समुद्र में हनुमान जी को कौन मिले?
लंका तक के रास्ते में हनुमान जी को समुद्र में तीन बड़े जीव मिलते हैं: आराम देने को उठता मैनाक पर्वत, परीक्षा लेने वाली नागमाता सुरसा, और परछाईं पकड़कर खींचने वाली सिंहिका। दूसरी रामकथाओं के अपने समुद्री जीव हैं: तमिल में अंगारतारा, जैन में आशालिका, और थाई कथा में समुद्र की रखवाली करने वाली राक्षसी।

एक नज़र में
| कथा | जीव | क्या करता है | हनुमान जी क्या करते हैं |
|---|---|---|---|
| वाल्मीकि रामायण | मैनाक | आराम करने को कहता है | छूकर आगे बढ़ जाते हैं |
| वाल्मीकि रामायण | सुरसा | परीक्षा लेती हैं, मुँह फैलाती हैं | छोटे होकर मुँह में जाते और निकलते हैं |
| वाल्मीकि रामायण | सिंहिका | परछाईं पकड़कर खींचती है | भीतर जाकर मारते हैं |
| कंब रामायण | अंगारतारा | परछाईं पकड़ती है | भीतर से चीरकर निकलते हैं |
| जैन रामकथा | आशालिका | निगलना चाहती है | चीरकर निकलते हैं, फिर दीवार तोड़ते हैं |
| रामकियेन | समुद्र और आकाश की राक्षसियाँ | लंका की रखवाली | दोनों को मारते हैं |
वाल्मीकि रामायण में: तीन जीव, तीन परीक्षाएँ
मैनाक सोने का पर्वत है, जो समुद्र से ऊपर उठकर हनुमान जी से कुछ देर आराम करने को कहता है। हनुमान जी उसे बस हाथ से छूकर आगे बढ़ जाते हैं, क्योंकि रुकना नहीं है।
सुरसा नागों की माता हैं, जिन्हें देवता हनुमान जी की परीक्षा लेने भेजते हैं। वे मुँह फैलाती जाती हैं और हनुमान जी अपना शरीर बढ़ाते जाते हैं। फिर हनुमान जी अचानक अँगूठे जितने छोटे होकर उनके मुँह में जाते हैं और बाहर निकल आते हैं।
सिंहिका समुद्र में रहने वाली राक्षसी है, जो ऊपर उड़ते जीवों को उनकी परछाईं पकड़कर खींच लेती है। हनुमान जी उसके मुँह में जाकर भीतर से उसे मारते हैं और बाहर निकल आते हैं (सर्ग 1)।
कंब रामायण में: अंगारतारा
तमिल कंब रामायण में समुद्र की राक्षसी का नाम अंगारतारा है। वह भी हनुमान जी को उनकी परछाईं पकड़कर रोकती है, और हनुमान जी उससे कहते हैं कि तूने परछाईं पकड़ने के अपने वरदान का इस्तेमाल किया। फिर वे उसके मुँह में जाकर उसे भीतर से चीरते हुए बाहर निकलते हैं और आगे उड़ जाते हैं (सुंदर कांडम्, कडल् ताऊ पडलम्, पद 76 से 84, कंबन प्रोजेक्ट की गिनती में)। यह वाल्मीकि की सिंहिका जैसी है, पर नाम और कहने का ढंग कंबन का अपना है।
जैन रामकथा में: आशालिका
हेमचंद्र की जैन रामकथा में लंका के पास आशालिका है, एक विद्या, यानी माया की शक्ति, जिसने लंका की दीवार बनाई थी। वह हनुमान जी को निगलना चाहती है। हनुमान जी उसके मुँह में जाते हैं, उसे चीरकर बाहर आते हैं, और फिर लंका की दीवार तोड़ते हैं (त्रिषष्टि, पर्व 7, सर्ग 6)।
थाई रामकियेन में: समुद्र और आकाश की रखवाली
बैंकॉक के वाट फ्रा केव मंदिर की दीवारों पर पूरी रामकियेन बनी है। कमरा 32 के चित्र में हनुमान जी लंका के चारों ओर के समुद्र की रखवाली करने वाली राक्षसी को मारते हैं, और कमरा 33 में आकाश में लंका की रक्षा करने वाली एक और राक्षसी को।
इस पर और
हर कथा का अपना पन्ना है, और हर पात्र का भी।










