पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · ज्येष्ठ अमावस्या

शनि जयंती 2027

Shani Jayanti 2027

सूरज का बेटा। छाया का बेटा। और बिना चाँद की रात।

शनि जयंती 2027 में 4 जून, शुक्रवार को है। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 4 जून, सुबह 4:06 से 5 जून, रात 1:10 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

शनि जयंती का शुभकामना कार्ड, WhatsApp पर भेजिए

अमावस्या: उस रात आकाश में चाँद नहीं

यहाँ घरों में चौखट है, पर किवाड़ नहीं। कोई ताला भी नहीं।

गाँव वाले कहते हैं, चोर को शनि ख़ुद सज़ा देते हैं।

बीच में एक खुला चबूतरा। उस पर आदमी जितना ऊँचा एक काला पत्थर, और ऊपर बस आसमान।

कहते हैं, शनि ने एक भक्त के सपने में आकर कहा था: मुझे छत नहीं चाहिए।

आज कतार लंबी है। हर हाथ में तेल का एक लोटा।

तेल की धार पत्थर पर गिरती है और धूप में चमकती हुई नीचे बहती है।

आज जेठ की अमावस्या है। रात को आसमान में चाँद नहीं होगा।

और जिसकी पूजा हो रही है, पुराण कहता है, वह सूरज का बेटा है, पर उसकी माँ एक छाया थी।

2027 में कब

शनि जयंती 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़4 जून, शुक्रवार

तिथिज्येष्ठ अमावस्या4 जून, सुबह 4:06 से 5 जून, रात 1:10 तक

नक्षत्रकृत्तिकासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:23

सूर्यास्तशाम 7:16

चंद्रोदयसुबह 4:27

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शुभकामना

शनि जयंती का शुभकामना कार्ड

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पहचान

शनि जयंती क्या है

शनि जयंती शनि देव के जन्म का दिन माना जाता है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गिनती में यह जेठ, यानी ज्येष्ठ, महीने की अमावस्या है, और दक्षिण भारत की अमांत गिनती में वैशाख की अमावस्या; नाम अलग हैं, दिन एक ही है। शनि सूर्य के बेटे हैं, और शनि ग्रह और शनिवार उनके माने जाते हैं। भक्त मानते हैं कि वे पूरा न्याय करते हैं: जिस पर उनकी कृपा हो उसके दिन फिरते हैं, और जिस पर न हो वह बरसों मेहनत करके भी कुछ नहीं पाता। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और शनि मंदिरों में दर्शन को जाते हैं। मंदिरों में इस दिन की बड़ी पूजाएँ हैं तैलाभिषेक, यानी शनि को तेल से नहलाना, और शनि शांति की पूजा, और साथ में हवन भी होता है; मान्यता है कि इनसे कुंडली के शनि दोष और साढ़े साती का असर हल्का होता है। उत्तर भारत के ज़्यादातर राज्यों में इसी दिन सुहागिनें वट सावित्री का व्रत भी रखती हैं, जिसका अपना पन्ना है। और दिन अमावस्या का है, इसलिए स्नान, दान और पितरों का तर्पण भी आज ही होते हैं। अमावस्या कब लगती और कब उतरती है, और पूजा की घड़ियाँ, यह पन्ना ऊपर अपने आप निकालता है।

कथा

शनि जयंती की कथा

शनि के जन्म की कथा मार्कंडेय पुराण के एक सौ तीसरे अध्याय में है। विश्वकर्मा ने अपनी बेटी संज्ञा का ब्याह विवस्वान, यानी सूर्य, से किया, और उनके तीन बच्चे हुए: मनु, यम और यमी। पर सूर्य का तेज ऐसा था कि तीनों लोक तपते थे, और संज्ञा उसे सह नहीं पाई। उसने अपनी छाया की ओर देखा और उसी से अपने जैसी एक स्त्री बना दी, जिसका नाम पड़ा छाया। संज्ञा ने उससे कहा: तुम यहीं रहो, मेरे बच्चों को सँभालो, और यह भेद किसी से मत कहना। छाया ने हाँ कहा, और संज्ञा अपने पिता के घर चली गई। पिता ने उसे पति के पास लौटने को कहा, तो वह घोड़ी का रूप लेकर उत्तर कुरु में कठोर तप करने लगी।

सूर्य छाया को ही संज्ञा समझते रहे, और छाया से भी उनके बच्चे हुए: सावर्णि, शनैश्चर, और एक बेटी तपती, जिसे आगे चलकर राजा संवरण ने ब्याहा। पुराण कहता है: 'द्वितीयो योऽभवच्चान्यः स ग्रहोऽभूच्छनैश्चरः', यानी जो दूसरा बेटा हुआ, वही ग्रह शनैश्चर बना। यही शनि हैं, सूर्य और छाया के बेटे। मान्यता है कि उनका जन्म जेठ की इसी अमावस्या को हुआ, और इसीलिए यह दिन शनि जयंती है।

पर छाया अपने बच्चों को संज्ञा के बच्चों से ज़्यादा चाहती थी। मनु ने यह सह लिया, यम ने नहीं सहा। यम ने छाया की ओर पैर उठाया, और छाया ने शाप दिया: 'तस्मात्तवैव चरणः पतिष्यति न संशय', यानी इसलिए तुम्हारा यही पैर गिरेगा, इसमें शक नहीं। यम पिता के पास गए और बोले, मैंने मारा नहीं था। सूर्य ने कहा, माँ का शाप उलटा नहीं जा सकता, पर कीड़े बस तुम्हारे पैर का माँस ले जाएँगे, तुम्हारी जान नहीं। फिर सूर्य ने छाया से पूछा कि माँ अपने ही बच्चों में भेद क्यों करती है। छाया बात टालती रही, पर सूर्य ने ध्यान की आँख से सच देख लिया, और डरी हुई छाया ने सब कह दिया। तब सूर्य ने विश्वकर्मा से अपना तेज ख़राद पर घिसवाकर कम करवाया, ताकि संज्ञा उन्हें सह सके, और उसे ढूँढ़कर लौटा लाए।

शनि की नज़र को लेकर भी कथाएँ हैं। लोक में कहते हैं कि तपस्या और उपवास के असर से शनि देव का रंग गहरा हो गया। ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा है कि शनि का ब्याह गंधर्वों के राजा चित्ररथ की बेटी से हुआ। एक दिन वह संतान की इच्छा लेकर उनके पास आई, पर शनि कृष्ण के ध्यान में डूबे रहे और उसकी ओर देखा तक नहीं। ग़ुस्से में उसने शाप दिया: आज से तुम जिसकी ओर देखोगे, उसका अमंगल होगा। तब से शनि सिर झुकाए रहते हैं, ताकि उनकी नज़र किसी पर न पड़े। इसी पुराण में आगे आता है कि पार्वती के कहने पर शनि ने बालक गणेश की ओर बाईं आँख के कोने से ज़रा सा देखा, और बालक का सिर धड़ से अलग हो गया; विष्णु ने हाथी का सिर जोड़ा, और तब से गणेश गजानन कहलाए।

व्रत

शनि जयंती का व्रत कैसे रखें

  1. सूरज निकलने से पहले उठकर किसी पवित्र नदी में, या घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर, स्नान किया जाता है; पूजा से पहले शरीर पर तेल मलने की रीत भी बताई जाती है।
  2. नहाकर शनि देव के आगे व्रत का संकल्प लिया जाता है, यानी मन में पक्का किया जाता है कि आज उपवास है।
  3. उपवास दिन भर चलता है, और जो रख सकें वे इसे कड़ाई से रखते हैं।
  4. दिन भर ब्रह्मचर्य रखा जाता है, और हो सके तो सफ़र टाला जाता है।
  5. दिन में शनि मंदिर जाकर दर्शन किए जाते हैं।
  6. पूजा पूरी होने के बाद एक सादे भोजन से व्रत खोला जाता है।

पारण: व्रत कैसे खोलें

शनि जयंती का उपवास दिन भर का होता है, और शनि की पूजा पूरी होने के बाद एक सादे भोजन से खुलता है। इसके लिए चाँद निकलने या तिथि उतरने जैसा कोई अलग नियम पंचांगों में नहीं मिलता, इसलिए पारण पूजा से बँधा है, घड़ी से नहीं। दिन अमावस्या का है, सो सुबह का स्नान, दान और पितरों का तर्पण भी इसी दिन, व्रत खोलने से पहले, हो जाते हैं। अमावस्या कब तक है, यह पन्ना ऊपर छापता है।

कहाँ कैसे

शनि जयंती कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • शनि शिंगणापुर, अहिल्यानगर (महाराष्ट्र)

    यहाँ शनि एक काले पत्थर के रूप में हैं, जिसे अपने आप प्रकट हुआ माना जाता है। पत्थर लगभग साढ़े पाँच फ़ुट ऊँचा है, और खुले चबूतरे पर है, बिना छत के। शनिवार को उन पर पानी और तेल चढ़ाया जाता है, अमावस्या को लाखों लोग आते हैं, और शनि जयंती पर भी यहाँ पूजा होती है। मंदिर के आसपास के घरों में दरवाज़े और ताले नहीं लगते।

  • मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश

    मध्य प्रदेश का शनिश्चरा मंदिर और उत्तर प्रदेश का कोकिलावन धाम शनि के जाने माने ठिकाने हैं। शनि जयंती पर भक्त ऐसे ही शनि मंदिरों में दर्शन और तेल चढ़ाने जाते हैं।

  • उत्तर भारत के घर

    यहाँ यह दिन दो पूजाओं का है: सुहागिनें बरगद के पास वट सावित्री का व्रत रखती हैं, और घर में या मंदिर में शनि की पूजा और दान होता है।

  • दक्षिण भारत

    अमांत गिनती में महीना अमावस्या पर पूरा होता है, इसलिए यहाँ शनि जयंती वैशाख की अमावस्या कहलाती है। दिन वही है जो उत्तर की जेठ अमावस्या का, बस महीने का नाम अलग।

रीत

शनि जयंती के दिन क्या करते हैं

  1. लकड़ी की चौकी पर काला कपड़ा बिछाकर शनि की मूर्ति या तस्वीर रखी जाती है; मूर्ति न हो तो एक काला पत्थर या एक सुपारी भी उनके रूप में रखी जा सकती है।
  2. पास में घी का और सरसों के तेल का दीया जलाया जाता है, और चंदन की धूप।
  3. शनि के इस रूप को पंचगव्य, पंचामृत और इत्र से नहलाकर अबीर, गुलाल, सिंदूर, कुमकुम और काजल लगाया जाता है, और नीले या काले फूल चढ़ते हैं।
  4. भोग में इमरती, तेल में तली चीज़ें, नारियल और मौसम के फल रखे जाते हैं।
  5. रुद्राक्ष या लाल चंदन की माला पर शनि मंत्र का 108 या 1008 बार जाप होता है, फिर शनि चालीसा और आरती।
  6. शनि मंदिर में शनि पर सरसों या तिल का तेल और काले तिल चढ़ाए जाते हैं, और पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीया जलाया जाता है।
  7. दान में तेल, काले तिल, उड़द और लोहा, काले कपड़े, जूते और छाता दिए जाते हैं, और किसी ज़रूरतमंद को तेल में तली चीज़ें खिलाई जाती हैं।
  8. कौवों और काले कुत्तों को खिलाना भी इस दिन शुभ माना जाता है; कौवा शनि का वाहन माना जाता है।

रसोई

शनि जयंती का खाना

  • इमरती शनि के भोग की मिठाई।
  • तेल में तली चीज़ें भोग में भी चढ़ती हैं और ज़रूरतमंदों को दान में भी दी जाती हैं।
  • उड़द शनि के दिन दान में दी जाने वाली दाल।

सवाल जवाब

शनि जयंती 2027: पूछे जाने वाले सवाल

शनि जयंती 2027 कब है?

शनि जयंती 2027 में 4 जून, शुक्रवार को है। ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 4 जून, सुबह 4:06 से 5 जून, रात 1:10 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

शनि जयंती किस तिथि को होती है?

जेठ महीने की अमावस्या को, उत्तर भारत की पूर्णिमांत गिनती में। दक्षिण की अमांत गिनती में इसी दिन को वैशाख की अमावस्या कहते हैं; दिन दोनों में एक है।

शनि जयंती और वट सावित्री एक ही दिन क्यों होते हैं?

क्योंकि दोनों जेठ की अमावस्या के हैं। उत्तर भारत के ज़्यादातर राज्यों में सुहागिनें इसी अमावस्या को वट सावित्री रखती हैं, और यही शनि के जन्म का दिन माना जाता है।

शनि देव के माता पिता कौन हैं?

मार्कंडेय पुराण के अनुसार शनि सूर्य और छाया के बेटे हैं। सावर्णि मनु और तपती उनके सगे भाई बहन हैं, और मनु, यम और यमी संज्ञा से जन्मे सौतेले भाई बहन।

शनि की नज़र को अशुभ क्यों माना जाता है?

ब्रह्मवैवर्त पुराण की कथा में शनि की पत्नी, चित्ररथ की बेटी, ने उन्हें शाप दिया था कि वे जिसकी ओर देखेंगे उसका अमंगल होगा, क्योंकि ध्यान में डूबे शनि ने उसकी ओर देखा तक नहीं था। इसीलिए शनि सिर झुकाए रहते हैं।

शनि जयंती पर क्या दान करें?

तेल, काले तिल, उड़द, लोहा, काले कपड़े, जूते और छाता, और किसी ज़रूरतमंद को तेल में तली चीज़ें। कौवों और काले कुत्तों को खिलाना भी शुभ माना जाता है।

शनि जयंती का व्रत कैसे खोलें?

उपवास दिन भर का है। शनि की पूजा पूरी करके एक सादे भोजन से व्रत खोला जाता है; इसके लिए चाँद या तिथि की कोई अलग घड़ी नहीं देखी जाती।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Drik Panchang: Shani Jayantiजेठ अमावस्या और अमांत में वैशाख, सूर्य के बेटे, न्याय की मान्यता, उपवास, तैलाभिषेक, शनि शांति पूजा, हवन, वट सावित्री का साथ
  2. Markandeya Purana, Chapter 103 (Enjoy Learning Sanskrit)संज्ञा, छाया, सावर्णि, शनैश्चर और तपती का जन्म, श्लोक 15, यम का पैर और श्लोक 20 का शाप, विश्वकर्मा का ख़राद
  3. Chhaya (Wikipedia)अलग पुराणों में छाया के बच्चे, हरिवंश में सूर्य का संज्ञा को लौटा लाना
  4. शनि देव का परिचय (Shubh Panchang)सूर्य और छाया, कौवा या गिद्ध वाहन, गहरा रंग और तप वाली बात, तेल, तिल, उड़द और लोहा, पीपल, शिंगणापुर, शनिश्चरा और कोकिलावन
  5. शनि की दृष्टि क्यों अशुभ (Amar Ujala)ब्रह्मवैवर्त पुराण: चित्ररथ की बेटी का शाप, गणेश का सिर
  6. Shani Jayanti: Puja Vidhi (SmartPuja)दिन भर का उपवास, पूजा के बाद एक सादा भोजन, तेल और काले तिल, पीपल का दीया, दान की चीज़ें, कौवे और काले कुत्ते
  7. शनि जयंती पूजा विधि (Patrika)भोर का स्नान, चौकी और काला कपड़ा, सुपारी या काला पत्थर, दीये, पंचगव्य, फूल, इमरती, जाप, ब्रह्मचर्य, तली चीज़ों का दान
  8. Shani Shingnapur (Wikipedia)खुले चबूतरे का काला पत्थर, सपने वाली कथा, बिना दरवाज़ों के घर, शनिवार का तेल, अमावस्या की भीड़, शनि जयंती

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।