पुष्पक विमान कैसा था?
पुष्पक विमान रावण के महल के बीच खड़ा है, और हनुमान जी सीता जी को ढूँढते हुए उस पर चढ़ते हैं। वाल्मीकि बताते हैं कि इसे विश्वकर्मा ने ब्रह्मा के लिए बनाया था, कुबेर ने तप से पाया, और रावण ने उनसे छीन लिया। यह मन के सोचने भर से चलता है।

एक नज़र में
| बात | वाल्मीकि क्या कहते हैं | कहाँ |
|---|---|---|
| किसने बनाया | विश्वकर्मा ने, ब्रह्मा के लिए | सर्ग 8 और 9 |
| किसके पास रहा | ब्रह्मा, फिर कुबेर, फिर रावण | सर्ग 9, श्लोक 11 और 12 |
| चमक | सूरज और आग जैसी; उगते सूरज जैसी | सर्ग 9, श्लोक 15 और 18 |
| बनावट | सोने की सीढ़ियाँ, दो तरह के नीलम के चबूतरे, मूँगे और मोती के फ़र्श | सर्ग 9, श्लोक 15 से 17 |
| कैसे चलता है | मन से; हज़ारों भूत उठाते हैं | सर्ग 8, श्लोक 4 और 6 |
किसका था, कहाँ से आया
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 9 (श्लोक 11 और 12) के अनुसार पुष्पक विमान स्वर्ग में ब्रह्मा के लिए बना था। कुबेर ने इसे तप करके पाया, और रावण ने ज़ोर से कुबेर से छीन लिया। सर्ग 8 (श्लोक 2) में इसे विश्वकर्मा का बनाया बताया गया है।
कैसा दिखता है
यह सूरज और आग जैसा चमकता है, और इसकी सीढ़ियाँ सोने की हैं (सर्ग 9, श्लोक 15)। उगते सूरज जैसा तेज़ है (श्लोक 18)। इसके खंभे सोने के हैं, जिन पर ईहामृग, यानी भेड़िए जैसे जीवों की आकृतियाँ बनी हैं (श्लोक 13), और इसके कमरे मेरु और मंदर पर्वत जितने ऊँचे हैं, जैसे आकाश छू रहे हों (श्लोक 13 और 14)।
खिड़कियाँ सोने और बिल्लौर की हैं, चबूतरे इंद्रनील और महानील, यानी दो तरह के नीलम के (श्लोक 16), और फ़र्श मूँगे और मोतियों का (श्लोक 17)। सर्ग 7 में उस पर बनी आकृतियाँ गिनाई गई हैं: वैदूर्य, चाँदी और मूँगे के पंछी, रत्नों के साँप, और हाथ में कमल लिए चार भुजाओं वाली लक्ष्मी।
कैसे चलता है
पुष्पक विमान मन की एकाग्र इच्छा से चलता है, और उसे हज़ारों भूत उठाते हैं, जिनकी आँखें गोल, टेढ़ी और बड़ी बड़ी हैं (सर्ग 8, श्लोक 4 और 6)।
एक बात अक्सर ग़लत कही जाती है: सर्ग 9 के दूसरे श्लोक में जो आधा योजन चौड़ा और एक योजन लंबा भवन है, वह रावण का महल है, विमान नहीं। वाल्मीकि पुष्पक की लंबाई चौड़ाई नहीं बताते।










