पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027

मुहर्रम 2027

Muharram 2027

दसवीं तारीख़। कर्बला। और सदियों से न थमा ग़म।

मुहर्रम 2027 में 16 जून, बुधवार को होने की उम्मीद है। पक्की तारीख़ चाँद दिखने पर तय होती है, इसलिए एक दिन आगे पीछे हो सकती है।

उस शाम का चाँद, 94 प्रतिशत रोशन

बाँस की पतली तीलियाँ। उन पर रंगीन काग़ज़ चढ़ रहा है, परत दर परत।

यह ताज़िया है: कर्बला में इमाम हुसैन के रौज़े की शक्ल। रौज़ा, यानी वह इमारत जिसके नीचे वे दफ़्न हैं।

पास के इमामबाड़े से एक आवाज़ आती है। कोई मरसिया पढ़ रहा है, बिना किसी साज़ के।

सुनने वालों के कपड़े काले हैं। कोई रो रहा है, कोई बस सिर झुकाए है।

गली के मोड़ पर एक काला अलम, यानी झंडा, हवा में धीरे धीरे हिलता है।

बनाने वाले हाथ एक पल रुकते हैं। फिर काम में लग जाते हैं।

आशूरा को यह ताज़िया कंधों पर उठेगा, और फिर मिट्टी में उतार दिया जाएगा। जैसे हर बरस। जैसे कर्बला की याद हर बरस लौट आती है।

2027 में कब

मुहर्रम 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़16 जून, बुधवार

नक्षत्रविशाखासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 5:23

सूर्यास्तशाम 7:21

चंद्रोदयशाम 5:11

भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची में मुहर्रम (आशूरा) 16 जून को है, चाँद के हिसाब से इसमें एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है।

मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar

कोई व्रत, कोई त्योहार अब छूटेगा नहीं

आज से दिसंबर 2027 तक के 334 त्योहार और व्रत, तिथि और मुहूर्त के साथ, सीधे आपके फ़ोन के कैलेंडर में। हर त्योहार के साथ उसका शुभकामना कार्ड भी, अपनों को WhatsApp पर भेजने के लिए। एक बार दबाइए, बस।

Google कैलेंडर में जोड़ें

  • मुफ़्त
  • कोई साइन अप नहीं
  • नाम, नंबर या ईमेल नहीं
  • जब चाहें हटा दें

दूसरा कैलेंडर: iPhone या Mac · Google · Outlook · फ़ाइल · सिर्फ़ यह दिन

सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।

पहचान

मुहर्रम क्या है

मुहर्रम इस्लामी, यानी हिजरी, साल का पहला महीना है; हिजरी साल इसी महीने से शुरू होता है। इसकी दसवीं तारीख़ आशूरा कहलाती है। शिया मुसलमानों के लिए यह ग़म का सबसे बड़ा दिन है: इसी दिन, 61 हिजरी में, कर्बला (इराक़) में पैग़म्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के नवासे इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) और उनके साथी शहीद हुए। मुहर्रम की पहली तारीख़ से मजलिसें शुरू होती हैं, और आशूरा तक ग़म सबसे गहरा हो जाता है। बहुत से सुन्नी मुसलमान आशूरा को एक अलग वजह से रोज़ा रखते हैं। हर इस्लामी महीना नया चाँद देखकर शुरू होता है, इसलिए पहले से निकाली गई तारीख़ एक दिन खिसक सकती है। यह याद और सोग का दिन है।

कथा

मुहर्रम की कथा

शिया परंपरा में कर्बला का यह वाक़िआ हर मजलिस में दोहराया जाता है। 61 हिजरी के मुहर्रम की दसवीं तारीख़ थी, ईसवी हिसाब से 680 का साल। कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन थे, उस वक़्त छप्पन बरस के, और उनके साथ उनके थोड़े से साथी। सामने कूफ़ा की फ़ौज थी, जिसकी कमान उमर बिन साद के हाथ में थी।

उस दिन की लड़ाई में इमाम हुसैन और उनके साथी शहीद हो गए। जो उन्हें याद करते हैं, उनके लिए वे इंसाफ़, हिम्मत, ईमान और ज़ुल्म के आगे न झुकने की मिसाल हैं। इसीलिए यह दिन ख़ुशी का नहीं, सोग का है; लोग काले कपड़े पहनते हैं, दुनिया के कामों से दूर रहते हैं, और कर्बला के शहीदों को रोकर याद करते हैं।

ग़म जताने का सबसे पुराना तरीक़ा शायरी है: कर्बला के शहीदों पर कहे गए मरसिए, और उन्हें सुनकर बहते आँसू। हिंदुस्तान में लखनऊ इस सोग, यानी अज़ादारी, का बड़ा केंद्र बना। वहाँ मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर ने मरसिए को बहुत ऊँचाई दी।

सुन्नी परंपरा में आशूरा का अपना अलग अर्थ है। कहा जाता है कि हिजरत के कुछ ही समय बाद पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस दिन रोज़ा रखने को कहा। परंपरा में यह दिन हज़रत नूह (अलैहिस्सलाम) के कश्ती से उतरने और हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) के फ़िरऔन से बचने की याद से जुड़ा है। यह रोज़ा अपनी मर्ज़ी का, यानी नफ़्ल, रोज़ा है।

कहाँ कैसे

मुहर्रम: कहाँ और कैसे

  • लखनऊ

    पहली मुहर्रम को बड़े इमामबाड़े से शाही ज़री निकलती है, सातवीं को जुलूस ए मेहँदी, और आठवीं को हज़रत अब्बास का अलम मशालों के साथ रात भर चलता है। आशूरा पर ताज़िये दफ़्न किए जाते हैं, और यहाँ की अज़ादारी में सुन्नी और हिंदू भी शरीक होते हैं।

  • लखनऊ के इमामबाड़े

    पहले दस दिन इमामबाड़ा ग़ुफ़रान मआब जैसी जगहों पर रोज़ मजलिसें होती हैं। नख़ास के इमामबाड़ा नाज़िम साहब से अलम ए आशूरा का जुलूस उठता है।

  • मुंबई

    डोंगरी इलाक़े में जुलूस ताज़िये लेकर चलते हैं, जो इमाम हुसैन के रौज़े की शक्ल होते हैं।

  • श्रीनगर

    आठवीं मुहर्रम के जुलूस में लोग झंडे लेकर चलते हैं, और डल झील पर शिकारे भी जुलूस में शामिल होते हैं।

  • हैदराबाद, कोलकाता और मयूरभंज

    जुलूस, मजलिसें और दुआएँ होती हैं, और लोग इमाम हुसैन और उनके साथियों की याद में पानी और खाना बाँटते हैं।

याद

मुहर्रम कैसे याद किया जाता है

  1. पहली मुहर्रम से मजलिसें होती हैं, जिनमें आलिम कर्बला का हाल सुनाते हैं और उसका मतलब समझाते हैं।
  2. मरसिया ख़्वानी में कर्बला का हाल बिना साज़ के पढ़ा जाता है; सोज़ ख़्वानी में उसे सुर में कहा जाता है।
  3. नौहा, यानी कर्बला पर कहे गए दुख के बोल, मातमी टोली के बीच नौहाख़्वान पढ़ता है; कई घरों में औरतें भी नौहा और सोज़ पढ़ती हैं।
  4. मातम में लोग खुली हथेली से सीने पर हाथ मारकर ग़म जताते हैं।
  5. लोग काले कपड़े पहनते हैं, और गलियों में काले झंडे और अलम लगते हैं।
  6. ताज़िया बाँस, लकड़ी और काग़ज़ से बनता है, और आशूरा पर उसे मिट्टी में दफ़्न किया जाता है।
  7. आशूरा पर शिया मुसलमान अस्र की नमाज़ तक कुछ नहीं खाते; लखनऊ में शाम को चावल, काली मसूर की दाल और शरबत के सादे खाने से फ़ाक़ा तोड़ा जाता है, जिसे फ़ाक़ा शिकनी कहते हैं।
  8. बहुत से सुन्नी मुसलमान आशूरा पर नफ़्ल रोज़ा रखते हैं।

सवाल जवाब

मुहर्रम 2027: पूछे जाने वाले सवाल

मुहर्रम 2027 कब है?

मुहर्रम 2027 में 16 जून, बुधवार को होने की उम्मीद है। पक्की तारीख़ चाँद दिखने पर तय होती है, इसलिए एक दिन आगे पीछे हो सकती है।

आशूरा क्या है?

मुहर्रम की दसवीं तारीख़ को आशूरा कहते हैं। शिया मुसलमानों के लिए यह इमाम हुसैन और उनके साथियों की कर्बला में शहादत के सोग का दिन है।

मुहर्रम में ताज़िया क्यों बनाते हैं?

ताज़िया कर्बला में इमाम हुसैन के रौज़े की शक्ल होता है, जो बाँस, लकड़ी और काग़ज़ से बनता है। जुलूस में उठाने के बाद आशूरा पर इसे दफ़्न किया जाता है।

मजलिस और मरसिया क्या होते हैं?

मजलिस सोग की वह सभा है जिसमें कर्बला का हाल सुनाया जाता है। मरसिया कर्बला के शहीदों पर कही गई शोक कविता है, जो बिना साज़ के पढ़ी जाती है।

सुन्नी मुसलमान आशूरा पर रोज़ा क्यों रखते हैं?

सुन्नी परंपरा में पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इस दिन रोज़ा रखने को कहा था, और यह दिन हज़रत नूह और हज़रत मूसा (अलैहिमस्सलाम) की याद से जुड़ा माना जाता है। यह अपनी मर्ज़ी का रोज़ा है।

क्या मुहर्रम इस्लामी नया साल है?

हाँ, मुहर्रम हिजरी साल का पहला महीना है, इसलिए नया हिजरी साल इसी से शुरू होता है। पर इसकी दसवीं तारीख़, आशूरा, शिया मुसलमानों के लिए सोग का दिन है।

आशूरा के दिन क्या कहना ठीक है?

आशूरा याद और ग़म का दिन है, इसलिए इस दिन ख़ुशी की बधाई नहीं दी जाती। सोग में डूबे लोगों के साथ ख़ामोशी और हमदर्दी ही ठीक है।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Ashura, WikiShia61 हिजरी, इमाम हुसैन की उम्र, उमर बिन साद, मजलिसें, शोक कविता, सोग के तरीक़े
  2. Lucknow's Legacy in Azadari, Lucknow Observerलखनऊ के जुलूस, इमामबाड़े, मरसिया, सोज़, नौहा, ताज़िया, अलम, फ़ाक़ा शिकनी
  3. Muharram in India, Free Press Journalमुंबई, श्रीनगर और दूसरे शहरों के जुलूस, काले कपड़े, मजलिस, पानी और खाना बाँटना
  4. Ashura, ReligionFactsहिजरी साल का पहला महीना, सुन्नी रोज़ा, नूह और मूसा की याद
  5. Ashura, Banglapediaमुहर्रम पहला महीना, इमाम हुसैन नवासे, ताज़िया, मातम

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।