उनतालीस लंकाएँ पंचांग 2027 · मकर संक्रांति
लोहड़ी 2027
Lohri 2027
पोह की आख़िरी रात। एक आग, और उसके गिर्द एक पुराना नाम।
लोहड़ी 2027 में 14 जनवरी, गुरुवार को है। सूर्य रात 9:10 पर मकर राशि में जाता है। समय नई दिल्ली के हैं।
दरवाज़े पर खटखट। फिर बहुत सी पतली आवाज़ें एक साथ।
एक बच्चा आगे होकर गाता है। बाक़ी सब पीछे से एक लंबा हो भरते हैं।
गीत में एक नाम बार बार लौटता है: दुल्ला भट्टी।
घर की औरत मुट्ठी भर रेवड़ी और मूँगफली झोली में डालती है। आज किसी को ख़ाली हाथ नहीं लौटाते।
साँझ ढलते ही चौक में लकड़ियाँ जलती हैं। लोग आग में तिल, गुड़ और रेवड़ी फेंकते हैं।
आग चटकती है। गन्ने की एक पोरी गरम होकर फट जाती है। ढोल बजता है।
गीत उस आदमी का है जो कोई देवता नहीं था। पर लोक ने उसे हर बरस की इस आग में जगह दी है।
2027 में कब
लोहड़ी 2027: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़14 जनवरी, गुरुवार
संक्रांतिसूर्य मकर राशि मेंरात 9:10
नक्षत्रउत्तरा भाद्रपदसूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 7:15
सूर्यास्तशाम 5:45
चंद्रोदयसुबह 10:47
मुफ़्त · Manu Vishranti Calendar
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पहचान
लोहड़ी क्या है
लोहड़ी पंजाब का सर्दी का त्योहार है, जो माघी यानी मकर संक्रांति से एक रात पहले आता है। पंजाबी महीनों में यह पोह महीने का आख़िरी दिन है, और अगले दिन से माघ। यह दिन चाँद की तिथि से नहीं, सूरज से चलता है, इसलिए हर बरस लगभग एक ही जगह, जनवरी के बीच में आता है। साँझ को गाँव या मोहल्ले के चौक में आग जलती है, उसमें तिल, गुड़ और रेवड़ी डाली जाती है, लोग उसके फेरे लेते हैं, गाते हैं और नाचते हैं। भारत के पंजाब के साथ हरियाणा, हिमाचल और जम्मू में भी लोहड़ी रखी जाती है, और सिंधी लोग इसे लाल लोई कहते हैं। जिस घर में नई बहू आई हो या बच्चा जन्मा हो, वहाँ की लोहड़ी और भी बड़ी होती है।
कथा
लोहड़ी की कथा
लोहड़ी के गीतों में एक नाम हमेशा आता है: दुल्ला भट्टी। उनका पूरा नाम राय अब्दुल्ला ख़ान भट्टी बताया जाता है। वे सोलहवीं सदी में पंजाब के सांदल बार इलाक़े के थे, जो रावी और चिनाब नदियों के बीच है और आज पाकिस्तान में है। उनका घराना मुसलमान राजपूत ज़मींदारों का था। कहते हैं, उनके पिता और दादा ने मुग़लों के लगान का विरोध किया था, और दुल्ला के जन्म से पहले ही उन्हें मार दिया गया था। जब माँ लाधी ने बड़े होते बेटे को यह सच बताया, तो दुल्ला ने बादशाह अकबर के राज के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए।
लोक में उनकी पहचान ऐसे आदमी की है जो अमीर सौदागरों से छीनता था और गाँव के ग़रीबों में बाँट देता था। इसीलिए आज के लोग उन्हें पंजाब का रॉबिन हुड कहते हैं। सबसे ज़्यादा कही जाने वाली कथा दो लड़कियों की है, सुंदरी और मुंदरी। एक कथा में वे एक ग़रीब ब्राह्मण की बेटियाँ हैं, जिनकी सगाई तो हो चुकी थी पर बाप के पास ब्याह का ख़र्च नहीं था, और इलाक़े के हाकिमों की नज़र उन पर थी। दूसरी कथा में एक ही लड़की है, सुंदरी, जिसे मुग़ल सिपाही उठा ले गए थे ताकि बेच सकें। कथा के रूप अलग अलग हैं, पर अंत एक है।
दुल्ला ने बाप से कहा, तेरी बेटियाँ मेरी बेटियाँ। उन्होंने लोगों से गुड़ और अनाज इकट्ठा किया, रास्ते भर आग जलवाई ताकि बारात सुरक्षित निकल सके, और अपने ख़र्च पर ब्याह करवाया। लोक मानता है कि उसी ब्याह की आग से लोहड़ी की आग चली। 'सुंदर मुंदरिए' वाला गीत इसी ब्याह को गाता है: लड़कियों का नाम, दुल्ला का नाम, आग और मीठे का ज़िक्र, और आख़िर में लोहड़ी की भेंट की माँग।
दुल्ला भट्टी का अंत अच्छा नहीं हुआ। कई लड़ाइयों के बाद मुग़ल अफ़सरों ने सुलह की बात के बहाने उन्हें बुलाया, पकड़ा, और सन 1599 में लाहौर में फाँसी दे दी गई। लाहौर में उनकी फाँसी की कहानी पर भी लोक कथा का रंग चढ़ा हुआ है। पर पिंडी भट्टियाँ में आज भी उनके गीत गाए जाते हैं, और सरहद के इस पार हर लोहड़ी पर।
कहाँ कैसे
लोहड़ी कहाँ कैसे मनाया जाता है
पंजाब के गाँव और शहर
साँझ को चौक में बड़ी आग जलती है। बच्चे दिन में घर घर जाकर दुल्ला भट्टी के गीत गाते हैं और रेवड़ी, मूँगफली, फुल्लियाँ या पैसे पाते हैं। अगले दिन माघी पर लोग गुरुद्वारे जाते हैं।
जम्मू
यहाँ छोटे बच्चे एक नक़ली मोर बनाते हैं, जिसे छज्जा कहते हैं, और उसे लेकर घर घर जाते हैं। हिरन नाच होता है, और बच्चे मूँगफली, सूखे मेवे और टॉफ़ियों की मालाएँ पहनते हैं।
सिंधी घर
सिंधी लोग इसे लाल लोई कहते हैं। बच्चे दादा दादी और बुआ मौसी से लकड़ियाँ लाते हैं, रात को आग जलती है और सब उसके गिर्द नाचते हैं।
हिमाचल और हरियाणा
हिमाचल में लोहड़ी पर छुट्टी रहती है। हरियाणा में छुट्टी नहीं होती, पर साँझ की आग वहाँ भी जलती है।
लाहौर, पुरानी याद में
बँटवारे से पहले लाहौर में भाटी चौक और लोहारी चौक जैसी जगहों पर लोहड़ी के मेले और बड़ी आग लगती थी। आज वहाँ बड़े बूढ़े इसे याद करते हैं, पर नई पीढ़ी इसे कम जानती है।
रीत
लोहड़ी के दिन क्या करते हैं
- दिन में बच्चे टोली बनाकर घर घर जाते हैं, एक गाता है और बाक़ी 'हो' भरते हैं; घर वाले उन्हें मीठा या पैसे देते हैं।
- बच्चों को ख़ाली हाथ लौटाना अच्छा नहीं माना जाता, और जिस घर में नई बहू या नया बच्चा हो, वहाँ से ज़्यादा माँगा जाता है।
- इकट्ठा की गई चीज़ों को भी लोहड़ी कहते हैं, और रात को वे सबमें बाँटी जाती हैं।
- साँझ को चौक में आग जलाई जाती है।
- आग में तिल, गुड़, मिश्री, रेवड़ी, मूँगफली और फुल्लियाँ डाली जाती हैं।
- कुछ लोग आग के फेरे लेकर उसे प्रणाम करते हैं, और कुछ आग के चारों ओर दूध और पानी डालकर सूरज का धन्यवाद करते हैं।
- फिर आग को घेरकर गीत और भंगड़ा देर रात तक चलता है, जब तक आग बुझ न जाए।
रसोई
लोहड़ी का खाना
- सरसों का साग और मक्की की रोटी लोहड़ी की रात का मुख्य खाना।
- रेवड़ी और गज्जक तिल और गुड़ की मिठाइयाँ, जो आग में भी जाती हैं और मेहमानों को भी दी जाती हैं।
- मूँगफली और फुल्लियाँ भुनी मूँगफली और मक्के के फूले दाने।
- तिलचौली तिल वाले चावल।
- नई फ़सल के भुने भुट्टे और गन्ना आग में गरम करके खाए जाते हैं।
सवाल जवाब
लोहड़ी 2027: पूछे जाने वाले सवाल
लोहड़ी 2027 कब है?
लोहड़ी 2027 में 14 जनवरी, गुरुवार को है। सूर्य रात 9:10 पर मकर राशि में जाता है। समय नई दिल्ली के हैं।
लोहड़ी क्यों मनाई जाती है?
लोहड़ी सर्दी के ढलने और पोह महीने के ख़त्म होने की रात है, जब गन्ने की फ़सल कटती है। आग जलाकर उसमें नई फ़सल का तिल, गुड़ और मीठा डाला जाता है, और मिलकर गाया नाचा जाता है।
दुल्ला भट्टी कौन थे?
दुल्ला भट्टी, यानी राय अब्दुल्ला ख़ान भट्टी, सोलहवीं सदी में पंजाब के सांदल बार इलाक़े के एक ज़मींदार थे, जिन्होंने अकबर के राज के ख़िलाफ़ बग़ावत की। लोक कथा में वे ग़रीबों के रखवाले हैं, जिन्होंने सुंदरी मुंदरी का ब्याह करवाया। सन 1599 में लाहौर में उन्हें फाँसी दी गई।
लोहड़ी की आग में क्या डालते हैं?
आग में तिल, गुड़, मिश्री, रेवड़ी, मूँगफली और फुल्लियाँ डाली जाती हैं। यही चीज़ें बाद में मेहमानों को भी दी जाती हैं।
पहली लोहड़ी क्या होती है?
जिस घर में उस बरस शादी हुई हो या बच्चा जन्मा हो, उसकी पहली लोहड़ी बड़ी मानी जाती है। ऐसे घरों से बच्चे गाकर ज़्यादा भेंट माँगते हैं।
लोहड़ी और मकर संक्रांति में क्या फ़र्क़ है?
लोहड़ी मकर संक्रांति से पहले की रात है, पोह का आख़िरी दिन। अगला दिन, माघ का पहला दिन, पंजाब में माघी कहलाता है, और वही मकर संक्रांति है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Punjab's Robinhood Dulla Bhatti: Why Lohri is celebrated, SabrangIndiaदुल्ला का घराना, माँ लाधी, सुंदरी मुंदरी, गुड़ अनाज और आग, 1599 की फाँसी, बच्चों के गीत
- How the Robin Hood-esque Dulla Bhatti became a Lohri folk hero, Homegrownराय अब्दुल्ला ख़ान भट्टी, सांदल बार, अकबर, सुंदरी की दूसरी कथा, लाहौर
- The Fire We Once Shared: Lohri and the cultural memory of Lahore, The Friday Timesपोह का आख़िरी दिन, लाहौर के चौक, पिंडी भट्टियाँ, गन्ना आग में, रेवड़ी गच्चक
- Lohri, Wikipediaमाघी से पहले की रात, सूरज वाला पंचांग, आग की रीत, घर घर गीत, जम्मू का छज्जा, लाल लोई, खाना
- One festival, different names, WIONमाघी लोहड़ी के अगले दिन, गुरुद्वारे जाना
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2027 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।