सुंदरकांड के पात्र
त्रिजटा
बूढ़ी राक्षसी, जिसने राक्षसों के अंत का सपना देखा
त्रिजटा अशोक वाटिका में सीता पर पहरा देने वाली राक्षसियों में एक बूढ़ी राक्षसी है। जब बाकी राक्षसियाँ सीता को डराती हैं, तब वह उन्हें रोकती है और अपना सपना सुनाती है, जिसमें राम की जीत और राक्षसों का अंत दिखा था।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 27
वाल्मीकि रामायण में
जब राक्षसियाँ सीता को खा जाने की धमकी देती हैं, तब बूढ़ी राक्षसी त्रिजटा जागकर कहती है कि रुको। उसने एक डरावना सपना देखा है, जो राक्षसों के अंत और सीता के पति की जीत की ख़बर देता है।
सपने में राम और लक्ष्मण सफ़ेद कपड़ों में आते हैं और सीता राम से मिलती हैं। रावण मुंडे सिर, तेल से सना, दक्षिण की ओर घसीटा जाता दिखता है, और कुंभकर्ण और रावण के बेटे भी दक्षिण की ओर जाते हैं। अकेले विभीषण सफ़ेद छत्र के नीचे खड़े दिखते हैं, और राम का एक वानर दूत लंका को जला देता है।
वह राक्षसियों से कहती है कि सीता से माफ़ी माँग लो, और सीता के शरीर पर अच्छे शकुन पढ़ती है।
स्वप्नो ह्यद्य मया दृष्टो दारुणो रोमहर्षणः। राक्षसानामभावाय भर्तुरस्या भवाय च॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 27, श्लोक 6
आज मैंने एक डरावना, रोंगटे खड़े कर देने वाला सपना देखा है, जो राक्षसों के अंत और इसके पति की जीत की ख़बर देता है।
लङ्का दृष्टा मया स्वप्ने रावणेनाभिरक्षिता॥ दग्धा रामस्य दूतेन वानरेण तरस्विना।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 27, श्लोक 36
मैंने सपने में देखा कि रावण की रखवाली वाली यह लंका, राम के एक तेज़ वानर दूत ने जला दी।
तुलसीदास, रामचरितमानस, सुंदरकांड
रामचरितमानस में
त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 11 से पहले की चौपाई
त्रिजटा नाम की एक राक्षसी थी, जिसे राम के चरणों से प्रेम था और जो बहुत समझदार थी।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 11 से पहले की चौपाई
सपने में एक वानर ने लंका जला दी और राक्षसों की सारी सेना मार डाली।
मानस में त्रिजटा राम की भक्त है और उसका सपना कुछ ही पंक्तियों में है। वहाँ एक दृश्य और जुड़ता है: सीता उसे माँ कहकर चिता के लिए आग माँगती हैं, और त्रिजटा राम की महिमा सुनाकर उन्हें धीरज देती है और कहती है कि रात में आग नहीं मिलेगी।
दूसरी रामकथाओं में
खेल में यह पल त्रिजटा का सपना, वाटिका का कोना पर आता है, और वहाँ इसे दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है।
आनंद रामायण
वे नींद में देखती हैं कि एक वानर आया और कुछ कहकर चला गया।
जागने पर उन्हें याद रहता है सिर्फ़ इतना कि कोई ख़बर पास तक आई थी।
पूरा सपना वाल्मीकि में खुलता है, और जिज्ञासु की यात्रा में वह पूरा मिलता है।
इस कथा के सुनाने वाले शिव माने जाते हैं, इसलिए यहाँ ब्योरे की जगह सार रहता है।
आनंद रामायण, सारकांड · आनंद रामायणयम ज़ातदो
बर्मी मंच पर यह कोना बहुत साफ़ दिखाया जाता है।
पुतलियों के चेहरे नहीं बदलते, इसलिए सब कुछ हरकत और ढोल की ताल से कहा जाता है।
पुतली का सिर धीरे से एक ओर झुकता है, और दर्शक समझ जाते हैं कि वह रो रही है।
ढोल की ताल धीमी होती जाती है, और मंच पर रोशनी कम कर दी जाती है।
डर और राहत, दोनों वहाँ शरीर की चाल से पहुँचते हैं।
यम ज़ातदो; यम ज़ात प्वे · यम ज़ातदोश्लोक और उनकी संख्या आईआईटी कानपुर के पाठ से हैं। वाल्मीकि रामायण का यह पाठ दक्षिण की परंपरा का है, जिसमें सुंदरकांड 68 सर्गों का है; बड़ौदा के समीक्षित संस्करण में सर्ग संख्या कुछ अलग है। श्लोकों का अर्थ सीधी हिंदी में दिया गया है।
सुंदरकांड के और पात्र
- मैनाकसमुद्र से उठा सोने का पहाड़, जिसने हनुमान को रुकने को कहा
- सुरसानागों की माता, जिसने देवताओं के कहने पर हनुमान को परखा
- सिंहिकापरछाईं पकड़ने वाली राक्षसी
- लंकिनीलंका नगर की रखवाली, जिसे हनुमान ने एक मुक्का मारा
- मंदोदरीरावण की रानी, जिसे हनुमान ने पल भर के लिए सीता समझ लिया
- विभीषणरावण का छोटा भाई, जिसने भरे दरबार में कहा कि दूत को मारा नहीं जाता
- अक्षय कुमाररावण का बेटा, जो सोने के रथ पर हनुमान से लड़ने आया