सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में · भारत के बाहर
ककविन रामायण
Kakawin Ramayana
- भाषा पुरानी जावानी
- किसकी कवि अज्ञात; बाली की परंपरा योगीश्वर नाम लेती है
- कब नौवीं सदी, 26 सर्ग
- कहाँ मध्य जावा, इंडोनेशिया
यह कथा
जावा की सबसे पुरानी रामकथा, नौवीं सदी के अंत में मध्य जावा में लिखी गई, छब्बीस सर्गों की। यह वाल्मीकि से नहीं, भट्टिकाव्य नाम की संस्कृत रचना से ली गई है, और लगभग दो तिहाई उसी के पास चलती है, फिर अपने रास्ते। पूर्वी जावा के पनातरन मंदिर की दीवारों पर इसी कथा के दृश्य खुदे हैं।
एक नज़र में
ककविन रामायण, अपनी लिपि में
Kakawin Rāmāyaṇa
- लिपि
- पुरानी जावानी (कावी)
- रूप
- ककविन, संस्कृत छंदों में पुरानी जावानी; 26 सर्ग
- समय
- नौवीं सदी का अंत, लगभग 856 से 930 ईस्वी
इस कथा की लंका
- लगभग सत्रहवें सर्ग तक यह भट्टिकाव्य के पास चलती है, उसके बाद अपने रास्ते।
- आठवें सर्ग में हनुमान जी की उड़ान में मैनाक पर्वत आता है।
- पूर्वी जावा के पनातरन मंदिर की नक़्क़ाशी इसी कथा पर है, और उसमें हनुमान जी सबसे आगे हैं।
आज: बाली में आज भी पढ़ी जाती है; हनुमान जी की लंका यात्रा बाली के केचक में खेली जाती है।
सुंदरकांड के पल, इस कथा में
खेल में लंका की किसी जगह पर पहुँचकर वही पल दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है। यह कथा उन पलों को ऐसे कहती है।
ऊपर की अटारियाँ
पहली रात: खोज
छत दर छत वे आगे बढ़ते हैं, और नीचे गली में पहरा चलता रहता है।
हर छत पर वे रुककर नीचे झाँकते हैं, फिर अगली छत पर कूद जाते हैं।
किसी छत पर कपड़े सूख रहे हैं, किसी पर मिट्टी के बर्तन उलटे रखे हैं।
एक जगह से कूदते हुए पैर फिसलता है, और नीचे से आवाज़ आती है कि कौन है।
जावा में यही सब पत्थर पर खुदा है, इसलिए वहाँ देखने वाला दीवार के साथ चलकर इसे पढ़ता है।
ककविन रामायण; जावा के मंदिरों की दीवारेंलौटती उड़ान
दूसरा दिन: आग
लौटती उड़ान यहाँ नपी तुली है, जैसे हर क़दम गिना जा रहा हो।
नीचे समुद्र है, ऊपर बादल, और बीच में एक सीधी लकीर।
बादलों के बीच से निकलते हुए कपड़े भीग जाते हैं, और आगे हवा उन्हें सुखा देती है।
नीचे कहीं कोई नाव दिखती है, इतनी छोटी कि हाथ भर की लगती है।
दो तिहाई रास्ता उसी के पास रहता है, और बाकी अपने रास्ते चला जाता है।
ककविन रामायण, नौवीं सदी; मूल भट्टिकाव्य यानी रावणवधइस कथा के 1 और पल खेल के भीतर पढ़े जा सकते हैं: नगर की गलियाँ।
इस कथा से खेल के पत्ते
खेल में ये पत्ते इसी कथा से खुलते हैं। हर पत्ते में एक ऐसी बात है जो बहुत कम लोगों ने सुनी है।
उपन्यास
इस कथा की लंका, उपन्यास में
मनु विश्रांति की उपन्यास गाथा उनतालीस लंकाएँ इस कथा की लंका में उतरती है। तीनों खंड लिखे जा चुके हैं, और प्रकाशन की तैयारी में हैं।
खंड 1, पाँचवाँ चेहरा: पाँच लोग, एक दरवाज़ा, और लंका का एक राजा जो चाहता है कि एक यहीं रहे।- सदियों का एक मेहमान: राय, बाली, 1931। खंड 1, पाँचवाँ चेहरा
ककविन रामायण इन त्योहारों के पन्नों पर भी आती है, उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 में: बाली जात्रा। ये दिन, और साल का हर त्योहार और व्रत, एक बार दबाकर अपने फ़ोन के कैलेंडर में: Manu Vishranti Calendar जोड़ें।
सुंदरकांड पर और
यही पल, सारी रामकथाओं में एक साथ: