उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027
लोसर 2027
Losar 2027
कटोरे में नौ चीज़ें, और आटे के गोले में छिपा एक मज़ाक़।
लोसर 2027 में 7 फ़रवरी, रविवार को है।
दाँत किसी सख़्त चीज़ से टकराता है।
कटोरे में गुथुक है, नौ चीज़ों वाला गरम शोरबा। हर किसी के हिस्से आटे का एक बड़ा गोला आया है।
गोले के भीतर कुछ छिपा है। किसी के हिस्से नमक, किसी के मिर्च, किसी के ऊन, किसी के कोयला।
एक भिक्षुणी हथेली खोलती है। मिर्च। सब हँस पड़ते हैं: बहुत बोलती हो ना।
साल की उनतीसवीं रात है। कमरे धुल चुके हैं, कोना कोना।
दो भिक्षुणियाँ आटे और मक्खन के तोरमा और बचा हुआ गुथुक लेकर दरवाज़े से बाहर जाती हैं।
पीछे से आवाज़ आती है: दोंग शो मा। जाओ, घर छोड़ो।
पुराना साल बाहर। अब नया भीतर आएगा।
2027 में कब
लोसर 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़7 फ़रवरी, रविवार
नक्षत्रधनिष्ठासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 7:06
सूर्यास्तशाम 6:05
चंद्रोदयसुबह 7:24
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पहचान
लोसर क्या है
लोसर तिब्बती बौद्ध परंपरा का नया साल है। यह तिब्बती पंचांग के पहले दिन आता है, जो चाँद और सूरज, दोनों से चलता है: पहले महीने की शुरुआत वाले नए चाँद के दिन। बड़ा लोसर तीन दिन का होता है। पहला दिन लामा लोसर कहलाता है, जब मठों में पूजा होती है, और दूसरा ग्यालपो लोसर, यानी राजा का लोसर। भारत में इसे धर्मशाला समेत देश भर में बसे तिब्बती रखते हैं, और लद्दाख, सिक्किम, स्पीति, किन्नौर और अरुणाचल प्रदेश के बौद्ध भी। लद्दाख की अपनी गिनती है: वहाँ लोसर तिब्बती लोसर से लगभग दो महीने पहले, ग्यारहवें महीने के पहले दिन आता है।
कथा
लोसर की कथा
कहते हैं, लोसर की जड़ बौद्ध धर्म से भी पुरानी है। तिब्बत के पुराने बोन धर्म में सर्दियों में धूप और ख़ुशबू वाली लकड़ी जलाने की एक रीत थी, और लोसर उसी से निकला माना जाता है। आज भी लोसर में जूनिपर और दूसरी ख़ुशबूदार झाड़ियों के धुएँ वाली मशालें और धूप जलती हैं।
भारत में बसे तिब्बती प्रशासन के पन्ने बताते हैं कि पुराने तिब्बत में मठों में लोसर की तैयारी बारहवें महीने की उनतीसवीं तारीख़ से शुरू हो जाती थी, धर्म की रक्षा करने वाले देवताओं की पूजा से। नामग्याल मठ के भिक्षु उनके लिए आटे का बड़ा चढ़ावा बनाते थे, और भुने जौ के आटे की छोटी गोलियाँ लंबी उमर की दुआ के साथ चढ़ाई जाती थीं। लामा लोसर की सुबह भिक्षु पालदेन ल्हामो का आवाहन पढ़ते थे, और आए हुए लोग चुपचाप अपनी प्रार्थना करते थे। दूसरे दिन, ग्यालपो लोसर पर, सरकार मेहमानों से मिलती थी, और तीसरे दिन से आम लोगों का नया साल शुरू होता था।
लद्दाख में एक कहानी सुनाई जाती है। सोलहवीं सदी के आख़िर और सत्रहवीं सदी की शुरुआत में वहाँ राजा जमयांग नामग्याल का राज था। वे स्कर्दू और बल्तिस्तान पर चढ़ाई करना चाहते थे, और सर्दी की वजह से हमले का सबसे अच्छा समय असली लोसर से दो महीने पहले का था। राजा जानते थे कि लड़ाई में कौन लौटेगा, कौन नहीं, कोई नहीं कह सकता। इसलिए उन्होंने चाहा कि उनके सिपाही जाने से पहले नया साल देख लें। तब से, कहते हैं, लद्दाख का लोसर दो महीने पहले आता है।
कहाँ कैसे
लोसर: कहाँ और कैसे
धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश
भारत में बसे तिब्बतियों के लोसर का बड़ा केंद्र। यहाँ परंपरा के अनुसार पालदेन ल्हामो, यानी धर्म की रक्षा करने वाली देवी, के लिए पूजा होती है, और लोग एक दूसरे से तशी देलेक कहते हैं।
लेह, लद्दाख
यहाँ लोसर तिब्बती लोसर से लगभग दो महीने पहले आता है। बड़ों को ख़ताक, यानी सम्मान का दुपट्टा, और भेंट देकर आशीर्वाद लिया जाता है। विहार में तरचेन नाम का बड़ा प्रार्थना झंडा खोला जाता है, और आँगन में लद्दाख का पुराना संगीत और नाच होता है।
सिक्किम
घरों की पूरी सफ़ाई होती है और पुराना सामान बाहर किया जाता है। गोम्पाओं में, यानी बौद्ध मठों में, प्रार्थना का पाठ होता है।
तवांग, अरुणाचल प्रदेश
यहाँ मोनपा लोग लोसर तीन दिन तक रखते हैं।
स्पीति और किन्नौर, हिमाचल प्रदेश
इन ऊँची घाटियों में भी लोसर तिब्बती बौद्ध रीत से आता है। घरों, गोम्पाओं और पहाड़ियों की चोटियों पर रंगीन झंडे फहराते हैं।
रीत
लोसर के दिन क्या करते हैं
- साल की उनतीसवीं तारीख़ को, जिसे तिब्बती में न्यी शु गु कहते हैं, घर का कोना कोना साफ़ किया जाता है, ताकि पुराने साल की रुकावटें और बुरा असर निकल जाए।
- उसी रात गुथुक बनता है, कम से कम नौ चीज़ों वाला शोरबा, और आटे के गोलों में छिपी चीज़ें खाने वाले के स्वभाव पर हँसी मज़ाक़ बन जाती हैं।
- आटे और मक्खन से तोरमा बनते हैं, और उन्हें बचे हुए गुथुक के साथ घर से बाहर ले जाकर बुरी चीज़ों को विदा किया जाता है।
- पूजा की जगह पर छेमार रखा जाता है: भुने जौ और त्सम्पा, यानी भुने जौ के आटे, से भरा डिब्बा, जिसे मक्खन की आकृतियों से सजाते हैं।
- पुराने प्रार्थना झंडे चीड़ और जूनिपर के साथ जलाए जाते हैं, और नए झंडे टाँगे जाते हैं।
- मेथो की रीत में मंत्र पढ़े जाते हैं और आग जलाई जाती है, ताकि बुरी शक्तियाँ भाग जाएँ।
- मठों में त्सोग चढ़ता है, यानी आशीर्वाद वाला खाना, जैसे खापसे बिस्कुट और फल, और आने वालों को नमकीन मक्खन वाली चाय मिलती है।
- लोग मिलते ही एक दूसरे से तशी देलेक कहते हैं, और तीसरे दिन भिक्षुणियाँ लोसर तशी देलेक पुकारते हुए हवा में त्सम्पा उछालती हैं।
रसोई
लोसर का खाना
- गुथुक नौ चीज़ों वाला शोरबा, आटे के गोलों के साथ, जो साल की आख़िरी रातों में खाया जाता है।
- खापसे तले हुए, ऐंठे हुए बिस्कुट, जो लोसर से कुछ दिन पहले बना लिए जाते हैं।
- छांग जौ से बनी बियर, जो गरम परोसी जाती है।
- नमकीन मक्खन वाली चाय पूजा के बाद आए लोगों के साथ बाँटी जाती है।
- त्सम्पा भुने जौ का आटा, जो छेमार में भी भरा जाता है।
सवाल जवाब
लोसर 2027: पूछे जाने वाले सवाल
लोसर 2027 कब है?
लोसर 2027 में 7 फ़रवरी, रविवार को है।
लोसर क्या है?
लोसर तिब्बती बौद्ध परंपरा का नया साल है, जो तिब्बती पंचांग के पहले दिन आता है। इसकी जड़ें बोन धर्म की सर्दियों में धूप जलाने की एक पुरानी रीत में बताई जाती हैं।
लद्दाख में लोसर पहले क्यों आता है?
लद्दाख में कहते हैं कि राजा जमयांग नामग्याल स्कर्दू पर चढ़ाई से पहले अपने सिपाहियों को नया साल मनवाना चाहते थे, क्योंकि सर्दी के कारण हमले का समय लोसर से दो महीने पहले का था। तब से वहाँ लोसर ग्यारहवें महीने के पहले दिन आता है।
गुथुक में छिपी चीज़ों का क्या मतलब होता है?
आटे के गोले में नमक, मिर्च, ऊन, चावल या कोयला जैसी चीज़ें छिपी होती हैं, और जिसे जो मिलता है, उससे उसके स्वभाव पर मज़ाक़ होता है। जैसे नमक मिले तो आलसी, मिर्च मिले तो बहुत बोलने वाला।
छेमार डिब्बा क्या होता है?
भुने जौ और त्सम्पा से भरा एक डिब्बा, जिसे मक्खन की आकृतियों से सजाकर लोसर पर पूजा की जगह चढ़ाया जाता है।
लोसर पर क्या कहकर बधाई देते हैं?
तशी देलेक, या लोसर तशी देलेक। यह नए साल की शुभकामना है।
लामा लोसर और ग्यालपो लोसर क्या हैं?
लोसर के पहले दिन को लामा लोसर कहते हैं, जब मठों में पूजा होती है। दूसरे दिन को ग्यालपो लोसर, यानी राजा का लोसर, कहते हैं।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Chemar, Tibetan Nuns Projectछेमार, गुथुक, उनतीसवीं की सफ़ाई, तोरमा, दोंग शो मा, झंडे, त्सोग, खापसे, तशी देलेक
- Losar, Central Tibetan Administrationपुराने तिब्बत के मठों की तैयारी, पालदेन ल्हामो, लामा लोसर, ग्यालपो लोसर
- Happy Losar, Siddhartha School Ladakhलद्दाख का ग्यारहवें महीने का लोसर, राजा जमयांग नामग्याल की कहानी
- Ladakh celebrates Losar, Reach Ladakhलेह में ख़ताक, तरचेन झंडा, विहार में संगीत और नाच
- All you need to know about Losar festival in India, EastMojoनए चाँद का नियम, सिक्किम, तवांग के मोनपा, झंडे, धूप वाली मशालें
- Losar: All About The Tibetan New Year, Outlook Travellerस्पीति, किन्नौर, मेथो की रीत, गुथुक
- Losar, Wikipediaबोन जड़ें, धर्मशाला, छांग, खापसे, राजा का लोसर
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।