पंचांग 2027

सुंदरकांड, 39 रामकथाओं में

सोने की लंका कैसी थी?

सीधा जवाब

लंका त्रिकूट पर्वत पर बसा नगर है, जिसे विश्वकर्मा ने बनाया। वाल्मीकि बताते हैं कि उसके चारों ओर सोने की दीवार है, कमलों से भरी खाइयाँ हैं, और सफ़ेद महल ऐसे खड़े हैं जैसे नगर आकाश में तैर रहा हो। तमिल कवि कंबन कहते हैं कि वहाँ रत्नों की रोशनी से रात भी दिन बन जाती है।

उनतालीस लंकाएँ: चाँदनी रात में पहाड़ पर बसी सोने की लंका
उनतालीस लंकाएँ: चाँदनी रात में पहाड़ पर बसी सोने की लंका

एक नज़र में

एक नज़र में: सोने की लंका
कथालंका कहाँसबसे बड़ी बातकहाँ लिखा है
वाल्मीकि रामायणत्रिकूट पर्वत परसोने की दीवार, कमल भरी खाई, आकाश में तैरता सा नगरसुंदरकांड, सर्ग 2
कंब रामायणसोने की पहाड़ी पररत्नों की रोशनी से रात दिन बन जाती हैसुंदर कांडम्, ऊर् तेडु पडलम्

वाल्मीकि रामायण में: नगर जो आकाश में तैरता लगे

समुद्र पार करके हनुमान जी त्रिकूट पर्वत की चोटी से लंका देखते हैं (सर्ग 2, श्लोक 1)। नगर के चारों ओर सोने की दीवार है (श्लोक 16), और खाइयाँ कमलों और कुमुदिनियों से भरी हैं (श्लोक 14)।

सफ़ेद, सटे हुए महल हैं, जिनकी खिड़कियाँ सोने की हैं (श्लोक 56)। रंग बिरंगे सोने के तोरण पूरे नगर को रोशन करते हैं (श्लोक 54)। ऊपर से देखने पर लंका ऐसी लगती है जैसे आकाश में बसा नगर हो, और वाल्मीकि बताते हैं कि इसे विश्वकर्मा ने बनाया था (श्लोक 19 और 20)।

रात का इंतज़ार, और चाँद

दिन में नगर में जाना ख़तरनाक है, इसलिए हनुमान जी सूरज ढलने तक रुकते हैं, और फिर बिल्ली जितने छोटे हो जाते हैं (श्लोक 48 और 49)।

तभी चाँद निकलता है, हज़ारों किरणों के साथ, और धरती पर रोशनी का चँदोवा तान देता है। वह दूध या कमल के रेशे जैसा सफ़ेद है, शंख जैसी चमक वाला (श्लोक 57 और 58)। इसी चाँदनी में लंका की खोज शुरू होती है।

कंब रामायण में: जहाँ रात होती ही नहीं

कंबन के सुंदर कांडम् में नगर ढूँढने का अपना अध्याय है, ऊर् तेडु पडलम्। हनुमान जी सोने की दीवार लाँघकर नगर में ऐसे उतरते हैं जैसे दूध के सागर में जामन की एक बूँद, जो पूरे सागर को बदल देगी (कंब रामायण 5.3.96)।

आकाश छूते रत्नों के करोड़ों महल अँधेरा मिटाकर रात को दिन बना देते हैं, और हनुमान जी चौंककर सोचते हैं कि कहीं सूरज का रथ तो नहीं निकल आया (5.3.97)। कंबन कहते हैं कि इस नगर के बीच सूरज भी जुगनू जैसा लगता, इसलिए वह शर्म से दूर रहता है (5.3.98)। और हनुमान जी सोचते हैं कि जिस नगर में अँधेरा है ही नहीं, वहाँ के लोगों को निशाचर, यानी रात में घूमने वाले, क्यों कहते हैं (5.3.99)।

नगर की खाई के बारे में कंबन कहते हैं कि सारी दुनिया युगों तक खोदती तब भी ऐसी खाई न बनती; लगता है जैसे सातों समुद्र रावण के डर से आकर नगर को घेर रहे हों (5.3.147)। विभीषण के घर के भीतर बिल्लौर के चबूतरे, मूँगे के कक्ष, और कल्पवृक्ष का कुंज है जिससे ताज़ा शहद टपकता है (5.3.136)। यहाँ पदों की संख्या Project Madurai के तमिल पाठ की है।

इस पर और

हर कथा का अपना पन्ना है, और हर पात्र का भी।

सवाल जवाब

पूछे जाने वाले सवाल

लंका किस पर्वत पर बसी थी?

वाल्मीकि रामायण के अनुसार त्रिकूट पर्वत पर (सुंदरकांड, सर्ग 2)।

सोने की लंका किसने बनाई?

वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 2, श्लोक 20 के अनुसार विश्वकर्मा ने।

हनुमान जी लंका में कब और कैसे गए?

सूरज ढलने के बाद, बिल्ली जितने छोटे होकर। उसी समय चाँद निकलता है (सर्ग 2, श्लोक 48 से 58)।

कंब रामायण में लंका कैसी है?

वहाँ रत्नों के महलों की रोशनी से रात भी दिन बन जाती है, और हनुमान जी सोचते हैं कि कहीं सूरज तो नहीं निकल आया (कंब रामायण 5.3.97)।

लंका की खाई कैसी थी?

वाल्मीकि के अनुसार कमलों से भरी। कंबन कहते हैं कि वह इतनी बड़ी है जैसे सातों समुद्र आकर नगर को घेर रहे हों।

In English

Valmiki (Sundara Kanda, sarga 2) sets Lanka on Mount Trikuta: a golden boundary wall, moats full of lotuses, close-built white mansions with golden windows, golden archways, a city that "looked as though it were floating in the sky", built by Vishvakarma. Hanuman waits for sunset, shrinks to the size of a cat, and enters as the moon rises. In Kamban's Tamil telling the gem mansions turn night into day, so that Hanuman wonders whether the sun has risen.

स्रोत

  1. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग दर सर्ग (sanskritdocuments.org)
  2. वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, संस्कृत पाठ और अंग्रेज़ी अर्थ (valmikiramayan.net)
  3. कंब रामायण, सुंदर कांडम्, तमिल पाठ (Project Madurai)

वाल्मीकि रामायण के श्लोकों की संख्या दक्षिण की परंपरा के पाठ से है, जैसा valmikiramayan.net और sanskritdocuments.org छापते हैं। दूसरे संस्करणों में संख्या एक दो श्लोक आगे पीछे हो सकती है।

सुंदरकांड के और पन्ने