीष्म को मैं अर्घ्य देता हूँ।
  4. तर्पण के बाद एक छोटी वेदी बनाकर उस पर फूल, फल और दूध की मिठाई रखते हैं।
  5. विष्णु की पूजा होती है, और विष्णु सहस्रनाम या महाभारत के श्लोक पढ़ते हैं।
  6. भीष्म के नाम पर पुजारियों या ज़रूरतमंदों को खाना खिलाते हैं; खाने और कपड़ों का दान बड़े पुण्य का काम माना गया है।
  7. यह शोक और याद का दिन है, इसलिए इसमें बधाई या उत्सव जैसी कोई रीत नहीं; दिन भीष्म के सत्य और संयम को याद करने में जाता है।
  8. कई लोग तीन दिन बाद की भीष्म एकादशी तक भीष्म को याद करते हैं और उनके नाम का तर्पण करते हैं।

सवाल जवाब

भीष्म अष्टमी 2027: पूछे जाने वाले सवाल

भीष्म अष्टमी 2027 कब है?

भीष्म अष्टमी 2027 में 14 फ़रवरी, रविवार को है। माघ शुक्ल अष्टमी तिथि 14 फ़रवरी, रात 2:07 से 15 फ़रवरी, रात 12:42 तक है। मध्याह्न की पूजा का समय सुबह 11:29 से दोपहर 1:42 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

भीष्म अष्टमी पर तर्पण कौन कर सकता है?

हर कोई, वे भी जिनके पिता जीवित हैं। आम तौर पर पिता के रहते पितरों का तर्पण नहीं होता, पर भीष्म का अपना कोई बेटा नहीं था, इसलिए इस दिन उनका तर्पण सबके लिए बताया गया है। जिनके पिता जीवित हैं वे तिल की जगह चावल और जल से करते हैं।

भीष्म कितने दिन बाणों की सेज पर रहे?

महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म ख़ुद कहते हैं कि वे अट्ठावन रातों से इस सेज पर लेटे हैं। कुछ परंपराओं में यह गिनती अड़तालीस दिन की भी मिलती है।

भीष्म ने प्राण छोड़ने के लिए उत्तरायण की राह क्यों देखी?

उन्हें पिता से इच्छा मृत्यु का वर मिला था, यानी वे अपनी मौत का समय ख़ुद चुन सकते थे। उत्तरायण, सूरज की उत्तर की चाल का समय, देह छोड़ने के लिए सबसे शुभ माना जाता था, और मान्यता है कि इस समय देह छोड़ने वाला स्वर्ग जाता है।

भीष्म अष्टमी के व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल और दूध। अन्न और नमक नहीं खाया जाता। शाम को, तर्पण के बाद, हल्के सात्विक खाने से व्रत खुलता है।

भीष्म एकादशी क्या है?

भीष्म अष्टमी के तीन दिन बाद आने वाली माघ शुक्ल एकादशी को भीष्म की याद में भीष्म एकादशी भी कहते हैं। विष्णु सहस्रनाम भीष्म ने ही युधिष्ठिर को दिया था, इसलिए इन दिनों लोग उसका पाठ ख़ास तौर पर करते हैं।

भीष्म अष्टमी पर क्या दान करें?

खाना और कपड़े। भीष्म के नाम पर पुजारियों या ज़रूरतमंदों को भोजन कराना भी इस दिन की रीत है।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Mahabharata, Anusasana Parva, Section 167, sacred-texts.comयुधिष्ठिर का आना, सूरज का उत्तर मुड़ना, अट्ठावन रातें, माघ का उजला पखवाड़ा, कृष्ण की आज्ञा, सत्य वाली सीख
  2. Mahabharata, Anusasana Parva, Section 168, sacred-texts.comप्राणों का ऊपर उठना, सिर से निकलना, उल्का, दाह संस्कार, गंगा का विलाप, कृष्ण का समझाना
  3. Mahabharata Anushasana Parva Chapter 167, Krishnakoshअट्ठावन रातें और माघ के पखवाड़े वाले वचन का मिलान
  4. Bheeshmashtami, Madhwa Sakhaपिता के रहते भी तर्पण, सव्य और अपसव्य, चार उँगलियों का अर्घ्य, अर्घ्य और तर्पण के मंत्र, रात के खाने पर रोक नहीं, विष्णु और इस्कॉन मंदिर, अड़तालीस दिन वाली गिनती
  5. Bhishma Ashtami, Wikipediaमाघ शुक्ल अष्टमी, इच्छा मृत्यु, बंगाल और दक्षिण भारत, घाट पर तर्पण, चावल और तिल, एकोद्दिष्ट श्राद्ध, बेटों के गुणों की आस
  6. Bhishma Ashtami: significance and rituals, Hindu Toneमध्याह्न का समय, तिल, कुश और पानी, व्रत में फल दूध, अन्न नमक नहीं, शाम का भोजन, सहस्रनाम पाठ, देवव्रत की प्रतिज्ञा, दसवाँ दिन
  7. Bheeshma Tarpanam, Hindu Toneसुबह का स्नान और संकल्प, तिल और जल, भीष्म के नाम पर भोजन
  8. Guiding Light: Bhishma Ekadashi, Free Press Journalविष्णु सहस्रनाम, माघ शुक्ल अष्टमी, तीन दिन बाद की भीष्म एकादशी

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।