सुंदरकांड के पात्र
मैनाक
समुद्र से उठा सोने का पहाड़, जिसने हनुमान को रुकने को कहा
मैनाक सोने का एक पहाड़ है जो समुद्र के भीतर छिपा रहता था। सुंदरकांड में जब हनुमान समुद्र लाँघ रहे होते हैं, तो समुद्र के कहने पर मैनाक पानी से ऊपर उठता है, ताकि हनुमान उस पर रुककर थकान उतार लें। हनुमान रुकते नहीं, उसे छूकर आगे बढ़ जाते हैं।
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1
वाल्मीकि रामायण में
समुद्र को याद आता है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के कारण ही वह इतना बड़ा हुआ था, इसलिए वह राम के दूत की मदद करना चाहता है। वह पानी के नीचे छिपे मैनाक से कहता है कि ऊपर उठो और हनुमान को आराम की जगह दो।
हनुमान उठते हुए पहाड़ को रुकावट समझते हैं और अपनी छाती से धक्का देकर उसे नीचे कर देते हैं। तब मैनाक मनुष्य का रूप लेकर अपनी चोटी पर खड़ा होता है। वह बताता है कि जब इंद्र पहाड़ों के पंख काट रहे थे, तब पवन देव ने उसे बचाया था, इसलिए वह पवन के पुत्र का क़र्ज़दार है।
हनुमान विनम्रता से मना कर देते हैं, क्योंकि काम जल्दी का है। वे पहाड़ को हाथ से छूते हैं और आगे उड़ जाते हैं। इंद्र मैनाक की इस मदद से ख़ुश होकर उसे अभय देते हैं।
कृते च प्रतिकर्तव्यमेष धर्मः सनातनः। सोऽयं त्वत्प्रतिकारार्थी त्वत्तः सम्मानमर्हति॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1, श्लोक 114
जिसने उपकार किया हो, उसका बदला चुकाना चाहिए, यही सनातन धर्म है। (समुद्र) तुम्हारा उपकार चुकाना चाहता है, इसलिए तुमसे सम्मान पाने का हक़दार है। (मैनाक, हनुमान से)
त्वरते कार्यकालो मे अहश्चाप्यतिवर्तते। प्रतिज्ञा च मया दत्ता न स्थातव्यमिहान्तरे॥
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1, श्लोक 132
मेरे काम का समय जा रहा है और दिन भी ढल रहा है। मैंने वचन दिया है, इसलिए मुझे बीच में कहीं रुकना नहीं है। (हनुमान, मैनाक से)
तुलसीदास, रामचरितमानस, सुंदरकांड
रामचरितमानस में
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 1 से पहले की चौपाई
समुद्र ने सोचा कि यह रघुपति का दूत है, और मैनाक से कहा, तुम इसकी थकान उतारने वाले बनो।
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥1॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड, दोहा 1
हनुमान ने उसे हाथ से छुआ, फिर प्रणाम किया और कहा, राम का काम किए बिना मुझे आराम कहाँ।
मानस में यह पूरा प्रसंग दो पंक्तियों का है। वहाँ न पहाड़ को धक्का देने की बात है, न इंद्र के पंख काटने की कथा, न इंद्र का वरदान।
दूसरी रामकथाओं में
खेल में यह पल पानी से उठा पहाड़ पर आता है, और वहाँ इसे दूसरी रामकथाओं में भी पढ़ा जा सकता है।
भानुभक्त रामायण
पहाड़ इस तरह उठता है जैसे कोई जानी पहचानी चीज़ सामने आ गई हो।
चोटी पर बर्फ़ नहीं है, पर सोने जैसी चमक ज़रूर है।
पहाड़ पानी से निकलकर सिर उठाता है, जैसे कोई पड़ोसी दरवाज़े से झाँकता हो।
वह रुकने को कहता है, और जवाब में सिर्फ़ एक हाथ उठता है, धन्यवाद का।
भाषा सीधी है और चाल गाने जैसी, इसलिए यह पल जल्दी बीत जाता है।
भानुभक्त रामायण, नेपाली · भानुभक्त रामायणश्लोक और उनकी संख्या आईआईटी कानपुर के पाठ से हैं। वाल्मीकि रामायण का यह पाठ दक्षिण की परंपरा का है, जिसमें सुंदरकांड 68 सर्गों का है; बड़ौदा के समीक्षित संस्करण में सर्ग संख्या कुछ अलग है। श्लोकों का अर्थ सीधी हिंदी में दिया गया है।
सुंदरकांड के और पात्र
- सुरसानागों की माता, जिसने देवताओं के कहने पर हनुमान को परखा
- सिंहिकापरछाईं पकड़ने वाली राक्षसी
- लंकिनीलंका नगर की रखवाली, जिसे हनुमान ने एक मुक्का मारा
- मंदोदरीरावण की रानी, जिसे हनुमान ने पल भर के लिए सीता समझ लिया
- त्रिजटाबूढ़ी राक्षसी, जिसने राक्षसों के अंत का सपना देखा
- विभीषणरावण का छोटा भाई, जिसने भरे दरबार में कहा कि दूत को मारा नहीं जाता
- अक्षय कुमाररावण का बेटा, जो सोने के रथ पर हनुमान से लड़ने आया