पंचांग 2026
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2026
Guru Tegh Bahadur Shaheedi Diwas 2026
सिर दे दिया, पर अपना प्रण नहीं दिया।
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2026 में 24 नवंबर, मंगलवार को है।
बाहर चाँदनी चौक का शोर है। रिक्शे, ठेले, पुकारें।
सड़क के एक कोने का नाम है मतीदास चौक।
गुरुद्वारे की सीढ़ियों पर जूते उतरते हैं। सिर ढक जाते हैं।
भीतर क़दम रखते ही शोर पीछे छूट जाता है।
गुरबाणी की धीमी आवाज़। कोई कुछ नहीं कहता।
इसी जगह एक गुरु ने सिर दिया था। अपने लिए नहीं, दूसरों के धर्म के लिए।
और उनसे पहले, उनकी आँखों के सामने, तीन सिख गए थे।
2026 में कब
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2026: तारीख़, तिथि और मुहूर्त
तारीख़24 नवंबर, मंगलवार
नक्षत्रकृत्तिकासूर्योदय के समय
सूर्योदयसुबह 6:51
सूर्यास्तशाम 5:25
चंद्रोदयशाम 4:57
अगले बरस गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 24 नवंबर 2027, बुधवार को है: गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2027, तारीख़ और मुहूर्त
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सारे समय नई दिल्ली के हैं, सूर्य और चंद्रमा की असली चाल से निकाले गए। दूसरे शहरों में कुछ मिनट या कभी एक दिन का फ़र्क़ हो सकता है। शुभ काम का समय अपने पंडित जी से पक्का कर लें।
पहचान
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस क्या है
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी, की शहादत का दिन है। 1675 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के हुक्म पर दिल्ली के चाँदनी चौक में उनका सिर काटा गया। सिख इस दिन को शहीदी पुरब कहते हैं, और यह याद का दिन है, सिर झुकाने का दिन। इसकी तारीख़ पर सिख संस्थाओं में अलग अलग राय रही है: नानकशाही कैलेंडर इसे अंग्रेज़ी कैलेंडर की एक तय तारीख़ पर रखता है, और अकाल तख़्त ने एक बरस इसे अलग दिन रखने का फ़ैसला दिया था। स्रोतों में भी शहादत की अंग्रेज़ी तारीख़ दो तरह से मिलती है।
कथा
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस की कथा
सिख इतिहास में आता है कि उन दिनों कश्मीर के पंडितों को डर था कि उनसे ज़बरदस्ती धर्म बदलवाया जाएगा। उनका एक जत्था चक्क नानकी पहुँचा, जिसे गुरु तेग बहादुर जी ने ख़ुद बसाया था और जिसे आज आनंदपुर साहिब कहते हैं। वहाँ नौ बरस के गोबिंद राय ने अपने पिता से पूछा: ग़रीब ब्राह्मणों की रक्षा के लिए आपसे बेहतर कौन होगा? गुरु जी पंडितों की ओर से निकले। रास्ते में वे पकड़े गए, कई दिन आँखों पर पट्टी बाँधकर रखे गए, और फिर लोहे के पिंजरे में दिल्ली लाए गए। वहाँ उनके आगे रखा गया: इस्लाम क़बूल करो, या कोई करामात दिखाओ, या मौत। गुरु जी ने दोनों बातें मना कर दीं। जान देना उन्हें मंज़ूर था।
उनके साथ तीन सिख थे, और गुरु जी के सामने ही उन्हें मारा गया। भाई मती दास, जो जेहलम ज़िले के करयाला गाँव के थे, आरी से चीर दिए गए। सिख परंपरा कहती है कि उन्होंने इक ओंकार कहा और जपुजी साहिब का पाठ शुरू किया, और आरी चलती रही, पर पाठ नहीं रुका। उनके छोटे भाई, भाई सती दास, को रुई में लपेटकर जला दिया गया। भाई दयाला को उबलते पानी की देग में डाल दिया गया। जहाँ यह हुआ, वह कोतवाली की जगह थी, और आज वह चौक भाई मती दास के नाम से जाना जाता है।
फिर चाँदनी चौक में, सबके सामने, गुरु जी का सिर काटा गया। जहाँ यह हुआ, वहाँ आज गुरुद्वारा सीस गंज साहिब है। उसके बाद आँधी उठी। भाई जैता गुरु जी का सिर लेकर आनंदपुर साहिब पहुँचे, और वहाँ जिस जगह सिर का संस्कार हुआ, वहाँ भी आज गुरुद्वारा सीस गंज है। धड़ को भाई लक्खी शाह बंजारा अपने घर ले गए। उन्होंने उसे चारपाई पर रखा और अपने पूरे घर को आग लगा दी, ताकि किसी को पता न चले कि संस्कार हो रहा है। उस जगह आज गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब है।
बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी ने बचित्तर नाटक में, जो दसम ग्रंथ में है और उनकी रचना मानी जाती है, पिता की शहादत को इन शब्दों में याद किया: तिलक जंञू राखा प्रभ ता का। कीनो बडो कलू महि साका॥ साधन हेति इती जिनि करी। सीसु दीआ पर सी न उचरी॥१३॥ धरम हेति साका जिनि कीआ। सीसु दीआ पर सिररु न दीआ॥ (बचित्तर नाटक, अध्याय 5, छंद 13 और 14) अर्थ: उन्होंने उनके तिलक और जनेऊ की रक्षा की, और इस कलियुग में बड़ा साका किया, यानी ऐसा बलिदान जो सदा याद रहे। संतों के लिए उन्होंने इतना किया कि सिर दे दिया, पर मुँह से उफ़ तक न निकली। धर्म के लिए जिसने यह साका किया, उसने सिर दिया, पर अपना प्रण नहीं दिया। इसीलिए सिख उन्हें हिंद की चादर कहते हैं, यानी वह चादर जिसने हिंद को ढककर बचाया।
कहाँ कैसे
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस: कहाँ और कैसे
गुरुद्वारा सीस गंज साहिब, चाँदनी चौक, दिल्ली
जहाँ गुरु जी का सिर काटा गया। इस दिन हज़ारों लोग यहाँ पहुँचते हैं, और गुरबाणी के बीच शहीदों को चुपचाप याद करते हैं। शहादत की बड़ी बरसियों पर यहाँ से रकाब गंज साहिब तक नगर कीर्तन जाता है।
गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब, नई दिल्ली
जहाँ भाई लक्खी शाह बंजारा ने अपना घर जलाकर गुरु जी के धड़ का संस्कार किया। शहादत की बड़ी बरसियों पर सीस गंज साहिब से चला नगर कीर्तन यहीं आकर पूरा होता है।
आनंदपुर साहिब, पंजाब
चक्क नानकी, जिसे गुरु जी ने बसाया और जहाँ से वे दिल्ली के लिए निकले। यहाँ का गुरुद्वारा सीस गंज वह जगह है जहाँ भाई जैता का लाया हुआ सिर अग्नि को सौंपा गया।
श्री हरमंदिर साहिब, अमृतसर
SGPC यहाँ गुरुद्वारा मंजी साहिब के दीवान हॉल में अखंड पाठ रखती है, हरमंदिर साहिब के रागी गुरबाणी कीर्तन करते हैं, और गुरुद्वारा शहीद गंज साहिब में हुकमनामा पढ़ा जाता है।
याद
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस कैसे याद किया जाता है
- गुरुद्वारों में अखंड पाठ रखा जाता है, यानी गुरु ग्रंथ साहिब का बिना रुके, शुरू से आख़िर तक पाठ।
- रागी गुरबाणी का कीर्तन करते हैं, और संगत चुपचाप सुनती है।
- हुकमनामा पढ़ा जाता है, यानी गुरु ग्रंथ साहिब से उस दिन का वाक।
- कथा में शहादत की पूरी बात सुनाई जाती है: कश्मीरी पंडितों की फ़रियाद, दिल्ली का पिंजरा, और तीन सिखों की क़ुर्बानी।
- संगत गुरु ग्रंथ साहिब के आगे माथा टेकती है और शहीदों को याद करती है।
- दिल्ली में सीस गंज साहिब पर संगत जुटती है, और शहादत की बड़ी बरसियों पर वहाँ से रकाब गंज साहिब तक नगर कीर्तन जाता है।
सवाल जवाब
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2026: पूछे जाने वाले सवाल
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2026 कब है?
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2026 में 24 नवंबर, मंगलवार को है।
गुरु तेग बहादुर जी को हिंद की चादर क्यों कहते हैं?
क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्म की रक्षा के लिए अपना सिर दिया। सिख कहते हैं कि वे पूरे हिंद को ढकने और बचाने वाली चादर बने।
गुरु तेग बहादुर जी की शहादत कहाँ हुई थी?
1675 में दिल्ली के चाँदनी चौक में, जहाँ आज गुरुद्वारा सीस गंज साहिब है।
भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाला कौन थे?
वे तीन सिख जो गुरु जी के साथ दिल्ली में शहीद हुए, गुरु जी की आँखों के सामने। भाई मती दास आरी से चीरे गए, उनके छोटे भाई भाई सती दास रुई में लपेटकर जलाए गए, और भाई दयाला उबलते पानी की देग में डाले गए।
गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब किस बात की याद में है?
उस जगह की, जहाँ भाई लक्खी शाह बंजारा ने गुरु जी के धड़ को अपने घर में रखकर पूरे घर को आग लगा दी, ताकि चुपचाप संस्कार हो सके।
गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु तेग बहादुर जी की कितनी बाणी है?
उनके 116 पद आदि ग्रंथ, यानी गुरु ग्रंथ साहिब, में हैं। वे 1664 से 1675 तक सिखों के गुरु रहे।
गुरु तेग बहादुर जी का सिर आनंदपुर कौन ले गया?
भाई जैता। वे दिल्ली से सिर लेकर आनंदपुर साहिब पहुँचे, और वहाँ उसका संस्कार हुआ, जहाँ आज गुरुद्वारा सीस गंज है।
स्रोत
यह पन्ना किन स्रोतों से मिलाकर लिखा गया
- Guru Tegh Bahadur, SikhiWikiकश्मीरी पंडित, गोबिंद राय के शब्द, गिरफ़्तारी, पिंजरा, तीन सिख, भाई जैता, भाई लक्खी शाह, हिंद की चादर, सीस गंज और रकाब गंज
- Martyrdom of Guru Tegh Bahadur, SikhiWikiधर्म, करामात या मौत की शर्त, तीनों सिखों की शहादत के तरीक़े, बचित्तर नाटक का अर्थ
- Bhai Mati Das, SikhiWikiकरयाला गाँव, कोतवाली, आरी, जपुजी साहिब का पाठ, भाई सती दास और भाई दयाला
- Anandpur Sahib, SikhiWikiचक्क नानकी बसाना, आनंदपुर का गुरुद्वारा सीस गंज, भाई जैता का सिर लाना
- Guru Tegh Bahadur, Encyclopaedia Britannicaनौवें गुरु 1664 से 1675, आदि ग्रंथ में 116 पद, धार्मिक आज़ादी, दिल्ली
- Devotees gather at Gurdwara Sis Ganj Sahib, The Tribuneसीस गंज पर संगत, गुरबाणी, मतीदास चौक, सीस गंज से रकाब गंज तक नगर कीर्तन
- Akhand path marks martyrdom day of Guru Tegh Bahadur, The TribuneSGPC का अखंड पाठ, रागियों का कीर्तन, हुकमनामा
- Martyrdom day date, SikhNetनानकशाही तारीख़ और अकाल तख़्त के फ़ैसले पर मतभेद
तिथि, नक्षत्र और समय: स्विस एफ़ेमेरिस से, लाहिड़ी अयनांश, नई दिल्ली। त्योहारों की तारीख़ें भारत सरकार की 2026 की छुट्टियों की सूची और प्रचलित पंचांगों से मिलाई गई हैं।