पंचांग 2027

उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी

काल भैरव जयंती 2027

Kaal Bhairav Jayanti 2027

काल भी जिससे डरता है, उसके प्रकट होने की रात।

इस बरस (2026) काल भैरव जयंती 30 नवंबर, सोमवार को है। काल भैरव जयंती 2026: तारीख़, मुहूर्त और शुभकामना कार्ड · यह पन्ना 2027 का है।

काल भैरव जयंती 2027 में 20 नवंबर, शनिवार को है। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी तिथि 20 नवंबर, शाम 7:18 से 21 नवंबर, शाम 5:20 तक है। निशीथ काल की पूजा 20 नवंबर, रात 11:40 से 21 नवंबर, रात 12:34 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

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उस शाम का चाँद, 56 प्रतिशत रोशन

एक कलाई आगे बढ़ती है। पुजारी जी उस पर रक्षा सूत्र बाँधते हैं। फिर अगली कलाई।

मंदिर के दरवाज़े पर तेल की कटोरियाँ हैं, काले तिल की पुड़ियाँ, फूल।

भीतर से बस एक चेहरा दिखता है, चाँदी का।

बाहर गली में अँधेरा है, पर कोई सोया नहीं। चाँद आज देर रात आएगा, आधा।

कहते हैं, इस नगर में रहना हो तो पहले इनसे पूछना पड़ता है।

आज रात यहाँ जागरण है। पुराण कहता है, आज जो उपवास करके जागे, उसके बड़े पाप छूट जाते हैं।

एक कटा हुआ सिर, एक लंबी यात्रा, और यही नगर, जहाँ आकर वह खोपड़ी हाथ से छूटी थी।

2027 में कब

काल भैरव जयंती 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त

तारीख़20 नवंबर, शनिवार

तिथिमार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी20 नवंबर, शाम 7:18 से 21 नवंबर, शाम 5:20 तक

नक्षत्रआश्लेषासूर्योदय के समय

सूर्योदयसुबह 6:47

सूर्यास्तशाम 5:26

चंद्रोदयरात 11:43

निशीथ काल
20 नवंबर, रात 11:40 से 21 नवंबर, रात 12:34 तकआधी रात के आसपास का मुहूर्त, रात के पंद्रह हिस्सों में आठवाँ।

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शुभकामना

काल भैरव जयंती का शुभकामना कार्ड

काल भैरव जयंती का शुभकामना कार्ड: काल भैरव जयंती की शुभकामनाएँ, मनु विश्रांति

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पहचान

काल भैरव जयंती क्या है

काल भैरव जयंती, जिसे भैरव अष्टमी भी कहते हैं, मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी है, उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के हिसाब से। दक्षिण के अमांत पंचांग में यही दिन कार्तिक की कृष्ण अष्टमी गिना जाता है, पर दोनों में दिन एक ही रहता है। शिव पुराण कहता है कि इसी तिथि को शिव भैरव के रूप में प्रकट हुए। हर महीने आने वाली कालाष्टमी में यह सबसे बड़ी है। भैरव की पूजा रात की है, इसलिए यह जयंती उस दिन रखी जाती है जिसकी रात में अष्टमी हो, और पूजा निशीथ में होती है, यानी आधी रात के आसपास की घड़ी में। उस घड़ी का समय इस पन्ने पर ऊपर दिया है।

कथा

काल भैरव जयंती की कथा

शिव पुराण की शतरुद्र संहिता के आठवें अध्याय में नंदीश्वर सनत्कुमार को भैरव के अवतार की कथा सुनाते हैं। एक बार ऋषि मेरु पर्वत पर ब्रह्मा के पास गए और पूछा, वह एक सच क्या है जो कभी नष्ट नहीं होता? ब्रह्मा बोले, मैं ही दुनिया को बनाता और चलाता हूँ, मुझसे बड़ा कोई नहीं। पास खड़े विष्णु हँसे, पर भीतर से उन्हें ग़ुस्सा आ गया था। वे बोले, दुनिया को बनाने वाला तो मैं, नारायण, हूँ; तुम भी मेरे कहने से ही रचते हो।

दोनों ने वेदों से पूछा। चारों वेदों ने एक ही बात कही। ऋग्वेद बोला, जिससे सब निकला वह रुद्र है। यजुर्वेद बोला, यज्ञ और योग से जिसे पूजते हैं वह शिव है। सामवेद बोला, सबसे ऊपर त्र्यंबक हैं, तीन आँखों वाले। अथर्ववेद बोला, शंकर ही हैं। पर माया में पड़े ब्रह्मा और विष्णु वेदों पर हँस दिए, और रुद्र के रूप और रहन सहन का मज़ाक़ उड़ाया। फिर ओंकार ख़ुद बोला, तब भी उनकी आँखें नहीं खुलीं।

तभी दोनों के बीच एक बड़ा उजाला उठा, और उसके भीतर एक आकृति दिखी। ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर ग़ुस्से से जल उठा: हम दोनों के बीच आने वाला यह कौन है? पल भर में वहाँ नीललोहित दिखे, तीन आँखों वाले। ब्रह्मा ने उन्हें पहचाना और घमंड से बोले, तुम तो वही रुद्र हो जो मेरे माथे से जन्मे थे, रोए थे इसलिए रुद्र कहलाए। इन बोलों पर शिव को क्रोध आया, और उसी क्रोध से भैरव प्रकट हुए, आग जैसे दमकते हुए।

शिव ने उन्हें नाम दिए। श्लोक है: 'त्वत्तो भेष्यति कालोऽपि ततस्त्वं कालभैरवः' (शिव पुराण, शतरुद्र संहिता 8.47 का अंश)। मतलब: तुमसे काल भी डरेगा, इसलिए तुम कालभैरव हो। दुष्टों को कुचलोगे, सो आमर्दक; भक्तों के पाप खाओगे, सो पापभक्षण। शिव ने उन्हें मुक्ति की नगरी काशी का अधिकार भी दिया, वहाँ के पापियों का न्याय करने का। तब भैरव ने अपनी बाईं उँगली के नाख़ून की नोक से ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर काट दिया, वही सिर जिसने निंदा की थी। पुराण कहता है, जो अंग अपराध करे, सज़ा भी उसी को।

डरे हुए विष्णु ने शतरुद्रीय से शिव की स्तुति की, ब्रह्मा ने भी, और दोनों का घमंड उतर गया। शिव ने दोनों को अभय दिया, और भैरव से कहा कि ब्रह्मा की खोपड़ी हाथ में लेकर भिक्षा माँगते हुए घूमो; पीछे पीछे ब्रह्महत्या चली, उस पाप का स्त्री रूप। अगले अध्याय में भैरव काशी पहुँचते हैं, और वहाँ खोपड़ी उनके हाथ से छूट जाती है; वह जगह कपालमोचन कहलाती है। उसी अध्याय में लिखा है: 'कृष्णाष्टम्यान्तु मार्गस्य मासस्य परमेश्वरः। आविर्बभूव सल्लीलो भैरवात्मा सताम्प्रियः॥' (9.63)। मतलब: मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण अष्टमी को परमेश्वर भैरव के रूप में प्रकट हुए, सज्जनों के प्यारे।

व्रत

काल भैरव जयंती का व्रत कैसे रखें

  1. सुबह नहाकर भैरव के आगे व्रत का संकल्प लिया जाता है।
  2. दिन भर उपवास रहता है; शिव पुराण इसी अष्टमी पर उपवास की बात कहता है।
  3. व्रत उस दिन रखा जाता है जिसकी रात में अष्टमी हो, क्योंकि भैरव की पूजा रात की है।
  4. रात को निशीथ की घड़ी में भैरव की मुख्य पूजा और आरती होती है।
  5. पूजा के बाद रात भर जागरण होता है, जहाँ हो सके भैरव के मंदिर में, उनके पास।

पारण: व्रत कैसे खोलें

शिव पुराण इस दिन उपवास और जागरण, दोनों की बात कहता है, सो व्रत रात के जागरण के साथ चलता है और रात की पूजा से पहले नहीं खुलता। पारण की कोई अलग घड़ी न शिव पुराण देता है, न पंचांग; पंचांग बस यह तय करते हैं कि व्रत उस दिन हो जिसकी रात में अष्टमी हो। जागरण पूरा होने पर घर अपनी रीत से व्रत खोलते हैं। कहा जाता है कि व्रत खोलने के बाद काले कुत्ते को मीठी रोटियाँ खिलाई जाएँ।

कहाँ कैसे

काल भैरव जयंती कहाँ कैसे मनाया जाता है

  • काशी

    भैरव अष्टमी यहाँ के काल भैरव मंदिर का बड़ा उत्सव है। भीतर बस देवता का चाँदी का चेहरा दिखता है; भक्त तेल, काले तिल और फूल चढ़ाते हैं और कलाई पर भैरव का रक्षा सूत्र बँधवाते हैं।

  • कपालमोचन, काशी

    शिव पुराण के हिसाब से यही वह तीर्थ है जहाँ भैरव के हाथ से ब्रह्मा की खोपड़ी छूटी। पुराण कहता है कि यहाँ नहाकर तर्पण करने से ब्रह्महत्या तक का पाप छूटता है।

  • उज्जैन

    शिप्रा के किनारे वाले काल भैरव, जिन्हें नगर का कोतवाल माना जाता है, जयंती पर ख़ूब सजाए जाते हैं, अक्सर सूखे मेवों की मालाओं से। मूर्ति पर मराठा ढंग की पगड़ी रहती है, जिसे ग्वालियर का सिंधिया घराना सँभालता आया है।

  • काठमांडू

    दरबार चौक के काल भैरव के आगे कभी क़सम खाई जाती थी और गवाही दी जाती थी, क्योंकि मान्यता थी कि उनके आगे झूठ बोलने वाला बचता नहीं। इंद्र जात्रा के दिनों में यह जगह पूजा और भीड़ से भर जाती है।

  • दक्षिण भारत

    अमांत पंचांग में यह जयंती कार्तिक की कृष्ण अष्टमी कहलाती है, पर रखी उसी दिन जाती है जिस दिन उत्तर में मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी।

रीत

काल भैरव जयंती के दिन क्या करते हैं

  1. भैरव की पूजा धूप, दीया, काले तिल, उड़द और सरसों के तेल से होती है।
  2. शाम को शिव, पार्वती और भैरव की एक साथ पूजा होती है।
  3. आदि शंकराचार्य का कालभैरवाष्टक पढ़ा जाता है, जिसके हर श्लोक का अंत होता है: काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे, यानी मैं काशी नगरी के स्वामी कालभैरव को भजता हूँ।
  4. भैरव का मंत्र जपा जाता है: ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नमः।
  5. भैरव की सवारी कुत्ता है, इसलिए काले कुत्ते को मीठी रोटियाँ खिलाई जाती हैं।
  6. भैरव की यह कथा सुनी और सुनाई जाती है; शिव पुराण कहता है कि इसे सुनने से पाप और दुख छूटते हैं।

सवाल जवाब

काल भैरव जयंती 2027: पूछे जाने वाले सवाल

काल भैरव जयंती 2026 में कब है?

काल भैरव जयंती 2026 में 30 नवंबर, सोमवार को है। इस बरस की तिथि, मुहूर्त और शुभकामना कार्ड काल भैरव जयंती 2026 के पन्ने पर हैं। यह पन्ना 2027 का है।

काल भैरव जयंती 2027 कब है?

काल भैरव जयंती 2027 में 20 नवंबर, शनिवार को है। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी तिथि 20 नवंबर, शाम 7:18 से 21 नवंबर, शाम 5:20 तक है। निशीथ काल की पूजा 20 नवंबर, रात 11:40 से 21 नवंबर, रात 12:34 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।

काल भैरव जयंती को भैरव अष्टमी क्यों कहते हैं?

क्योंकि यह अष्टमी तिथि है, मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी, और शिव पुराण के हिसाब से इसी दिन शिव भैरव के रूप में प्रकट हुए। इसीलिए यह भैरव की अष्टमी भी है और उनकी जयंती भी।

काल भैरव ने ब्रह्मा का सिर क्यों काटा?

शिव पुराण में ब्रह्मा अपने को सबसे बड़ा कहते हैं और उनका पाँचवाँ सिर घमंड में शिव की निंदा करता है। शिव के क्रोध से भैरव जन्मे और उन्होंने नाख़ून से वही पाँचवाँ सिर काट दिया, क्योंकि पुराण के शब्दों में, जो अंग अपराध करे, सज़ा उसी को।

काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं?

शिव पुराण में शिव भैरव को काशी का अधिकार और वहाँ के पापियों का न्याय सौंपते हैं। इसी से वे नगर के कोतवाल, यानी रखवाले, माने जाते हैं, और मान्यता है कि काशी में रहने की इजाज़त वही देते हैं।

काल भैरव जयंती पर जागरण क्यों करते हैं?

शिव पुराण कहता है: 'मार्गशीर्षासिताष्टम्यां कालभैरवसन्निधौ। उपोष्य जागरं कुर्वन्महापापैः प्रमुच्यते॥' (शतरुद्र संहिता 9.64)। मतलब: मार्गशीर्ष की कृष्ण अष्टमी को कालभैरव के पास उपवास करके जो जागता है, वह बड़े पापों से छूट जाता है।

क्या उज्जैन में काल भैरव को सच में मदिरा चढ़ती है?

हाँ। भक्त प्रसाद में मदिरा लाते हैं, पुजारी जी उसे चाँदी की तश्तरी में भरकर मूर्ति के होंठों की ओर झुकाते हैं। जो न चाहे, वह फूल, प्रार्थना या दीया चढ़ा सकता है।

दक्षिण भारत में काल भैरव जयंती किस महीने में होती है?

अमांत पंचांग में इसे कार्तिक की कृष्ण अष्टमी कहते हैं। महीने का नाम अलग है, दिन वही है जो उत्तर में मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी का।

स्रोत

यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया

  1. Shiva Purana, Shatarudra Samhita, Adhyaya 8: Bhairavavatara varnanam (VedaPath)मेरु पर ऋषियों का प्रश्न, ब्रह्मा और विष्णु का झगड़ा, वेदों और ओंकार का उत्तर, भैरव का जन्म, उनके नाम, काशी का अधिकार, नाख़ून से पाँचवाँ सिर
  2. Shiva Purana, Shatarudra Samhita, Adhyaya 9: Bhairava avatara lila (VedaPath)काशी और कपालमोचन, मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रकट होना, उपवास और जागरण का श्लोक, कथा सुनने का फल
  3. Drik Panchang: Masik Kalashtamiकाल भैरव जयंती सबसे बड़ी कालाष्टमी, भैरव अष्टमी नाम, पूर्णिमांत में मार्गशीर्ष और अमांत में कार्तिक, रात वाला नियम
  4. Incredible India: Kaal Bhairav Temple, Varanasiकाशी का कोतवाल, चाँदी का चेहरा, रक्षा सूत्र, तेल और तिल, भैरव अष्टमी का उत्सव
  5. Madhya Pradesh Tourism: Kal Bhairav Temple, Ujjainउज्जैन के कोतवाल, मदिरा का प्रसाद, सिंधिया घराने की पगड़ी, जयंती पर सूखे मेवों की मालाएँ
  6. Nepal Traveller: Kaal Bhairav of Basantapurकाठमांडू के काल भैरव, क़सम और गवाही, इंद्र जात्रा
  7. Shlokam: Kalabhairava Ashtakamआदि शंकराचार्य का कालभैरवाष्टक, काशी नगरी के स्वामी, कुत्ता भैरव की सवारी
  8. Aaj Tak: Kalashtami vrat pujan vidhiसंकल्प, शाम और रात की पूजा, तिल उड़द और सरसों का तेल, मंत्र, व्रत के बाद कुत्ते को मीठी रोटी

तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।