हनुमान जी को किसने कौन सा वरदान दिया?
वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड (सर्ग 36) में आठ देवता बालक हनुमान को वरदान देते हैं: इंद्र, सूर्य, वरुण, यम, कुबेर, शिव, ब्रह्मा और विश्वकर्मा। फिर ऋषियों के एक श्राप से वे अपनी ताक़त भूल जाते हैं, जिसे जाम्बवान छलाँग से पहले जगाते हैं। और लंका में वे ब्रह्मा के आदर में ब्रह्मास्त्र से ख़ुद बँध जाते हैं।

एक नज़र में
| किसने | क्या वरदान | कहाँ |
|---|---|---|
| इंद्र | नाम हनुमान; वज्र से नहीं मरेंगे | उत्तर कांड 36.11 और 12 |
| सूर्य | तेज का सौवाँ हिस्सा; शास्त्रों का ज्ञान | उत्तर कांड 36.13 और 14 |
| वरुण | पाश और पानी से मौत नहीं | उत्तर कांड 36.15 |
| यम | दंड से बचाव; रोग नहीं; युद्ध में हिम्मत | उत्तर कांड 36.16 |
| कुबेर | गदा से नहीं मरेंगे | उत्तर कांड 36.17 |
| शिव | शिव और शिव के हथियारों से नहीं मरेंगे | उत्तर कांड 36.18 |
| ब्रह्मा | हर ब्रह्मदंड से बचाव; लंबी उम्र | उत्तर कांड 36.19 |
| विश्वकर्मा | उनके बनाए किसी हथियार से नहीं मरेंगे | उत्तर कांड 36.20 और 21 |
नाम कैसे पड़ा
किष्किंधा कांड के सर्ग 66 में जाम्बवान यह कथा सुनाते हैं। बालक हनुमान सूरज को फल समझकर उसकी ओर छलाँग लगाते हैं, और इंद्र का वज्र उनकी बाईं हनु, यानी ठोड़ी, तोड़ देता है। इसी से उनका नाम हनुमान पड़ा (श्लोक 21 से 24)। बेटे को चोट लगी देख वायु देव तीनों लोकों की हवा रोक देते हैं (श्लोक 25 और 26)।
आठ देवता, आठ वरदान
उत्तर कांड के सर्ग 36 में वरदानों की पूरी सूची है। इंद्र उन्हें हनुमान नाम देते हैं और कहते हैं कि वज्र उन्हें नहीं मारेगा (श्लोक 11 और 12)। सूर्य अपने तेज का सौवाँ हिस्सा देते हैं और शास्त्र पढ़ाने का वचन, ताकि वे अच्छा बोलने वाले बनें (श्लोक 13 और 14)। वरुण कहते हैं कि उनके पाश और पानी से लाखों बरस तक भी मौत नहीं होगी (श्लोक 15)।
यम अपने दंड से बचाव, उम्र भर रोग से छुटकारा और युद्ध में कभी हिम्मत न हारने का वरदान देते हैं (श्लोक 16)। कुबेर कहते हैं कि उनकी गदा इसे नहीं मारेगी (श्लोक 17)। शंकर कहते हैं कि वह न शिव से मरेगा, न शिव के हथियारों से (श्लोक 18)। ब्रह्मा हर ब्रह्मदंड से बचाव, लंबी उम्र और महानता देते हैं (श्लोक 19), और विश्वकर्मा कहते हैं कि देवताओं के लिए बनाया उनका कोई हथियार इसे युद्ध में नहीं मारेगा (श्लोक 20 और 21)।
किष्किंधा कांड (सर्ग 66, श्लोक 27 और 28) में यही कथा छोटी है: ब्रह्मा कहते हैं कि कोई हथियार उन्हें नहीं मारेगा, और इंद्र कहते हैं कि उनकी मौत उनकी अपनी इच्छा से ही होगी। आजकल की कई सूचियों में अग्नि, कामदेव और दूसरे देवताओं के वरदान भी जोड़ दिए जाते हैं; वे इस पाठ में नहीं हैं।
श्राप, और जाम्बवान की याद
बचपन में हनुमान जी ऋषियों के आश्रमों में बहुत ऊधम करते थे। भृगु और अंगिरा के वंश के ऋषि उन्हें श्राप देते हैं कि श्राप के असर से वे बहुत समय तक अपनी ताक़त नहीं जानेंगे (उत्तर कांड, सर्ग 36, श्लोक 32 और 33)। इसीलिए वाली और सुग्रीव के झगड़े में भी उन्हें अपना बल याद नहीं था (श्लोक 39 और 40)।
समुद्र किनारे, जब कोई वानर सौ योजन कूदने को तैयार नहीं, तब जाम्बवान उन्हें उनके जन्म और बल की कथा सुनाते हैं (किष्किंधा कांड, सर्ग 66, श्लोक 8 से 30), और फिर कहते हैं, उठो, समुद्र लाँघ जाओ (श्लोक 36 और 37)। सुनते ही वे बढ़ने लगते हैं, पूँछ फटकारते हैं, और महेंद्र पर्वत पर चढ़ जाते हैं (सर्ग 67)। आगे की कथा छलाँग के पन्ने पर है।
ब्रह्मास्त्र: वे ख़ुद क्यों बँधे
अशोक वाटिका उजाड़ने के बाद इंद्रजीत हनुमान जी पर ब्रह्मास्त्र चलाता है, यह जानते हुए कि वे मर नहीं सकते, बस उन्हें रोकने के लिए (सुंदरकांड, सर्ग 48, श्लोक 36 और 37)। हनुमान जी गिर पड़ते हैं, हिल नहीं पाते, और ब्रह्मा के वरदान को याद करके सोचते हैं कि इस अस्त्र का मान रखना है (श्लोक 38 से 42)। उन्हें डर नहीं लगता, क्योंकि ब्रह्मा, इंद्र और वायु उनकी रक्षा कर रहे हैं (श्लोक 43), और वे सोचते हैं कि पकड़े जाने से रावण से बात करने का मौक़ा मिलेगा (श्लोक 44)।
फिर राक्षस उन्हें सन की रस्सियों और पेड़ की छाल से बाँध देते हैं, और यहीं ब्रह्मास्त्र छूट जाता है, क्योंकि यह अस्त्र किसी ऐसे को नहीं बाँधे रखता जो किसी दूसरे बंधन में बँधा हो (श्लोक 48)। इंद्रजीत यह देखकर परेशान होता है (श्लोक 49 और 50)। हनुमान जी अस्त्र से छूट गए थे, पर राक्षस उन्हें खींचते और मारते रहे (श्लोक 51)।
दो और वरदान, जिनसे कथा चलती है
रावण ने ब्रह्मा से अमर होना माँगा था, फिर यह माँगा कि वह गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस और देवताओं से न मरे। मनुष्यों का नाम उसने नहीं लिया, क्योंकि उसके लिए मनुष्य तिनके जैसे थे (उत्तर कांड, सर्ग 10, श्लोक 16 से 20)।
और लंका नगरी को ब्रह्मा ने कहा था कि जिस दिन कोई वानर उसे अपने बल से हरा दे, उस दिन जान लेना कि राक्षसों पर संकट आ गया (सुंदरकांड, सर्ग 3, श्लोक 47)। पूरी बात लंका के पहरेदारों वाले पन्ने पर है।










