पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी

खीर भवानी मेला 2027

Kheer Bhawani Mela 2027

कुंड का पानी आज किस रंग का है? पूरी घाटी यही पूछती है।

खीर भवानी मेला 2027 में 11 जून, शुक्रवार को है। ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी तिथि 11 जून, सुबह 5:14 से 12 जून, रात 3:45 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

खीर भवानी मेला का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

उस शाम का चाँद, 51 प्रतिशत रोशन

दूध की एक धार पानी में उतरती है, और बादल सी फैल जाती है।

फिर खीर की एक कटोरी। फिर कुछ फूल।

सात कोनों वाले कुंड के बीच संगमरमर का एक छोटा मंदिर है। चारों ओर रेलिंग।

चिनार की छाँव में घास की चटाइयाँ बिछी हैं। लोग उन पर से उठकर, झुककर पानी देखते हैं।

एक बूढ़ा आदमी धीरे से कहता है: आज हल्का हरा है।

पास खड़ी औरत की रुकी हुई साँस छूट जाती है। काला नहीं है। बस यही देखना था।

बाहर गाँव के लोग दूध और फूल बेच रहे हैं। उनमें बहुत से मुसलमान हैं, जो देवी को माज भगवती कहते हैं।

कहते हैं, यह देवी कभी लंका में थीं। फिर एक वानर उन्हें यहाँ तक उठा लाया।

2027 में कब

खीर भवानी मेला 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़11 जून, शुक्रवार

तिथिज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी11 जून, सुबह 5:14 से 12 जून, रात 3:45 तक

नक्षत्रपूर्वा फाल्गुनीसूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:23

सूर्यास्तशाम 7:19

चंद्रोदयदोपहर 12:11

मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar

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शुभकामना

खीर भवानी मेला का शुभकामना कार्ड

खीर भवानी मेला का शुभकामना कार्ड: खीर भवानी मेला की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

खीर भवानी मेला क्या है

खीर भवानी मेला कश्मीर के गांदरबल ज़िले के तुलमुल गाँव में, श्रीनगर से लगभग पच्चीस किलोमीटर उत्तर पूरब में, ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगता है, जिसे कश्मीरी पंडित ज़ेठ अठम कहते हैं। यहाँ एक कुंड के बीच माता रागन्या का मंदिर है, जिन्हें देवी राज्ञा भी कहते हैं, दुर्गा का एक रूप। खीर भवानी नाम इसलिए, कि देवी को दूध और चावल की खीर चढ़ती है। मान्यता है कि देवी की यह मूर्ति ज़ेठ अठम को ही यहाँ रखी गई थी, इसीलिए उस दिन का मेला सबसे बड़ा है; पर पंडित हर महीने की अष्टमी को भी यहाँ आते हैं, और चैत की दुर्गाष्टमी और आषाढ़ की अष्टमी को भी मेले लगते हैं। कुंड का पानी रंग बदलता है, और उस रंग से घाटी अपना आने वाला समय पढ़ती है।

कथा

खीर भवानी मेला की कथा

कश्मीरी पंडितों में देवी के लंका से आने की कथा कई रूपों में कही जाती है। एक रूप में रावण ने हज़ार बरस तप किया, देवी प्रसन्न हुईं, उसे दर्शन दिए, और लंका के उत्तर पश्चिम कोने को अपना ठिकाना चुना। रावण उनका भक्त बना और उसे लंका का राज मिला। फिर रावण सीता को उठा लाया।

आगे की बात हर कहने वाले के पास थोड़ी अलग है। एक कथा कहती है कि सीता के हरण से देवी रावण से रूठ गईं, लंका छोड़ दी, और हनुमान से कहा कि मेरी मूर्ति कहीं दूर ले चलो; हनुमान उन्हें कश्मीर ले आए और यहीं रख दिया। दूसरी कथा कहती है कि जब राम ने लंका पर चढ़ाई की, तब हनुमान को आज्ञा हुई कि देवी को अनंत नाग की पीठ पर रखकर सतीसर ले जाएँ, जो कश्मीर का पुराना नाम है; जिस रात देवी कश्मीर पहुँचीं, उसे रागन्या रात्रि कहते हैं। तीसरी कथा में राम ने वनवास में रागन्या देवी की पूजा की थी, और वनवास के बाद हनुमान से कहा कि देवी का आसन शादीपुर ले जाओ, जहाँ से वह बाद में आज की जगह आया। ये सब परंपरा की कथाएँ हैं, लिखा हुआ इतिहास नहीं। पर हर रूप में एक बात वही रहती है: देवी को उनकी नई जगह तक हनुमान ही लेकर आते हैं।

फिर एक समय बाढ़ आई और कुंड और मंदिर पानी में डूबकर खो गए। कथा है कि बोहरी कदल, श्रीनगर के एक कश्मीरी पंडित को सपने में देवी दिखीं और जगह बताई; कहने वालों में उनका नाम अलग अलग मिलता है। एक रूप में आवाज़ ने कहा कि शादीपुर के पास नाव लो, एक साँप रास्ता दिखाएगा। वे नाव से तुलमुल के दलदल तक पहुँचे और मिट्टी के बर्तनों से दूध कुंड में उड़ेला। एक कथा कहती है कि साँप ने, जिसे शिव का रूप माना गया, कुंड की सात कोनों वाली दीवार की लकीर खींची। कहते हैं, पहली पूजा के बाद पानी पर भोजपत्र का एक टुकड़ा तैरता मिला, जिस पर एक श्लोक लिखा था।

भृंगीश संहिता में, जहाँ शिव पार्वती को यह कथा सुनाते हैं, देवी का मंत्र पंद्रह अक्षरों का बताया गया है, और कहा गया है कि वे दूध, मिसरी और घी से प्रसन्न होती हैं। कल्हण की राजतरंगिणी भी दलदली ज़मीन के बीच इस पवित्र कुंड का ज़िक्र करती है। कुंड का पानी लाल, नारंगी, बैंगनी, गुलाबी, हरा, नीला और दूधिया सफ़ेद होता रहता है, और बहुत कम काला। हल्के हरे और दूधिया सफ़ेद को लोग अच्छा मानते हैं, पर बाक़ी रंगों का मतलब साफ़ नहीं और उस पर लोग एक राय नहीं। काले रंग पर सब एक हैं: वह घाटी के लिए बुरा शगुन है। बुज़ुर्ग बताते हैं कि घाटी की बड़ी मुसीबतों से पहले पानी काला दिखा था।

कहाँ कैसे

खीर भवानी मेला कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • तुलमुल का कुंड, गांदरबल

    सात कोनों वाले कुंड के बीच संगमरमर का मंदिर है, जिसमें देवी के साथ शिव की मूर्ति भी है। यहाँ सड़क से भी पहुँचते हैं और नदी के रास्ते नाव से भी, और ज़ेठ अठम पर इतनी भीड़ होती है कि इसे अमरनाथ के बाद घाटी का दूसरा सबसे बड़ा हिंदू जमावड़ा कहा जाता है।

  • देवी अंगन

    मंदिर का पत्थर बिछा आँगन, जिसमें पुराने चिनार हैं। यात्री वगुव पर आराम करते हैं, घास की वे चटाइयाँ जो गर्मी में ठंडी और सर्दी में गरम रहती हैं।

  • तुलमुल गाँव के बाज़ार

    गाँव के मुसलमान दुकानदार दूध, फूल और पूजा का सामान बेचते हैं, और कई लोग अपने पंडित दोस्तों के हाथ देवी को फूल भेजते हैं, उन्हें माज भगवती कहकर।

  • जानीपुर, जम्मू

    तुलमुल के मंदिर के ढंग पर जम्मू के जानीपुर में भी एक खीर भवानी मंदिर बना है, और वहाँ भी ज़ेठ अठम पर मेला लगता है।

रीत

खीर भवानी मेला के दिन क्या करते हैं

  1. दर्शन से पहले नहाना ज़रूरी है।
  2. मेले के दिनों में मछली, मांस और अंडे से दूर रहा जाता है; लोग शाकाहारी खाना खाकर ही देवी के पास जाते हैं।
  3. देवी को खीर, दूध, मिसरी और फूल चढ़ते हैं, और इनमें से कुछ कुंड के पानी में भी डाला जाता है।
  4. दीप जलते हैं, धूप होती है, और स्तुतियाँ और भजन गाए जाते हैं; पूजा का कोई एक तय तरीक़ा नहीं है।
  5. सब कुंड के पानी का रंग देखते हैं, और आपस में बात करते हैं कि आज रंग कैसा है।
  6. बहुत से भक्त ज़ेठ के अलावा हर महीने की अष्टमी को भी दर्शन को आते हैं।

रसोई

खीर भवानी मेला का खाना

  • खीर दूध और चावल की, देवी का भोग, जिससे इस जगह का नाम पड़ा।
  • दूध और मिसरी देवी को चढ़ने वाली सबसे पुरानी भेंट।

सवाल जवाब

खीर भवानी मेला 2027: पूछे जाने वाले सवाल

खीर भवानी मेला 2027 कब है?

खीर भवानी मेला 2027 में 11 जून, शुक्रवार को है। ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी तिथि 11 जून, सुबह 5:14 से 12 जून, रात 3:45 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

खीर भवानी का कुंड रंग क्यों बदलता है?

यह आस्था की बात है। कुंड का पानी कई रंग बदलता है, और माना जाता है कि यह आने वाले समय का संकेत है। काला रंग घाटी के लिए बुरा शगुन माना जाता है; बाक़ी रंगों के मतलब पर लोग एक राय नहीं।

खीर भवानी नाम कैसे पड़ा?

यहाँ की देवी माता रागन्या को दूध और चावल की खीर चढ़ाई जाती है, इसलिए उन्हें खीर भवानी कहते हैं।

क्या हनुमान देवी को लंका से लाए थे?

कश्मीरी पंडितों की परंपरा यही कहती है, पर कई रूपों में: किसी में देवी सीता हरण से रूठकर लंका छोड़ती हैं, किसी में राम की आज्ञा से हनुमान उन्हें लाते हैं। यह परंपरा की कथा है।

खीर भवानी मंदिर कहाँ है?

कश्मीर के गांदरबल ज़िले के तुलमुल गाँव में, श्रीनगर से लगभग पच्चीस किलोमीटर दूर। यहाँ सड़क और नदी के रास्ते, दोनों से पहुँचते हैं।

खीर भवानी मेले के क्या नियम हैं?

दर्शन से पहले नहाना होता है, और मछली, मांस और अंडे से दूर रहकर शाकाहारी खाना खाकर ही जाते हैं।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Abode of Bhagwati Ragnya: historical facts and legends (Greater Kashmir)तुलमुल, रावण और हनुमान वाली कथा, भृंगीश संहिता, राजतरंगिणी, सात कोनों वाला कुंड, साँप, रंग, काला शगुन, देवी अंगन, वगुव, मुसलमान दुकानदार
  2. When Swami Vivekananda performed puja at Khir Bhawani (ikashmir.net)रावण का तप, अनंत नाग और सतीसर, रागन्या रात्रि, नाव और साँप, भोजपत्र, नहाना, मांस मछली अंडा नहीं, माज भगवती, चैत की अष्टमी
  3. Kheer Bhawani: Know Your Motherland (mkraina.com)राम का वनवास में पूजा करना, शादीपुर, ज़ेठ अष्टमी पर स्थापना, हर अष्टमी, शाकाहार, हल्का हरा और दूधिया रंग
  4. Kashmiri Hindu festivals (Wikipedia)ज़ेठ अठम, खीर दूध मिसरी की भेंट, कुंड में डालना, आषाढ़ अष्टमी, जानीपुर का मंदिर

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।