पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी

हेरथ 2027

Herath 2027

एक घड़ा पानी, मुट्ठी भर अखरोट, और रात भर शिव।

हेरथ 2027 में 5 मार्च, शुक्रवार को है। फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी तिथि 5 मार्च, सुबह 9:54 से 6 मार्च, दोपहर 12:04 तक है। निशीथ काल की पूजा 6 मार्च, रात 12:08 से रात 12:57 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

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उस शाम का चाँद, 8 प्रतिशत रोशन

एक मुट्ठी खुलती है, और अखरोट एक एक कर पानी में उतरते हैं।

मिट्टी का घड़ा ताज़े पानी से भरा है। घर के लोग इसे वटुक कहते हैं।

दीवारें पिछले हफ़्ते पुती थीं। घर का हर कोना धुला है।

रसोई से मछली और कमल ककड़ी की ख़ुशबू आ रही है। यहाँ यह रात भूखे रहने की नहीं, भोग की है।

रात भर पूजा चलती है। घड़ों पर फूल हैं, आगे दीया।

अखरोट अभी कई दिन इसी पानी में रहेंगे। अमावस को निकलेंगे, और घर घर बँटेंगे।

कल सुबह दरवाज़े खुले रहेंगे। रिश्तेदार आएँगे, पड़ोसी आएँगे, बच्चों की मुट्ठी में हेरथ ख़र्च होगा।

बाक़ी देश की शिवरात्रि से एक दिन पहले, कश्मीर की अपनी रात, अपनी कथा।

2027 में कब

हेरथ 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़5 मार्च, शुक्रवार

तिथिफाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी5 मार्च, सुबह 9:54 से 6 मार्च, दोपहर 12:04 तक

नक्षत्रश्रवणसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 6:43

सूर्यास्तशाम 6:23

चंद्रोदयसुबह 4:52

निशीथ काल
6 मार्च, रात 12:08 से रात 12:57 तकआधी रात के आसपास का मुहूर्त, रात के पंद्रह हिस्सों में आठवाँ।

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शुभकामना

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पहचान

हेरथ क्या है

हेरथ कश्मीरी पंडितों की शिवरात्रि है। नाम संस्कृत के हररात्रि से आया है, यानी हर की रात, और हर शिव का एक नाम है। बाक़ी भारत फागुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि रखता है, पर कश्मीरी पंडित इसे एक दिन पहले, फागुन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को रखते हैं। तंत्र के ग्रंथ इसे भैरवोत्सव कहते हैं, भैरव का उत्सव। यह एक रात का नहीं, पूरे पखवाड़े का त्योहार है: पहले हफ़्ते भर घर की सफ़ाई, फिर त्रयोदशी की रात वटुक पूजा, अगली सुबह सलाम, और अमावस को डून मावस, जब घड़े के भीगे अखरोट बँटते हैं। चतुर्दशी भी यहाँ दावत का दिन रहता है, जबकि नीलमत पुराण शिवरात्रि को चतुर्दशी पर ही बताता है।

कथा

हेरथ की कथा

कश्मीरी पंडितों में इस रात की कथा ऐसे कही जाती है। प्रदोष काल में, यानी रात की शुरुआत वाली साँझ में, आग का एक लिंग प्रकट हुआ, एक ज्वाला लिंग। महादेवी के मन से जन्मे दो बेटे थे, वटुक भैरव और राम भैरव, जिन्हें कहीं कहीं रमण भैरव भी कहते हैं। दोनों उस आग के खंभे का आदि या अंत ढूँढने निकले। दोनों चलते रहे, और थक गए। कहीं छोर नहीं मिला।

हारकर दोनों ने उस लिंग की स्तुति की और महादेवी के पास लौटे। महादेवी उस ज्वाला लिंग में समा गईं। फिर देवी ने दोनों बेटों को वर दिया: इस दिन मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे, और यज्ञ के भोग में तुम्हारा भी हिस्सा होगा। कहते हैं, जब महादेवी ने पानी के एक घड़े में झाँका, तो वटुक उसी घड़े से निकले, पूरे हथियारों के साथ, और राम भैरव भी उसी तरह। इसीलिए आज भी वटुक भैरव को पानी भरे घड़े के रूप में पूजा जाता है, और उस घड़े में अखरोट डाले जाते हैं।

इसीलिए कश्मीर में इस रात का ध्यान शिव के दूल्हा रूप से ज़्यादा उनके ज्वाला लिंग वाले, बिना छोर के रूप पर रहता है। फिर भी बहुत से पंडित परिवार यह भी मानते हैं कि यही शिव और पार्वती के ब्याह की रात है। दोनों बातें घाटी में साथ साथ कही जाती हैं, और घड़ा दोनों में बीच में रहता है।

कहाँ कैसे

हेरथ कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • कश्मीर घाटी के पंडित घर

    हेरथ असल में घर का त्योहार है। सफ़ाई, पुताई, वटुक के घड़े, रात की पूजा और भोग, सब घर के भीतर होता है, और बहुत से स्थानीय पंडित इस रात मंदिर जाने की जगह घर में ही पूजा करते हैं।

  • श्रीनगर का शंकराचार्य मंदिर

    डल झील के ऊपर पहाड़ी पर बने इस मंदिर में शिवरात्रि पर बड़ी भीड़ चढ़ती है, जिसमें दूर से आए यात्री भी होते हैं।

  • घाटी के पुराने मोहल्ले

    हेरथ के अगले दिन, सलाम पर, मुसलमान पड़ोसी पंडित घरों में बधाई देने आते थे और साथ खाना होता था। पंडित और मुसलमान, दोनों घरों के बच्चे बड़ों से मिलने वाले हेरथ ख़र्च की राह देखते थे।

  • जम्मू, दिल्ली और दूर बसे पंडित परिवार

    घाटी छूटने के बाद भी कश्मीरी पंडित जहाँ बसे, वहाँ हेरथ उसी ढंग से रखते हैं: घड़े, अखरोट, रात की पूजा। सलाम का पुराना पड़ोस भले बिखरा, उसकी याद और रीत बची है।

रीत

हेरथ के दिन क्या करते हैं

  1. हुर ओकदोह से हुर सतम तक घर का हर कोना साफ़ किया जाता है, और दीवारें पोती जाती हैं।
  2. हुर्या अष्टमी को मंदिरों के दर्शन होते हैं, और द्यारा दहम को ब्याही बेटियाँ मायके आकर शगुन पाती हैं।
  3. द्वादशी की रात वागुर की ख़ास पूजा होती है।
  4. त्रयोदशी की रात वटुक पूजा: मिट्टी के घड़े ताज़े पानी और साबुत अखरोटों से भरे जाते हैं; सबसे बड़ा घड़ा वटुक नाथ है, शिव का रूप। इस भरने और पूजने को वटुक बरुन कहते हैं।
  5. घड़ों के साथ शिव, पार्वती, कुमार, गणेश, उनके गण, योगिनियाँ और क्षेत्रपाल भी मिट्टी की मूर्तियों में पूजे जाते हैं। ये मूर्तियाँ चाक पर नहीं, हाथ से बनती हैं।
  6. दिन में व्रत रहता है और रात को यज्ञ; फिर भोग बनता है, मांस, मछली या सादा, जो पहले देवताओं को चढ़ता है और फिर पूरा घर खाता है।
  7. अगली सुबह सलाम: रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर जाकर हेरथ की बधाई दी जाती है, और बड़े बच्चों को हेरथ ख़र्च, यानी त्योहार का जेब ख़र्च, देते हैं।
  8. अमावस को, डून मावस पर, घड़ों का पानी नदी में बहाया जाता है और भीगे अखरोट प्रसाद की तरह परिवार में बाँटे जाते हैं।

रसोई

हेरथ का खाना

  • गाड स्यून मूली के साथ पकी मछली, जिसे भैरव को चढ़ाने लायक माना जाता है।
  • नदरू यख़नी दही की तरी में पकी कमल ककड़ी।
  • दम आलू धीमी आँच पर पके मसालेदार आलू।
  • कहवा केसर वाली हरी चाय, भारी भोग के बाद।
  • भीगे अखरोट वटुक के घड़े से निकला प्रसाद, डून मावस पर बँटता है।

सवाल जवाब

हेरथ 2027: पूछे जाने वाले सवाल

हेरथ 2027 कब है?

हेरथ 2027 में 5 मार्च, शुक्रवार को है। फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी तिथि 5 मार्च, सुबह 9:54 से 6 मार्च, दोपहर 12:04 तक है। निशीथ काल की पूजा 6 मार्च, रात 12:08 से रात 12:57 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

हेरथ और महाशिवरात्रि में क्या फ़र्क़ है?

दोनों शिव की रात हैं, पर कश्मीरी पंडित हेरथ फागुन कृष्ण त्रयोदशी को रखते हैं, बाक़ी देश की चतुर्दशी से एक दिन पहले। हेरथ पूरे पखवाड़े चलता है, इसमें वटुक के घड़ों की पूजा होती है, और रात व्रत की नहीं, भोग की होती है।

वटुक पूजा क्या होती है?

वटुक मिट्टी के वे घड़े हैं जिनमें ताज़ा पानी और साबुत अखरोट भरे जाते हैं। सबसे बड़ा घड़ा वटुक नाथ, यानी शिव का रूप है, और वटुक भैरव को भी पानी भरे घड़े के रूप में पूजा जाता है।

हेरथ में अखरोट पानी में क्यों रखे जाते हैं?

अखरोट वटुक के घड़े का प्रसाद हैं, जो अमावस तक पानी में भीगते हैं और फिर बँटते हैं। कुछ लोग इन्हें सुख और ताक़त का निशान मानते हैं, कुछ इन्हें इंसान की खोपड़ी और अहंकार के घुल जाने का।

हेरथ के अगले दिन सलाम क्या होता है?

सलाम मतलब बधाई। हेरथ की अगली सुबह लोग रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर बधाई देने जाते हैं, और घाटी में मुसलमान पड़ोसी भी पंडित घरों में आते थे। बच्चों को हेरथ ख़र्च मिलता है।

डून मावस क्या है?

हेरथ के पखवाड़े की अमावस। इस दिन वटुक के घड़ों का पानी नदी में बहाया जाता है और भीगे अखरोट प्रसाद के रूप में बाँटे जाते हैं।

क्या हेरथ पर व्रत रखते हैं?

हाँ, दिन में व्रत रखा जाता है और रात को यज्ञ होता है। पूजा के बाद बना भोग, जिसमें मछली और मांस भी हो सकता है, देवताओं को चढ़ाकर घर वाले खाते हैं।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Shivaratri / Herath article (Kashmiri Overseas Association, KOA)हररात्रि नाम, त्रयोदशी, भैरवोत्सव, ज्वाला लिंग और वटुक की कथा, वटुक बरुन, वागुर, व्रत, यज्ञ और भोग, नीलमत पुराण
  2. Kashmiri Hindu festivals (Wikipedia)हेरथ की वटुक पूजा, अखरोट का नैवेद्य, मिट्टी की मूर्तियाँ
  3. Hairath: Kashmiri Shivratri, a definitive guide (Kashmiril)हुर ओकदोह से डून मावस तक के दिन, वटुक नाथ, सलाम, हेरथ ख़र्च, गाड स्यून, नदरू यख़नी, कहवा
  4. All you need to know about Herath (Outlook Traveller)डून मावस पर अखरोट बँटना, सलाम का दिन, शंकराचार्य मंदिर
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तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।