उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · माघ कृष्ण चतुर्थी
सकट चौथ 2027
Sakat Chauth 2027
माघ की ठंडी रात, तिल की गंध, और बच्चों के नाम एक माँ का निर्जल दिन।
सकट चौथ 2027 में 25 जनवरी, सोमवार को है। माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि 25 जनवरी, सुबह 8:11 से 26 जनवरी, सुबह 6:01 तक है। चाँद रात 9:12 निकलेगा। समय नई दिल्ली के हैं।
धप। धप। धप। ओखली में मूसल गिर रहा है।
भीतर भुने हुए तिल और गुड़ की डली। कूटते कूटते दोनों एक हो जाते हैं।
रसोई की खिड़की पर कोहरा जमा है। चूल्हे पर शकरकंद उबल रही है।
माँ ने सुबह से पानी भी नहीं पिया। फिर भी कूटना उन्हीं के हाथ में है।
आँगन में तिलकुट का एक छोटा सा बकरा बनकर तैयार है। बच्चा उसकी गर्दन पर उँगली फेरकर हँसता है।
रात ठंडी है और चाँद देर से आएगा। लोटे में जल भरकर रख दिया गया है।
हर माँ के पास इस रात की अपनी कथा है। किसी के पास कुम्हार का आवा, किसी के पास पीपल पर टँगा दूल्हा।
2027 में कब
सकट चौथ 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़25 जनवरी, सोमवार
तिथिमाघ कृष्ण चतुर्थी25 जनवरी, सुबह 8:11 से 26 जनवरी, सुबह 6:01 तक
नक्षत्रपूर्वा फाल्गुनीसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 7:13
सूर्यास्तशाम 5:54
चंद्रोदयरात 9:12
- चंद्रोदय
- रात 9:12नई दिल्ली में चाँद निकलने का समय। बादल हों तो इसी समय अर्घ्य देते हैं।
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शुभकामना
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पहचान
सकट चौथ क्या है
सकट चौथ माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी का व्रत है, उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के हिसाब से; अमांत पंचांग वाले महाराष्ट्र और गुजरात में यही दिन पौष की संकष्टी है। सकट शब्द संकट का बिगड़ा रूप है, और इसे संकट चौथ, तिलकुटा या तिलकुट चौथ, तिल चौथ, माही या माघी चौथ और वक्रतुंडी चतुर्थी भी कहते हैं। संकष्टी की सूची में यह लंबोदर गणेश की चौथ है, और पंचांगों में इसे साल की सबसे बड़ी संकष्टी कहा गया है। माँएँ यह व्रत अपने बच्चों के लिए रखती हैं, उनकी लंबी उम्र और उन पर से संकट टलने के लिए, और बहुत सी माँएँ दिन भर पानी भी नहीं पीतीं। इस दिन गणेश, सकट माता और चाँद की पूजा होती है। कहा जाता है कि जो हर महीने की चौथ न रख सके, वह बस माघ की यह एक चौथ रख ले, तो उसे साल भर की चौथों का फल मिलता है। व्रत उस दिन होता है जिस दिन चतुर्थी तिथि में चाँद उगे, और रात को चाँद को अर्घ्य देकर खुलता है। चाँद निकलने का समय यह पन्ना ऊपर दिखाता है।
कथा
सकट चौथ की कथा
सकट चौथ की सबसे ज़्यादा सुनी जाने वाली कथा एक कुम्हार के आवे की है, यानी उस भट्ठी की जिसमें मिट्टी के बर्तन पकते हैं। लोक में कहते हैं, एक नगर में एक कुम्हार था। एक बार उसने बर्तन बनाकर आवे में लगाए, पर आवा पका ही नहीं। हारकर वह राजा के पास गया। राजा ने राजपुरोहित को बुलाया, और पुरोहित ने कहा, हर बार आवा लगाने से पहले नगर के किसी एक घर से एक बच्चे की बलि दी जाए, तो आवा पकेगा। राजा ने हाँ कह दी, और रोज़ किसी न किसी घर का बच्चा जाने लगा।
फिर एक बुढ़िया की बारी आई। उसका एक ही बेटा था, बुढ़ापे का अकेला सहारा। वह उसे भेजना नहीं चाहती थी, पर राजा का हुक्म था। वह दिन सकट चौथ का था। बुढ़िया ने बेटे को सकट की सुपारी और दूब का बीड़ा दिया और कहा, आवे में जाकर गणेश जी का नाम लेते रहना, सकट माता तुम्हारी रक्षा करेंगी। फिर वह ख़ुद पूजा में लग गई और सकट माता से बेटे के लिए प्रार्थना करती रही।
उस रात कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था। जो आवा कई कई दिनों में पकता था, वह एक ही रात में पक गया। सुबह कुम्हार ने आवा खोला तो बर्तन पके रखे थे, और बुढ़िया का बेटा उनके बीच ठीक ठाक था, उसे आँच भी नहीं लगी थी। और कथा कहती है कि जिन बच्चों की पहले बलि दी गई थी, वे भी जी उठे। उस दिन से नगर के लोग सकट माता को मानने लगे और यह व्रत रखने लगे।
दूसरी कथा एक साहूकारनी की है। साहूकार और साहूकारनी के कोई बच्चा नहीं था। सकट के दिन साहूकारनी पड़ोसन के घर गई, जो पूजा कर रही थी, और पूछा कि इस व्रत से क्या मिलता है। पड़ोसन ने कहा, अन्न, धन, सुहाग और बेटा। साहूकारनी ने मन्नत मानी कि बच्चा हुआ तो सवा सेर तिलकुट चढ़ाऊँगी। बेटा हुआ, फिर बेटे के ब्याह की मन्नत भी मानी, पर तिलकुट कभी नहीं चढ़ाया। ब्याह के दिन चौथ देव ने दूल्हे को फेरों के बीच से उठाकर पीपल के पेड़ पर पहुँचा दिया।
दुल्हन अपनी सखियों के साथ गणगौर के लिए दूब लेने वन में गई, तो पीपल से आवाज़ आई: ओ मेरी अर्धब्याही! घर लौटकर वह सूखने लगी। उसकी माँ पेड़ के पास गई, तो वहाँ हाथों में मेहँदी और सिर पर सेहरा बाँधे दामाद मिला, जिसने बताया कि उसकी माँ ने चौथ माता की मन्नत तोड़ी थी। साहूकारनी ने भूल मानी और ढाई मन तिलकुट की मन्नत मानी। गणेश प्रसन्न हुए, दूल्हा फेरों में लौटा, ब्याह पूरा हुआ, और साहूकारनी ने ढाई मन तिलकुट चढ़ाकर जीवन भर व्रत रखने का वचन लिया। तब से पूरा नगर तिलकुट से सकट का व्रत रखने लगा।
व्रत
सकट चौथ का व्रत कैसे रखें
- सुबह नहाकर माँ बच्चों की ख़ैर के लिए व्रत का संकल्प लेती है।
- व्रत ज़्यादातर निर्जल होता है, यानी सुबह से चाँद निकलने तक न खाना, न पानी।
- शाम को गोधूलि के समय, जब गायें घर लौटती हैं, गणेश के दर्शन करके उनके नाम लेते हैं।
- पूजा के बाद सकट की कथा सुनते हैं, और फिर चाँद की राह देखते हैं।
- चाँद को अर्घ्य देने के बाद ही माँ कुछ खाती है, और व्रत चढ़ाए हुए प्रसाद से खुलता है।
पारण: व्रत कैसे खोलें
सकट चौथ का व्रत रात को चाँद निकलने के बाद ही खुलता है। पहले कथा सुनते हैं, फिर लोटे से चाँद को जल का अर्घ्य देते हैं और तिल का लड्डू चढ़ाते हैं। व्रत उसी प्रसाद से खुलता है: कहीं चाँद को चढ़े तिल के लड्डू से, और सुल्तानपुर जैसे ज़िलों में तिल गुड़ और शकरकंद की चीज़ों से। माँ रात के अर्घ्य के बाद ही खाना खाती है। चाँद निकलने का समय यह पन्ना ऊपर दिखाता है।
कहाँ कैसे
सकट चौथ कहाँ कैसे मनाया जाता है
पूर्वी उत्तर प्रदेश
सुल्तानपुर जैसे ज़िलों में माँएँ बेटों की लंबी उम्र के लिए निर्जल व्रत रखती हैं। काले तिल, गुड़, शकरकंद और रामदाने की चीज़ें सकट महरानी के आगे रखी जाती हैं, गणेश और सकट देवी की पूजा होती है, और चाँद देखने के बाद इन्हीं तिल गुड़ और शकरकंद से व्रत खुलता है।
चौथ का बरवाड़ा, सवाई माधोपुर, राजस्थान
यहाँ लगभग ग्यारह सौ फ़ुट ऊँची पहाड़ी पर चौथ माता का मंदिर है, जहाँ लगभग सात सौ सीढ़ियाँ चढ़कर पहुँचते हैं; साथ में गणेश और भैरव की मूर्तियाँ भी हैं। मंदिर की कथा कहती है कि राजा भीम सिंह ने माघ कृष्ण चतुर्थी को ही यहाँ माता की मूर्ति स्थापित की थी, और तिलकुटा चौथ पर यहाँ बड़ा मेला भरता है।
उत्तर भारत के घर
जिस घर में उस बरस बेटे का ब्याह हुआ हो या बेटा जन्मा हो, वहाँ सवा किलो तिल और उतनी ही चीनी या गुड़ कूटकर तेरह लड्डू बनते हैं, जो बहू सास को बायने में देती है। कई जगह गौरी और गणेश की स्थापना होती है और वे साल भर घर में रहते हैं।
महाराष्ट्र और अमांत पंचांग वाले घर
यहाँ यही चौथ पौष की लंबोदर संकष्टी कहलाती है, और बाक़ी संकष्टियों की तरह चाँद को अर्घ्य देकर खुलती है।
रीत
सकट चौथ के दिन क्या करते हैं
- तिल भूनकर गुड़ के साथ कूटते हैं। इसी तिलकुट से गणेश की पूजा होती है, यही बायने में जाता है, और यही खाया जाता है।
- पीढ़े पर मिट्टी की एक डली रखकर उसे गणेश मानते हैं और उसी की पूजा करते हैं; कई घरों में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर गणेश की मूर्ति या तस्वीर रखते हैं।
- गणेश को रोली, कलावा, हल्दी, दूर्वा, चंदन, फूल, धूप और घी चढ़ता है, और तिल गुड़ का भोग लगता है।
- पूजा में गणेश अथर्वशीर्ष या गणेश चालीसा पढ़ते हैं।
- कई जगह तिलकुट का बकरा बनाते हैं, उसकी पूजा होती है, और घर का बच्चा उसकी गर्दन काटता है; फिर वह प्रसाद में बँटता है।
- तिल, ईख, गंजी, भंटा, यानी बैंगन, अमरूद, गुड़ और घी बाँस की एक डलिया में रात भर ढककर रखते हैं, जिसे पहार कहते हैं; अगले दिन बेटा उसे खोलता है, और फिर वह घर वालों और रिश्तेदारों में बँटता है।
- रात को चाँद निकलने पर लोटे से उसे जल का अर्घ्य देते हैं और तिल का लड्डू चढ़ाते हैं; कई जगह शाम को चाँद को दूध भी चढ़ता है।
रसोई
सकट चौथ का खाना
- तिलकुट भुने तिल और गुड़ को कूटकर बनी मिठाई, इस दिन का सबसे बड़ा भोग।
- तिल के लड्डू चाँद को चढ़ते हैं और इन्हीं से व्रत खुलता है।
- शकरकंद उबली हुई, तिल गुड़ के साथ व्रत खोलने का खाना।
- रामदाना इसकी चीज़ें सकट महरानी के आगे रखी जाती हैं।
सवाल जवाब
सकट चौथ 2027: पूछे जाने वाले सवाल
सकट चौथ 2027 कब है?
सकट चौथ 2027 में 25 जनवरी, सोमवार को है। माघ कृष्ण चतुर्थी तिथि 25 जनवरी, सुबह 8:11 से 26 जनवरी, सुबह 6:01 तक है। चाँद रात 9:12 निकलेगा। समय नई दिल्ली के हैं।
सकट चौथ का व्रत कौन रखता है?
ज़्यादातर माँएँ, अपने बच्चों की लंबी उम्र और भलाई के लिए। कहा जाता है कि जो हर महीने की चौथ न रख पाए, वह माघ की यह एक चौथ ज़रूर रख ले।
क्या सकट चौथ में पानी पी सकते हैं?
ज़्यादातर माँएँ इसे निर्जल रखती हैं, यानी सुबह से चाँद निकलने तक पानी भी नहीं। पानी चाँद को अर्घ्य देने के बाद ही लेती हैं।
सकट चौथ पर तिल और गुड़ क्यों चढ़ाते हैं?
इसीलिए इसका नाम तिलकुटा चौथ है: भुने तिल गुड़ के साथ कूटकर तिलकुट बनता है, जिससे गणेश की पूजा होती है, जो बायने में जाता है और जिससे व्रत खुलता है। साहूकारनी वाली कथा में भी मन्नत तिलकुट की ही है।
सकट चौथ का व्रत कैसे खोलें?
चाँद निकलने पर उसे लोटे से जल का अर्घ्य दें और तिल का लड्डू चढ़ाएँ, फिर उसी प्रसाद से व्रत खोलें। कई घरों में तिल गुड़ और शकरकंद से व्रत खुलता है।
तिलकुट का बकरा क्या होता है?
कई जगह तिलकुट से एक बकरा बनाते हैं, उसकी पूजा होती है, और घर का बच्चा उसकी गर्दन काटता है। फिर वह प्रसाद में बँटता है।
सकट चौथ पर किस गणेश की पूजा होती है?
संकष्टी की महीनेवार सूची में माघ की यह चौथ लंबोदर गणेश की है, यानी बड़े पेट वाले गणेश की। साथ में सकट माता और चाँद की पूजा होती है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Patrika: सकट चौथ की कथा (कुम्हार और बुढ़िया)कुम्हार के आवे और बुढ़िया के बेटे की पूरी कथा
- BhaktiBharat: सकट चौथ व्रत कथा, एक साहूकार और साहूकारनीसाहूकारनी की मन्नत, पीपल पर दूल्हा, ढाई मन तिलकुट
- भारतकोश: सकट चौथ (वक्रतुण्डी चौथ)दूसरे नाम, मिट्टी की डली के गणेश, तिलकुट, पहार की डलिया, तिलकुट का बकरा, तेरह लड्डू का बायना, अर्घ्य के बाद खाना
- Patrika: तिलकुट चौथ, माघ चतुर्थी व्रतपूजा की विधि, गोधूलि, चाँद को तिल का लड्डू, उसी से पारण, साल भर की चौथों का फल
- Amar Ujala: सुल्तानपुर में बेटों की लंबी उम्र के लिए निर्जल व्रतनिर्जल व्रत, सकट महरानी, तिल गुड़, शकरकंद और रामदाना
- Patrika: सवाई माधोपुर का चौथ माता मंदिरचौथ का बरवाड़ा, सात सौ सीढ़ियाँ, माघ कृष्ण चतुर्थी को स्थापना, तिलकुटा चौथ का मेला
- Drik Panchang: Sankashti Chaturthi dates (explanatory text)माघ पूर्णिमांत और पौष अमांत, साल की सबसे बड़ी संकष्टी, उत्तर भारत में सकट चौथ
- Drik Panchang: Sankashti Chaturthi Vrat Katha Listमाघ की संकष्टी लंबोदर गणेश की
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।