उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · पौष शुक्ल सप्तमी
गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2027
Guru Gobind Singh Jayanti 2027
पोह की ठंडी रात। पटना की एक हवेली में रोशनी उतरती है।
गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2027 में 15 जनवरी, शुक्रवार को है। पौष शुक्ल सप्तमी तिथि 14 जनवरी, दोपहर 1:59 से 15 जनवरी, दोपहर 2:14 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
ठंड इतनी है कि बोलते ही साँस दिखती है।
पोह का महीना। लोग शॉल में लिपटे, एक लंबी कतार में, धीरे धीरे आगे सरकते हैं।
भीतर, शीशे के पीछे, एक छोटा पंघूड़ा रखा है, यानी पालना। चार पाये, उन पर सोने के पत्तर।
पास में एक छोटी सी तलवार, लोहे के चार तीर, और हाथीदाँत की बनी बचपन की चप्पलें।
एक दादी पोते के कान में कहती हैं: इतने छोटे थे वे, जब इसी आँगन में खेलते थे।
कहते हैं, यहीं एक फ़कीर ने उनके आगे दो कटोरे रखे थे। एक में दूध, एक में पानी।
बालक ने कोई एक नहीं चुना। उसने मुस्कुराकर दोनों पर हाथ रख दिए।
2027 में कब
गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़15 जनवरी, शुक्रवार
तिथिपौष शुक्ल सप्तमी14 जनवरी, दोपहर 1:59 से 15 जनवरी, दोपहर 2:14 तक
नक्षत्ररेवतीसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 7:15
सूर्यास्तशाम 5:46
चंद्रोदयसुबह 11:17
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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शुभकामना
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पहचान
गुरु गोबिंद सिंह जयंती क्या है
गुरु गोबिंद सिंह जयंती सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी, का प्रकाश पर्व है, यानी उनके जन्म का गुरपुरब। गुरपुरब का मतलब है गुरु से जुड़ा दिन, और प्रकाश का मतलब रोशनी: गुरु का इस दुनिया में आना। SGPC के अनुसार उनका जन्म पटना साहिब में पोह सुदी सप्तमी को हुआ, यानी पोह (पौष) महीने के उजाले पखवाड़े की सातवीं तिथि को, बिक्रमी संवत 1723 में। नानकशाही कैलेंडर ने इस दिन को अंग्रेज़ी कैलेंडर की एक तय तारीख़ पर रखना चाहा था, पर उस पर मतभेद रहा, और आज यह दिन चाँद वाली इसी पुरानी तिथि से गिना जाता है। इसीलिए हर बरस यह दिसंबर या जनवरी में आता है, पर तारीख़ बदलती रहती है।
कथा
गुरु गोबिंद सिंह जयंती की कथा
सिख इतिहास में आता है कि पटना में सालस राय जौहरी नाम के एक सिख की हवेली थी। वे गुरु नानक देव जी के बड़े भक्त थे। उसी जगह, संवत 1723 की पोह सुदी सप्तमी को, माता गुजरी जी के घर एक बालक आया। पिता थे नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी। बालक का नाम गोबिंद रखा गया, और बचपन के उनके नाम गोबिंद दास और गोबिंद राय, दोनों मिलते हैं।
सिख परंपरा में एक कथा कही जाती है। पीर भीखन शाह नाम के एक मुसलमान फ़कीर को, कहते हैं, एक रोशनी ने पटना की राह दिखाई। वे बालक को देखने आए और उसके आगे दो कटोरे रखे: एक में दूध, एक में पानी। एक हिंदुओं की निशानी था, एक मुसलमानों की। सब देख रहे थे कि बालक किस कटोरे को छूता है। बालक मुस्कुराया, और उसने दोनों कटोरों पर हाथ रख दिए।
बचपन के शुरू के बरस पटना में बीते। फिर पिता के कहने पर परिवार पंजाब लौटा, और बालक चक्क नानकी पहुँचे, जिसे आज आनंदपुर साहिब कहते हैं। वहाँ उन्होंने पंजाबी, ब्रज, संस्कृत और फ़ारसी पढ़ी। फिर 1675 में दिल्ली में पिता गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हुई, और नौ बरस की उमर में गोबिंद राय सिखों के गुरु बने।
आगे की कथा सिख इतिहास की बड़ी कथा है। 1699 की बैसाखी पर आनंदपुर में उन्होंने खालसा सजाया और कहा, खालसा मेरा अपना रूप है। उन्होंने कलम भी उठाई। परंपरा उन्हें चंडी दी वार, जाप साहिब, अकाल उसतत, सवैये, औरंगज़ेब के नाम फ़ारसी में लिखा ज़फ़रनामा और अपनी कथा बचित्तर नाटक की रचना देती है। 1708 में नांदेड़ में, जोती जोत समाने से पहले, उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का सदा का गुरु कहा।
उनतालीस लंकाएँ
रामकथाओं में गुरु गोबिंद सिंह जयंती
उनतालीस लंकाएँ जिन रामकथाओं से बनी है, उनमें से ये इस दिन को छूती हैं। हर कथा के नाम पर उसका अपना पन्ना है।
रामावतार
ब्रजभाषा · Ramavatar (Dasam Granth)
दसम ग्रंथ में चौबीस अवतार नाम की एक लंबी रचना है, और उसका बीसवाँ हिस्सा है राम अवतार, जिसमें 864 छंद हैं। यह ब्रजभाषा में है और गुरमुखी लिपि में लिखा है, और इसमें कवि का नाम स्याम आता है। सिख परंपरा इसे गुरु गोबिंद सिंह जी की रचना मानती है; पर दसम ग्रंथ के कुछ हिस्सों के लेखक को लेकर सिखों में बहस भी रही है, और कुछ लोग कुछ हिस्सों को उनके दरबार के कवियों का लिखा मानते हैं। रचना के आख़िरी छंद कहते हैं कि यह संवत 1755 में आनंदपुर में, सतलुज के किनारे, नैना देवी के मंदिर के पास पूरी हुई। इसका आख़िरी सवैया और दोहा आज भी सिखों के रोज़ के नितनेम में, शाम की बाणी रहरास साहिब में पढ़े जाते हैं।
कहाँ कैसे
गुरु गोबिंद सिंह जयंती: कहाँ और कैसे
पटना साहिब, बिहार
तख़्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब, सिखों के पाँच तख़्तों में से एक, ठीक उस जगह है जहाँ गुरु जी जन्मे। यहाँ मुख्य दीवान सजता है, सुबह से शबद कीर्तन चलता है, संगत अरदास करती है, और जन्म की घड़ी आधी रात को आतिशबाज़ी से याद की जाती है।
पटना साहिब का लंगर
बड़े गुरपुरबों पर देश और दुनिया से लाखों लोग पटना पहुँचते हैं। सेवादार हर दिन लाखों लोगों के लिए लंगर चलाते हैं।
पंजाब और दुनिया भर के गुरुद्वारे
गुरपुरब से पहले अखंड पाठ, एक दिन पहले नगर कीर्तन, और गुरपुरब की सुबह तड़के आसा दी वार के कीर्तन से दीवान शुरू होता है।
दूर बसी संगत
जो पटना नहीं पहुँच पाते, वे तख़्त साहिब के दीवान को सीधे वीडियो पर देखते और सुनते हैं।
रीत
गुरु गोबिंद सिंह जयंती के दिन क्या करते हैं
- गुरपुरब से पहले गुरुद्वारे में अखंड पाठ रखा जाता है, यानी गुरु ग्रंथ साहिब का बिना रुके, शुरू से आख़िर तक पाठ।
- गुरपुरब से एक दिन पहले नगर कीर्तन निकलता है: सबसे आगे पंज प्यारे, और उनके पीछे पालकी में गुरु ग्रंथ साहिब।
- गुरपुरब की सुबह, अँधेरे में ही, आसा दी वार के कीर्तन से दीवान शुरू होता है।
- फिर कथा होती है, और गुरु जी के जीवन और सिख इतिहास की बात सुनाई जाती है।
- अरदास के बाद कड़ाह प्रसाद बँटता है, यानी मीठा हलवा।
- फिर लंगर होता है, जिसमें हर आने वाले को, बिना किसी भेद के, एक साथ खाना मिलता है।
- कीर्तन देर रात तक चलता है।
रसोई
गुरु गोबिंद सिंह जयंती का खाना
- कड़ाह प्रसाद अरदास के बाद बँटने वाला मीठा हलवा।
- लंगर गुरुद्वारे की साझी रसोई का खाना, जो हर आने वाले के लिए है।
सवाल जवाब
गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2027: पूछे जाने वाले सवाल
गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2027 कब है?
गुरु गोबिंद सिंह जयंती 2027 में 15 जनवरी, शुक्रवार को है। पौष शुक्ल सप्तमी तिथि 14 जनवरी, दोपहर 1:59 से 15 जनवरी, दोपहर 2:14 तक है। समय नई दिल्ली के हैं।
गुरु गोबिंद सिंह जी का जन्म कहाँ हुआ था?
पटना, बिहार में, उस जगह जहाँ आज तख़्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब है। यह सिखों के पाँच तख़्तों में से एक है।
गुरु गोबिंद सिंह जयंती हर साल अलग तारीख़ पर क्यों आती है?
क्योंकि यह चाँद वाली तिथि, पोह सुदी सप्तमी, से गिनी जाती है। नानकशाही कैलेंडर ने एक तय तारीख़ रखी थी, पर उस पर मतभेद रहा, और तिथि वाली गिनती ही चलती है।
गुरु गोबिंद सिंह जी के माता पिता कौन थे?
पिता नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी, और माता, माता गुजरी जी।
गुरु गोबिंद सिंह जी कितनी उमर में गुरु बने?
नौ बरस की उमर में, 1675 में, जब दिल्ली में उनके पिता गुरु तेग बहादुर जी की शहादत हुई।
दसम ग्रंथ किसकी रचना है?
सिख परंपरा इसे गुरु गोबिंद सिंह जी की रचनाओं का ग्रंथ मानती है, जिसे बाद में भाई मनी सिंह ने एक जगह इकट्ठा किया। इसके कुछ हिस्सों के लेखक को लेकर सिखों में बहस रही है। इसके जाप साहिब, त्व प्रसाद सवैये और बेंती चौपई रोज़ के नितनेम में पढ़े जाते हैं।
पटना साहिब में गुरु जी की कौन सी चीज़ें रखी हैं?
सोने के पत्तर चढ़ा चार पायों वाला एक छोटा पालना, एक छोटी तलवार, लोहे के चार तीर, और बचपन की हाथीदाँत की चप्पलें।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Guru Gobind Singh, SikhiWikiजन्म, माता पिता, पीर भीखन शाह की कथा, आनंदपुर, गुरु बनना, रचनाएँ, नांदेड़
- Patna Sahib, SikhiWikiसालस राय की हवेली, पाँच तख़्त, रखी हुई चीज़ें
- Gurpurbs, SGPCपोह सुदी सप्तमी, अखंड पाठ, नगर कीर्तन, आसा दी वार, कथा, कड़ाह प्रसाद, लंगर
- Guru Gobind Jayanti date, Drik Panchangपौष शुक्ल सप्तमी संवत 1723, नानकशाही तारीख़ पर मतभेद
- Dasam Granth, SikhiWikiदसम ग्रंथ, भाई मनी सिंह, लेखक पर बहस, नितनेम की बाणियाँ
- Chaubis Avtar, SikhiWikiराम अवतार के 864 छंद, संवत 1755, आनंदपुर, नैना देवी, नितनेम का सवैया दोहा
- 358th birth anniversary of Guru Gobind Singh celebrated in Bihar, News on AIRतख़्त पटना साहिब का दीवान, शबद कीर्तन, अरदास, आधी रात की आतिशबाज़ी
- Parkash Purab, SikhNetपटना में लाखों के लिए लंगर, सीधा वीडियो
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।